Tuesday, 30 December 2014

खिचड़ी -3

                                                                   खिचड़ी -3 
वर्ष - 2014 को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र (भारत )में सत्ता परिवर्तन के लिए हमेशा याद किया जाएगा। देश की जनता ने धर्म जाति रंगभेद भाषा से उपर उठ कर जिस तरह बीजेपी को बहुमत दिया उससे से ये तो साफ़ हो गया के लोकतंत्र में जनता ही भगवन है। अब देखना यह है कि जनता की आशाएं कब और कैसे पूरी होती हैं। बेशक कुछ लोग इसे मोदी की लच्छे दर भाषणों का प्रभाव कहें या फिर मोदी लहर। एक लम्बे अरसे से परिवर्तन चाह रही जनता ने अपना काम बखूबी किया है। अब देखना ये है के मोदी सरकार जनता के विश्वास पर कितना खरा उतरती है। 
कर्ण पब्लिक स्कूल का वार्षिक उत्सव मनाया जाना है। सभी बच्चों  ,अध्यापकों  और स्टाफ ने खूब मेह्नत की है। धुंध और सर्दी के बावजूद बच्चों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखाई देती।  मेरा सलाम !   हमारे इन नन्हें -नन्हें बच्चे को  जो केवल अपनी परफॉरमेंस देने के लिए धुंध और सर्दी से लोहा ले रहे हैं। यही तो कमाल है हमारी शिक्षा प्रणाली का ,जो हमें ज्ञान के साथ -साथ जीवन में आने वाली विपदाओं से लड़ना और संघर्ष करना सिखाती है। हमें आगे बढ़ना सिखाती है। हमारे बच्चों में लग्न ,मेहनत ,जज़्बा  और बढ़िया perform करने की spirit छिपी हुई है ,जिसे हम सब को मिल कर को केवल देखना ही नहीं सराहना भी होगा। जब बच्चे रिहर्सल कर रहे होते हैं और मुझे जब भी उनकी रिहर्सल देखने का मौका मिलता है तो उनकी आँखों के अंदर एक ज़बरदस्त चमक दिखाई देती है ,और उस चमक को मैं बखूबी पढ़ भी पाता हूँ। सच मानिये उनकी आँखें ये पूछना चाहती हैं के क्या मैं अच्छा परफॉर्म कर रहा हूँ या नहीं। और जब उन्हें इस बात का एहसास हो जाता है के वो अच्छा कर रहे हैं तो वो सब और अच्छा करने के लिए  अपनी जान लगा देते हैं। उदेश्य यही है के हमें मिल जुल कर बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभा को खोजना होगा, समझना होगा और तराशना होगा।क्या पता और कौन जाने इन्हीं में कोई सचिन ,धोनी ,कल्पना चावला, सायना या कोई हमारा भावी नेता या प्रधानमंत्री छिपा हुआ हो।  जब हम डिमांड के हिसाब से वाक्यों को घड़ने लगते हैं तो उसकी सरलता और सात्विकता ख़त्म हो जाती है !  तो क्या डिमांड के अनुसार चीज़ोँ या वक्तव्यों को चाशनी लगा कर प्रस्तुत किया जाना चाहिए ?मेरे कहने का मतलब भी यही है के चाहे वो लेखन हो या फिर जीवन जहाँ हम जटिलताओं की डिमांड के अनुसार  चाशनी लगाने लगते हैं तो सरलता और सादगी ख़त्म हो जाती है।
 2014 ने जाते जाते दुनिया को ऐसी ख़बरें दी हैं जिनसे दिल दहल उठा है। मलेशिया के पूर्वी तटीय इलाकों में बाढ़ ,पाकिस्तान में स्कूली बच्चों पर आतंकी हमला ,कुछ दिन पहले असम में आतंकी हमला और Air Asia के विमान का समुद्र में समा जाना। इन हमलों और त्रासदियों ने अंदर तक हिला के रख दिया है। किन्तु जीवन की सच्चाई तो यही है कि चलने का नाम ही ज़िंदगी है। इन हादसों में मारे गए सभी लोगों को मेरी श्रद्धांजलि। 
अलविदा -2014  
सभी को मेरी शुभकामनायें ! 

खिचड़ी -2

                                                            खिचड़ी -2 
  दिसम्बर महीने में दोस्तों  को comments किए और कुछ अपनी वाल पर पोस्ट किया ! इन को पढ़ रहा था तो लगा के social media के बेशक़ लाख नुकसान हों लेकिन ये आपको दोस्तों ,विचारों ,संवेदनाओं और खासतौर पर दुनिया से जोड़े रखता है।दोस्त और दुनिया के लोग क्या सोच रहे हैं हम उससे वाकिफ होते हैं। "खिचड़ी -1 " की तरह ही इस बार भी दोस्तों की wall पर जो post किया वो "खिचड़ी -2" के रूप में तैयार है। 2014 बस जाने वाला है आओ हम सब मिलकर नववर्ष 2015 का स्वागत करें।
धर्म परिवर्तन।  कुछ समझ नहीं आ रहा के देश में ये चल क्या रहा है। "न्म दिन मुबारक हो विशाल भाई। आपका जीवन हमेशा खुशियों से भरा रहे।"य हो। अच्छा डॉक्टर साहेब मुंबई पहुँच गए ! पेंदर जी  अगर आप के पास समय हो तो बात करें ? वैसे आप हैं कहाँ? Mr. India की तरह कहाँ गायब हो जाते हो ? कोई खबर नहीं ?र ते मन च रहन्दा ही है डॉ साहेब।  शिखर के छूने के सुख को मनुष्य जो पहाड़ों पर विजय पताका फहरा रहा है। और जहाँ -जहाँ मनुष्य पहुंचा है वहां सत्यानाश हुआ है। बेशक वो धरती ,आसमान ,समुद्र या फिर पहाड़ हों !
ये सब कुछ इसी तरह होता रहेगा ,जब तक हम सुनने वाली भीड़ का हिस्सा बने रहेंगे। जोगेन्दर भाई जीवन में खटास और मिठास के साथ संतुलन बना रहे। यही शुभकामना।देश में अच्छा माहौल बनाने की ज़रुरत है। आखिर हम कब तक इसी तरह की राजनीति करते रहेंगे। ये वास्तव में दुखद समझौता ही है।
लो थोड़ा घूमना हो जाए !कल मिलते हैं।लिक परिवार की ओर से ऋचा को जन्म दिन मुबारक हो।
बरदस्त फोटो है डॉ साहेब !  ये बताता है के जीना  चाहते हो अभी उपमन्यु। उपमन्यु अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा संभल जाओ ! 
कभी -कभी आतंक का दूसरा नाम लगता है पुलिस।  साल में एक दो बार चंडीगढ़ जाना होता है,शहर में घुसते ही चौंक पर शिकारी कुत्तों की तरह सूंघते पुलिस वालों को देख कर सच में डर लगने लगता है। अब रोका के अब रोका। साल में एक बार वो पकड़ ही लेते हैं। कभी हेड लाइट बुझी है तो कभी हेड लाइट क्यों जला रखी है ? चलान भुगतो या फिर जेब गर्म करो।बिलकुल नहीं डरते हैं घूस लेते हुए। पता नहीं क्यों।
 Pakistan में स्कूली बच्चों पर हुए हमले ने अंदर तक हिला के रख दिया है। सोच रहा हूँ के आदमी इतना निर्दयी भी हो सकता है ?अमानवीयता की अति है ये तो !
 हुत मर्म है आप की बात में ! "माँ " दरवाजा तकती रह गई-बच्चे स्कूल से सीधे जन्नत चले गए ।।साभार प्रदीप राठौर। क  उम्दा कविता।हुत ख़ूब जनाब ! सच्ची कहानी ! शादियों में अक्सर ऐसा सुनने को मिलता है। यही नहीं लोग अपनी प्लेटों में इतना भर लेते है मानो सदियों से भूखे हों !
 न्म दिन की मुबारक कबूल हो हमारी ! जीवन में हर ख़ुशी मिले आप को ये कामना है हमारी ! जन्म दिन मुबारक़ हो सुनील जी।  न्म दिन मुबारक़ हो प्रियंका ! जन्मदिन मुबारक़ हो समीर जी !न्मदिन मुबारक़ हो अशोक भाई !पुरानी तस्वीरें। ये तस्वीर अमानत की शादी वाले दिन खींची थी। न्म दिन मुबारक हो परविंदर पल जी  ! इसी के साथ नव वर्ष की शुभकामनायें भी स्वीकार करें। प्रभु आप को व् परिवार को खुशियां बख्शें।
 दुःख सुख ,लाभ हानि और जीवन मृत्यु हमारी रोज़मर्रा ज़िंदगी का हिस्सा हैं। 2014 बीत चुका है।  पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो यही लगता है के आज पुरे विश्व में शांति और मानवता की ज़रुरत है।  नया साल 2015 आने वाला है। आओ सब मिल कर पूरे विश्व कल्याण के लिए दुआ करें और इस के लिए सार्थक प्रयास भी करें ।
 आप सब को नववर्ष २०१५ के लिए शुभकामनायें !

Thursday, 11 December 2014

स्कूल फीस

                                                                 स्कूल फीस 
 स्कूल असेंबली का ये नियम था के हर रोज़ एक अध्यापक और कुछ बच्चे कहानी ,गीत,चुटकले ,कविता ,यात्रा संस्मरण ,सद्वचन ,आज की बात ,ताज़ा ख़बरें या फिर किसी current topic पर ज़रूर बोलते। इस के बाद प्रिंसिपल बच्चों से मुख़ातिब होते और अपने अनुभव और कुछ नई बातें बच्चों के साथ सांझा करते । आज स्कूल असेंबली को पाँच बच्चों ने conduct किया था। रीना , अमर ,ज्योति ,पवन और माया।  पांचों की presentation कमाल की थी। टीचर्स और बच्चों ने खूब enjoy किया। तालियों की गड़गड़ाहट से पाँचों बच्चे फूले नहीं समा रहे थे।
प्रिंसिपल ने बच्चों की सराहना करते हुए कहा ,"आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं। आप ही में से कोई कल का सचिन ,धोनी,सायना ,कल्पना या मलाला हो सकते हैं। " अपनी बात को समझाने के उदेश्य से प्रिंसिपल ने आगे बोलते हुए कहा  ,"मैं आप को बता देना चाहता हूँ के अगर जोश और जुनून साथ हो तो कोई भी विपदा आड़े नहीं आती। बस ज़रुरत है अपने आप को सही दिशा में तैयार करने की। " अपनी speech के दौरान घडी की तरफ देखते हुए प्रिंसिपल बोले,"स्कूल आप सब के लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहाँ आप अपनी तैयारी सही ढंग से कर सकते हैं।"
इसी दौरान एकाउंट्स क्लर्क मीनू हाथ में एक लिस्ट लिए प्रिंसिपल के पास आकर खड़ी हो गई। प्रिंसिपल ने अपने चश्मे में से मीनू को देखा और उसने वो लिस्ट प्रिंसिपल को थमा दी। लिस्ट पर नज़र दौडाते हुए उन्होंने अपना टॉपिक change करते हुए कहा ,"देखो बेटा आज महीने की 12 तारीख हो गई है लेकिन अभी तक बहुत सारे बच्चों की फीस जमा नहीं हुई है। जिन बच्चों की फीस अभी तक जमा नहीं हुई है वो अपने पेरेंट्स को फीस जमा करवाने के लिए बोलें। आप लोगों सेबातें तो बहुत करनी थी लेकिन असेंबली का समय पूरा हो चुका है। May God  bless you all .आप से कल फिर मु लाकात होती है।" यह कहते हुए प्रिंसिपल ने अपनी वाणी को विराम दे दिया।
अपने कमरे में पहुँचते ही प्रिंसिपल ने टेबल पर रखी घंटी पर अपनी अंगुली दबा दी।  आवाज़ सुन कर रमेश  ने भागते हुए कमरे में प्रवेश किया। अपने ही स्टाइल में उसने पूछा ,"हाँ जी सर ?" प्रिंसिपल ने रमेश को एक पर्ची थमाते हुए कहा ,"इन बच्चों को जल्दी से मेरे पास भेजो। " पर्ची पर उन पाँचों के नाम थे। रमेश बाहर जा चुका था। प्रिंसिपल असेंबली वाले बच्चों को गिफ्ट देने के लिए अलमारी में से कुछ निकालने लगे। बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रिंसिपल कोई न कोई गिफ्ट देते रहते।
अपनी कुर्सी पर बैठने के बाद खिड़की में से वो बाहर की तरफ देखने लगे। उन्होंने बाहर से ज्योति को आते हुए देखा। ज्योति उन पांचों बच्चों में से एक थी। वो धीरे -धीरे प्रिंसिपल के कमरे की और बढ़ रही थी। उसके चेहरे पर उदासी साफ नज़र आ रही थी। प्रिंसिपल के कमरे में प्रवेश करते ही वो पीली पड़ गई। प्रिंसिपल ने बच्ची को घबराते हुए देखा तो वो मुस्कुराते हुए बोले , " बेटा आप को मालूम है के मैंने आप को आज किस लिए बुलाया है ?"
अपनी गर्दन हिलाते हुए हुए वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। "अरे बेटा क्या हुआ ?आप इस तरह से क्यों रो……?" इस से पहले के प्रिंसिपल अपनी बात पूरी करते ,ज्योति रोते -रोते बोली , "मेरे पापा कह रहे थे के फीस जल्द ही जमा करवा देंगे। पापा बीमार हैं। वो आज कल काम पर भी नहीं जाते। वो कह रहे थे के पैसे आते ही फीस जमा करवा देंगे। सर , क्लर्क मैडम कह रही थी कि जिन बच्चों की फीस जमा नहीं हुई है उनको दिसंबर टेस्ट में नहीं बैठने दिया जाएगा।"
कल से दिसंबर टेस्ट शुरू होने थे। ज्योति को इनाम के रूप में दिया जाने वाला पेन प्रिंसिपल के हाथ से छिटक कर नीचे गिर गया। उसने नन्ही ज्योति को अपनी छाती से लगा लिया।
बच्ची डर के मारे अभी भी रोए जा रही थी !


खिचड़ी-1

                                                               खिचड़ी-1 
ल किरयाने की एक दुकान पर खड़ा था। लाला जी किसी ग्राहक से बातचीत में मशगूल थे। वो उस को बताने लगे के दुकानदारी आसान काम नहीं है। कहने लगे के दुकान में जितना मर्ज़ी सामान डाल लो कोई न कोई ग्राहक खाली ज़रूर जाता है। ग्राहक उनसे पूछ बैठा ,"ऐसी कौन सी चीज़ है जो आप की दुकान में नहीं है ?" लाला जी सोचने लगे लेकिन उन्हें ऐसी कोई चीज़ याद न आई। दिमाग पर बहुत ज़ोर डालने के बाद बोले ,"हाँ सच ! कल एक ग्राहक खिचड़ी मांगने लगा। लेकिन मेरी दुकान में खिचड़ी का पैकेट नहीं था। "
"खिचड़ी का क्या है इसको बनाना तो बहुत ही आसान है। कोई भी दो -तीन दाल और चावल mix कर के दे देते।" लाला के साथ खड़ा व्यक्ति बोला। " मैं भी जाणू हूँ के खिचड़ी क्या होती है लेकिन वो तो किसी कंपनी का पैकेट ही मांग रहा था। " लाला जी  ने सफाई देते हुए कहा ।
घर पहुंचा तो फेसबुक पर हिंदी में लिखे comments देख कर मेरा भी मन हुआ के हिंदी  में कमेंट्स किए जाएं तो पढ़ने वाले के लिए आसान हो जाएगा। वर्ना कई बार तो अर्थ ही बदल जाता है। कंप्यूटर में हाथ तंग होने के कारण मैं ये कर नहीं पा रहा था। मैंने एक file खोल कर किसी तरह हिंदी में लिख कर copy किया और लगा face Book पर  paste करने। थोड़ी देर के बाद जब हिंदी लिखने वाली file पर पहुंचा तो  वहां बहुत बढ़िया खिचड़ी पक चुकी थी। आप भी चख कर देखिए कैसी है ये खिचड़ी !
 ज़ुल्फ़िकार भाई , अगर 27 साल के बाद दोबारा "आगरा बाज़ार " में काम करने का मौका मिलता है तो अच्छा होगा। बहुत सारी यादें जुड़ी हैं इस  नाटक के साथ। शुभकामनायें।   मोहिन्दर जी को मेरा सादर प्रणाम ज़रूर पहुँचाना। च्चन जी पहले बधाई.... …… ! बच्चन जी ,दिल से लिखते हैं आप। जीवन में सामजस्य बना कर रखना भी कोई अपराध है क्या ? ज़ुली, मोहिन्दर जी को मेरा सादर प्रणाम ज़रूर पहुँचाना। क्या शादी के बाद किसी दूसरी स्त्री से प्यार बनाना जुर्म है ? वैसे लोग ये भी तो कहते हैं के प्यार कभी एक तरफ़ा नहीं होता। बरदस्त ! विलक्षण के जन्म दिवस पर पूरे जोशी परिवार को मुबारक। प्रभू विलक्षण को सद्बुद्धि व् दीर्घायु बख्शें। धाई अंकल ! परन्तु समझ नहीं आ रहा के आप ने किसी बनिए की बही  की तरह ऐसा क्यों लिखा कि किसी को समझ ही न आये। लो अच्छा है ………इसी तरह कारवां बनता रहे। पुनः  विलक्षण को जन्मदिन मुबारक हो ! "Happy B 'Day"  हुत ही पेचीदगी है आप की इस बात में। क्या आप का ये मानना है कि पुरुष फ़िज़ूल खर्ची  है और उसी की वजह से परिवार ऋणी होता है।क समय के बाद पारिवारिक रिश्ते टूटने और बिखरने ही लगते हैं ,बेशक कारण अलग अलग हो सकते हैं। ब माया है ! दलाव मे समय तो लगता ही है। ढ़िया है जोगेन्दर भाई ! हा हा हा हाहाहाःहाहा हा हा हा हा ! ता नहीं पादने के नाम पर सब का पाद क्यों निकल जाता है। हुत अच्छे ! किसी कहानी का ज़िक्र करें तो और भी अच्छा होगा ललित जी ! ये एक बढ़िया प्रयास है समाज में फैली बुराइयों और कचरे को दूर करने के लिए किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा। निफा टीम को बधाई ! शा करता हूँ आप दोनों सकुशल हैं ! सुप्रभात ! हाँ मोहिन्दर आप  की कहानी के हिसाब से तो ये ज़बरदस्त लग रहा है ! श्विनी ,लोगों को खुजली लगाने का ये अच्छा तरीका है। लेकिन बच्चों को तो आज तक यही पढ़ाया गया के "जनसंख्या "अभिशाप है। ये एक ऐसा भूत है जो प्रगति को डकार जाता है। और गरीबों को आगे नहीं बढ़ने देता।  हन जी ये हमारे और अंकल के बीच की गुफ्तगू थी। खैर ! मेरी यही शुभकामना है के almighty आप सब पर खुशियों रुपी पुष्प वर्षा सदैव करते रहें। मिठाई देखकर मुहं में पानी आ रहा है।
 बचपन से यहीं गाना सुनते आ रहे हैं……, "हम भी अगर बच्चे होते खाने को मिलते लड्डू। "
जय हो !

Friday, 5 December 2014

गर्म ख़ून (भाग -4)

                                                                    गर्म ख़ून ( भाग -4 )
पति को  बेहोश देखकर वो बदहवास चौधरी मलखान के कमरे की ओर चल पड़ी। मलखान भी अपने कमरे में बेसुध पड़ा था। मंद रौशनी में भी उसका बदन कुश्ती के लिए तैयार किसी पहलवान की तरह दमक रहा था। एक बारगी तो सुंदरी बाहर की ओर चल पड़ी। दरवाज़े से बाहर अपने पति को बेसुध पड़े देखा तो न जाने सुंदरी के मन में कैसा बदलाव आया। उसने अंदर से दरवाज़ा धीरे से बंद कर लिया। अपने कपडे उतारे और मलखान के बिस्तर पर जा पहुंची। जैसे ही उसने मलखान को स्पर्श किया ,वो नींद में बोला ,"मैं न कहता था सुंदरी के तू ज़रूर आएगी। " इसी के साथ ही मलखान ने सुंदरी को अपने पाश में ऐसे जकड़ा मानो उसके टुकड़े कर देगा। सुंदरी भी जैसे टूट कर चकनाचूर हो जाना चाहती थी। जब सब कुछ निपट गया तो सुंदरी के कानों में मलखान के वो शब्द गूंजने लगे ,"हमारे कुँए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन तुझ से इश्क़ हो गया है सुंदरी। " सुंदरी तो जैसे आज सच में आज़ाद हो गई थी। सुंदरी की आँखें किसी प्रतिशोध लेने वाली नागिन की तरह चमक रहीं थीं। वो मलखान की तरफ पलटी और धीरे से मलखान के कान में गुनगुनाने लगी ," जा तुझे आज़ाद किया , तुझे माफ़ किया चौधरी , लेकिन तेरी जात पर प्यार नहीं घिन आती है चौधरी !"
  पोह फटने लगी थी। चन्द्रमा की चांदनी जैसे आज ही सारा चमकना चाहती थी। सुंदरी पूरी तरह से बिखर चुकी थी। फिर भी उसने अपने आप को सँभाला। मलखान की ओर एक ज़हरीली नज़र से देखते हुए सुंदरी मंद मंद मुस्कुराने लगी। बेसुध पड़े मलखान को वो पूरी तरह निचोड़ चुकी थी। सुंदरी का व्यक्तित्व बिल्कुल दो धारी तलवार की तरह लग  रहा था। मलखान बदहवास और बेसुध अपनी चारपाई पर पड़ा था। बिल्कुल एक नंगी लाश की तरह।  सुंदरी ने धीरे से मलखान का चुम्बन लिया दरवाज़ा खोला और खेत के बीचों बीच मोरनी की तरह नाचते हुए अपनी कोठरी में जा पहुंची। 
 कुछ समय बाद गांव में ये बात आग की तरह फैल गई के सुंदरी पेट से है । गांव ओर  परिवार के लोग खुश थे। नरेश तो फूला नहीं समा रहा था। वो जहाँ से भी गुजरता अपना सीना चौड़ा कर लेता। नरेश की मर्दानगी पर शक करने वाले लौंडे उसे बधाई देते नहीं थकते थे। नरेश जब भी रात को सुंदरी से मिलता वो उसके पेट पर धीरे धीरे अंगुलियां फेरते हुए बस एक ही बात दोहराता ," मैं न कहता था सुंदरी भगवान के घर देर है , अंधेर नहीं ।" नरेश की ये बात सुन कर सुंदरी भी धीरे से उसकी हाँ में हाँ मिलाती और नरेश के बालों में अपने सख्त  हाथों की अंगुलियां फेरने लगती।
एक अर्सा  हो गया था इन बातों को। सुंदरी का बेटा दिलावर जवान हो चुका था। वो गांव में जहाँ से भी गुज़रता ,अगड़ों के छोकरों को रश्क होने लगता। पुरे इलाके में दिलावर जैसा कोई न था। सभी कहते माँ पर गया है। माँ की तरह बिल्कुल गोरा चिट्टा। अगड़ों की जवान छोकरियाँ भी अपनी खिड़कियों की दरारों में से उसे देखती और ठंडी ठंडी आहें भरती। अगड़ों को दिलावर एक आँख न सुहाता। जब भी मौका मिलता वो उसे घेर लेते। दिलावर तो जैसे फौलाद का बना हुआ था। दस -बारह से अकेला भीड़ जाता। हर बार एक दो को फोड़ कर ही उसको शांती मिलती। पिछले एक वर्ष से करीब २० लोगों को अस्पताल पहुंचा चुका था। दिलवार ने पिछले हफ्ते ही मलखान के बेटे का सिर भी फोड़ दिया था। आज उसी सिलसिले में पंचायत रखी गई थी। 
पंचायत में सभी पंच और सरपंच अपना अपना स्थान ग्रहण कर चुके थे। चौपाल खचा खच भरी हुई थी। जगतार ने सब को राम राम कहते हुए बोलना शुरू किया ,"मैं तो बस इतना कहना चाहूँ सूं के सुंदरी के बेटे दिलावर ने जो आतंक फैला राख्या है वो अब सहन नहीं होता। " सुंदरी ने भी अपने घूँघट के पल्लू को मुहँ में से  निकलाते हुए कहा ," अपणी जाण बचाणे का अधिकार भी न है दिलावर नै। सारे अपणे दिल पर हाथ रख कर बताओ के शुरुआत कौन करे है ? आखिर मेरे छोरे का दोष के है जो थम सारे उसकी जान के दुश्मण हो रहे
 हो ?" जगतार इस बार गर्म होते हुए बोला ,"तेरे छोरे ने आतंक फैला राख्या है ,बहुत उबाले मार रह्या है तेरे छोरे का खून। इसी तरह उबाले मारता रहा तो ठंडा होते देर न लगेगी तेरे छोरे का गर्म ख़ून।
सुंदरी रोज़ रोज़ के तानो से तंग आ चुकी थी। पिछले महीने से ये पांचवीं पंचायत थी। जगतार की बात सुन कर रहा न गया उससे । वो अंदर तक टूट गई। सुंदरी तैश में आकर जगतार की तरफ अंगुली उठाते हुए बोली ,"क्यों मेरा मुहं खुलवाओ हो चौधरी !" आज तक गांव में कभी किसी ने इस तरह अगड़ों का विरोध नहीं किया था।  सुंदरी के इस व्यवाहर से सभी सकते में थे। जगतार भी तैश में आ गया और बोला ,"ऐसा क्या ले रही है मुहं में सुंदरी जो उगले नहीं बणदा। " अब की बार सुंदरी चुप थी। पंचायत में खुसरपुसर होने लगी। मलखान जो बहुत देर से चुप बैठा था सहसा खड़ा हो गया।  सुंदरी की तरफ इशारा करते हुए वो बोला ," गर्म ख़ून तो चौधरियां का होता है। ज़्यादा गर्मी दिखावेगा तो ठंडा होते देर न लगेगी। " मलखान के मुहं से ये बात सुन कर सुंदरी के तन -बदन में जैसे आग लग गई। वो चिल्लाते हुए बोली , "उबाले तो मारेगा ही यो खून चौधरी, आखिर यू गर्म ख़ून चौधरी तेरा ही तो है । इब बी ठंडा करणे का जी करे है तो कर लियो ठंडा। ये कहते ही सुंदरी वहां से निकल पड़ी।
 पंचायत में सन्नाटा पसर चुका था ! सभी चौधरी की तरफ देख रहे थे !

Thursday, 4 December 2014

गर्म ख़ून ( भाग -3 )

                              
                                                             गर्म ख़ून  ( भाग -3 ) 
रात को थक हार कर जब भी नरेश और सुंदरी मिलते तो बस एक ही बात करते।आखिर ऐसा कौन सा पाप किया है जो बच्चा नहीं हो रहा हो रहा। नरेश बेशक सुन्दर नहीं था। लेकिन दिल से वो राजा था। उसकी सादगी,शराफत और ईमानदारी का पूरा गांव कायल था। अपनी औकात से ज़्यादा पैसा खर्च कर के नरेश ने दोनों के डॉक्टरी टेस्ट भी करवाए थे। सब कुछ ठीक ठाक था। 
 उस दिन के बाद न जाने क्या हुआ , मलखान ने सुंदरी को कुछ नहीं कहा। सुबह ही खेतों में निकल जाता। दिन भर खेत जोहता। जब थक जाता तो दारू के दो पेग लगा कर प्यार भरे गीत गुनगुनाने लगता। मलखान को  जैसे सच में इश्क़ हो गया था। अब मलखान टुबवेल पर ही सोने लगा था। मलखान की सेवा में लगा नरेश अपने चौधरी में आए इस बदलाव को देख कर हैरान था।  नरेश रात को घर पहुंच कर जैसे ही खाना खाने लगा उसका ध्यान मलखान की ओर चला गया। दुनिया से बेखबर नरेश को भी आज न जाने क्या सूझी। वो सुंदरी के आगे मलखान सिंह का ज़िक्र कर बैठा।  नरेश सुंदरी से बोला ,"आज कल चौधरी को न जाने क्या हो गया है,  हर वक़्त गुनगुनाता रहता है। जब दिल करता है पीने बैठ जाता है। " सुंदरी बिना कोई खास ध्यान दिए नरेश की बातें सुनती रही। आज से पहले नरेश ने बाहर की किसी बात का ज़िक्र घर में नहीं किया था।
 कई दिन इसी तरह बीत गए। एक लम्बे अरसे के बाद आज मलखान सिंह  दुरुस्त नज़र आ रहा था। उसके चाचा के बेटे की शादी थी। दोस्त रिश्तेदार जुड़ने शुरू हो चुके थे। वो आज खुश था के उसके सभी पुराने दोस्त आ रहे हैं। परिवार में जब भी कोई कार्यक्रम होता मलखान के खास दोस्तों की मण्डली टुबवेल पर ही जमती। खेतों के बीचों बीच टयूबवेल के नज़दीक मलखान चारपाई पर बैठा नरेश को हुकुम दिए जा रहा था। गिलास धो लिए न ! सलाद काट लिया ! सोडा फ्रिज में लगा दिया है ! देख बड़ी देर से कुकर की सीटी नहीं बजी ! खेत में से ताज़ी मूली निकाल ला ! बेचारा नरेश अकेली जान फिरकी की तरह कभी इधर तो कभी उधर भाग भाग कर काम किए जा रहा था।
जैसे ही गाड़ी की आवाज़ मलखान सिंह के कान में पड़ी वो  चिल्लाया ,"ओये कुत्ते तुझे कहा था न के यारों के आने से पहले सब कुछ सेट होना चाहिए ! देख जल्दी से पानी का जग टेबल पर रख दे ! " ये कहते-कहते मलखान सिंह ने चारपाई के नीचे रखी जूती में अपने पाँव घुसाए और गाड़ियों की तरफ भाग लिया। खेतों के बीचों बीच धूल उड़ाती गाड़ियां जैसे ही उसके नज़दीक आकर रुकीं मलखान सिंह ने एक मोटी गाली निकाल कर अपने यारों का स्वागत किया। सब ज़ोर का ठाहका लगाते हुए टेबल की और बढ़ गए।
 इससे पहले के शेर सिंह ,जगतार सिंह  ,समर सिंह , किशन सिंह और दलबीर सिंह मलखान के गले मिलते उन्होंने टेबल पर रखे ग्लासों को अपने हाथ में उठाया और चियर्स कहते हुए सब से पहले अपने हलक को तर किया। यही इन के मिलने का स्टाइल भी था। जिस के अड्डे पर मिलते मेजबान पहले से ही ग्लास तैयार रखता।
जब तक नरेश खेत में से मूली तोड़ कर लाता ,सभी के अंदर दो दो पेग जा चुके थे। एक दूसरे से घर परिवार का हालचाल पूछने के बाद जब बच्चों की बातें होने लगी तो मलखान ने सभी के गिलास में एक -एक पेग और डाल दिया। एक ही सांस में पीने के बाद सभी को खाली गिलास दिखाते हुए बोला , "आह !अब थोड़ा सिर घूमा है !" बोतल ख़त्म हो हो चुकी थी। नरेश खाली बोतल उठा कर ले गया और भरी हुई टेबल पर रख गया।
इसी बीच कुकर की सीटी बज गई। मलखान ने नरेश को कुकर टेबल पर रखने को कहा। कुकर में से गैस निकालते हुए मलखान बोला ,"आज ऐसा माल बनाया है के सभी उँगलियाँ चाटते रह जाओगे।" शेर सिंह की तरफ जैसे ही चिकेन की प्लेट आई तो वो मलखान की तारीफ़ करते हुए बोला ,"खुशबू ही इतनी लाजवाब है तो माल तो बढ़िया होगा ही !" शेर सिंह ने माल शब्द पर ज़ोर देकर अपनी बात को कुछ इस तरह कहा के सभी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगे। इस बीच दूसरी बोतल का तला भी दिखाई देने लगा था। नरेश ने एक बोतल और लाकर रख दी। दारू पीते पीते शेर सिंह को पता नहीं क्या सूझा उस ने दही की फरमाइश कर डाली। दही की फरमाइश सुनते ही नरेश खेत के बीचों बीच बनी डोल पर भागता  नज़र आया। जाते जाते वो बोल गया ,"बस दहीं लेकर यूं आया चौधरी।
जब तक नरेश वापिस लौटता सभी टुन हो चुके थे। महफ़िल का रंग जमने लगा था।सभी के चेहरे सुलगे हुए कोयले की तरह लाल हो चुके थे। घर परिवार की बातों से अब वो बाहर निकल आए थे। सभी बातों बातों में कच्चे पर उतर आए और लगे अपने अपने पोतड़े उधेड़ने। सभी अपने अपने किस्से कहानियां सुनाने लगे। उन सब को अपनी मर्दानगी पर गर्व था। परन्तु किस्से और कहानियां साफ बयां कर रहे थे के मर्द जात अपना लंगोट जितना भी कस कर रखे वो कभी न कभी फिसल ही जाता है। मलखान सिंह की ज़बान और कदम दोनों डगमगाने लगे थे। अँधेरा हो चुका था। सभी दोस्तों ने विदाई ली। वो सभी भूल गए के नरेश गांव में दही लेने गया है।
जब तक नरेश दही लेकर वापिस लौटता सभी अपनी रवानगी डाल चुके थे। नरेश टुबवेल पर पहुँचते ही हांफते  हांफ़ते बोला ," क्या बात सारे जा लिए ,चौधरी ? राहदारी वाला पी के गए या नहीं ?" असल में गांव में एक प्रथा है के आप बेशक जितनी मर्ज़ी दारू पिएं ,जाते जाते टैक्स के तौर पर या यूं कहें मेज़बान अपने दोस्तों को जाते जाते एक ड्रिंक ज़रूर पिलाता है। । यही ड्रिंक राहदारी वाला पेग से मशहूर भी है। नरेश के इन दोनों प्रश्नों में अपनापन ज़्यादा झलक रहा था।
नरेश की बात को सुन कर मलखान ने दो ग्लासों में दारू की बोतल उलटी कर दी। मोटे मोटे दो पेग बनाये और एक गिलास नरेश को थमा दिया।  इससे पहले के नरेश संभलता या कुछ बोलता मलखान चियर्स करते हुए बोला ,"तो भी क्या बात है नरेश ! आज की राहदारी वाला हम तेरे साथ पी लेते है। " नरेश ने इस से पहले कभी नहीं पी थी। लेकिन चौधरियों को शराब पिलाने का काम वो बचपन से करता आ रहा था। ओंठों के साथ गिलास लगाते ही उसने सारी की सारी एक बार में अपने अंदर उढ़ेल दी।
मलखान अपनी थरथराती आवाज़ में नरेश को सब कुछ समेटने के लिए कह कर  टुबवेल पर बने कमरे में सोने के लिए चल दिया। नरेश सफाई में जुट गया। थोड़ी देर बाद ही नरेश की हालत पतली होने लगी। नरेश तो लगा करने उल्टियाँ। उससे अब खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था।  लड़खड़ा कर टुबवेल के पास ही गिर गया। रात काफी हो चुकी थी। नरेश के घर वाले सभी शादी में काम करवाने गए हुए थे। सुंदरी घर पर अकेली थी। वो नरेश को लेकर परेशान हो गई। नरेश की यह आदत थी के उसे जब भी देरी का कोई अंदेशा होता वो भाग कर घर बतला आता। आज तो खुद नरेश बेसुध था।
रात के दस बज चुके थे। सुंदरी के मन में न जाने क्या आया वो अपने नरेश को देखने खेतो की ओर चल दी। वो कब टुबवेल पर पहुँची उसे खुद भी पता नहीं चला। टुबवेल पर लटके जीरो वॉट के बल्ब से आती मंद मंद रोशनी में कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। बिखरा हुआ सामान किसी उजड़े  हुए चमन की तरह लग रहा था। सुंदरी की नज़र सहसा नरेश पर पड़ी। सुंदरी के तो जैसे होश ही उड़ गए। उसने नरेश को इधर उधर हिलाया लेकिन वो तो धरती पर चित पड़ा था। उसे समझते देर न लगी के नरेश ने शराब पी है। उसका जैसे विश्वास ही टूट गया। उसके मन में उलटे पुलटे विचार आने लगे। उसको एकदम से मलखान का ख्याल आया। वो भगवान से सब ठीक होने की कामना करने लगी।
आगे  ............................ (भाग -4 )

गर्म ख़ून ( भाग- 2 )


                                                                      गर्म ख़ून  ( भाग- 2 )
 बेशक गांव सुंदरी का दीवाना था। लेकिन किसी की क्या मज़ाल के उस पर हाथ डालता। जब कभी भी किसी ने कोशिश की ,सुंदरी बिना बोले इस तरह देखती मानो सामने शेरनी खड़ी हो। अपने आप को कभी ढीला नहीं होने दिया था सुंदरी ने।  मलखान का अपना रुतबा था गांव में। कई हथकंडे अपनाए मलखान ने पर सुंदरी के आगे उसकी दाल न गली।
शराब और शबाब मलखान के खास शौंक थे। जब भी स्वाद बदलने का मन होता ,खेतों में टुबवेल पर अपना अड्डा जमा लेता। खेतों में घास काटने या किसी और काम से आने वाली पिछड़ों की कई औरतों का शिकार कर चुका था मलखान । कोई पैसे के लालच तो कोई लोकलाज के डर से अपना मुहँ न खोलती। कोई बोलने की हिम्मत जुटाती तो मलखान डरा धमका कर उसका मुहँ बंद कर देता । पीड़ित औरतें बकरियों की तरह  थोड़े समय के लिए मिमियाती। लेकिन अगड़ों के ज़ुल्म , लोक लाज , गरीबी और अगड़ों के प्रभाव और दबाव के   कारण कोई अपना मुहँ न खोलती। मजबूरी के कारण वो इसे ही अपना भाग्य समझ लेती। लेकिन सुंदरी दूसरी औरतों की तरह नहीं थी। स्वाभिमान जैसे उसमें कूट कूट कर भरा हुआ था।
 सुंदरी -नरेश की शादी को दो साल बीत चुके थे। लेकिन अभी तक किसी तरह की कोई खबर नहीं थी। गांव में घुसफुस शुरू हो चुकी थी। सब के अपने अपने विचार थे। कोई नरेश को कमज़ोर कहता तो कोई सुंदरी को चैक करवाने की सलाह देता। कभी कभी मलखान भी मौका देख कर सुंदरी को दो अर्थी बात बोल देता। लेकिन सुंदरी पर इन बातों का कोई असर न होता।
एक दिन तो मलखान ने हद ही कर दी। घर के सभी लोग गांव में ही शादी पर गए हुए थे। मलखान घर पर अकेला था। सुंदरी पशुओं को चारा देने के बाद घर की ओर जाने लगी तो मलखान ने सुंदरी का हाथ पकड़ लिया। सुंदरी को अपनी ओर  खींचते हुए मलखान बोला ,"हमारे कुंएं का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। " एक बार तो सुंदरी नागिन की तरह फुँकारी लेकिन मलखान की मज़बूत पकड़ के आगे वो ढीली पड़ गई। अक्सर चुप रहने वाला  मलखान ये सब कुछ कैसे बोल गया उसे भी समझ नहीं आ रहा था। न जाने सुंदरी के अंदर एक अदम्य शक्ति कहाँ से आई। अपनी कलाई छुड़वाते हुए उसने मलखान को ज़ोर से धक्का दिया। मलखान संभल नहीं पाया और नीचे जा गिरा। मलखान कहाँ हार मानने वाला था। उसने सुंदरी को फिर पकड़ लिया। इस बार उसने सुंदरी को ज़ोर से  अपनी छाती से लगा लिया। सुंदरी पर अपनी  पकड़ मज़बूत बनाते हुए मलखान ने अपना पहले वाला डायलॉग दोहराया ,"हमारे कुंए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। " इसी के साथ अपनी पकड़ ढीली करते हुए बोला ,"जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन इश्क़ हो गया है तुझ से सुंदरी । "  सुंदरी किसी छिपकली के जबड़े से छूटी तितली की तरह छटपटाती हुई बाहर की ओर भागी। मलखान बिल्कुल फ़िल्मी हीरो की तरह सुंदरी को दूर तक जाते हुए देखता रहा। आज पहली बार किसी औरत को पकड़ने के  बाद मलखान का दिल धड़क रहा था।
सुंदरी को भी पहली बार लगा के वो कमज़ोर पड़ गई है। काम की थकावट से उसने कभी हार नहीं मानी थी। लेकिन लोगों के तानों से वो तंग आ चुकी थी। मलखान की हवेली से सीधे अपनी कोठरी में जाकर अपनी टूटी हुई चारपाई पर एक लाश की तरह धम से गिर गई। हर हाल में खुश रहने वाली सुंदरी फफक फफक कर रोने लगी। टूटी फूटी और घर में  चुल्हे से काली हुई छत की और देख कर वो अपने भाग्य को कोसने लगी। भाग्य और भगवान दो अस्त्र ही होते हैं गरीब के ,जिसके आगे वो अपने सारे शस्त्र डाल देता है। रोते रोते उसका संपर्क सीधे नीली छतरी वाले से हो गया। गरीब का तो भगवान ही सहारा होता है। सुंदरी पागलों  की तरह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए भगवान से पूछने लगी ,"क्या दोष है मेरा ? कौन सा पाप किया है मैंने ? क्यों मुझे बच्चा नहीं होता ? "
आगे ………………(भाग -3)

गर्म ख़ून ( भाग -1 )


   
                                                                      गर्म ख़ून
 गांव में पंचायत जम चुकी थी। मलखान सिंह हुक्के की गुड़ -गुड़ के साथ इधर उधर नज़र दौड़ा रहा था। शेर सिंह भी बार बार अपनी मूंछों को ताव दे रहा था। जगतार सिंह सभी को राम राम कहते हुए मलखान सिंह के बगल में बैठ गया। मलखान सिंह ने हुक्का जगतार की और बढ़ाते हुए कहा ,"ये तो हद ही हो गई। एक कमीन का लौंडा नहीं संभल रहा पूरे गांव के छोकरों से।
 इस से पहले के जगतार कुछ बोलता पंचायत में हलचल शुरू हो गई। हलचल हो भी क्यों न,सुंदरी जो आ रही थी। बला की ख़ूबसूरत थी सुंदरी। एक बार जहां से निकल जाती -क्या बूढ़ा क्या जवान साँसों पर नियंत्रण न रहता। एक बार जो उसे देख लेता ये ज़रूर कहता ,"भगवान ने बहुत ही फुर्सत में बनाया है सुंदरी को। "
अपने पचास बसंत पूरे कर चुकी थी सुंदरी लेकिन आज भी किसी "हूर" से कम नहीं थी। सुंदरता तो जैसे उसकी दासी हो। चौपाल पर आज भी गांव के मनचले वहां से निकलने की इंतज़ार में घंटों उस की बाट जोहते रहते।
१८ साल की रही होगी सुंदरी जब नरेश उसे अपने गांव टोबा ब्याह कर लाया था। कहते हैं के ख़ुदा जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। सुंदरी पर भी ख़ुदा कुछ ज़्यादा ही मेहरबान था। गठा हुआ शरीर ,उभारदार वक्ष,बल खाती कमर ,कटार जैसी आँखें। उसकी चाल बिल्कुल ऐसी थी मानो कोई नागिन दुनिया से बेफिक्र किसी बीन की धुन पर नृत्य कर रही हो। कईं बार तो मनचले उसके पीछे -पीछे उसकी नक़ल करते हुए दूर तक उसके साथ साथ चलते। कईं कच्चे छोकरों की तो सुंदरी की चाल से ही बीन बज जाती।
गोलमटोल नथुने,जब वो सांस लेती तो  उसके नथूने भटी में गर्म किए जाने वाले मक्की के दानों की तरह फूल जाते। जब कभी नसवार का तड़का लगा लेती तो उसकी खुशबू दूर तक फ़ैल जाती। माथे के बीचों बीच उसकी बिंदिया ऐसे लगती मानो आसमान में चाँद चमक रहा हो।
गांव के दूसरे छोकरों की तरह ही नरेश की शादी पर भी गांव के अगड़ों के डर से कोई शोर शराबा नहीं हुआ था। नरेश की ये दिली इच्छा थी के वो भी घोड़ी चढ़े ,बैंड बाजा हो और उसके यार दोस्त उसकी घोड़ी के सामने नाचते गाते चलें। नरेश के पिता सुखिया ने घर के सभी लोगों को पहले ही आगाह कर दिया था के सभी अगडों के हुकुम और नियमों की पालना करेंगे। नरेश न घोड़ी चढ़ा न ही  बैंड बाजा हुआ और शादी बिना किसी बिघ्न के सम्पन्न हो गई ।
नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत सुखिया पर बिल्कुल सटीक बैठती थी। सुखिया तो बस नाम का सुखिया था । उसके पुरखे कईं सालों से गांव में ज़मीदारों के खेतों की बिजाई ,जुताई और कटाई का काम करते आ रहे थे। पशुओं की नहलाई ,धुलाई ,चारा डालने से लेकर गोबर उठाने तक का काम नरेश के परिवार को करना पड़ता था। क्या बच्चे ,महिलाएं सभी गावं के अगड़ों के घर और खेतों में किसी न किसी काम में व्यस्त रहते। यही नहीं मैला ढोहने का काम भी नरेश का परिवार ही  करता।
 शादी के एक महीने बाद सुंदरी काम के लिए घर से बाहर निकली। उस को मलखान के घर की साफ़ सफाई का जिम्मा सौंपा गया। घर क्या पूरी हवेली थी। सुंदरी बरामदे में झाड़ू लगा रही थी। मलखान अपने कमरे में से निकला और उसकी नज़र सुंदरी पर पड़ी। सुंदरी को देखते ही वो बुत बन गया। उसकी सांसें थम सी गई। मलखान भी गोरा चिट्टा  गबरू जवान था। सुंदरी की नज़र जब मलखान पर पड़ी तो एक बारगी वो भी सकपका गई। उसके हाथ से झाड़ू छिटक कर नीचे गिर गया। बिल्कुल हिंदी फिल्मों की तरह झाड़ू गिरते ही दोनों झाड़ू उठाने के लिए नीचे झुके।  दोनों का हाथ से हाथ टकराया और सुंदरी संकुचाती-शर्माती झाड़ू वहीँ छोड़ कर बाहर  की ओर भाग गई।
 मलखान सिंह तो उसका खास दीवाना हो गया था। खेतों में जाने की बजाए वो हुक्के में आग सुलगा कर सुबह ही अपनी देहरी पर बैठ जाता। आँगन बुहारते हुए सुंदरी को वो ऐसे निहारता मानो वो उसे सारा का सारा पी जाना चाहता हो। इस चक्कर में वो अपना हुक्का ही पीना भूल जाता। सुंदरी कुछ पल के लिए इधर उधर होती तो वो हुक्के को अपनी और खींचता। लेकिन तब तक हुक्के की आग मंद पड़ चुकी होती और मलखान बुझे हुक्के में आग सुलगाने के लिए अपनी धोती को ठीक करते हुए चुल्हे की ओर हो लेता। जब तक मन और हुक्के की आग बुझ न जाती वो उसे निहारता रहता। ऐसा नहीं के सुंदरी कुछ समझती नहीं थी। लेकिन वो कभी भी मलखान को घास न डालती। सुंदरी उसकी परवाह किए बिना अपने काम में लगी रहती।
आगे ............. (भाग 2 )

Friday, 28 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-25

                                                           "HALF CENTURY"
दोस्तों नमस्कार।
 पिछले दिनों घर में रंगाई पुताई का काम चला तो पुरानी डायरियां ,चिठियां और पर्चियां हाथ लग गई।  खोल कर पढ़ना शुरू किया तो अवचेतन में दबी हुई बहुत सारी यादें ज़िंदा हो उठी। यात्रा संस्मरण ,खेलकूद , राजनीति के विविध समाचार , देश विदेश में होने वाली हलचल , कभी घर से भाग कर फिल्म देखने का ज़िक्र , कहीं प्रेमिका के साथ मिलने की बातें , किसी जगह उलटे शब्दों में लिखी किस्से कहानियाँ , टूटी फूटी कवितायेँ, कहीं सिस्टम के विरुद्ध आवाज़ ,नाटक का ज़िक्र , २० साल पुरानी सिनेमा की टिकट , हॉस्टल से भाग कर आवारागर्दी  , घर बताये बिना दोस्तों के साथ कहीं दूर निकल जाना , नौकरी के दौरान अलग अलग लोगों के साथ मिलने वाले अनुभव, और न जाने क्या क्या । सब का ज़िक्र करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है।
 
आज मैं ५० वर्ष का हो गया हूँ। सच कहूँ तो जीवन के ये ५० वर्ष भरपूर जिए। आप हैरान होंगे लेकिन ये सच है के इस आधी सदी के जीवन में छः पीढ़ियों के जीवन को करीब से देख चुका हूँ। जितना कुछ साफ़ या धुँधला याद आता है कहीं कोई गिला शिकवा नहीं है इस ज़िंदगी से। परिवार ,दोस्त ,सहयोगियों और सम्बन्धियों का इतना  सहयोग और प्यार मिलता रहा। समय कब फुर्र कर के उड़ गया पता ही नहीं चला। कभी एहसास ही नहीं हुआ के बूढ़ा हो गया हूँ। आज भी अपने आप को बच्चों की तरह बर्ताव करते हुए पाता हूँ। ये करम जले दोस्त कभी कभी याद दिला देते हैं के दाढ़ी सफ़ेद हो गई है। लेकिन मन को संतुष्टि है के ये बाल धूप में सफ़ेद नहीं हुए हैं।
कल नाई के पास दाढ़ी बनवाने चला गया। नया लड़का था।  दाढ़ी बनाते हुए बोला ,"आप काले बाल नहीं    करते ? "  "क्या हो जाएगा बाल काले करने से ? " , मैंने भी उस से पूछ लिया। वो बोला ,"अच्छे लगेंगे।" "अब अच्छे नहीं लग रहे क्या ?",मैंने फिर उससे पूछा। इस बार वो चुप था। शायद कुछ सोच रहा था। दाढ़ी बनवाते हुए मैंने एक आँख  खोल कर उसकी ओर देखा तो वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था। " बताया नहीं तूने की क्या हो जाएगा बाल काले करने से ।" मैंने दोबारा पूछा। अब की बार वो बोला ,"Personality निकल आएगी आप की , smart लगेंगे आप ! " मैंने फिर धीरे से फिर पूछा ,"क्या अब smart  नहीं लग रहा मैं ?" इस बार उसने कोई जवाब नहीं दिया और वो फिर मंद मंद मुस्कुराने लगा। 
 बेशक दुःख सुख जीवन का हिस्सा हैं लेकिन माया नगरी के जादूगर ने जीवन में कभी कोई कमी नहीं आने दी। जो चाहा वो यदि मिल गया तो ठीक और यदि नहीं भी मिला तो भी ठीक। मुझे याद नहीं के कभी ज़्यादा हासिल करने का लालच किया हो। जो मिल गया उसे मुक़दर समझ लिया।
ऐसा नहीं के जीवन में सब कुछ ठीक ही चलता रहा। लेकिन जब भी विकट दौर आया ,किसी अदृश्य शक्ति ने मेरा हाथ पकड़ कर पार लगा दिया। मैं जैसा भी हूँ खुश हूँ और अपने जीवन में सभी को खुश रखने का प्रयास भी किया है। फिर भी यदि कभी जाने अनजाने मेरी वजह से किसी को दुःख पहुंचा हो या कोई आहत हुआ हो तो मैं उसके लिया क्षमा प्रार्थी हूँ।
आधी सदी जी चुका हूँ। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिस ने भी मेरे इस जीवन में साथ दिया है , उन सब का मैं अपने दिल की गहराइयों से धन्यवाद करता हूँ।सभी दोस्तों को जनम दिवस की  शुभ कामनाओं के लिए धन्यवाद। हाफ सेंचुरी के साथ -साथ आज गोल्डन जुबली भी हो गई। इस का मतलब फिल्म हिट हो गई ।
 ये जीवन इसी तरह उमंग , उत्साह और प्रेम से भरा रहे और किसी के काम आ सके।इस मंगल कामना के साथ आपसे विदा लेता हूँ।  
 जय हो !

Wednesday, 19 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-24

                                               A LETTER...EK CHITHEE PART-22 से आगे  ………………………
                                                                    अपहरण (भाग -2 )
नाटक "अपहरण " को निर्देशित करना मेरे लिए एक बढ़िया अनुभव रहा। पिछले साल भी इसी कॉलेज (K V A D A V, KARNAL) में नाटक करवाया था। बच्चों ने अच्छा प्रदर्शन किया सो इस बार भी नाटक करवाने का जिम्मा मुझे ही सौंप दिया गया।
अगस्त महीने की आखिरी तारीख को जैसे ही भंडारी मैडम का फ़ोन आया मुझे समझते देर ना लगी कि युवा उत्सव नज़दीक आ गया  है। भंडारी मैडम कॉलेज में सांस्कृतिक विभाग को देखती हैं। नाटक करवाने का न्यौता स्वीकार करते हुए मैं अगले दिन कॉलेज पहुँच गया।
विश्व विद्यालयों द्वारा हर साल युवाओं में छिपी प्रतिभा को निखारने और संवारने के उदेश्य से युवा उत्सव के माध्यम से एक मंच प्रदान किया जाता है। जहाँ सभी महाविद्यालयों के छात्र -छात्राएं विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों की प्रतियोगिताओं में बढ़ चढ़  कर भाग लेते हैं। एक अच्छा ख़ासा फण्ड विश्व विद्यालयों द्वारा सभी महाविद्यालयों को दिया जाता है।
ये बात अलग है के ट्रॉफी हासिल करने के चक्कर में host college ऐसा घालमेल करते हैं के कला ,प्रतिभा और संस्कृति को नज़र अंदाज़ कर देते हैं। यूथ फेस्टिवल में इस तरह के घालमेल के कारण ही प्रतिभावान कलाकार पिछड़ जाते हैं। वो इस मंच का सदुपयोग नहीं कर पाते।
खैर इस बार मुझे नाटक की विषय वस्तु को explain करने को कहा गया। मैंने दो कहानियाँ सुनाई -अपहरण और तेज़ाब। " दो कहानियां सुनाने के बाद यह तय हुआ के अपहरण नाटक की तैयारी की जाए। दूसरी कहानी "तेज़ाब " को इस लिए मना कर दिया गया चूँकि ये महिलाओं के मुद्दे की कहानी थी और महिलाओं के मुद्दे से जुडी कहानी पर पिछले साल नाटक खेला जा चुका था। मेरे लाख आग्रह पर के लड़कियां अपने साथ हो रहे शोषण या अत्याचार के विषय को बारीकी से समझ पाएंगी यह निर्णय लिया गया की तेज़ाब नहीं अपितु अपहरण नाटक करवाया जाए।
 लड़कियों पर लड़कों द्वारा तेज़ाब फेंके जाने और उसके बाद उसके जीवन की कहानी है-" तेज़ाब "।
 "अपहरण "- एक गरीब परिवार में जन्मी नन्हीं लड़की "कंचन "की कहानी है जो दूसरे बच्चों की तरह टी /वी बहुत देखती है।माँ से एक अदद साइकिल दिलवाने की ज़िद करती है। गरीबी का वास्ता देकर माँ कुछ दिन इंतज़ार करने को कहती है।बस्ती की ही दो लड़कियों सलोनी और सुहानी के पास साइकिल है। वो दोनों कंचन  को साथ नहीं खेलने देती और ऊपर से उसको चिढ़ाती भी हैं। बस्ती में गणेश उत्सव की तैयारियां चल रही हैं। गणेश स्थापित हो चुके हैं। कंचन घर में उदास बैठी टी /वी देख  रही है। चॅनेल्स बदलते हुए एक सीरियल पर उसकी आँखें जम जाती हैं। उसमे कुछ युवा किसी साहूकार के बच्चे का अपहरण कर लेते हैं और फिरौती की मांग करते हैं। कंचन के मन में एक आईडिया आता है और वो गणेशा का अपहरण कर लेती है। कंचन गणेश के पिता शिव शंकर से गणेशा के बदले साइकिल की मांग करती है।शंकर अपने बच्चे को छुड़वाने के लिए पार्वती के साथ प्रकट होते हैं। कंचन से गणेशा को छोड़ने की अपील करते हैं। लेकिन बाल-मन कंचन साइकिल की ज़िद पर अड़ी रहती है। भोले शंकर तब कंचन के माध्यम से सन्देश देते हैं के बाज़ार आम आदमी के घर में घुस गया है। इसीलिए लोगों की इच्छाएं बढ़ती जा रही हैं। यही कारण है के संसार में अराजकता,अशांति,लूट,भय और अपहरण जैसी वारदातें बढ़ी हैं। बच्ची को भगवन की बात समझ आती है तो वो गणेशा को दोबारा से स्थापित कर देती है।
नाटक करते हुए अजब संयोग हुआ। एक लघु नाटिका (skit) का जिम्मा भी मुझे सौंप दिया गया। तेज़ाब की कहानी को लघु नाटिका के तौर पर प्रस्तुत किया गया। इस के लिए भी अच्छी टीम मिल गई। हालाँकि मुख्य पात्र को अपहरण की काजल (कंचन )ने ही अभिनीत किया। तेज़ाब में अनुराधा नाम की लड़की एक लड़के की बात नहीं मानती और वो उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक देता है। चेहरा जलने के बाद अनुराधा के जीवन की व्यथा और उसकी जीवन के साथ लड़ाई को ये कहानी बखूबी चित्रित करती है। नाटक और नाटिका में सभी लड़कियों ने बखूबी अभिनय किया।
अपहरण और तेज़ाब दोनों नाटक मेरे लेखक मित्र मोहिन्दर प्रताप सिंह ने लिखे हैं। मोहिन्दर पिछले कई बरसों से लेखक ,प्रोडूसर और निर्देशक के रूप में मुंबई में काम कर रहा है। नाटक के दौरान मोहिन्दर ने रिहर्सल भी देखी। मुझे  इस बात की ख़ुशी है के मोहिन्दर अपहरण और तेज़ाब की परफॉरमेंस से संतुष्ट था।
कॉलेज प्रबंधन ,प्रिंसिपल ,मिसेज भंडारी , मिसेज कादयान ,मिसेज ठाकुर ,अमनदीप ,अम्बिका और कॉलेज के कर्मचारियों के सहयोग से ही अपहरण और तेज़ाब की सफल प्रस्तुतियाँ हो सकी।
बेशक मेरे दोनों नाटकों की सभी actresses की प्रतिबद्धत्ता ,सीखने की ललक ,सहयोग और सादगी को मैं कतई नहीं भूल सकता। नाटक में सहयोग के लिए सभी को मेरा सलाम !

A LETTER...EK CHITHEE PART-23

                                                               मौनी बाबा
पिछले एक लम्बे अरसे से पढ़ना लिखना जैसे छूट सा गया था। वो तो भला हो इस नईं टेक्नोलॉजी का जिस के ज़रिए बहुत कुछ देखने ,पढ़ने को मिल रहा है।
 ज़माना बहुत आगे निकल गया है ! आप बहुत पिछड़ गए हैं ! पता नहीं कहाँ जा कर रुकेगी ये दुनिया ! आप ने खुद को इस दौड़ में कभी शामिल ही नहीं किया इसलिए ऐसा तो होना ही था !
एक लम्बे अरसे से कुछ ऐसा ही दोहराया जा रहा था।
आज फेस बुक को खोलने के बाद कुछ नए लोगों की साइट्स में घुसने की कोशिश की तो पता चला के लोग तो दिल खोल कर लिखते हैं।  बेबाकी के साथ।
सादगी का तड़का कुछ इस तरह से लगा होता है मानो वो आप के अंदर की ही बात कह रहे हों।
 वो भी ऐसी बात जिसे आप बरसों से ढोह रहे होते हैं। किसी से उस का ज़िक्र भी नहीं कर पाते।
कोई ऐसी बात जिसे आप एक ऐसे संदूक में बंद कर देते हैं जिसे शायद सदियों खोला ही नहीं जाता।
 ऐसी बात जिसे आप ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर सारी  दुनिया को बतला देना चाहते हैं लेकिन ताउम्र मौनी बाबा बने रहते हैं।
आप ये सोच रहे होते हैं के समय आने पर अपनी पोटली को खोलेंगे। लेकिन आप को पता भी नहीं चलता के आप की पोटली कहीं दूर खुल चुकी होती है। 

Thursday, 13 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-22

                                                         "अपहरण " ( भाग -1 )
समय बहुत तेजी से चलता है इस बात का अहसास तब होता है जब आप busy रहते हैं।अगस्त ,सितम्बर और अक्टूबर'14 के महीने कब और कैसे बीते पता ही नहीं चला।
दीपावली का त्यौहार जा चुका है। समझ नहीं आता के इस त्यौहार का सभी बेसब्री से क्यों इंतज़ार करते हैं। खर्चे के सिवाए कुछ भी नहीं। यही नहीं बम और पटाखों से जो प्रदुषण फैलता है वो अलग। क्या सच में पटाखों के प्रदूषण  या महंगे गिफ्ट्स की खरीद से राम और लक्ष्मी पूजा सफल होते  हैं। इस विषय पर मैं कोई तर्क वितर्क नहीं करना चाहता। सोचना व् फैसला करना आपके अपने अधिकार क्षेत्र में है।
सितम्बर -अक्टूबर '१४  में K.V.A.D.A.V.College for girls में नाटक "अपहरण "करवाने में व्यस्त रहा। पिछले 25 सालों में एक बढ़िया ,समझदार और मेहनती टीम के साथ काम करने का मौका मिला।
"काजल" कमाल की actress है। अगर यूं कहें के ,"She is born actress!"...तो कुछ गलत नहीं होगा। 
काम के प्रति उसकी मेहनत ,प्रतिबद्धत्ता, लग्न और Team Spirit हमेशा सारी टीम को प्रोत्साहित करता रहा। लगभग २ महीने बच्चियों के साथ काम किया और नाटक के साथ साथ उनके व्यक्तित्व में होते बदलाव को मैं सहजता से महसूस कर पा रहा था।
बिल्कुल चुपचाप रहने वाली प्रीति के व्यक्तित्व में जो ज़बरदस्त बदलाव देखने को मिला वो सच में काबिले गौर करने वाला था। बिल्कुल एकांत पसंद लड़की ने नाटक में जिस तरह से जीवन की उमंग के मायने को समझा वो कमाल नाटक का ही कर सकता है। पूरी टीम ने उसका नाम छुपा रुस्तम रख दिया।
 दीक्षा क्रिकेट की नेशनल प्लेयर है। इसके साथ -साथ वो साइकिलिंग चैंपियन भी है। बहु प्रतिभा की धनी दीक्षा में सादगी के साथ स्पष्टता का जो मेल  है उसका कोई सानी नहीं हो सकता। हर बात के बाद जीभ निकालना ,धीरे से किसी को भी छेड़ देना और हर वक़्त खाने की बात करना उसकी sense of humour के कुछ बेमिसाल नमूने हैं । एक दिन उसने मुझे बताया के पिछले साल नाटक की रिहर्सल देखते हुए उसने decide कर लिया था के वो जब भी मौका मिलेगा नाटक ज़रूर करेगी। चुलबुली दीक्षा की नटखट शरारतें मुझे हमेशा याद रहेंगी।
स्मृति और भारती खेल खेल में नाटक खेल गई। हालांकि भारती शुरूआत में थोड़ी नर्वस रही लेकिन बाद में उसने नाटक का भरपूर आनंद उठाया। बचपन कितना सरल और पाक-साफ़ होता है वो मुझे स्मृति की बच्चों जैसी बातों ने सिखाया। सोनम रोर ने मस्ती ,रुचि ढिल्लों ने परिपक्वता और सोनाली ने अपने आप को प्रूव करने के लिए नाटक और अपने रोल के लिए खूब मेहनत की।सोनाली ने अपने घर वालों के विरोध और विपरीत परिस्थितिओं के बावजूद हार नहीं मानी। उसने अपने पात्र को दिल से जिया।
इस दौरान खास बात ये रही के नाटक "अपहरण "के लेखक मोहिन्दर प्रताप सिंह खुद रिहर्सल में शामिल हुए   और बच्चियों को नाटक के बारे में खूब सारी जानकारी दी। मोहिन्दर पिछले २० वर्षों से मुंबई में है और नाटक ,फिल्म्स और एडवरटाइजिंग में जानामाना नाम हैं। मोहिन्दर मुंबई में लेखन और निर्देशन का काम करता है। मोहिन्दर द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्म "भुजंग" बन कर तैयार है और सभी उसके रिलीज़ होने का बेसब्री से इंतज़ार भी कर हैं।
 दबंग ,रंगरेज़ ,आरक्षण और बेशर्म जैसी फिल्मों में काम कर चुके अमितोष नागपाल ने तो कई दिन बच्चों के साथ एक्टिंग की वर्कशॉप ही कर डाली। इस वर्कशॉप का पूरी टीम को फायदा हुआ। असल में मोहिन्दर और अमितोष  करनाल अपने घर आये हुए थे और जब उन्हें नाटक की रिहर्सल्स के बारे में पता चला तो दोनों ने अपना ज़्यादा समय नाटक मण्डली के साथ ही बिताया।
यही नहीं नाटक के ज़रिये बलराज रावल से भी मुलाकात हो गई। बलराज ने 2008 में खालसा कॉलेज में मेरे निर्देर्शन में "नाटक नहीं "किया था। वहां उसके अभिनय के लिए उसे "सर्वश्रेष्ठ एक्टर" घोषित किया गया था। वो थिएटर करना चाहता था लेकिन किसी अच्छे इंस्टिट्यूट में दाखिला न मिलने और वक़्त के थपेड़ों ने मार्केटिंग क्षेत्र में धकेल दिया। बलराज आजकल पानीपत में  एक्सपोर्ट कंपनी में अच्छे ओहदे पर काम कर रहा है। उसका दिल्ली आना जाना रहता है। और वो नाटक देखने का कोई भी मौका नहीं चूकता।
अपने दोस्त समीर और राहुल का अगर मैं ज़िक्र नहीं करूंगा तो बेमानी होगी। उनका सहयोग और प्रोत्साहन मुझे सदा आगे की और बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहता है।
हर साल की तरह इस बार भी नाटक को ज़ोनल यूथ फेस्टिवल में कॉम्पिटिशन के लिए खेला गया। इस बार फेस्टिवल का आयोजन आर्य कॉलेज पानीपत में किया गया था। वैसे मेरा तो हमेशा यही मानना है के कला का कोई मापदंड नहीं होता परन्तु बच्चों के लिए तैयारी का ये एक सशक्त माध्यम है। बच्चों की कला को अनदेखा करके आयोजक जिस तरह ट्रॉफी हासिल करने के लिए घालमेल करते हैं वो वाकये निंदनीय है।नाटक ही नहीं बल्कि सभी विधाओं में निर्णायक मंडल के निर्णयों का अधिकतर प्रतिभागीयों ने विरोध किया।
मेरी दिली इच्छा थी के नाटक के कुछ शो हो जाएँ। भला हो जोगेन्दर भोला और भंडारी मैडम का जिन के कारण बच्चों को एक और शो करने का मौका मिला। स्पोर्ट्स एवं यूथ अफेयर्स डिपार्टमेंट विभाग दवारा आयोजित जिला सांस्कृतिक प्रतियोगिता में बच्चों ने भाग लिया। बच्चों ने जिस तरह से मेहनत की थी उसका रिजल्ट यहाँ की परफॉरमेंस में साफ़ नज़र आ रहा था। सभी ने ज़बरदस्त परफॉर्म किया और प्रथम स्थान हासिल किया। हालांकि कॉलेज में सांस्कृतिक विभाग की इंचार्ज भंडारी मैडम को इस की permission लेने के लिए बहुत मशक्क़त करनी पड़ी।
अगली चिठ्ठी के साथ आप से जल्द मिलूंगा तब तक के लिए जय हो !

Thursday, 23 October 2014

shame to you

दीपावली के अवसर पर एक दूसरे को बधाई देने का सिलसिला चल रहा था। कोई फ़ोन से तो कोई उपहार का आदान प्रदान कर के दीवाली का त्यौहार मना रहा था।
 कबीर का दोस्त सोनू भी क्यों पीछे रहता। सोनू कभी स्कूल नहीं गया था। लेकिन  अक्षर ज्ञानी था।
 फ़ोन पर मैसेज भेजना हो या फेस बुक पर कोई comment करना हो, सोनू बखूबी कर लेता।
 अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण कभी कभी अर्थ बदल जाता।
 दीपावली के अवसर पर उसके दोस्तों ने उसके face book पर ढेरों बधाई सन्देश भेजे।
 सोनू खुश था। वो सभी को जवाब देने में मशगूल था।
सोनू को अधिकतर messages थे , " Happy Diwali "
 सोनू सभी को जवाब दे रहा था ................ "shame to you !"

Monday, 13 October 2014

KYAAMAT KI RAAT

कल मतदान का दिन है। मतदान को करीब २४ घंटे बाकी हैं। चुनाव प्रचार समाप्त हो गया है। भोंपू चिल्लाने बंद हो गए हैं। शोरशराबा कम हो गया है। सट्टा बाजार सभी उम्मीदवारों के अलग -अलग भाव लगा रहा है। अफवाहों का बाज़ार गर्म है। अपने अपने अंदाज़ सभी लोग चुनावों के किस्से सुनने सुनाने में मशगूल हैं। कहीं अनाज तो कहीं शराब बांटी जा रही है। कैश बांटने में भी कोई गुरेज़ नहीं किया जा रहा। चुनावों की भाषा में इसे आर पार की लड़ाई का दौर कहा जा रहा है। मोटर गाड़ियों का भरपूर प्रयोग हो रहा है। उम्मीदवार लोगों को लुभाने के नए -नए तरीके अपना रहे हैं।
 चुनाव आयोग ने कमर कस ली है ताकि कोई वोटर को खरीद न सके। छापे  मारे जा रहे हैं। कई ट्रक शराब के पकडे भी जा चुके हैं।  नेताओं ने भी शराब पिलाने के नायाब तरीके निकाल लिए हैं। बैंक से दस दस के नए नोटों की गड्डियां ले ली गई हैं। नोटों के सीरियल नम्बर के हिसाब से नोट बांटे जा रहे हैं। जितने 10 के  नोट उतनी शराब की बोतलें। ठेके पर 10 का नोट दो और बोतल लो। ठेके वालों से हिसाब बाद में होता रहेगा। आज  खबर छपी है के चुनाव आयोग चुस्त दुरुस्त है।
लोग कह रहे हैं के नेता तो नेता हैं ! आज की रात क़यामत की रात होगी !

Tuesday, 7 October 2014

A Letter....Ek Chithee Part-21

                                                         समय चक्र 
 आज सुबह नींद जल्दी खुल गई। उठा तो सोचा सैर पर निकल लेता हूँ ,लेकिन अभी तीन ही बजे थे। मन किया क्यों न कुछ लिख लिया जाए। लिखना तो क्या था। बैठ गया पढ़ने पुरानी चिठियों को। पेन कागज़ की जगह आज कल लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन्स ने ले ली है। जैसे ही लिखने बैठा ,सोचा कुछ पुराना लिखा हुआ पढ़ लिया जाए। मैं आप को अब तक 20 चिठियां लिख चुका हूँ। ये आप को मेरी 21 वीं चिठ्ठी है। पहली चिठ्ठी 30 जनवरी 2014 और पहला ब्लॉग 15 सितम्बर 2013 को लिखा था । लगभग एक साल से चिठियों , कहानियों और ब्लॉग्स के ज़रिए आप से अपने मन की बात करता आ रहा हूँ ।
भला हो धीरेश सैनी का जो सन 2011 में मेरे घर आया और मेरा फेस बुक अकाउंट खोल गया। धीरेश सैनी  लम्बे समय तक करनाल अमर उजाला में पत्रकार के रूप में काम करता रहा। मेरी उससे मुलाक़ात बस यूं ही हो गई थी। कलम पर उस की पकड़ कमाल की है।आज कल फेस बुक के ज़रिये कभी कभी फॉर्मल बातचीत हो जाती है। हर आदमी अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त है। समय के साथ -साथ शायद धीरेश की दुनिया भी बदली है।  ये समय चक्र का ही कमाल है।

पिछले साल सितम्बर-ऑक्टूबर 2013 में एक कॉलेज में नाटक करवाया था। इस बार फिर ठेका मिला है। लेखक और निर्देशक कुछ नया और प्रासंगिक करने के लिए जूझ रहे हैं। इस सोच के साथ के शायद कुछ सृजन हो जाए।  नाटक नया है , कॉलेज वही है , कुछ पात्र बदल गए हैं लेकिन परिस्थितियां और सोच वही है। कॉलेज में नाटक करना भी नाटक हो गया है। यहाँ समय चक्र अपना कमाल कब दिखाएगा कुछ मालूम नहीं।
काजल को छोड़ कर नाटक में एक्टिंग कर रही सभी लड़कियां नई हैं। किसी ने भी इस से पहले कभी नाटक नहीं किया है। काजल ,स्मृति ,प्रीति ,सोनम ,सोनाली ,दीक्षा  रूचि और भारती सभी बढ़िया काम कर रही हैं। नाटक के प्रति सब की लग्न देखते ही बनती है।
ये समय चक्र का ही कमाल है के फेस बुक के ज़रिए लगभग 27 बरस बाद कॉलेज के कुछ साथियों गगन अत्रेजा , रणवीर कुंडू और अतुल शर्मा से मुलाकात हो गई। कॉलेज के दिनों में गगन ग़ज़ल गायिकी का जानामाना नाम था। गगन आजकल किसी दवाइयों की कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है। रणवीर कुंडू दिल्ली high court में वकील हो गया है। इन दोनों से फेसबुक पर मिलना तो हुआ लेकिन कोई खास बात नहीं हुई। कितना अजब है के हम जान कर भी अनजान हैं !! अतुल शर्मा करनाल में ही है। अतुल से अक्सर बढ़िया बातचीत हो जाती है।
चलते -चलते आप को बता दूँ आज मेरी जीवन संगिनी हरदीप का जन्म दिवस है। पिछले 32 सालों से हम एक दूसरे के साथ हैं। जीवन में बहुत कुछ बदला है। अगर कुछ नहीं बदला है तो वो है हरदीप का स्वभाव ,विश्वास प्यार , समर्पण और खुद हरदीप। पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो सच में ऐसा लगता है के अगर हरदीप मेरे जीवन में नहीं होती तो ये जीवन अधूरा सा होता।
जन्म दिन मुबारक दीपे !

Tuesday, 30 September 2014

SAFAI ABHIYAN

    पूरे देश में इस बात की चर्चा है के गांधी जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री इस बार स्वयं झाड़ू लगा कर "सफाई अभियान " की शुरूआत करने जा रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री अगर झाड़ू लगाएं तो जन जन का भी ये दायित्व बनता है के वो भी देश को साफ़ सुथरा रखने के लिए इस अभियान में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें। ऐसा नहीं के ये पहली बार हो रहा है। जब जब बापू का जन्म दिवस आता है इस तरह के आयोजन सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा किए जाते हैं।
लेकिन इस बार बात कुछ अलग है। क्योंकि ख़ुद प्रधानमंत्री झाड़ू लगाने जा रहे हैं। सभी वर्ग के लोगों में इस बात को लेकर चर्चाओं का सिलसिला शुरू हो चुका है। सभी अपने अपने ढंग से इस पर अपने विचार रख रहे हैं। लेकिन सरकारी तबके के लोगों में इस विषय को लेकर कुछ चिंता का माहौल है। सरकारी महकमों में इस बात की सुगबुगाहट है के यदि प्रधानमंत्री झाड़ू लगा रहे हैं तो उन्हें भी झाड़ू लगाने के आदेश आ सकते हैं।
नमालूम इस को लेकर सरकारी फरमान जारी हुआ या नहीं लेकिन सरकारी अवकाश रद्द किए जाने की ख़बर आग की तरह फ़ैल चुकी है। "सरकारी अवकाश" की कुर्बानी पर इस "सफाई अभियान" के मायने उन्हें समझ नहीं आ रहे हैं।
सरकारी तबका मायूस है !

STATUE OF MAHATMA

       कल  2 अक्टूबर  को महात्मा गांधी का जन्म दिवस है।
                    झाड़ू लगने शुरू हो गए हैं। फोटोज़ अपलोड होने लगी हैं।
                  एक अरसे के बाद बुतों को साफ़ किया जा रहा है । साफ पानी से नहलाया जा रहा है।     
                  कल महात्मा के बुतों पर मालार्पण के लिए होड़ लगी रहेगी।
                   सड़कों ,बाज़ारो ,मोहल्लों और गलियों में झाड़ू लगाए जाने की प्रतिस्पर्धा सा माहौल होगा । 
                   फोटो खिंचवाए जाएंगे। देश को साफ सुथरा बनाए रखने की कसमें खाई जांएगी। 
                  अख़बारों की सुर्खियां भी यही होंगी। 
                   इस बार लोगों में जोश कुछ ज़्यादा है। देश के प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत का नारा जो दिया है।
                  लोगों को लग रहा है के महात्मा आज खुश होंगे। 
                  "महा आत्मा" आज भी दुःखी और आहत है !
                 क्योंकि सड़कों -गलियों को साफ़ करने के साथ बहुत सारे ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ सच में
                 सफाई की ज़रुरत है।  असल में ज़रुरत है मनोवृती बदलने की। 
                 अगर मनोवृती शुद्धिकरण लोगों के " बूते" की बात नहीं है तो देश को हर रोज़ साफ़ करने के 
                कस्मे वायदे तो बरसों से सुनते आ रहे हैं !
              
             

Sunday, 28 September 2014

NAQAAB

कबीर का बाप राम सिंह पिछले 35 वर्षों से इसी शहर की पटरी पार बस्ती में रह रहा था। हर तबके के लोगों में उठना बैठना था उसका। चुनाव के दिन चल रहे थे। सभी राजनीतिक पार्टी के लोग जानते थे के अगर रामसिंह हामी भर दे तो अच्छी खासी वोटों पर कब्ज़ा किया जा सकता है।
हालांकि राम सिंह ने कभी किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष को तवज्जो नहीं दी थी। फिर भी सभी पार्टीयों  के लोग उसकी चोखट पर माथा ज़रूर टेकते। सभी जानते थे के वो अपने मताधिकार का प्रयोग करने के साथ अपने सभी साथियों को वोट डलवाने के लिए ज़रूर ले जाता था। जहाँ और जिस पार्टी को वोट डालने के लिए राम सिंह बोल देता वो पत्थर पर लकीर की तरह होता। बस्ती के सभी लोग वहीं वोट डालते जहाँ राम सिंह बोल देता। किसी की क्या मज़ाल के कोई भी बस्ती के लोगों की वोट खरीदने की कोशिश करे।
राम सिंह सच बोलने से कभी डरता नहीं था। नेताओं को वो मौका परस्त ,गिरगिट ,लूटेरे ,डाकू , मतलबी , नकाबपोश और न जाने किस -किस नाम से सम्बोधित करता। जब भी कोई राजनीति पर बात करता तो वो शहर की दुर्दशा की दुहाई देते हुए उन्हें ज़रूर लताड़ता।लेकिन कोई भी उसकी बात का बुरा न मानता।
इस बार फिर सभी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रामसिंह के द्वार पर दस्तक देनी शुरू कर दी थी। लेकिन इस बार राम सिंह कुछ बदला बदला नज़र आ रहा था। जब भी कोई वोट मांगने के लिए उसके द्वार पर आता ,वो हंस कर उसका स्वागत करता। जो भी आता उसी को वोट डालने की हामी भर देता। शायद इस बार राम सिंह ने भी नेताओं की तरह अपने चेहरे पर नक़ाब डाल लिया था। यही कारण था किसी को भी अब तक अंदाज़ नहीं हुआ था के ऊंट किस करवट बैठने वाला है। राम सिंह ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले थे।
35 साल के तज़ुर्बे से राम सिंह को इतना तो समझ आ ही गया था के सत्ता हाथ आने के बाद सभी नेता नपुंसक की तरह हो जाते हैं। जो चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकते। उनके पास कुछ रह जाता है तो बस वायदे और केवल वायदे। मतदान को एक दिन बाकी था। राम सिंह ने सब साथियों को बुलाया और लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोटिंग मशीन पर छपे नए बटन "NOTA"(not other than above) के बारे में बताया।  सभी राम सिंह की बात सुन कर अपने अपने घरों की ओर चल दिए।
रात को सहसा शोर सुन कर राम सिंह ने खिड़की से बाहर झाँका तो दंग रह गया। बस्ती के लोग वहां खड़े एक ट्रक से चावल ,दाल ,गेहूँ ,शराब और रोज़मर्रा काम आने वाले सामान को उतार कर अपने -अपने घरों में रखने में मशगूल थे। राम सिंह सभी को रोकने की कोशिश करने लगा। लेकिन किसी पर भी राम सिंह की बातों का कोई असर नहीं हो रहा था।
राम सिंह को समझ आ चुका  था के बस्ती वालों ने भी अपने चेहरों पर नक़ाब पहन लिया है। 

Thursday, 25 September 2014

A LETTER... EK CHITHEE PART-20


                                                                      "पुस्तक मेला "
दोस्तों नमस्कार !
ये आप को मेरी 20 वीं चिठ्ठी है। उम्मीद करता हूँ के आप मेरी चिठियां ज़रूर पढ़ रहे होंगे। वैसे आज कल लोगों का ये मानना है के चिठियों के दिन लद चुके हैं। इंटरनेट ,व्हाट्स एप्प और फेस बुक के इस युग में चिठ्ठी outdated हो गई है। लेकिन मेरा मानना है के चिठ्ठी में जो अपनापन ,संवेदना और संजीदगी है वो फेस बुक या व्हाट्स एप्प में नहीं है। मैंने तो आज भी अपने दोस्तों, रिश्तेदारों की बहुत सारी चिठियों को सहेज कर रखा हुआ है और जब भी समय मिलता है मैं उन्हें बांचने बैठ जाता हूँ। फुर्सत के पलों में चिठियां बांचते हुए बीते हुए दिनों का जो चलचित्र उभर कर आता है उस एहसास को बयां करना शायद बहुत कठिन है।
चिठियों की तरह पुस्तकों के बारे में भी बहुतेरे लोगों का ये मानना है के इस ओर रुझान कम हुआ है। लोगों का मानना है के इलेक्ट्रॉनिक और इंटरनेट के इस युग में किताबें लोगों की मित्र नहीं रहीं खासतोर पर बच्चे किताबों से दूर भागते हैं। मैं तो इस बात से भी इत्तफ़ाक़ नहीं रखता। मेरा तो ये मानना है के पुस्तकों की importance कभी भी कम नहीं हो सकती। बेशक़ सरिता ,धर्मयुग ,चंपक ,फेंटम ,लोटपोट या चाचा चौधरी सरीखी किताबें बाज़ार से गायब हो गई हों।
पिछले दिनों स्कूल में एक पुस्तक मेले का आयोजन किया था। बच्चों का किताबों के प्रति रुझान देखते ही बनता था। उनके चेहरे ये साफ़ बयां कर रहे थे के वो सब किताबें खरीद लें। दरअसल competition के इस युग में  हम ने बच्चों को स्वयं उस तोते की तरह बना दिया है जिसे बंद पिंजरे में रहने की आदत सी हो गई है और वो चाहते हुए भी बाहर की दुनिया से कोई वास्ता नहीं रख पाता। हम ने खुद उनके सपनों को पिंजरे में बंद कर दिया है।
निःसंदेह आज समय और संस्कृति दोनों बदल रहे हैं। हमें ये कतई नहीं भूलना है के सृजन सपनों से ही होता है। इसलिए आज समय की मांग है कि हम बच्चों को सपने बुनने दें ताकि वो दुनिया को अपने  नज़रिये से देखें ,सोचें ,समझें और बुनें।
चलते -चलते बता दूँ के बीते साल की तरह इस बार भी एक कॉलेज में नाटक करवा रहा हूँ। रिहर्सल शुरू हो चुकी है। अगस्त महीना बहुत  busy रहा। अगली चिठ्ठी में पिछले महीने के कुछ खट्टे मीठे संस्मरणों के साथ जल्द ही आप से फिर भेंट करने के साथ आप से विदा लेता हूँ।
"बाकी रब्ब राखा !" 

Monday, 22 September 2014

 टू टूज़ा फोर और ए फॉर एप्पल वाली पद्धति शायद अब पुरानी हो गई है।शिक्षा प्रणाली में बदलाव की ज़रुरत है। 

Saturday, 20 September 2014

"Ek Sawaal"

                                                                "पुतले"
दियों से हम बुराई के प्रतीक "रावण "का पुतला फूंकते आ रहे हैं !
 इस बार फिर तैयारी चल रही है, पुतले बनाए जा रहे हैं।
 हम पुतले बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते।
लेकिन हम इन पुतलों को फूंकने की औपचारिकता भर करते हैं।
 क्या ऐसा नहीं हो सकता के हम पुतले बनाएं ही न ताकि हमें इन्हें फूंकने की औपचारिकता न करनी पड़े ?

Friday, 19 September 2014

Aazaadi

देश को आज़ाद हुए लगभग 67 वर्ष बीत चुके हैं। पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो बहुत कुछ बदल गया है।हालाँकि देश ने पिछले सालों में खूब तरक्की की है।मेरा भारत महान के नारे भी लगते रहे हैं। लेकिन अभी भी बहुत सारी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें चुस्त दुरुस्त करने की ज़रुरत है। 15 अगस्त 2014 आज़ादी की पूर्व संध्या पर ये ब्लॉग लिख दिया था। लेकिन पोस्ट नहीं कर पाया। आज इसे पोस्ट कर रहा हूँ  ……………………… 
रोज़गार के लिए गांव से लोग शहरों में बसने लगे हैं। शहरों के लोग गांवों में बसना चाहते हैं।
जनसँख्या लगातार बढ़ती जा रही है। विश्व में दूसरा स्थान है हमारा। जानकारों का कहना है अगर इसी तरह जनसँख्या बढ़ती रही तो हम जल्द ही चीन को पछाड़ कर नम्बर एक हो जाएंगे।
कुछ साल पहले तक भी माहौल शांत था। आजकल इतनी गाड़ियां हो गई हैं आम आदमी का सड़कों पर चलना ही मुश्किल हो गया है। शोरशराबे और वायु प्रदुषण के कारण लोगों में हाइपर टेंशन ,माइग्रेन  जैसी बीमारियां आम हो गई हैं। यही नहीं कैंसर और हार्ट अटैक के लिए भी प्रदुषण मुख्य कारक है।
भ्रष्टाचार का तो पूछो ही मत। यह पूरी तरह से हमारी संस्कृति में रच -बस गया है । अफसरों से लेकर राजनेता तक सब इस का रसपान करना अपना धर्म समझते हैं। एक राशन कार्ड ,ड्राइविंग लाईसेंस ,या कोई भी सरकारी काम हो आपको बाबू लोगों की मुट्ठी बंद करनी ही पड़ती है। घूसखोरों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।
दलालों की कोई कमी नहीं है हमारे देश में। कोई काम हो ,सरकारी ठेका हो या फिर कोई खरीद -फरोख्त आप को दलाल की ज़रुरत पड़ती ही है। वर्ना आप की फ़ाइल दबी रहेगी और धूल फांकती रहेगी।
गरीबी और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। रोज़गार के लिए कोई ठोस नीति सरकार के पास नहीं है। गरीब और अमीर के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।
राजनेता और धर्म के ठेकेदार विभाजन को अपने अस्त्र की तरह प्रयोग करते हैं। ये लोग आज भी धर्म /जाति के नाम पर समाज को दो फाड़ करने में कतई नहीं चूकते हैं।
कानून अँधा होता है इस के मायने देश की कानून व्यवस्था को देख कर कोई भी लगा सकता है। हर रोज़ लूट , हत्या ,बलात्कार के समाचार देश के लोगों के लिए आम हो गए हैं। पुलिस को आम आदमी "वर्दी वाला गुंडा" कह कर पुकारता है।  
शिक्षा समय के साथ साथ महंगी और निरर्थक हो गई है। युवा डिग्री हासिल तो कर लेता है परन्तु कर्म क्षेत्र में पहुँचते ही डिग्री युक्तिहीन हो जाती है।
सरकारी तंत्र को तो जैसे दीमक ने खोखला कर दिया है। मानव संसाधन को चुस्त दुरुस्त करने के लिए सरकार कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती है ये कोई समझ नहीं पाया है। शिक्षा ,स्वास्थ्य ,दूरसंचार ,दूरदर्शन ,ट्रांसपोर्ट ,सीवरेज ,सड़कें आदि क्षेत्र चरमराये हुए हैं।
क्या आप को भी देश की व्यवस्था और कार्य प्रणाली " नाम बड़े और दर्शन छोटे " की तरह नहीं लगती हैं ?
 क्या इसी का नाम आज़ादी है ?
   क्या सब कुछ इसी तरह से चलता रहेगा ?
  

Monday, 15 September 2014

HANUMAAN KI SENA


घर के सभी लोग टी वी पर रामायण देखने में व्यस्त थे। 7 - 8 साल का नन्हां कबीर अपनी दादी की गोद में बैठा था। वो बार बार अपनी दादी माँ का पल्लू खींच कर कोई सवाल पूछना चाह रहा था। लेकिन दादी माँ चुप करवा देती। कमर्शियल ब्रेक में दादी माँ ने कबीर की और मुखातिब होते हुए पूछा ,"हाँ अब बता क्या पूछना है तुझे ?" कबीर बोला ,"दादी माँ , वो बन्दर कौन था जो अपनी पूँछ पर आग लगा कर सब कुछ जला रहा था ?" दादी माँ झल्ला कर बोली ,"बेटा ऐसा नहीं बोलते। ये वानर राज भगवान हनुमान हैं और बाकी सभी वानर हनुमान की सेना ! इन्होंने ही मैय्या सीता को बचाने में भगवान राम की सहायता की थी।"
 दादी ने आगे बताया के कल घर में हनुमान चालीसा का आयोजन किया जाएगा। अगले दिन घर में हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। सभी पूजा पाठ  में व्यस्त थे। अचानक बाहर शोर हुआ और सभी बाहर की ओर भागे। रसोई में बन रहे प्रसाद पर बंदरों के एक झुण्ड ने धावा बोल दिया था। कोई लाठी तो कोई बम बजा कर बंदरो को डराने लगा। सभी शोर मचाकर बंदरों को भगाने लगे।
कबीर दादी माँ के पल्लू को पकड़ कर ये सब नज़ारा देख रहा था। उसने दादी माँ का पल्लू खींचा । दादी ने कबीर की ओर देखा तो कबीर तुरंत बोला ," दादी माँ ,ये तो प्रभु राम भक्त हनुमान की सेना  है न ! फिर सभी इस को भगा क्यों रहे हैं ?"
दादी माँ के पास कबीर के प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। 

Sunday, 14 September 2014

PATENT

धर्म संसद में युद्ध छिड़ गया है.………… !
अपने -२ भगवान को बचाने का संकट आन पड़ा है। 
अब तो भगवान को पूजने के लिए भी मंज़ूरी लेनी पड़ सकती है। 
 अब समय आ गया है के अपने अपने भगवान का "पेटेंट " करवा लिया जाए ताकि भविष्य में किसी तरह की कोई दिक्कत न झेलनी पड़े

Friday, 12 September 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-19

दोस्तों नमस्कार।
मैं आप से खूब बातें करता रहता हूँ।  इस बार सोचा के क्यों न ये जाना जाए के आप के मन में क्या चल रहा है।
क्या आप ने कहीं पढ़ा या सुना है के स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में सार्वजानिक जगहों पर धुम्रपान करने पर लगाए जाने वाले जुर्माने को २०० से बढ़ा कर २०००० रूपए का प्रस्ताव दिया है। ये एक अच्छा निर्णय है या आप को प्रजातंत्र में तुग़लकी फरमान जैसा लगता है ? ये आप खुद तय करें !
 हरयाणा के विधान सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। हरयाणा हमेशा दल बदलूओं के लिए मशहूर रहा है। लोकसभा में भाजपा की सुनामी क्या चली दूसरे दलों के नेताओं को जैसे अपनी पार्टी से एलर्जी होने लगी। हरयाणा के नेताओं ने तो कमाल ही कर दिया है इधर से उधर पाला इस तरह बदल रहे हैं मानो उनके लिए राजनीति का मतलब केवल सत्ता हासिल करना हो। जनता की उन्हें कोई चिंता नहीं। ऐसे में इन जैसे लोगों को वोट देना चाहिए या नहीं ? ये आप खुद तय करें !
पांच वर्ष पूर्व  ( सी। बी। एस। ई। ) सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ स्कूल एजुकेशन द्वारा सी। सी। ई। प्रणाली को शुरू किया गया था। मकसद केवल एक था के बच्चों को बस पास होना चाहिए। बेशक़ वो जीवन की परीक्षा में फेल हो जाए। उस समय खूब हो हल्ला मचा के इस से शिक्षा का स्तर गिर जाएगा।  अब समाचार ये है के पहले की तरह दोबारा वार्षिक परीक्षा होंगी। अब पास वही होगा जो किताबों को पढ़ कर लिखने में सक्षम होगा। हमारी शिक्ष प्रणाली ठीक है या गलत ? ये आप खुद तय करें !
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में तापी नदी ने जिस तरह से प्रकोप बरपाया है उससे तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति को अपने साथ अब और छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं है। ये तो हम सब जानते हैं के आपदा कभी दस्तक दे कर नहीं आती परन्तु देश के अलग अलग भागों में जिस तरह प्राकृतिक विसंगतियां होने लगी हैं ये  बिल्कुल दस्तक  देने जैसा ही है। इस सब के लिए दोषी कौन है ? ये आप खुद तय करें !
एक जर्मन कवि फ्रेडरिक होल्डरलिन ने लिखा है ," धरती इस लिए नरक बन रही है ,क्योंकि मनुष्य इसे अपना स्वर्ग बनाने  कोशीश कर रहा है।" हम इस धरती को स्वर्ग बना रहे हैं या नरक ? ये आप खुद तय करें !
अच्छा दोस्तों फिर मिलते हैं। कुछ तय कर लें तो मुझे ज़रूर बताइएगा !

Saturday, 6 September 2014

A LETTER .. EK CHITHEE PART-18

दोस्तों नमस्कार।
लिखने को तो "बहुत कुछ " है पर जीवन की भागमभाग में जैसे बहुत कुछ छूट सा जाता है।इसी वजह से ये चिठ्ठी लिखने में कुछ देरी भी हो गई। लेकिन ये चिठ्ठी लिखना एक ऐसा माध्यम बन गया है के इसके लिखने से मन की "भड़ास"तो निकल ही जाती है। 
इस बार कर्ण भूमि करनाल के लोग सावन में बरसात को तरसते रहे परन्तु भादों में बरखा ने गर्मी को कम कर दिया है। "लोगों के साथ -साथ मौसम भी बदल रहा है !"
" नाटक करना भी जैसे युद्ध जीतना है। पिछले वर्ष की तरह इस बार भी  कॉलेज में नाटक की तैयारी करवा रहा हूँ। प्रिंसिपल कहती हैं ,"नाटक विनिंग होना चाहिए !  नाटक में हार -जीत क्या होता है ,अभी तक समझ नहीं पाया हूँ !" 2000 की संख्या वाले कॉलेज में फ़क़त 8 लड़कियों को नाटक में PARTICIPATE करवाने के लिए पूरे कॉलेज की टीम मशक्क़त कर रही है। "नाटक को लेकर बच्चियां जो तर्क देती हैं उससे अब समझ आने लगा है ज़िन्दगी भी एक नाटक है  !
भाई मोहिन्दर से पिछले कईं दिनों से हर रोज़ बात हो जाती है। पिछले साल की तरह इस बार भी मोहिन्दर ही नाटक की स्क्रिप्ट लिख रहा है। पिछले साल "मोहिन्दर "द्वारा लिखित नाटक "पल पल जीती हर पल मरती" नाटक का मंचन किया था। मोहिन्दर ने बताया के फिल्म भुजंग का पोस्ट प्रोडक्शन लगभग पूरा होने वाला है। फिल्म का पहला पोस्टर रिलीज़ हो चुका है। पोस्टर मोहिन्दर की पत्नि ऋचा ने डिज़ाइन किया है। "ऋचा बधाई ,बहुत सुन्दर बना है पोस्टर ! " फिल्म का डायरेक्शन और लेखन मोहिन्दर ने खुद किया है।
अगस्त 2014 काफी व्यस्त रहा। पहले पांच दिन मोहिन्दर के साथ बीत गए। मोहिन्दर मुंबई से घर छुटियाँ मनाने आया था। जिस तरह से अगस्त महीने के पहले पांच दिन बीते " हमारी भी ईद हो गई ! "
अगले 10 -15  दिन स्कूल में आज़ादी ,तीज ,ईद , राखी ,मुंशी प्रेम चंद के जन्मोत्सव मनाने में बीत गए। हर वर्ष की भांति इस बार भी  स्कूल में "सद्भावना पखवाड़ा " मनाया गया। स्वतंत्रता समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत मेरे कॉलेज समय के केमिस्ट्री के प्रोफेसर डॉ अशोक महता ने की। डॉ अशोक महता की सादगी और नम्रता का मैं हमेशा कायल रहा हूँ। "कॉलेज के दिनों में बेशक केमिस्ट्री  में हाथ तंग रहा लेकिन ज़िन्दगी की केमिस्ट्री का अपना ही मज़ा है !"
1987 में दयाल  सिंह कॉलेज करनाल से ग्रेजुएशन पास किया था । 1984  में दयाल सिंह कॉलेज की और से भारत सरकार द्वारा सांस्कृतिक सद्भावना के उदेशय से आयोजित "अपना उत्सव "कार्यक्रम में मैंने हरयाणा को रिप्रेजेंट किया था । वहीं अंबाला से अपना उत्सव में भागेदारी कर रहे बबलू, हंस और मनबीर तथा यमुनानगर से अमित डांगे से मिलना हुआ। 27 साल बीत जाने के बाद आज भी उन से मुलाकात होती रहती है। बाद में बबलू ने भी इंडियन थिएटर से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आज कल बबलू अमेरिका में किसी "संधू "नाम की गारमेंट कंपनी में नौकरी करता है। इस से पहले उस के पास  दुबई का चार्ज था।अमेरिका जाते हुए करनाल कुछ देर रुक कर गया। उससे बातचीत और मुलाकात बढ़िया रही। "जीवन की किताब के पुराने पन्ने खुले तो बहुत सारी भूली बिसरी यादें ताज़ा हो गई !"
चिठ्ठी लिखते लिखते सावन के सूखे को भादों की बरखा ने हरा कर दिया है। सावन में यहाँ सूखा रहा लेकिन भादों में बरखा जम के बरस रही है। लोग खुश हैं के मौसम में ढंडक हो गई है लेकिन किसान इस बेमौसमी बरखा से निराश है।"जो किसान पानी के लिए आसमान की ओर देख रहा था आज वही अभी ना बरसने की गुहार लगा रहा है !"
अगली चिठ्ठी में कुछ और संस्मरणों के साथ फिर मुलाक़ात होती है। तब तक के अलविदा दोस्तों !
TO BE CONTINUED.......................

Sunday, 17 August 2014

SHOK SABHA

 एक शोक सभा में जाने का अवसर मिला। दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए पाठ  चल रहा था। जितने लोग हॉल में थे ,उतने ही बाहर खड़े थे। अलग -अलग झुंडों में अलग -अलग चर्चा चल रही थी। चुनाव नज़दीक होने के कारण अधिकतर लोग चुनावों पर बतिया रहे थे।मृतक का भाई भी बाहर खड़ा था। वो नज़दीकी सम्बन्धियों और मित्रों को मिलने में व्यस्त था।
बाहर खड़े लोगों में अधिकतर नेता और अफसर थे जो अपने -अपने चाटुकारों से घिरे हुए थे। आज कल शोक सभाएं भी शक्ति प्रदर्शन का अखाडा लगने लगी हैं। बाहर खड़ी लाल और नीली बत्ती वाली गाड़ियों से तो कुछ ऐसा ही लग रहा था।
शोक सभा समाप्त होने में अभी देरी थी , मैं भी समय बिताने के लिए एक झुण्ड के समीप हो लिया। इस झुण्ड में मृतक का भाई सुल्तान और कुछ सम्बन्धी आपस में बतिया रहे थे। इधर उधर की बात करने के बाद सुल्तान ताली पीटते हुए ज़ोर से बोला,"कोई ग़म नहीं है भाई के जाने का,मौज कर के गया है।अभी एक महीना पहले ही सिंगापुर,थाईलैंड और कईं देश घूम कर आया था। घोड़े जैसा था अब तक !" सुल्तान की बात सुन कर सब ने ज़ोर का ठहाका लगाया।
ठहाकों के बीच एक लाल बत्ती लगी गाड़ी की कूँ कूँ ने शोक स्थल के बाहर खड़े सभी लोगों का ध्यान अपनी और खींच लिया। गाड़ी को देखते ही सुल्तान गाड़ी की तरफ हो लिया। गाड़ी से उतरने वाले व्यक्ति से सभी का परिचय करवाते हुए सुल्तान बोला ,"अपने दामाद के बड़े भाई हैं ,"मलखान सिंह " कमिश्नर हैं आज कल। " पास खड़े लोगों में से कुछ अपनी मुंडी हिलाते हुए एक स्वर में बोले ,"जनाब को कौन नहीं जानता। " अपनी प्रशंसा सुनते ही मलखान सिंह का चेहरा लाल गुलाब की तरह खिल उठा।
मलखान ने सुल्तान को एक तरफ ले जा कर शोक प्रकट किया। लेकिन सुल्तान तो जैसे भाई के चरित्र का सर्टिफिकेट सब को दे देना चाहता था। उसने मलखान का हाथ दबाते हुए फिर दोहराया ,"मौज कर के गया है भाई। अभी एक महीना पहले ही सिंगापुर ,थाईलैंड और कईं देश घूम कर आया था। बिल्कुल घोड़े जैसा था अब तक !" मलखान सिंह के चेहरे पर भी एक कमीनी सी मुस्कान दिखाई देने लगी।बाकी सभी लोगों ने इस बार ठहाका तो नहीं लगाया लेकिन एक कटु मुस्कान सब के चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थी।
बातों बातों में मलखान का भाई जगतार भी मण्डली में शामिल हो गया और सुल्तान दूसरे रिश्तेदारों को मिलने लगा। उसने आते ही भाई को प्रणाम किया और भाभी व बच्चों के बारे में पूछने लगा। मलखान सिंह के चेहरे पर उदासी छा गई। इस से पहले के मलखान सिंह कुछ बोलता , झुण्ड में से ही एक परिचित ने उदासी भरे लहज़े से पूछा ," सब ठीक तो है कमिशनर साब  ?"
"हाँ , कल सुबह जब्बर भगवान को प्यारा हो गया ,घर में मातम छाया हुआ था !"भरे हुए गले से मलखान सिंह बोला।
मलखान की बात सुनते ही सारा वातावरण ग़मगीन हो गया। हालांकि बहुत सारे लोग जब्बर से परिचित नहीं थे। भाई को उदास देख जगतार बोला ,"आप ने बताया भी नहीं ,कैसे हुआ ये सब ?"
 "कईं दिनों से बीमार चल रहा था," मलखान ने जवाब दिया।
 इतने में सुल्तान फिर वहां पहुँच गया। माहौल को उदास देख उसने इशारों इशारों में उदासी का कारण जानने की कोशिश की।जगतार सस्पेंस से पर्दा उठाते हुए बोला , "भाई साब के कुत्ते की मौत हो गई आज सुबह , बहुत प्यारा और समझदार कुत्ता था।सुल्तान, जगतार की बात सुनते ही अफ़सोस करते हुए बोला ,"ओहो ! पिछली बार ही तो मिला था मैं , बहुत प्यार करते थे बच्चे उससे। घर में तो सभी बहुत उदास होंगे !"इतने में जगतार बोला ,"बिल्कुल घर के मेंबर की तरह था जब्बर। "
 इससे पहले के कमिशनर साब कुछ बोलते ,झुण्ड में खड़े सभी लोग शोक प्रकट करने लगे !

Thursday, 7 August 2014

A JOURNEY TO BAALA G DHAM PART-2

अब आगे………………
 सालासर जाते हुए रास्ते में अधिकतर खेत सूखे हुए थे। हालांकि पिछले दिनों हुई बरसात के कारण आसपास काफी हरयाली नज़र आ रही थी। लेकिन अधिकतर खेत रेत के टीलों की तरह ही लग रहे थे हमारे सारे रास्ते में बादल आसमान में मंडराते रहे हमारे साथ चलते रहे लेकिन कहाँ बरसे ये बाला जी  ही जानें। रास्ते में लक्ष्मणगढ़ का किला भी आया। सालासर जल्दी पहुँचने के चक्कर में उसे नज़दीक से नहीं देख सके। हालाँकि ज़्यादातर फोटो चलते -चलते ही खींची थी और लक्ष्मणगढ़ के किले को भी दूर से ही क्लिक कर सका।

शाम को सालासर  पहुँच कर गाड़ी को चमेली देवी धर्मशाला के सामने रोक दिया गया। ध्रर्मशाला का निर्माण बखूबी किया गया था।  कहीं से भी फाइव स्टार होटल से कम नज़र नहीं आ रही थी। अंदर जाने के बाद जब हमने अपने कमरे में प्रवेश किया तो मैं हैरान हो गया। कमरे में खूबसूरत नक्काशी वाले बेड ,मित्सुबिशी का ए सी ,तोशिबा का एल सी डी ,शानदार बाथरूम ,गर्म और ठंडे पानी की व्य्वस्था ,भोजन के लिए साफसुथरी मेस और कैंटीन। सच में सब कमाल था। सब कुछ मात्र 600 रुपये में लेकिन खाने का बिल अलग से।

शहर में जब घूमने गए तो पता चला के यहाँ धर्मशालाओं का जाल सा बिछा हुआ है।हिसार धर्मशाला। आदमपुर धर्मशाला। मायादेवी धर्मशाला। नरवाना वालों की धर्मशाला। बातों बातों में गाइड की भूमिका अदा कर रहे राकेश ने बताया के अधिकतर धर्मशालाएं देश के बड़े सेठों और हरयाणा के बड़े राजनितिक घरानों की हैं।ऐसा नहीं के सभी धर्मशालाएं महंगी थी। आपकी श्रद्धा और जेब के हिसाब से यहाँ सभी तरह की व्यवस्था है।
यहाँ अधिकतर  धर्मशालाओं के नाम बेशक हरयाणा के शहरों पर रखे गए थे लेकिन उन पर लगे पोस्टरों की और इशारा करते हुए राकेश ने बताया के ये धर्मशालाएं हरयाणा के पूर्व मुख्य मंत्रियों भजनलाल और ओम प्रकाश चौटाला की हैं।  "धर्म के नाम पर काले को सफ़ेद करने का ये नायाब तरीका है", राकेश ने इशारों -इशारों में मुझे समझाने  की कोशिश की।
 यही नहीं हरयाणा के मौजूदा मुख्य मंत्री की भी यहाँ एक धर्मशाला निर्माणाधीन है। वैसे तो पूरे भारत वर्ष से भगतजन बाला जी के दर्शन के लिए यहाँ आते हैं लेकिन अधिकतर लोग यहाँ हरयाणा , राजस्थान और पंजाब से आते हैं।
थोड़ी देर आराम करने के बाद हम तीनों ने मंदिर का रुख किया। आरती का समय शाम 7. 40 निर्धारित था। मंदिर द्वार पर पहुंचे तो वहां बहुत भीड़ थी।  
आरती का समय नज़दीक आता जा रहा था। अगर श्रद्धालूओं वाली लाइन में लगते तो आरती का समय निकल जाता। श्यामलाल ने जुगाड़ लगा कर वी आई पी द्वार से प्रवेश करवा दिया। मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही मन आनंदमयी हो गया। मंदिर की सरंचना बहुत भव्य थी।
लेकिन मंदिर के अंदर प्रवेश करने के बावजूद भी मन बाला जी से यही प्रश्न करता रहा और सोचता रहा के क्या भगवान भी जुगाड़ वालों को ही दर्शन देते हैं। कुछ समय बाद ही आरती आरम्भ हो गई।  जो कुछ भी हो लोगों की श्रद्धा और विश्वास देखते ही बनता था। देखते ही देखते पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

Tuesday, 5 August 2014

A JOURNEY TO BAALA G DHAM - PART 1




लम्बे अरसे से दोस्तों के साथ किसी दौरे पर नहीं गया था। चार -पांच साल पहले तक दोस्तों की चौंकड़ी जमते ही कहीं न कहीं निकल लेते थे। पिछले दो सालों से मित्रमंडली में से श्यामलाल गर्ग और राकेश हर महीने बाला जी धाम सालासर राजस्थान की यात्रा पर जाते हैं। उनके साथ समीर ,राहुल ,जगदीश पाण्डे ,राजीव चौधरी,वीर प्रकाश आदि लगभग सभी साथी वहां हो आए थे। मन तो मेरा भी था लेकिन संजोग नहीं बन रहा था।
 श्यामलाल गर्ग और राकेश का 26 जुलाई को सालासर जाने का प्रोग्राम बना। शनिवार का दिन था , मैं भी हो लिया उनके साथ। मुझे बताया गया के करनाल से सालासर 370 किलोमीटर है। सुबह 8. 30 पर सफर की शुरुआत हुई और पानीपत ,रोहतक ,भिवानी ,लोहारू ,झुंझनू ,लक्ष्मणगढ़ से होते हुए हम शाम 5 बजे सालासर पहुँच गए।
रास्ते में पानीपत पर पहला टोल प्लाजा आया और उसके बाद कुल 6 जगह सड़क पर चलने के लिए एक तरफ का कुल 350 रूपए टैक्स देना पड़ा। सरकार का कहना है के जगह जगह पर लिए जाने वाले टोल टैक्स सड़कों के रखरखाव के लिए हैं। कुछ इलाकों को छोड़ कर अधिकतर सड़कें खस्ताहाल थीं। न जाने लोग इन्हें बंद करवाने के लिए एकजुट क्यों नहीं होते।
लोहारू के बाद जैसे ही राजस्थान में प्रवेश किया तो कासनी गांव में राकेश ने कार को रोक लिया। मुझे बताया गया के ये गांव नीलम प्रदीप कासनी का ससुराल है। नीलम प्रदीप कासनी हरयाणा में आई ए एस काडर की अफसर हैं और कुछ समय के लिए करनाल की डी सी भी रहीं। उनके पति भी हरयाणा में आई ए एस अफसर हैं। आगे चल कर बख्तावर पुरा  गांव के बारे में बताते हुए राकेश ने बताया के ये एक मॉडल विलेज है। बख्तावर पूरा की खासीयत ये है के इस गांव में कोई नाली नहीं है

रास्ते में दो जगह रुक कर चाय पी और खाना खाया। रास्ते में गाड़ी को उन्हीं जगह पर रोक गया जहाँ वो हर बार रुकते थे। रास्ते में होटल न्यू सुख सागर में खाना खाया और कुछ देर आराम किया। इस जगह का ज़िक्र राकेश और श्याम लाल अक्सर किया करते थे। यहाँ की आवभगत और खासतौर पर हुक्के का ज़िक्र करते हुए दोनों थकते नहीं थे। वापसी पर भी यहाँ रुके लेकिन दोनों बार हुक्का नदारद था।

 पूरे सफर में राकेश एक गाइड की तरह मुझे हर उस चीज़ की जानकारी  देता रहा। रास्ते में मरुस्थल के जहाज़ के नाम से मशहूर ऊँट की सवारी आम थी। गधों को ईंट के भट्ठों पर ईंट की ढुलाई ,धोबियों के पास कपड़ों की ढुलाई और गावों में सामान इधर -उधर पहुंचाने के प्रयोग में आम  देखा था लेकिन गधों को ठेला खींचते हुए देखना अजब संजोग था। लोकल आने जाने के लिए लोग थ्री व्हीलर का प्रयोग करते हैं। यहाँ चलने वाले थ्री व्हीलर्स का डिज़ाइन भी कमाल का है।

Monday, 21 July 2014

A LETTER...... EK CHITHEE PART-17

दोस्तों नमस्कार।
आशा करता हूँ आप सब कुशल मंगल से हैं।
जब देश में मानसून का मौसम हो और बरसात का कहीं अतापता न हो। देश के अधिकतर इलाकों में सूखे के आसार हों। ऐसे में कुशल मंगल पूछना बेमानी सा लगता है।
 जब महंगाई आसमां छू रही हो। टमाटर ,प्याज और आलू जैसी आम सब्ज़ियाँ ,आम आदमी की पहुँच से बहुत दूर हो गई हों।सरकारें काला बाज़ारी को दोषी ठहरा कर पल्ला झाड़ रही हों। ऐसे में कुशल मंगल पूछना बेमानी सा लगता है।
जब देश के अलग -अलग हिस्सों से युवतियों और बच्चियों से बलात्कार की ख़बरें समाचार पत्रों की सुर्खियां बन रही हों।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा ऐसी ख़बरों को जब चटपटी चाट की तरह परोसा जा रहा हो। ऐसे में कुशल मंगल पूछना बेमानी सा लगता है।
 जब देश की सत्ताधारी पार्टी से लोगों को बहुत सारी उम्मीदें हों और लोग अच्छे दिन आने के सपने देख रहे हों। ऐसे समय में देश में धार्मिक सौहार्द को बिगाड़ने के उदेश्य से सत्ताधारी पार्टी के ही नेता द्वारा धार्मिक उन्माद के किस्सों को स्मरण करने की बात कही जा रही हो , ऐसे में कुशल मंगल पूछना बेमानी सा लगता है। जब आसमाँ से बम्बों की वर्षा के समाचार सुनने को मिल रहे हों।  आसमान में मलेशिया एयरलाइन्स के विमान को मिसाईल से हमला कर जिस तरह से 298 लोगों की ज़िन्दगी को लील दिया गया है। ऐसे में कुशल मंगल पूछना बेमानी सा लगता है।
 फिर भी लोइस मेकमास्टर बुजोल्ड(LOIS MCMASTER BUJOLD) के इस कथन ,"The dead can't cry out for justice.It is duty of the living to do for them." के साथ आप के मंगल भविष्य और आप से पुनः मिलने की कामना करते हुए अपनी कलम को विश्राम देता हूँ।