खिचड़ी -3
वर्ष - 2014 को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र (भारत )में सत्ता परिवर्तन के लिए हमेशा याद किया जाएगा। देश की जनता ने धर्म जाति रंगभेद भाषा से उपर उठ कर जिस तरह बीजेपी को बहुमत दिया उससे से ये तो साफ़ हो गया के लोकतंत्र में जनता ही भगवन है। अब देखना यह है कि जनता की आशाएं कब और कैसे पूरी होती हैं। बेशक कुछ लोग इसे मोदी की लच्छे दर भाषणों का प्रभाव कहें या फिर मोदी लहर। एक लम्बे अरसे से परिवर्तन चाह रही जनता ने अपना काम बखूबी किया है। अब देखना ये है के मोदी सरकार जनता के विश्वास पर कितना खरा उतरती है।
कर्ण पब्लिक स्कूल का वार्षिक उत्सव मनाया जाना है। सभी बच्चों ,अध्यापकों और स्टाफ ने खूब मेह्नत की है। धुंध और सर्दी के बावजूद बच्चों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखाई देती। मेरा सलाम ! हमारे इन नन्हें -नन्हें बच्चे को जो केवल अपनी परफॉरमेंस देने के लिए धुंध और सर्दी से लोहा ले रहे हैं। यही तो कमाल है हमारी शिक्षा प्रणाली का ,जो हमें ज्ञान के साथ -साथ जीवन में आने वाली विपदाओं से लड़ना और संघर्ष करना सिखाती है। हमें आगे बढ़ना सिखाती है। हमारे बच्चों में लग्न ,मेहनत ,जज़्बा और बढ़िया perform करने की spirit छिपी हुई है ,जिसे हम सब को मिल कर को केवल देखना ही नहीं सराहना भी होगा। जब बच्चे रिहर्सल कर रहे होते हैं और मुझे जब भी उनकी रिहर्सल देखने का मौका मिलता है तो उनकी आँखों के अंदर एक ज़बरदस्त चमक दिखाई देती है ,और उस चमक को मैं बखूबी पढ़ भी पाता हूँ। सच मानिये उनकी आँखें ये पूछना चाहती हैं के क्या मैं अच्छा परफॉर्म कर रहा हूँ या नहीं। और जब उन्हें इस बात का एहसास हो जाता है के वो अच्छा कर रहे हैं तो वो सब और अच्छा करने के लिए अपनी जान लगा देते हैं। उदेश्य यही है के हमें मिल जुल कर बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभा को खोजना होगा, समझना होगा और तराशना होगा।क्या पता और कौन जाने इन्हीं में कोई सचिन ,धोनी ,कल्पना चावला, सायना या कोई हमारा भावी नेता या प्रधानमंत्री छिपा हुआ हो। जब हम डिमांड के हिसाब से वाक्यों को घड़ने लगते हैं तो उसकी सरलता और सात्विकता ख़त्म हो जाती है ! तो क्या डिमांड के अनुसार चीज़ोँ या वक्तव्यों को चाशनी लगा कर प्रस्तुत किया जाना चाहिए ?मेरे कहने का मतलब भी यही है के चाहे वो लेखन हो या फिर जीवन जहाँ हम जटिलताओं की डिमांड के अनुसार चाशनी लगाने लगते हैं तो सरलता और सादगी ख़त्म हो जाती है।
2014 ने जाते जाते दुनिया को ऐसी ख़बरें दी हैं जिनसे दिल दहल उठा है। मलेशिया के पूर्वी तटीय इलाकों में बाढ़ ,पाकिस्तान में स्कूली बच्चों पर आतंकी हमला ,कुछ दिन पहले असम में आतंकी हमला और Air Asia के विमान का समुद्र में समा जाना। इन हमलों और त्रासदियों ने अंदर तक हिला के रख दिया है। किन्तु जीवन की सच्चाई तो यही है कि चलने का नाम ही ज़िंदगी है। इन हादसों में मारे गए सभी लोगों को मेरी श्रद्धांजलि।
अलविदा -2014
सभी को मेरी शुभकामनायें !
वर्ष - 2014 को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र (भारत )में सत्ता परिवर्तन के लिए हमेशा याद किया जाएगा। देश की जनता ने धर्म जाति रंगभेद भाषा से उपर उठ कर जिस तरह बीजेपी को बहुमत दिया उससे से ये तो साफ़ हो गया के लोकतंत्र में जनता ही भगवन है। अब देखना यह है कि जनता की आशाएं कब और कैसे पूरी होती हैं। बेशक कुछ लोग इसे मोदी की लच्छे दर भाषणों का प्रभाव कहें या फिर मोदी लहर। एक लम्बे अरसे से परिवर्तन चाह रही जनता ने अपना काम बखूबी किया है। अब देखना ये है के मोदी सरकार जनता के विश्वास पर कितना खरा उतरती है।
कर्ण पब्लिक स्कूल का वार्षिक उत्सव मनाया जाना है। सभी बच्चों ,अध्यापकों और स्टाफ ने खूब मेह्नत की है। धुंध और सर्दी के बावजूद बच्चों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखाई देती। मेरा सलाम ! हमारे इन नन्हें -नन्हें बच्चे को जो केवल अपनी परफॉरमेंस देने के लिए धुंध और सर्दी से लोहा ले रहे हैं। यही तो कमाल है हमारी शिक्षा प्रणाली का ,जो हमें ज्ञान के साथ -साथ जीवन में आने वाली विपदाओं से लड़ना और संघर्ष करना सिखाती है। हमें आगे बढ़ना सिखाती है। हमारे बच्चों में लग्न ,मेहनत ,जज़्बा और बढ़िया perform करने की spirit छिपी हुई है ,जिसे हम सब को मिल कर को केवल देखना ही नहीं सराहना भी होगा। जब बच्चे रिहर्सल कर रहे होते हैं और मुझे जब भी उनकी रिहर्सल देखने का मौका मिलता है तो उनकी आँखों के अंदर एक ज़बरदस्त चमक दिखाई देती है ,और उस चमक को मैं बखूबी पढ़ भी पाता हूँ। सच मानिये उनकी आँखें ये पूछना चाहती हैं के क्या मैं अच्छा परफॉर्म कर रहा हूँ या नहीं। और जब उन्हें इस बात का एहसास हो जाता है के वो अच्छा कर रहे हैं तो वो सब और अच्छा करने के लिए अपनी जान लगा देते हैं। उदेश्य यही है के हमें मिल जुल कर बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभा को खोजना होगा, समझना होगा और तराशना होगा।क्या पता और कौन जाने इन्हीं में कोई सचिन ,धोनी ,कल्पना चावला, सायना या कोई हमारा भावी नेता या प्रधानमंत्री छिपा हुआ हो। जब हम डिमांड के हिसाब से वाक्यों को घड़ने लगते हैं तो उसकी सरलता और सात्विकता ख़त्म हो जाती है ! तो क्या डिमांड के अनुसार चीज़ोँ या वक्तव्यों को चाशनी लगा कर प्रस्तुत किया जाना चाहिए ?मेरे कहने का मतलब भी यही है के चाहे वो लेखन हो या फिर जीवन जहाँ हम जटिलताओं की डिमांड के अनुसार चाशनी लगाने लगते हैं तो सरलता और सादगी ख़त्म हो जाती है।
2014 ने जाते जाते दुनिया को ऐसी ख़बरें दी हैं जिनसे दिल दहल उठा है। मलेशिया के पूर्वी तटीय इलाकों में बाढ़ ,पाकिस्तान में स्कूली बच्चों पर आतंकी हमला ,कुछ दिन पहले असम में आतंकी हमला और Air Asia के विमान का समुद्र में समा जाना। इन हमलों और त्रासदियों ने अंदर तक हिला के रख दिया है। किन्तु जीवन की सच्चाई तो यही है कि चलने का नाम ही ज़िंदगी है। इन हादसों में मारे गए सभी लोगों को मेरी श्रद्धांजलि।
अलविदा -2014
सभी को मेरी शुभकामनायें !

बस्ती की ही दो लड़कियों सलोनी और सुहानी के पास साइकिल है। वो दोनों कंचन को साथ नहीं खेलने देती और ऊपर से उसको चिढ़ाती भी हैं। बस्ती में गणेश उत्सव की तैयारियां चल रही हैं। गणेश स्थापित हो चुके हैं। कंचन घर में उदास बैठी टी /वी देख रही है। चॅनेल्स बदलते हुए एक सीरियल पर उसकी आँखें जम जाती हैं। उसमे कुछ युवा किसी साहूकार के बच्चे का अपहरण कर लेते हैं और फिरौती की मांग करते हैं। कंचन के मन में एक आईडिया आता है और वो गणेशा का अपहरण कर लेती है। कंचन गणेश के पिता शिव शंकर से गणेशा के बदले साइकिल की मांग करती है।
शंकर अपने बच्चे को छुड़वाने के लिए पार्वती के साथ प्रकट होते हैं। कंचन से गणेशा को छोड़ने की अपील करते हैं। लेकिन बाल-मन कंचन साइकिल की ज़िद पर अड़ी रहती है। भोले शंकर तब कंचन के माध्यम से सन्देश देते हैं के बाज़ार आम आदमी के घर में घुस गया है। इसीलिए लोगों की इच्छाएं बढ़ती जा रही हैं। यही कारण है के संसार में अराजकता,अशांति,लूट,भय और अपहरण जैसी वारदातें बढ़ी हैं। बच्ची को भगवन की बात समझ आती है तो वो गणेशा को दोबारा से स्थापित कर देती है।
तेज़ाब में अनुराधा नाम की लड़की एक लड़के की बात नहीं मानती और वो उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक देता है। चेहरा जलने के बाद अनुराधा के जीवन की व्यथा और उसकी जीवन के साथ लड़ाई को ये कहानी बखूबी चित्रित करती है।
नाटक और नाटिका में सभी लड़कियों ने बखूबी अभिनय किया।
बिल्कुल एकांत पसंद लड़की ने नाटक में जिस तरह से जीवन की उमंग के मायने को समझा वो कमाल नाटक का ही कर सकता है। पूरी टीम ने उसका नाम छुपा रुस्तम रख दिया।
चुलबुली दीक्षा की नटखट शरारतें मुझे हमेशा याद रहेंगी।
हालांकि भारती शुरूआत में थोड़ी नर्वस रही लेकिन बाद में उसने नाटक का भरपूर आनंद उठाया। बचपन कितना सरल और पाक-साफ़ होता है वो मुझे स्मृति की बच्चों जैसी बातों ने सिखाया। सोनम रोर ने मस्ती ,रुचि ढिल्लों ने परिपक्वता और सोनाली ने अपने आप को प्रूव करने के लिए नाटक और अपने रोल के लिए खूब मेहनत की।
सोनाली ने अपने घर वालों के विरोध और विपरीत परिस्थितिओं के बावजूद हार नहीं मानी।
उसने अपने पात्र को दिल से जिया।
मोहिन्दर मुंबई में लेखन और निर्देशन का काम करता है। मोहिन्दर द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्म "भुजंग" बन कर तैयार है और सभी उसके रिलीज़ होने का बेसब्री से इंतज़ार भी कर हैं।
इस वर्कशॉप का पूरी टीम को फायदा हुआ। असल में मोहिन्दर और अमितोष करनाल अपने घर आये हुए थे और जब उन्हें नाटक की रिहर्सल्स के बारे में पता चला तो दोनों ने अपना ज़्यादा समय नाटक मण्डली के साथ ही बिताया।
वैसे मेरा तो हमेशा यही मानना है के कला का कोई मापदंड नहीं होता परन्तु बच्चों के लिए तैयारी का ये एक सशक्त माध्यम है। बच्चों की कला को अनदेखा करके आयोजक जिस तरह ट्रॉफी हासिल करने के लिए घालमेल करते हैं वो वाकये निंदनीय है।नाटक ही नहीं बल्कि सभी विधाओं में निर्णायक मंडल के निर्णयों का अधिकतर प्रतिभागीयों ने विरोध किया।
हालांकि कॉलेज में सांस्कृतिक विभाग की इंचार्ज भंडारी मैडम को इस की permission लेने के लिए बहुत मशक्क़त करनी पड़ी।
काजल को छोड़ कर नाटक में एक्टिंग कर रही सभी लड़कियां नई हैं। किसी ने भी इस से पहले कभी नाटक नहीं किया है। काजल ,स्मृति ,प्रीति ,सोनम ,सोनाली ,दीक्षा रूचि और भारती सभी बढ़िया काम कर रही हैं। नाटक के प्रति सब की लग्न देखते ही बनती है। 
















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to be continued.........................