Sunday, 28 September 2014

NAQAAB

कबीर का बाप राम सिंह पिछले 35 वर्षों से इसी शहर की पटरी पार बस्ती में रह रहा था। हर तबके के लोगों में उठना बैठना था उसका। चुनाव के दिन चल रहे थे। सभी राजनीतिक पार्टी के लोग जानते थे के अगर रामसिंह हामी भर दे तो अच्छी खासी वोटों पर कब्ज़ा किया जा सकता है।
हालांकि राम सिंह ने कभी किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष को तवज्जो नहीं दी थी। फिर भी सभी पार्टीयों  के लोग उसकी चोखट पर माथा ज़रूर टेकते। सभी जानते थे के वो अपने मताधिकार का प्रयोग करने के साथ अपने सभी साथियों को वोट डलवाने के लिए ज़रूर ले जाता था। जहाँ और जिस पार्टी को वोट डालने के लिए राम सिंह बोल देता वो पत्थर पर लकीर की तरह होता। बस्ती के सभी लोग वहीं वोट डालते जहाँ राम सिंह बोल देता। किसी की क्या मज़ाल के कोई भी बस्ती के लोगों की वोट खरीदने की कोशिश करे।
राम सिंह सच बोलने से कभी डरता नहीं था। नेताओं को वो मौका परस्त ,गिरगिट ,लूटेरे ,डाकू , मतलबी , नकाबपोश और न जाने किस -किस नाम से सम्बोधित करता। जब भी कोई राजनीति पर बात करता तो वो शहर की दुर्दशा की दुहाई देते हुए उन्हें ज़रूर लताड़ता।लेकिन कोई भी उसकी बात का बुरा न मानता।
इस बार फिर सभी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रामसिंह के द्वार पर दस्तक देनी शुरू कर दी थी। लेकिन इस बार राम सिंह कुछ बदला बदला नज़र आ रहा था। जब भी कोई वोट मांगने के लिए उसके द्वार पर आता ,वो हंस कर उसका स्वागत करता। जो भी आता उसी को वोट डालने की हामी भर देता। शायद इस बार राम सिंह ने भी नेताओं की तरह अपने चेहरे पर नक़ाब डाल लिया था। यही कारण था किसी को भी अब तक अंदाज़ नहीं हुआ था के ऊंट किस करवट बैठने वाला है। राम सिंह ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले थे।
35 साल के तज़ुर्बे से राम सिंह को इतना तो समझ आ ही गया था के सत्ता हाथ आने के बाद सभी नेता नपुंसक की तरह हो जाते हैं। जो चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकते। उनके पास कुछ रह जाता है तो बस वायदे और केवल वायदे। मतदान को एक दिन बाकी था। राम सिंह ने सब साथियों को बुलाया और लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोटिंग मशीन पर छपे नए बटन "NOTA"(not other than above) के बारे में बताया।  सभी राम सिंह की बात सुन कर अपने अपने घरों की ओर चल दिए।
रात को सहसा शोर सुन कर राम सिंह ने खिड़की से बाहर झाँका तो दंग रह गया। बस्ती के लोग वहां खड़े एक ट्रक से चावल ,दाल ,गेहूँ ,शराब और रोज़मर्रा काम आने वाले सामान को उतार कर अपने -अपने घरों में रखने में मशगूल थे। राम सिंह सभी को रोकने की कोशिश करने लगा। लेकिन किसी पर भी राम सिंह की बातों का कोई असर नहीं हो रहा था।
राम सिंह को समझ आ चुका  था के बस्ती वालों ने भी अपने चेहरों पर नक़ाब पहन लिया है। 

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