Friday, 19 September 2014

Aazaadi

देश को आज़ाद हुए लगभग 67 वर्ष बीत चुके हैं। पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो बहुत कुछ बदल गया है।हालाँकि देश ने पिछले सालों में खूब तरक्की की है।मेरा भारत महान के नारे भी लगते रहे हैं। लेकिन अभी भी बहुत सारी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें चुस्त दुरुस्त करने की ज़रुरत है। 15 अगस्त 2014 आज़ादी की पूर्व संध्या पर ये ब्लॉग लिख दिया था। लेकिन पोस्ट नहीं कर पाया। आज इसे पोस्ट कर रहा हूँ  ……………………… 
रोज़गार के लिए गांव से लोग शहरों में बसने लगे हैं। शहरों के लोग गांवों में बसना चाहते हैं।
जनसँख्या लगातार बढ़ती जा रही है। विश्व में दूसरा स्थान है हमारा। जानकारों का कहना है अगर इसी तरह जनसँख्या बढ़ती रही तो हम जल्द ही चीन को पछाड़ कर नम्बर एक हो जाएंगे।
कुछ साल पहले तक भी माहौल शांत था। आजकल इतनी गाड़ियां हो गई हैं आम आदमी का सड़कों पर चलना ही मुश्किल हो गया है। शोरशराबे और वायु प्रदुषण के कारण लोगों में हाइपर टेंशन ,माइग्रेन  जैसी बीमारियां आम हो गई हैं। यही नहीं कैंसर और हार्ट अटैक के लिए भी प्रदुषण मुख्य कारक है।
भ्रष्टाचार का तो पूछो ही मत। यह पूरी तरह से हमारी संस्कृति में रच -बस गया है । अफसरों से लेकर राजनेता तक सब इस का रसपान करना अपना धर्म समझते हैं। एक राशन कार्ड ,ड्राइविंग लाईसेंस ,या कोई भी सरकारी काम हो आपको बाबू लोगों की मुट्ठी बंद करनी ही पड़ती है। घूसखोरों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।
दलालों की कोई कमी नहीं है हमारे देश में। कोई काम हो ,सरकारी ठेका हो या फिर कोई खरीद -फरोख्त आप को दलाल की ज़रुरत पड़ती ही है। वर्ना आप की फ़ाइल दबी रहेगी और धूल फांकती रहेगी।
गरीबी और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। रोज़गार के लिए कोई ठोस नीति सरकार के पास नहीं है। गरीब और अमीर के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।
राजनेता और धर्म के ठेकेदार विभाजन को अपने अस्त्र की तरह प्रयोग करते हैं। ये लोग आज भी धर्म /जाति के नाम पर समाज को दो फाड़ करने में कतई नहीं चूकते हैं।
कानून अँधा होता है इस के मायने देश की कानून व्यवस्था को देख कर कोई भी लगा सकता है। हर रोज़ लूट , हत्या ,बलात्कार के समाचार देश के लोगों के लिए आम हो गए हैं। पुलिस को आम आदमी "वर्दी वाला गुंडा" कह कर पुकारता है।  
शिक्षा समय के साथ साथ महंगी और निरर्थक हो गई है। युवा डिग्री हासिल तो कर लेता है परन्तु कर्म क्षेत्र में पहुँचते ही डिग्री युक्तिहीन हो जाती है।
सरकारी तंत्र को तो जैसे दीमक ने खोखला कर दिया है। मानव संसाधन को चुस्त दुरुस्त करने के लिए सरकार कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती है ये कोई समझ नहीं पाया है। शिक्षा ,स्वास्थ्य ,दूरसंचार ,दूरदर्शन ,ट्रांसपोर्ट ,सीवरेज ,सड़कें आदि क्षेत्र चरमराये हुए हैं।
क्या आप को भी देश की व्यवस्था और कार्य प्रणाली " नाम बड़े और दर्शन छोटे " की तरह नहीं लगती हैं ?
 क्या इसी का नाम आज़ादी है ?
   क्या सब कुछ इसी तरह से चलता रहेगा ?
  

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