"पुस्तक मेला "
दोस्तों नमस्कार !
ये आप को मेरी 20 वीं चिठ्ठी है। उम्मीद करता हूँ के आप मेरी चिठियां ज़रूर पढ़ रहे होंगे। वैसे आज कल लोगों का ये मानना है के चिठियों के दिन लद चुके हैं। इंटरनेट ,व्हाट्स एप्प और फेस बुक के इस युग में चिठ्ठी outdated हो गई है। लेकिन मेरा मानना है के चिठ्ठी में जो अपनापन ,संवेदना और संजीदगी है वो फेस बुक या व्हाट्स एप्प में नहीं है। मैंने तो आज भी अपने दोस्तों, रिश्तेदारों की बहुत सारी चिठियों को सहेज कर रखा हुआ है और जब भी समय मिलता है मैं उन्हें बांचने बैठ जाता हूँ। फुर्सत के पलों में चिठियां बांचते हुए बीते हुए दिनों का जो चलचित्र उभर कर आता है उस एहसास को बयां करना शायद बहुत कठिन है।
चिठियों की तरह पुस्तकों के बारे में भी बहुतेरे लोगों का ये मानना है के इस ओर रुझान कम हुआ है। लोगों का मानना है के इलेक्ट्रॉनिक और इंटरनेट के इस युग में किताबें लोगों की मित्र नहीं रहीं खासतोर पर बच्चे किताबों से दूर भागते हैं। मैं तो इस बात से भी इत्तफ़ाक़ नहीं रखता। मेरा तो ये मानना है के पुस्तकों की importance कभी भी कम नहीं हो सकती। बेशक़ सरिता ,धर्मयुग ,चंपक ,फेंटम ,लोटपोट या चाचा चौधरी सरीखी किताबें बाज़ार से गायब हो गई हों।
पिछले दिनों स्कूल में एक पुस्तक मेले का आयोजन किया था। बच्चों का किताबों के प्रति रुझान देखते ही बनता था। उनके चेहरे ये साफ़ बयां कर रहे थे के वो सब किताबें खरीद लें। दरअसल competition के इस युग में हम ने बच्चों को स्वयं उस तोते की तरह बना दिया है जिसे बंद पिंजरे में रहने की आदत सी हो गई है और वो चाहते हुए भी बाहर की दुनिया से कोई वास्ता नहीं रख पाता। हम ने खुद उनके सपनों को पिंजरे में बंद कर दिया है।
निःसंदेह आज समय और संस्कृति दोनों बदल रहे हैं। हमें ये कतई नहीं भूलना है के सृजन सपनों से ही होता है। इसलिए आज समय की मांग है कि हम बच्चों को सपने बुनने दें ताकि वो दुनिया को अपने नज़रिये से देखें ,सोचें ,समझें और बुनें।
चलते -चलते बता दूँ के बीते साल की तरह इस बार भी एक कॉलेज में नाटक करवा रहा हूँ। रिहर्सल शुरू हो चुकी है। अगस्त महीना बहुत busy रहा। अगली चिठ्ठी में पिछले महीने के कुछ खट्टे मीठे संस्मरणों के साथ जल्द ही आप से फिर भेंट करने के साथ आप से विदा लेता हूँ।
"बाकी रब्ब राखा !"



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