Saturday, 6 September 2014

A LETTER .. EK CHITHEE PART-18

दोस्तों नमस्कार।
लिखने को तो "बहुत कुछ " है पर जीवन की भागमभाग में जैसे बहुत कुछ छूट सा जाता है।इसी वजह से ये चिठ्ठी लिखने में कुछ देरी भी हो गई। लेकिन ये चिठ्ठी लिखना एक ऐसा माध्यम बन गया है के इसके लिखने से मन की "भड़ास"तो निकल ही जाती है। 
इस बार कर्ण भूमि करनाल के लोग सावन में बरसात को तरसते रहे परन्तु भादों में बरखा ने गर्मी को कम कर दिया है। "लोगों के साथ -साथ मौसम भी बदल रहा है !"
" नाटक करना भी जैसे युद्ध जीतना है। पिछले वर्ष की तरह इस बार भी  कॉलेज में नाटक की तैयारी करवा रहा हूँ। प्रिंसिपल कहती हैं ,"नाटक विनिंग होना चाहिए !  नाटक में हार -जीत क्या होता है ,अभी तक समझ नहीं पाया हूँ !" 2000 की संख्या वाले कॉलेज में फ़क़त 8 लड़कियों को नाटक में PARTICIPATE करवाने के लिए पूरे कॉलेज की टीम मशक्क़त कर रही है। "नाटक को लेकर बच्चियां जो तर्क देती हैं उससे अब समझ आने लगा है ज़िन्दगी भी एक नाटक है  !
भाई मोहिन्दर से पिछले कईं दिनों से हर रोज़ बात हो जाती है। पिछले साल की तरह इस बार भी मोहिन्दर ही नाटक की स्क्रिप्ट लिख रहा है। पिछले साल "मोहिन्दर "द्वारा लिखित नाटक "पल पल जीती हर पल मरती" नाटक का मंचन किया था। मोहिन्दर ने बताया के फिल्म भुजंग का पोस्ट प्रोडक्शन लगभग पूरा होने वाला है। फिल्म का पहला पोस्टर रिलीज़ हो चुका है। पोस्टर मोहिन्दर की पत्नि ऋचा ने डिज़ाइन किया है। "ऋचा बधाई ,बहुत सुन्दर बना है पोस्टर ! " फिल्म का डायरेक्शन और लेखन मोहिन्दर ने खुद किया है।
अगस्त 2014 काफी व्यस्त रहा। पहले पांच दिन मोहिन्दर के साथ बीत गए। मोहिन्दर मुंबई से घर छुटियाँ मनाने आया था। जिस तरह से अगस्त महीने के पहले पांच दिन बीते " हमारी भी ईद हो गई ! "
अगले 10 -15  दिन स्कूल में आज़ादी ,तीज ,ईद , राखी ,मुंशी प्रेम चंद के जन्मोत्सव मनाने में बीत गए। हर वर्ष की भांति इस बार भी  स्कूल में "सद्भावना पखवाड़ा " मनाया गया। स्वतंत्रता समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत मेरे कॉलेज समय के केमिस्ट्री के प्रोफेसर डॉ अशोक महता ने की। डॉ अशोक महता की सादगी और नम्रता का मैं हमेशा कायल रहा हूँ। "कॉलेज के दिनों में बेशक केमिस्ट्री  में हाथ तंग रहा लेकिन ज़िन्दगी की केमिस्ट्री का अपना ही मज़ा है !"
1987 में दयाल  सिंह कॉलेज करनाल से ग्रेजुएशन पास किया था । 1984  में दयाल सिंह कॉलेज की और से भारत सरकार द्वारा सांस्कृतिक सद्भावना के उदेशय से आयोजित "अपना उत्सव "कार्यक्रम में मैंने हरयाणा को रिप्रेजेंट किया था । वहीं अंबाला से अपना उत्सव में भागेदारी कर रहे बबलू, हंस और मनबीर तथा यमुनानगर से अमित डांगे से मिलना हुआ। 27 साल बीत जाने के बाद आज भी उन से मुलाकात होती रहती है। बाद में बबलू ने भी इंडियन थिएटर से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आज कल बबलू अमेरिका में किसी "संधू "नाम की गारमेंट कंपनी में नौकरी करता है। इस से पहले उस के पास  दुबई का चार्ज था।अमेरिका जाते हुए करनाल कुछ देर रुक कर गया। उससे बातचीत और मुलाकात बढ़िया रही। "जीवन की किताब के पुराने पन्ने खुले तो बहुत सारी भूली बिसरी यादें ताज़ा हो गई !"
चिठ्ठी लिखते लिखते सावन के सूखे को भादों की बरखा ने हरा कर दिया है। सावन में यहाँ सूखा रहा लेकिन भादों में बरखा जम के बरस रही है। लोग खुश हैं के मौसम में ढंडक हो गई है लेकिन किसान इस बेमौसमी बरखा से निराश है।"जो किसान पानी के लिए आसमान की ओर देख रहा था आज वही अभी ना बरसने की गुहार लगा रहा है !"
अगली चिठ्ठी में कुछ और संस्मरणों के साथ फिर मुलाक़ात होती है। तब तक के अलविदा दोस्तों !
TO BE CONTINUED.......................

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