Friday, 30 May 2014

chunav

दुम हिलाते
निकल पड़ा है
कुतों का झुण्ड
ये मत समझना
के
वफादार
हो गए हैं ,
ध्यान रखना
ये
कुते
काटने
वाले हैं ! 

Friday, 23 May 2014

AJAB GAJAB KI RAJNEETI

दोस्तों ! देश के अलग अलग हिस्सों में मतदान की प्रक्रिया और चुनावी वायरल का यौवन समाप्त हो चुका है। देश और देश के लोगों का भाग्य जिन ई वी एस मशीनों में बंद हुआ था वो जादुई पिटारा १६ मई को खुला चुका है और पता लग गया है के देश के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं।चुनावी फ़िज़ा में बदलाव तो स्पष्ट नज़र आ रहा था। परन्तु असल में देश के लोगों के मन की बात १६ मई को ही पता चल पाई।बचपन में सुना करते थे के "इट इज़ ऑल फेयर इन लव एंड वॉर।" देश के अलग अलग हिस्सों में हुए चुनावी प्रचार -प्रसार को देखा तो  "इट इज़ ऑल फेयर इन पॉलिटिक्स " के मायने भी समझ आने लगे।

राजनीतिज्ञों के लिए सत्ता लोलुपता और राजनितिक महत्वकांक्षा इतनी महत्वपूर्ण हो गई है के इन लोगों ने सभी नियमों को ताक़ पर रख दिया। कुछ दिनों पहले की ही तो बात है मेरे एक मित्र ने मज़ाक -मज़ाक में कहा था," कितना अच्छा हो यदि सभी नियमों को तोड़ दिया जाए। "मैंने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा तो वो तुरंत बोला ,"कितना मज़ा हो अगर होली वाले दिन बॉम्ब पटाखे बजाए जायें और दीपावली वाले दिन लोग एक -दूसरे को रंग गुलाल लगाएं। "साथ ही उसने तर्क भी दिया ,"सब कुछ एक ही तरह से करते करते जीवन बेरंग और बेमज़ा हो गया है। "

बिल्कुल ऐसा ही हाल हमारे देश की राजनीति का भी रहा। राजनीतिज्ञों को भी ये समझ आ गया के अब के बार कुछ भी सीधा नहीं।लोगों में आपसी भाई चारे की बात करने वाले नेताओं ने झूठे वायदे और धार्मिक उन्माद फैलाने वाले भाषण दिए। नेताओं या पार्टी ने बेरोज़गारी ,गरीबी , महंगाई ,भ्रष्टाचार ,देश का भविष्य बच्चों और युवाओं के लिए शिक्षा व स्वास्थय सेवाओं, महिलाओं ,मज़दूरों या किसानों के बारे में बात तो की लेकिन संजीदगी से नहीं।  एक दूसरे पर औछी टिप्पणी का जैसे प्रचलन सा ही हो गया था। बातों -बातों और इशारों -इशारों में एक दूसरे को नंगा करने की कोशिश कुछ इस तरह से की गई मानो कहना चाह रहे हों के चुनाव भी हमाम की तरह है ,जहाँ सब को एक बार नंगा तो होना ही पड़ता है। इस बार तो ऐसा लगा मानो चुनाव नहीं बल्कि दंगल हो। दंगल में पहलवान अपने लंगोट कस कर मैदान में उतरते हैं परन्तु यहाँ तो सभी के लंगोट खिसकते नज़र आए।

 क्या यही राजनीति के असल मायने हैं ! कोई किसी की बीवी के बारे में सवाल पूछ रहा था तो कोई किसी के पति पर सवालिया निशान लगा रहा था। कोई माँ की ममता में अंधेपन का ज़िक्र कर के लोगों को अपनी आँखें खोलने की अपील कर रहा था तो कोई राजकुमार से शादी न करने का कारण पूछ रहा था। मौसमी पारे के बढ़ने के साथ -साथ चुनावी गर्मी भी बढ़ती गई। बाबा जी भी चुनावी दंगल में कूद गए। शायद भूल गए के दंगल में लंगोट कस कर रखना पड़ता है और सत्संग में बोल पर नियंतरण रखना ज़रूरी है।पर बाबा कहाँ रुकने वाले। ऐसे में सोशल मीडिया भी पीछे नहीं रहा। कहीं चाय वाले के कपड़ों का ज़िक्र हुआ तो कहीं बाबा को औरतों के कपड़ों में दिखा कर उन्हें भगोड़ा प्रमाणित करने का प्रयास किया गया। जाति के नाम को भुनाने का समय आया तो छाती ठोक कर अपना प्रमाण पत्र दिया। कुल मिला कर एक दूसरे की माँ बहन  करने में किसी ने कोई कोर कसर बाकी  नहीं छोड़ी।
शहजादे ,गुड़िआ ,मैडम ,टॉफ़ी ,गुब्बारे जैसे शब्दों का प्रयोग तो इस तरह किया गया मानो नेता लोग छोटे बच्चों की तरह गुड़िआ -गुड़िआ खेल रहे हों।
खैर इस बार अजब गजब तो हुआ ! सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ ! मतदान प्रतिशत भी बढ़ा। लोग भी जागरूक हुए ! लहर और सुनामी का असर भी देखने को मिला। परिवार वाद को अलविदा के साथ विश्व की सब से बड़ी और महानतम लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के ज़रिए सत्ता परिवर्तन की एक नई  दास्ताँ भी लिखी गई। 
२६ मई को देश का नया प्रधानमंत्री शपथ लेगा।  शेर की तरह चलने और दहाड़ने वाला नरेंदर मोदी देश के १२५ सौ करोड़ लोगों की उम्मीदों पर कैसे खरा उतरता है ,ये आने वाले समय में कबीले गौर करने वाला होगा।     









Wednesday, 21 May 2014

achhe din aane vaale hain.......!

अच्छे दिन आने वाले हैं................. !
लो जी विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र हिंदुस्तान की राजनीति में विश्व रिकॉर्ड बन गया है। स्वतन्त्र देश में जन्म लेने वाला पहला व्यक्ति २६ मई को विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहा है।पिछले करीब 65 साल से देश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस की ये सब से बढ़ी हार हुई है। 
 नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा के सेंट्रल हॉल में दिए गए भाषण को सुन रहा था। वाह जी वाह मोदी जी !आप तो छा गए। कमाल  का भाषण दिया। तालियां बजीं ,आंसू बहे ,माँ को याद किया गया। अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म का डायलाग याद आ गया , "मेरे पास माँ है। " टीवी वाले अलग -अलग ढंग से आप के भाषण को बार -बार दिखा रहे हैं। दिखाएँ भी क्यों ना.……टी आर पी का चक्कर जो है।
यही नहीं संसद में प्रवेश से पहले जिस तरहां से नतमस्तक हो कर सलाम किया गया वो सच में काबीले तारीफ़ है।आडवाणी और वाजपायी को जिस तरह से सम्मान दिया गया उस से भारतीय संस्कृति को बखूबी प्रचारित और प्रसारित करने में आप कामयाब हुए हैं। 
ये बाल धुप में सफ़ेद नहीं किए हैँ ,इस लकोक्ति के मायने समझ आने लगे हैं। समझ में आने लगा है के किला फ़तेह करने के लिए कला और कौशल दोनों की ज़रुरत होती है।जोकि मोदी ने बखूबी किया है। पूरा देश मोदीमय हो गया है। मोदी के बोलने के स्टाइल की वाजपाई के साथ तुलना की जा रही है।
आशावाद ,देशभक्ति ,महिलाओं की सुरक्षा ,गरीबों के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए जिस तरह मोदी ने संसद में बैठे जनप्रतिनिधिओं को सरकार के मायने बताए वो निःसंदेह सराहनीय है।सरकार का मतलब है लोगों की सरकार ,जो लोगों के बारे में सोचे और जो लोगों के सपने ले। वाह जी वाह मोदी जी। आपने संसद में अपने पहले भाषण से अपने साथिओं को जो संकेत दिए हैं ,मैं उस की मुक्त कंठ से  प्रसंशा करता हूँ। राह आसान नहीं है परन्तु यदि होंसले बुलंद हों और नियत में कोई खोट न हो तो मंज़िल नज़दीक नज़र आने लगती है।
मोदी को हिंदुस्तान की जनता ने जिस तरह से बहुमत दिया है उससे मोदी की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है। नुक्कड़ पर चाय की दुकान पर चाय पीता रिक्शा चालक या कॉलेज में पढ़ने वाला कोई बालक ,पान की दुकान पर धुंए के छलै बनाता कोई दिलजला आशिक या फिर कोई दार्शनिक ,बस में सफर करते दो अनजान यात्री हों या फिर किसी वातानुकूलित कमरे में बैठे दो घनिष्ठ मित्र ,दफ्तरों में काम करते बाबू या फिर एकांत में चिलम पीते साधू ,क्या दुकानदार ,हवालदार ,जैलदार या फिर कोई पहरेदार सभी के मुख पर बस एक ही बात है, "ये मोदी ज़रूर कुछ करेगा।"टीवी पर बेशक प्रचार प्रसार रुक गया हो लेकिन अब आम आदमी के ओंठों पर बस एक ही गीत है , "अच्छे दिन आने वाले हैं !"
शुभकामनायें !