दोस्तों ! देश के अलग अलग हिस्सों में मतदान की प्रक्रिया और चुनावी वायरल का यौवन समाप्त हो चुका है। देश और देश के लोगों का भाग्य जिन ई वी एस मशीनों में बंद हुआ था वो जादुई पिटारा १६ मई को खुला चुका है और पता लग गया है के देश के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं।चुनावी फ़िज़ा में बदलाव तो स्पष्ट नज़र आ रहा था। परन्तु असल में देश के लोगों के मन की बात १६ मई को ही पता चल पाई।बचपन में सुना करते थे के "इट इज़ ऑल फेयर इन लव एंड वॉर।" देश के अलग अलग हिस्सों में हुए चुनावी प्रचार -प्रसार को देखा तो "इट इज़ ऑल फेयर इन पॉलिटिक्स " के मायने भी समझ आने लगे।
राजनीतिज्ञों के लिए सत्ता लोलुपता और राजनितिक महत्वकांक्षा इतनी महत्वपूर्ण हो गई है के इन लोगों ने सभी नियमों को ताक़ पर रख दिया। कुछ दिनों पहले की ही तो बात है मेरे एक मित्र ने मज़ाक -मज़ाक में कहा था," कितना अच्छा हो यदि सभी नियमों को तोड़ दिया जाए। "मैंने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा तो वो तुरंत बोला ,"कितना मज़ा हो अगर होली वाले दिन बॉम्ब पटाखे बजाए जायें और दीपावली वाले दिन लोग एक -दूसरे को रंग गुलाल लगाएं। "साथ ही उसने तर्क भी दिया ,"सब कुछ एक ही तरह से करते करते जीवन बेरंग और बेमज़ा हो गया है। "
बिल्कुल ऐसा ही हाल हमारे देश की राजनीति का भी रहा। राजनीतिज्ञों को भी ये समझ आ गया के अब के बार कुछ भी सीधा नहीं।लोगों में आपसी भाई चारे की बात करने वाले नेताओं ने झूठे वायदे और धार्मिक उन्माद फैलाने वाले भाषण दिए। नेताओं या पार्टी ने बेरोज़गारी ,गरीबी , महंगाई ,भ्रष्टाचार ,देश का भविष्य बच्चों और युवाओं के लिए शिक्षा व स्वास्थय सेवाओं, महिलाओं ,मज़दूरों या किसानों के बारे में बात तो की लेकिन संजीदगी से नहीं। एक दूसरे पर औछी टिप्पणी का जैसे प्रचलन सा ही हो गया था। बातों -बातों और इशारों -इशारों में एक दूसरे को नंगा करने की कोशिश कुछ इस तरह से की गई मानो कहना चाह रहे हों के चुनाव भी हमाम की तरह है ,जहाँ सब को एक बार नंगा तो होना ही पड़ता है। इस बार तो ऐसा लगा मानो चुनाव नहीं बल्कि दंगल हो। दंगल में पहलवान अपने लंगोट कस कर मैदान में उतरते हैं परन्तु यहाँ तो सभी के लंगोट खिसकते नज़र आए।
क्या यही राजनीति के असल मायने हैं ! कोई किसी की बीवी के बारे में सवाल पूछ रहा था तो कोई किसी के पति पर सवालिया निशान लगा रहा था। कोई माँ की ममता में अंधेपन का ज़िक्र कर के लोगों को अपनी आँखें खोलने की अपील कर रहा था तो कोई राजकुमार से शादी न करने का कारण पूछ रहा था। मौसमी पारे के बढ़ने के साथ -साथ चुनावी गर्मी भी बढ़ती गई। बाबा जी भी चुनावी दंगल में कूद गए। शायद भूल गए के दंगल में लंगोट कस कर रखना पड़ता है और सत्संग में बोल पर नियंतरण रखना ज़रूरी है।पर बाबा कहाँ रुकने वाले। ऐसे में सोशल मीडिया भी पीछे नहीं रहा। कहीं चाय वाले के कपड़ों का ज़िक्र हुआ तो कहीं बाबा को औरतों के कपड़ों में दिखा कर उन्हें भगोड़ा प्रमाणित करने का प्रयास किया गया। जाति के नाम को भुनाने का समय आया तो छाती ठोक कर अपना प्रमाण पत्र दिया। कुल मिला कर एक दूसरे की माँ बहन करने में किसी ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।
शहजादे ,गुड़िआ ,मैडम ,टॉफ़ी ,गुब्बारे जैसे शब्दों का प्रयोग तो इस तरह किया गया मानो नेता लोग छोटे बच्चों की तरह गुड़िआ -गुड़िआ खेल रहे हों।
खैर इस बार अजब गजब तो हुआ ! सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ ! मतदान प्रतिशत भी बढ़ा। लोग भी जागरूक हुए ! लहर और सुनामी का असर भी देखने को मिला। परिवार वाद को अलविदा के साथ विश्व की सब से बड़ी और महानतम लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के ज़रिए सत्ता परिवर्तन की एक नई दास्ताँ भी लिखी गई।
२६ मई को देश का नया प्रधानमंत्री शपथ लेगा। शेर की तरह चलने और दहाड़ने वाला नरेंदर मोदी देश के १२५ सौ करोड़ लोगों की उम्मीदों पर कैसे खरा उतरता है ,ये आने वाले समय में कबीले गौर करने वाला होगा।
राजनीतिज्ञों के लिए सत्ता लोलुपता और राजनितिक महत्वकांक्षा इतनी महत्वपूर्ण हो गई है के इन लोगों ने सभी नियमों को ताक़ पर रख दिया। कुछ दिनों पहले की ही तो बात है मेरे एक मित्र ने मज़ाक -मज़ाक में कहा था," कितना अच्छा हो यदि सभी नियमों को तोड़ दिया जाए। "मैंने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा तो वो तुरंत बोला ,"कितना मज़ा हो अगर होली वाले दिन बॉम्ब पटाखे बजाए जायें और दीपावली वाले दिन लोग एक -दूसरे को रंग गुलाल लगाएं। "साथ ही उसने तर्क भी दिया ,"सब कुछ एक ही तरह से करते करते जीवन बेरंग और बेमज़ा हो गया है। "
बिल्कुल ऐसा ही हाल हमारे देश की राजनीति का भी रहा। राजनीतिज्ञों को भी ये समझ आ गया के अब के बार कुछ भी सीधा नहीं।लोगों में आपसी भाई चारे की बात करने वाले नेताओं ने झूठे वायदे और धार्मिक उन्माद फैलाने वाले भाषण दिए। नेताओं या पार्टी ने बेरोज़गारी ,गरीबी , महंगाई ,भ्रष्टाचार ,देश का भविष्य बच्चों और युवाओं के लिए शिक्षा व स्वास्थय सेवाओं, महिलाओं ,मज़दूरों या किसानों के बारे में बात तो की लेकिन संजीदगी से नहीं। एक दूसरे पर औछी टिप्पणी का जैसे प्रचलन सा ही हो गया था। बातों -बातों और इशारों -इशारों में एक दूसरे को नंगा करने की कोशिश कुछ इस तरह से की गई मानो कहना चाह रहे हों के चुनाव भी हमाम की तरह है ,जहाँ सब को एक बार नंगा तो होना ही पड़ता है। इस बार तो ऐसा लगा मानो चुनाव नहीं बल्कि दंगल हो। दंगल में पहलवान अपने लंगोट कस कर मैदान में उतरते हैं परन्तु यहाँ तो सभी के लंगोट खिसकते नज़र आए।
क्या यही राजनीति के असल मायने हैं ! कोई किसी की बीवी के बारे में सवाल पूछ रहा था तो कोई किसी के पति पर सवालिया निशान लगा रहा था। कोई माँ की ममता में अंधेपन का ज़िक्र कर के लोगों को अपनी आँखें खोलने की अपील कर रहा था तो कोई राजकुमार से शादी न करने का कारण पूछ रहा था। मौसमी पारे के बढ़ने के साथ -साथ चुनावी गर्मी भी बढ़ती गई। बाबा जी भी चुनावी दंगल में कूद गए। शायद भूल गए के दंगल में लंगोट कस कर रखना पड़ता है और सत्संग में बोल पर नियंतरण रखना ज़रूरी है।पर बाबा कहाँ रुकने वाले। ऐसे में सोशल मीडिया भी पीछे नहीं रहा। कहीं चाय वाले के कपड़ों का ज़िक्र हुआ तो कहीं बाबा को औरतों के कपड़ों में दिखा कर उन्हें भगोड़ा प्रमाणित करने का प्रयास किया गया। जाति के नाम को भुनाने का समय आया तो छाती ठोक कर अपना प्रमाण पत्र दिया। कुल मिला कर एक दूसरे की माँ बहन करने में किसी ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी।
शहजादे ,गुड़िआ ,मैडम ,टॉफ़ी ,गुब्बारे जैसे शब्दों का प्रयोग तो इस तरह किया गया मानो नेता लोग छोटे बच्चों की तरह गुड़िआ -गुड़िआ खेल रहे हों।
खैर इस बार अजब गजब तो हुआ ! सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ ! मतदान प्रतिशत भी बढ़ा। लोग भी जागरूक हुए ! लहर और सुनामी का असर भी देखने को मिला। परिवार वाद को अलविदा के साथ विश्व की सब से बड़ी और महानतम लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के ज़रिए सत्ता परिवर्तन की एक नई दास्ताँ भी लिखी गई।
२६ मई को देश का नया प्रधानमंत्री शपथ लेगा। शेर की तरह चलने और दहाड़ने वाला नरेंदर मोदी देश के १२५ सौ करोड़ लोगों की उम्मीदों पर कैसे खरा उतरता है ,ये आने वाले समय में कबीले गौर करने वाला होगा।
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