गर्म ख़ून ( भाग -4 )
पति को बेहोश देखकर वो बदहवास चौधरी मलखान के कमरे की ओर चल पड़ी। मलखान भी अपने कमरे में बेसुध पड़ा था। मंद रौशनी में भी उसका बदन कुश्ती के लिए तैयार किसी पहलवान की तरह दमक रहा था। एक बारगी तो सुंदरी बाहर की ओर चल पड़ी। दरवाज़े से बाहर अपने पति को बेसुध पड़े देखा तो न जाने सुंदरी के मन में कैसा बदलाव आया। उसने अंदर से दरवाज़ा धीरे से बंद कर लिया। अपने कपडे उतारे और मलखान के बिस्तर पर जा पहुंची। जैसे ही उसने मलखान को स्पर्श किया ,वो नींद में बोला ,"मैं न कहता था सुंदरी के तू ज़रूर आएगी। " इसी के साथ ही मलखान ने सुंदरी को अपने पाश में ऐसे जकड़ा मानो उसके टुकड़े कर देगा। सुंदरी भी जैसे टूट कर चकनाचूर हो जाना चाहती थी। जब सब कुछ निपट गया तो सुंदरी के कानों में मलखान के वो शब्द गूंजने लगे ,"हमारे कुँए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन तुझ से इश्क़ हो गया है सुंदरी। " सुंदरी तो जैसे आज सच में आज़ाद हो गई थी। सुंदरी की आँखें किसी प्रतिशोध लेने वाली नागिन की तरह चमक रहीं थीं। वो मलखान की तरफ पलटी और धीरे से मलखान के कान में गुनगुनाने लगी ," जा तुझे आज़ाद किया , तुझे माफ़ किया चौधरी , लेकिन तेरी जात पर प्यार नहीं घिन आती है चौधरी !"
पोह फटने लगी थी। चन्द्रमा की चांदनी जैसे आज ही सारा चमकना चाहती थी। सुंदरी पूरी तरह से बिखर चुकी थी। फिर भी उसने अपने आप को सँभाला। मलखान की ओर एक ज़हरीली नज़र से देखते हुए सुंदरी मंद मंद मुस्कुराने लगी। बेसुध पड़े मलखान को वो पूरी तरह निचोड़ चुकी थी। सुंदरी का व्यक्तित्व बिल्कुल दो धारी तलवार की तरह लग रहा था। मलखान बदहवास और बेसुध अपनी चारपाई पर पड़ा था। बिल्कुल एक नंगी लाश की तरह। सुंदरी ने धीरे से मलखान का चुम्बन लिया दरवाज़ा खोला और खेत के बीचों बीच मोरनी की तरह नाचते हुए अपनी कोठरी में जा पहुंची।
कुछ समय बाद गांव में ये बात आग की तरह फैल गई के सुंदरी पेट से है । गांव ओर परिवार के लोग खुश थे। नरेश तो फूला नहीं समा रहा था। वो जहाँ से भी गुजरता अपना सीना चौड़ा कर लेता। नरेश की मर्दानगी पर शक करने वाले लौंडे उसे बधाई देते नहीं थकते थे। नरेश जब भी रात को सुंदरी से मिलता वो उसके पेट पर धीरे धीरे अंगुलियां फेरते हुए बस एक ही बात दोहराता ," मैं न कहता था सुंदरी भगवान के घर देर है , अंधेर नहीं ।" नरेश की ये बात सुन कर सुंदरी भी धीरे से उसकी हाँ में हाँ मिलाती और नरेश के बालों में अपने सख्त हाथों की अंगुलियां फेरने लगती।
एक अर्सा हो गया था इन बातों को। सुंदरी का बेटा दिलावर जवान हो चुका था। वो गांव में जहाँ से भी गुज़रता ,अगड़ों के छोकरों को रश्क होने लगता। पुरे इलाके में दिलावर जैसा कोई न था। सभी कहते माँ पर गया है। माँ की तरह बिल्कुल गोरा चिट्टा। अगड़ों की जवान छोकरियाँ भी अपनी खिड़कियों की दरारों में से उसे देखती और ठंडी ठंडी आहें भरती। अगड़ों को दिलावर एक आँख न सुहाता। जब भी मौका मिलता वो उसे घेर लेते। दिलावर तो जैसे फौलाद का बना हुआ था। दस -बारह से अकेला भीड़ जाता। हर बार एक दो को फोड़ कर ही उसको शांती मिलती। पिछले एक वर्ष से करीब २० लोगों को अस्पताल पहुंचा चुका था। दिलवार ने पिछले हफ्ते ही मलखान के बेटे का सिर भी फोड़ दिया था। आज उसी सिलसिले में पंचायत रखी गई थी।
पंचायत में सभी पंच और सरपंच अपना अपना स्थान ग्रहण कर चुके थे। चौपाल खचा खच भरी हुई थी। जगतार ने सब को राम राम कहते हुए बोलना शुरू किया ,"मैं तो बस इतना कहना चाहूँ सूं के सुंदरी के बेटे दिलावर ने जो आतंक फैला राख्या है वो अब सहन नहीं होता। " सुंदरी ने भी अपने घूँघट के पल्लू को मुहँ में से निकलाते हुए कहा ," अपणी जाण बचाणे का अधिकार भी न है दिलावर नै। सारे अपणे दिल पर हाथ रख कर बताओ के शुरुआत कौन करे है ? आखिर मेरे छोरे का दोष के है जो थम सारे उसकी जान के दुश्मण हो रहे
हो ?" जगतार इस बार गर्म होते हुए बोला ,"तेरे छोरे ने आतंक फैला राख्या है ,बहुत उबाले मार रह्या है तेरे छोरे का खून। इसी तरह उबाले मारता रहा तो ठंडा होते देर न लगेगी तेरे छोरे का गर्म ख़ून।
सुंदरी रोज़ रोज़ के तानो से तंग आ चुकी थी। पिछले महीने से ये पांचवीं पंचायत थी। जगतार की बात सुन कर रहा न गया उससे । वो अंदर तक टूट गई। सुंदरी तैश में आकर जगतार की तरफ अंगुली उठाते हुए बोली ,"क्यों मेरा मुहं खुलवाओ हो चौधरी !" आज तक गांव में कभी किसी ने इस तरह अगड़ों का विरोध नहीं किया था। सुंदरी के इस व्यवाहर से सभी सकते में थे। जगतार भी तैश में आ गया और बोला ,"ऐसा क्या ले रही है मुहं में सुंदरी जो उगले नहीं बणदा। " अब की बार सुंदरी चुप थी। पंचायत में खुसरपुसर होने लगी। मलखान जो बहुत देर से चुप बैठा था सहसा खड़ा हो गया। सुंदरी की तरफ इशारा करते हुए वो बोला ," गर्म ख़ून तो चौधरियां का होता है। ज़्यादा गर्मी दिखावेगा तो ठंडा होते देर न लगेगी। " मलखान के मुहं से ये बात सुन कर सुंदरी के तन -बदन में जैसे आग लग गई। वो चिल्लाते हुए बोली , "उबाले तो मारेगा ही यो खून चौधरी, आखिर यू गर्म ख़ून चौधरी तेरा ही तो है । इब बी ठंडा करणे का जी करे है तो कर लियो ठंडा। ये कहते ही सुंदरी वहां से निकल पड़ी।
पंचायत में सन्नाटा पसर चुका था ! सभी चौधरी की तरफ देख रहे थे !
पति को बेहोश देखकर वो बदहवास चौधरी मलखान के कमरे की ओर चल पड़ी। मलखान भी अपने कमरे में बेसुध पड़ा था। मंद रौशनी में भी उसका बदन कुश्ती के लिए तैयार किसी पहलवान की तरह दमक रहा था। एक बारगी तो सुंदरी बाहर की ओर चल पड़ी। दरवाज़े से बाहर अपने पति को बेसुध पड़े देखा तो न जाने सुंदरी के मन में कैसा बदलाव आया। उसने अंदर से दरवाज़ा धीरे से बंद कर लिया। अपने कपडे उतारे और मलखान के बिस्तर पर जा पहुंची। जैसे ही उसने मलखान को स्पर्श किया ,वो नींद में बोला ,"मैं न कहता था सुंदरी के तू ज़रूर आएगी। " इसी के साथ ही मलखान ने सुंदरी को अपने पाश में ऐसे जकड़ा मानो उसके टुकड़े कर देगा। सुंदरी भी जैसे टूट कर चकनाचूर हो जाना चाहती थी। जब सब कुछ निपट गया तो सुंदरी के कानों में मलखान के वो शब्द गूंजने लगे ,"हमारे कुँए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन तुझ से इश्क़ हो गया है सुंदरी। " सुंदरी तो जैसे आज सच में आज़ाद हो गई थी। सुंदरी की आँखें किसी प्रतिशोध लेने वाली नागिन की तरह चमक रहीं थीं। वो मलखान की तरफ पलटी और धीरे से मलखान के कान में गुनगुनाने लगी ," जा तुझे आज़ाद किया , तुझे माफ़ किया चौधरी , लेकिन तेरी जात पर प्यार नहीं घिन आती है चौधरी !"
पोह फटने लगी थी। चन्द्रमा की चांदनी जैसे आज ही सारा चमकना चाहती थी। सुंदरी पूरी तरह से बिखर चुकी थी। फिर भी उसने अपने आप को सँभाला। मलखान की ओर एक ज़हरीली नज़र से देखते हुए सुंदरी मंद मंद मुस्कुराने लगी। बेसुध पड़े मलखान को वो पूरी तरह निचोड़ चुकी थी। सुंदरी का व्यक्तित्व बिल्कुल दो धारी तलवार की तरह लग रहा था। मलखान बदहवास और बेसुध अपनी चारपाई पर पड़ा था। बिल्कुल एक नंगी लाश की तरह। सुंदरी ने धीरे से मलखान का चुम्बन लिया दरवाज़ा खोला और खेत के बीचों बीच मोरनी की तरह नाचते हुए अपनी कोठरी में जा पहुंची।
कुछ समय बाद गांव में ये बात आग की तरह फैल गई के सुंदरी पेट से है । गांव ओर परिवार के लोग खुश थे। नरेश तो फूला नहीं समा रहा था। वो जहाँ से भी गुजरता अपना सीना चौड़ा कर लेता। नरेश की मर्दानगी पर शक करने वाले लौंडे उसे बधाई देते नहीं थकते थे। नरेश जब भी रात को सुंदरी से मिलता वो उसके पेट पर धीरे धीरे अंगुलियां फेरते हुए बस एक ही बात दोहराता ," मैं न कहता था सुंदरी भगवान के घर देर है , अंधेर नहीं ।" नरेश की ये बात सुन कर सुंदरी भी धीरे से उसकी हाँ में हाँ मिलाती और नरेश के बालों में अपने सख्त हाथों की अंगुलियां फेरने लगती।
एक अर्सा हो गया था इन बातों को। सुंदरी का बेटा दिलावर जवान हो चुका था। वो गांव में जहाँ से भी गुज़रता ,अगड़ों के छोकरों को रश्क होने लगता। पुरे इलाके में दिलावर जैसा कोई न था। सभी कहते माँ पर गया है। माँ की तरह बिल्कुल गोरा चिट्टा। अगड़ों की जवान छोकरियाँ भी अपनी खिड़कियों की दरारों में से उसे देखती और ठंडी ठंडी आहें भरती। अगड़ों को दिलावर एक आँख न सुहाता। जब भी मौका मिलता वो उसे घेर लेते। दिलावर तो जैसे फौलाद का बना हुआ था। दस -बारह से अकेला भीड़ जाता। हर बार एक दो को फोड़ कर ही उसको शांती मिलती। पिछले एक वर्ष से करीब २० लोगों को अस्पताल पहुंचा चुका था। दिलवार ने पिछले हफ्ते ही मलखान के बेटे का सिर भी फोड़ दिया था। आज उसी सिलसिले में पंचायत रखी गई थी।
पंचायत में सभी पंच और सरपंच अपना अपना स्थान ग्रहण कर चुके थे। चौपाल खचा खच भरी हुई थी। जगतार ने सब को राम राम कहते हुए बोलना शुरू किया ,"मैं तो बस इतना कहना चाहूँ सूं के सुंदरी के बेटे दिलावर ने जो आतंक फैला राख्या है वो अब सहन नहीं होता। " सुंदरी ने भी अपने घूँघट के पल्लू को मुहँ में से निकलाते हुए कहा ," अपणी जाण बचाणे का अधिकार भी न है दिलावर नै। सारे अपणे दिल पर हाथ रख कर बताओ के शुरुआत कौन करे है ? आखिर मेरे छोरे का दोष के है जो थम सारे उसकी जान के दुश्मण हो रहे
हो ?" जगतार इस बार गर्म होते हुए बोला ,"तेरे छोरे ने आतंक फैला राख्या है ,बहुत उबाले मार रह्या है तेरे छोरे का खून। इसी तरह उबाले मारता रहा तो ठंडा होते देर न लगेगी तेरे छोरे का गर्म ख़ून।
सुंदरी रोज़ रोज़ के तानो से तंग आ चुकी थी। पिछले महीने से ये पांचवीं पंचायत थी। जगतार की बात सुन कर रहा न गया उससे । वो अंदर तक टूट गई। सुंदरी तैश में आकर जगतार की तरफ अंगुली उठाते हुए बोली ,"क्यों मेरा मुहं खुलवाओ हो चौधरी !" आज तक गांव में कभी किसी ने इस तरह अगड़ों का विरोध नहीं किया था। सुंदरी के इस व्यवाहर से सभी सकते में थे। जगतार भी तैश में आ गया और बोला ,"ऐसा क्या ले रही है मुहं में सुंदरी जो उगले नहीं बणदा। " अब की बार सुंदरी चुप थी। पंचायत में खुसरपुसर होने लगी। मलखान जो बहुत देर से चुप बैठा था सहसा खड़ा हो गया। सुंदरी की तरफ इशारा करते हुए वो बोला ," गर्म ख़ून तो चौधरियां का होता है। ज़्यादा गर्मी दिखावेगा तो ठंडा होते देर न लगेगी। " मलखान के मुहं से ये बात सुन कर सुंदरी के तन -बदन में जैसे आग लग गई। वो चिल्लाते हुए बोली , "उबाले तो मारेगा ही यो खून चौधरी, आखिर यू गर्म ख़ून चौधरी तेरा ही तो है । इब बी ठंडा करणे का जी करे है तो कर लियो ठंडा। ये कहते ही सुंदरी वहां से निकल पड़ी।
पंचायत में सन्नाटा पसर चुका था ! सभी चौधरी की तरफ देख रहे थे !
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