गर्म ख़ून
गांव में पंचायत जम चुकी थी। मलखान सिंह हुक्के की गुड़ -गुड़ के साथ इधर उधर नज़र दौड़ा रहा था। शेर सिंह भी बार बार अपनी मूंछों को ताव दे रहा था। जगतार सिंह सभी को राम राम कहते हुए मलखान सिंह के बगल में बैठ गया। मलखान सिंह ने हुक्का जगतार की और बढ़ाते हुए कहा ,"ये तो हद ही हो गई। एक कमीन का लौंडा नहीं संभल रहा पूरे गांव के छोकरों से।
इस से पहले के जगतार कुछ बोलता पंचायत में हलचल शुरू हो गई। हलचल हो भी क्यों न,सुंदरी जो आ रही थी। बला की ख़ूबसूरत थी सुंदरी। एक बार जहां से निकल जाती -क्या बूढ़ा क्या जवान साँसों पर नियंत्रण न रहता। एक बार जो उसे देख लेता ये ज़रूर कहता ,"भगवान ने बहुत ही फुर्सत में बनाया है सुंदरी को। "
अपने पचास बसंत पूरे कर चुकी थी सुंदरी लेकिन आज भी किसी "हूर" से कम नहीं थी। सुंदरता तो जैसे उसकी दासी हो। चौपाल पर आज भी गांव के मनचले वहां से निकलने की इंतज़ार में घंटों उस की बाट जोहते रहते।
१८ साल की रही होगी सुंदरी जब नरेश उसे अपने गांव टोबा ब्याह कर लाया था। कहते हैं के ख़ुदा जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। सुंदरी पर भी ख़ुदा कुछ ज़्यादा ही मेहरबान था। गठा हुआ शरीर ,उभारदार वक्ष,बल खाती कमर ,कटार जैसी आँखें। उसकी चाल बिल्कुल ऐसी थी मानो कोई नागिन दुनिया से बेफिक्र किसी बीन की धुन पर नृत्य कर रही हो। कईं बार तो मनचले उसके पीछे -पीछे उसकी नक़ल करते हुए दूर तक उसके साथ साथ चलते। कईं कच्चे छोकरों की तो सुंदरी की चाल से ही बीन बज जाती।
गोलमटोल नथुने,जब वो सांस लेती तो उसके नथूने भटी में गर्म किए जाने वाले मक्की के दानों की तरह फूल जाते। जब कभी नसवार का तड़का लगा लेती तो उसकी खुशबू दूर तक फ़ैल जाती। माथे के बीचों बीच उसकी बिंदिया ऐसे लगती मानो आसमान में चाँद चमक रहा हो।
गांव के दूसरे छोकरों की तरह ही नरेश की शादी पर भी गांव के अगड़ों के डर से कोई शोर शराबा नहीं हुआ था। नरेश की ये दिली इच्छा थी के वो भी घोड़ी चढ़े ,बैंड बाजा हो और उसके यार दोस्त उसकी घोड़ी के सामने नाचते गाते चलें। नरेश के पिता सुखिया ने घर के सभी लोगों को पहले ही आगाह कर दिया था के सभी अगडों के हुकुम और नियमों की पालना करेंगे। नरेश न घोड़ी चढ़ा न ही बैंड बाजा हुआ और शादी बिना किसी बिघ्न के सम्पन्न हो गई ।
नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत सुखिया पर बिल्कुल सटीक बैठती थी। सुखिया तो बस नाम का सुखिया था । उसके पुरखे कईं सालों से गांव में ज़मीदारों के खेतों की बिजाई ,जुताई और कटाई का काम करते आ रहे थे। पशुओं की नहलाई ,धुलाई ,चारा डालने से लेकर गोबर उठाने तक का काम नरेश के परिवार को करना पड़ता था। क्या बच्चे ,महिलाएं सभी गावं के अगड़ों के घर और खेतों में किसी न किसी काम में व्यस्त रहते। यही नहीं मैला ढोहने का काम भी नरेश का परिवार ही करता।
शादी के एक महीने बाद सुंदरी काम के लिए घर से बाहर निकली। उस को मलखान के घर की साफ़ सफाई का जिम्मा सौंपा गया। घर क्या पूरी हवेली थी। सुंदरी बरामदे में झाड़ू लगा रही थी। मलखान अपने कमरे में से निकला और उसकी नज़र सुंदरी पर पड़ी। सुंदरी को देखते ही वो बुत बन गया। उसकी सांसें थम सी गई। मलखान भी गोरा चिट्टा गबरू जवान था। सुंदरी की नज़र जब मलखान पर पड़ी तो एक बारगी वो भी सकपका गई। उसके हाथ से झाड़ू छिटक कर नीचे गिर गया। बिल्कुल हिंदी फिल्मों की तरह झाड़ू गिरते ही दोनों झाड़ू उठाने के लिए नीचे झुके। दोनों का हाथ से हाथ टकराया और सुंदरी संकुचाती-शर्माती झाड़ू वहीँ छोड़ कर बाहर की ओर भाग गई।
मलखान सिंह तो उसका खास दीवाना हो गया था। खेतों में जाने की बजाए वो हुक्के में आग सुलगा कर सुबह ही अपनी देहरी पर बैठ जाता। आँगन बुहारते हुए सुंदरी को वो ऐसे निहारता मानो वो उसे सारा का सारा पी जाना चाहता हो। इस चक्कर में वो अपना हुक्का ही पीना भूल जाता। सुंदरी कुछ पल के लिए इधर उधर होती तो वो हुक्के को अपनी और खींचता। लेकिन तब तक हुक्के की आग मंद पड़ चुकी होती और मलखान बुझे हुक्के में आग सुलगाने के लिए अपनी धोती को ठीक करते हुए चुल्हे की ओर हो लेता। जब तक मन और हुक्के की आग बुझ न जाती वो उसे निहारता रहता। ऐसा नहीं के सुंदरी कुछ समझती नहीं थी। लेकिन वो कभी भी मलखान को घास न डालती। सुंदरी उसकी परवाह किए बिना अपने काम में लगी रहती।
आगे ............. (भाग 2 )
No comments:
Post a Comment