गर्म ख़ून ( भाग- 2 )
बेशक गांव सुंदरी का दीवाना था। लेकिन किसी की क्या मज़ाल के उस पर हाथ डालता। जब कभी भी किसी ने कोशिश की ,सुंदरी बिना बोले इस तरह देखती मानो सामने शेरनी खड़ी हो। अपने आप को कभी ढीला नहीं होने दिया था सुंदरी ने। मलखान का अपना रुतबा था गांव में। कई हथकंडे अपनाए मलखान ने पर सुंदरी के आगे उसकी दाल न गली।
शराब और शबाब मलखान के खास शौंक थे। जब भी स्वाद बदलने का मन होता ,खेतों में टुबवेल पर अपना अड्डा जमा लेता। खेतों में घास काटने या किसी और काम से आने वाली पिछड़ों की कई औरतों का शिकार कर चुका था मलखान । कोई पैसे के लालच तो कोई लोकलाज के डर से अपना मुहँ न खोलती। कोई बोलने की हिम्मत जुटाती तो मलखान डरा धमका कर उसका मुहँ बंद कर देता । पीड़ित औरतें बकरियों की तरह थोड़े समय के लिए मिमियाती। लेकिन अगड़ों के ज़ुल्म , लोक लाज , गरीबी और अगड़ों के प्रभाव और दबाव के कारण कोई अपना मुहँ न खोलती। मजबूरी के कारण वो इसे ही अपना भाग्य समझ लेती। लेकिन सुंदरी दूसरी औरतों की तरह नहीं थी। स्वाभिमान जैसे उसमें कूट कूट कर भरा हुआ था।
सुंदरी -नरेश की शादी को दो साल बीत चुके थे। लेकिन अभी तक किसी तरह की कोई खबर नहीं थी। गांव में घुसफुस शुरू हो चुकी थी। सब के अपने अपने विचार थे। कोई नरेश को कमज़ोर कहता तो कोई सुंदरी को चैक करवाने की सलाह देता। कभी कभी मलखान भी मौका देख कर सुंदरी को दो अर्थी बात बोल देता। लेकिन सुंदरी पर इन बातों का कोई असर न होता।
एक दिन तो मलखान ने हद ही कर दी। घर के सभी लोग गांव में ही शादी पर गए हुए थे। मलखान घर पर अकेला था। सुंदरी पशुओं को चारा देने के बाद घर की ओर जाने लगी तो मलखान ने सुंदरी का हाथ पकड़ लिया। सुंदरी को अपनी ओर खींचते हुए मलखान बोला ,"हमारे कुंएं का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। " एक बार तो सुंदरी नागिन की तरह फुँकारी लेकिन मलखान की मज़बूत पकड़ के आगे वो ढीली पड़ गई। अक्सर चुप रहने वाला मलखान ये सब कुछ कैसे बोल गया उसे भी समझ नहीं आ रहा था। न जाने सुंदरी के अंदर एक अदम्य शक्ति कहाँ से आई। अपनी कलाई छुड़वाते हुए उसने मलखान को ज़ोर से धक्का दिया। मलखान संभल नहीं पाया और नीचे जा गिरा। मलखान कहाँ हार मानने वाला था। उसने सुंदरी को फिर पकड़ लिया। इस बार उसने सुंदरी को ज़ोर से अपनी छाती से लगा लिया। सुंदरी पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाते हुए मलखान ने अपना पहले वाला डायलॉग दोहराया ,"हमारे कुंए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। " इसी के साथ अपनी पकड़ ढीली करते हुए बोला ,"जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन इश्क़ हो गया है तुझ से सुंदरी । " सुंदरी किसी छिपकली के जबड़े से छूटी तितली की तरह छटपटाती हुई बाहर की ओर भागी। मलखान बिल्कुल फ़िल्मी हीरो की तरह सुंदरी को दूर तक जाते हुए देखता रहा। आज पहली बार किसी औरत को पकड़ने के बाद मलखान का दिल धड़क रहा था।
सुंदरी को भी पहली बार लगा के वो कमज़ोर पड़ गई है। काम की थकावट से उसने कभी हार नहीं मानी थी। लेकिन लोगों के तानों से वो तंग आ चुकी थी। मलखान की हवेली से सीधे अपनी कोठरी में जाकर अपनी टूटी हुई चारपाई पर एक लाश की तरह धम से गिर गई। हर हाल में खुश रहने वाली सुंदरी फफक फफक कर रोने लगी। टूटी फूटी और घर में चुल्हे से काली हुई छत की और देख कर वो अपने भाग्य को कोसने लगी। भाग्य और भगवान दो अस्त्र ही होते हैं गरीब के ,जिसके आगे वो अपने सारे शस्त्र डाल देता है। रोते रोते उसका संपर्क सीधे नीली छतरी वाले से हो गया। गरीब का तो भगवान ही सहारा होता है। सुंदरी पागलों की तरह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए भगवान से पूछने लगी ,"क्या दोष है मेरा ? कौन सा पाप किया है मैंने ? क्यों मुझे बच्चा नहीं होता ? "
आगे ………………(भाग -3)
No comments:
Post a Comment