Thursday, 4 December 2014

गर्म ख़ून ( भाग -3 )

                              
                                                             गर्म ख़ून  ( भाग -3 ) 
रात को थक हार कर जब भी नरेश और सुंदरी मिलते तो बस एक ही बात करते।आखिर ऐसा कौन सा पाप किया है जो बच्चा नहीं हो रहा हो रहा। नरेश बेशक सुन्दर नहीं था। लेकिन दिल से वो राजा था। उसकी सादगी,शराफत और ईमानदारी का पूरा गांव कायल था। अपनी औकात से ज़्यादा पैसा खर्च कर के नरेश ने दोनों के डॉक्टरी टेस्ट भी करवाए थे। सब कुछ ठीक ठाक था। 
 उस दिन के बाद न जाने क्या हुआ , मलखान ने सुंदरी को कुछ नहीं कहा। सुबह ही खेतों में निकल जाता। दिन भर खेत जोहता। जब थक जाता तो दारू के दो पेग लगा कर प्यार भरे गीत गुनगुनाने लगता। मलखान को  जैसे सच में इश्क़ हो गया था। अब मलखान टुबवेल पर ही सोने लगा था। मलखान की सेवा में लगा नरेश अपने चौधरी में आए इस बदलाव को देख कर हैरान था।  नरेश रात को घर पहुंच कर जैसे ही खाना खाने लगा उसका ध्यान मलखान की ओर चला गया। दुनिया से बेखबर नरेश को भी आज न जाने क्या सूझी। वो सुंदरी के आगे मलखान सिंह का ज़िक्र कर बैठा।  नरेश सुंदरी से बोला ,"आज कल चौधरी को न जाने क्या हो गया है,  हर वक़्त गुनगुनाता रहता है। जब दिल करता है पीने बैठ जाता है। " सुंदरी बिना कोई खास ध्यान दिए नरेश की बातें सुनती रही। आज से पहले नरेश ने बाहर की किसी बात का ज़िक्र घर में नहीं किया था।
 कई दिन इसी तरह बीत गए। एक लम्बे अरसे के बाद आज मलखान सिंह  दुरुस्त नज़र आ रहा था। उसके चाचा के बेटे की शादी थी। दोस्त रिश्तेदार जुड़ने शुरू हो चुके थे। वो आज खुश था के उसके सभी पुराने दोस्त आ रहे हैं। परिवार में जब भी कोई कार्यक्रम होता मलखान के खास दोस्तों की मण्डली टुबवेल पर ही जमती। खेतों के बीचों बीच टयूबवेल के नज़दीक मलखान चारपाई पर बैठा नरेश को हुकुम दिए जा रहा था। गिलास धो लिए न ! सलाद काट लिया ! सोडा फ्रिज में लगा दिया है ! देख बड़ी देर से कुकर की सीटी नहीं बजी ! खेत में से ताज़ी मूली निकाल ला ! बेचारा नरेश अकेली जान फिरकी की तरह कभी इधर तो कभी उधर भाग भाग कर काम किए जा रहा था।
जैसे ही गाड़ी की आवाज़ मलखान सिंह के कान में पड़ी वो  चिल्लाया ,"ओये कुत्ते तुझे कहा था न के यारों के आने से पहले सब कुछ सेट होना चाहिए ! देख जल्दी से पानी का जग टेबल पर रख दे ! " ये कहते-कहते मलखान सिंह ने चारपाई के नीचे रखी जूती में अपने पाँव घुसाए और गाड़ियों की तरफ भाग लिया। खेतों के बीचों बीच धूल उड़ाती गाड़ियां जैसे ही उसके नज़दीक आकर रुकीं मलखान सिंह ने एक मोटी गाली निकाल कर अपने यारों का स्वागत किया। सब ज़ोर का ठाहका लगाते हुए टेबल की और बढ़ गए।
 इससे पहले के शेर सिंह ,जगतार सिंह  ,समर सिंह , किशन सिंह और दलबीर सिंह मलखान के गले मिलते उन्होंने टेबल पर रखे ग्लासों को अपने हाथ में उठाया और चियर्स कहते हुए सब से पहले अपने हलक को तर किया। यही इन के मिलने का स्टाइल भी था। जिस के अड्डे पर मिलते मेजबान पहले से ही ग्लास तैयार रखता।
जब तक नरेश खेत में से मूली तोड़ कर लाता ,सभी के अंदर दो दो पेग जा चुके थे। एक दूसरे से घर परिवार का हालचाल पूछने के बाद जब बच्चों की बातें होने लगी तो मलखान ने सभी के गिलास में एक -एक पेग और डाल दिया। एक ही सांस में पीने के बाद सभी को खाली गिलास दिखाते हुए बोला , "आह !अब थोड़ा सिर घूमा है !" बोतल ख़त्म हो हो चुकी थी। नरेश खाली बोतल उठा कर ले गया और भरी हुई टेबल पर रख गया।
इसी बीच कुकर की सीटी बज गई। मलखान ने नरेश को कुकर टेबल पर रखने को कहा। कुकर में से गैस निकालते हुए मलखान बोला ,"आज ऐसा माल बनाया है के सभी उँगलियाँ चाटते रह जाओगे।" शेर सिंह की तरफ जैसे ही चिकेन की प्लेट आई तो वो मलखान की तारीफ़ करते हुए बोला ,"खुशबू ही इतनी लाजवाब है तो माल तो बढ़िया होगा ही !" शेर सिंह ने माल शब्द पर ज़ोर देकर अपनी बात को कुछ इस तरह कहा के सभी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगे। इस बीच दूसरी बोतल का तला भी दिखाई देने लगा था। नरेश ने एक बोतल और लाकर रख दी। दारू पीते पीते शेर सिंह को पता नहीं क्या सूझा उस ने दही की फरमाइश कर डाली। दही की फरमाइश सुनते ही नरेश खेत के बीचों बीच बनी डोल पर भागता  नज़र आया। जाते जाते वो बोल गया ,"बस दहीं लेकर यूं आया चौधरी।
जब तक नरेश वापिस लौटता सभी टुन हो चुके थे। महफ़िल का रंग जमने लगा था।सभी के चेहरे सुलगे हुए कोयले की तरह लाल हो चुके थे। घर परिवार की बातों से अब वो बाहर निकल आए थे। सभी बातों बातों में कच्चे पर उतर आए और लगे अपने अपने पोतड़े उधेड़ने। सभी अपने अपने किस्से कहानियां सुनाने लगे। उन सब को अपनी मर्दानगी पर गर्व था। परन्तु किस्से और कहानियां साफ बयां कर रहे थे के मर्द जात अपना लंगोट जितना भी कस कर रखे वो कभी न कभी फिसल ही जाता है। मलखान सिंह की ज़बान और कदम दोनों डगमगाने लगे थे। अँधेरा हो चुका था। सभी दोस्तों ने विदाई ली। वो सभी भूल गए के नरेश गांव में दही लेने गया है।
जब तक नरेश दही लेकर वापिस लौटता सभी अपनी रवानगी डाल चुके थे। नरेश टुबवेल पर पहुँचते ही हांफते  हांफ़ते बोला ," क्या बात सारे जा लिए ,चौधरी ? राहदारी वाला पी के गए या नहीं ?" असल में गांव में एक प्रथा है के आप बेशक जितनी मर्ज़ी दारू पिएं ,जाते जाते टैक्स के तौर पर या यूं कहें मेज़बान अपने दोस्तों को जाते जाते एक ड्रिंक ज़रूर पिलाता है। । यही ड्रिंक राहदारी वाला पेग से मशहूर भी है। नरेश के इन दोनों प्रश्नों में अपनापन ज़्यादा झलक रहा था।
नरेश की बात को सुन कर मलखान ने दो ग्लासों में दारू की बोतल उलटी कर दी। मोटे मोटे दो पेग बनाये और एक गिलास नरेश को थमा दिया।  इससे पहले के नरेश संभलता या कुछ बोलता मलखान चियर्स करते हुए बोला ,"तो भी क्या बात है नरेश ! आज की राहदारी वाला हम तेरे साथ पी लेते है। " नरेश ने इस से पहले कभी नहीं पी थी। लेकिन चौधरियों को शराब पिलाने का काम वो बचपन से करता आ रहा था। ओंठों के साथ गिलास लगाते ही उसने सारी की सारी एक बार में अपने अंदर उढ़ेल दी।
मलखान अपनी थरथराती आवाज़ में नरेश को सब कुछ समेटने के लिए कह कर  टुबवेल पर बने कमरे में सोने के लिए चल दिया। नरेश सफाई में जुट गया। थोड़ी देर बाद ही नरेश की हालत पतली होने लगी। नरेश तो लगा करने उल्टियाँ। उससे अब खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था।  लड़खड़ा कर टुबवेल के पास ही गिर गया। रात काफी हो चुकी थी। नरेश के घर वाले सभी शादी में काम करवाने गए हुए थे। सुंदरी घर पर अकेली थी। वो नरेश को लेकर परेशान हो गई। नरेश की यह आदत थी के उसे जब भी देरी का कोई अंदेशा होता वो भाग कर घर बतला आता। आज तो खुद नरेश बेसुध था।
रात के दस बज चुके थे। सुंदरी के मन में न जाने क्या आया वो अपने नरेश को देखने खेतो की ओर चल दी। वो कब टुबवेल पर पहुँची उसे खुद भी पता नहीं चला। टुबवेल पर लटके जीरो वॉट के बल्ब से आती मंद मंद रोशनी में कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। बिखरा हुआ सामान किसी उजड़े  हुए चमन की तरह लग रहा था। सुंदरी की नज़र सहसा नरेश पर पड़ी। सुंदरी के तो जैसे होश ही उड़ गए। उसने नरेश को इधर उधर हिलाया लेकिन वो तो धरती पर चित पड़ा था। उसे समझते देर न लगी के नरेश ने शराब पी है। उसका जैसे विश्वास ही टूट गया। उसके मन में उलटे पुलटे विचार आने लगे। उसको एकदम से मलखान का ख्याल आया। वो भगवान से सब ठीक होने की कामना करने लगी।
आगे  ............................ (भाग -4 )

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