Thursday, 13 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-22

                                                         "अपहरण " ( भाग -1 )
समय बहुत तेजी से चलता है इस बात का अहसास तब होता है जब आप busy रहते हैं।अगस्त ,सितम्बर और अक्टूबर'14 के महीने कब और कैसे बीते पता ही नहीं चला।
दीपावली का त्यौहार जा चुका है। समझ नहीं आता के इस त्यौहार का सभी बेसब्री से क्यों इंतज़ार करते हैं। खर्चे के सिवाए कुछ भी नहीं। यही नहीं बम और पटाखों से जो प्रदुषण फैलता है वो अलग। क्या सच में पटाखों के प्रदूषण  या महंगे गिफ्ट्स की खरीद से राम और लक्ष्मी पूजा सफल होते  हैं। इस विषय पर मैं कोई तर्क वितर्क नहीं करना चाहता। सोचना व् फैसला करना आपके अपने अधिकार क्षेत्र में है।
सितम्बर -अक्टूबर '१४  में K.V.A.D.A.V.College for girls में नाटक "अपहरण "करवाने में व्यस्त रहा। पिछले 25 सालों में एक बढ़िया ,समझदार और मेहनती टीम के साथ काम करने का मौका मिला।
"काजल" कमाल की actress है। अगर यूं कहें के ,"She is born actress!"...तो कुछ गलत नहीं होगा। 
काम के प्रति उसकी मेहनत ,प्रतिबद्धत्ता, लग्न और Team Spirit हमेशा सारी टीम को प्रोत्साहित करता रहा। लगभग २ महीने बच्चियों के साथ काम किया और नाटक के साथ साथ उनके व्यक्तित्व में होते बदलाव को मैं सहजता से महसूस कर पा रहा था।
बिल्कुल चुपचाप रहने वाली प्रीति के व्यक्तित्व में जो ज़बरदस्त बदलाव देखने को मिला वो सच में काबिले गौर करने वाला था। बिल्कुल एकांत पसंद लड़की ने नाटक में जिस तरह से जीवन की उमंग के मायने को समझा वो कमाल नाटक का ही कर सकता है। पूरी टीम ने उसका नाम छुपा रुस्तम रख दिया।
 दीक्षा क्रिकेट की नेशनल प्लेयर है। इसके साथ -साथ वो साइकिलिंग चैंपियन भी है। बहु प्रतिभा की धनी दीक्षा में सादगी के साथ स्पष्टता का जो मेल  है उसका कोई सानी नहीं हो सकता। हर बात के बाद जीभ निकालना ,धीरे से किसी को भी छेड़ देना और हर वक़्त खाने की बात करना उसकी sense of humour के कुछ बेमिसाल नमूने हैं । एक दिन उसने मुझे बताया के पिछले साल नाटक की रिहर्सल देखते हुए उसने decide कर लिया था के वो जब भी मौका मिलेगा नाटक ज़रूर करेगी। चुलबुली दीक्षा की नटखट शरारतें मुझे हमेशा याद रहेंगी।
स्मृति और भारती खेल खेल में नाटक खेल गई। हालांकि भारती शुरूआत में थोड़ी नर्वस रही लेकिन बाद में उसने नाटक का भरपूर आनंद उठाया। बचपन कितना सरल और पाक-साफ़ होता है वो मुझे स्मृति की बच्चों जैसी बातों ने सिखाया। सोनम रोर ने मस्ती ,रुचि ढिल्लों ने परिपक्वता और सोनाली ने अपने आप को प्रूव करने के लिए नाटक और अपने रोल के लिए खूब मेहनत की।सोनाली ने अपने घर वालों के विरोध और विपरीत परिस्थितिओं के बावजूद हार नहीं मानी। उसने अपने पात्र को दिल से जिया।
इस दौरान खास बात ये रही के नाटक "अपहरण "के लेखक मोहिन्दर प्रताप सिंह खुद रिहर्सल में शामिल हुए   और बच्चियों को नाटक के बारे में खूब सारी जानकारी दी। मोहिन्दर पिछले २० वर्षों से मुंबई में है और नाटक ,फिल्म्स और एडवरटाइजिंग में जानामाना नाम हैं। मोहिन्दर मुंबई में लेखन और निर्देशन का काम करता है। मोहिन्दर द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्म "भुजंग" बन कर तैयार है और सभी उसके रिलीज़ होने का बेसब्री से इंतज़ार भी कर हैं।
 दबंग ,रंगरेज़ ,आरक्षण और बेशर्म जैसी फिल्मों में काम कर चुके अमितोष नागपाल ने तो कई दिन बच्चों के साथ एक्टिंग की वर्कशॉप ही कर डाली। इस वर्कशॉप का पूरी टीम को फायदा हुआ। असल में मोहिन्दर और अमितोष  करनाल अपने घर आये हुए थे और जब उन्हें नाटक की रिहर्सल्स के बारे में पता चला तो दोनों ने अपना ज़्यादा समय नाटक मण्डली के साथ ही बिताया।
यही नहीं नाटक के ज़रिये बलराज रावल से भी मुलाकात हो गई। बलराज ने 2008 में खालसा कॉलेज में मेरे निर्देर्शन में "नाटक नहीं "किया था। वहां उसके अभिनय के लिए उसे "सर्वश्रेष्ठ एक्टर" घोषित किया गया था। वो थिएटर करना चाहता था लेकिन किसी अच्छे इंस्टिट्यूट में दाखिला न मिलने और वक़्त के थपेड़ों ने मार्केटिंग क्षेत्र में धकेल दिया। बलराज आजकल पानीपत में  एक्सपोर्ट कंपनी में अच्छे ओहदे पर काम कर रहा है। उसका दिल्ली आना जाना रहता है। और वो नाटक देखने का कोई भी मौका नहीं चूकता।
अपने दोस्त समीर और राहुल का अगर मैं ज़िक्र नहीं करूंगा तो बेमानी होगी। उनका सहयोग और प्रोत्साहन मुझे सदा आगे की और बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहता है।
हर साल की तरह इस बार भी नाटक को ज़ोनल यूथ फेस्टिवल में कॉम्पिटिशन के लिए खेला गया। इस बार फेस्टिवल का आयोजन आर्य कॉलेज पानीपत में किया गया था। वैसे मेरा तो हमेशा यही मानना है के कला का कोई मापदंड नहीं होता परन्तु बच्चों के लिए तैयारी का ये एक सशक्त माध्यम है। बच्चों की कला को अनदेखा करके आयोजक जिस तरह ट्रॉफी हासिल करने के लिए घालमेल करते हैं वो वाकये निंदनीय है।नाटक ही नहीं बल्कि सभी विधाओं में निर्णायक मंडल के निर्णयों का अधिकतर प्रतिभागीयों ने विरोध किया।
मेरी दिली इच्छा थी के नाटक के कुछ शो हो जाएँ। भला हो जोगेन्दर भोला और भंडारी मैडम का जिन के कारण बच्चों को एक और शो करने का मौका मिला। स्पोर्ट्स एवं यूथ अफेयर्स डिपार्टमेंट विभाग दवारा आयोजित जिला सांस्कृतिक प्रतियोगिता में बच्चों ने भाग लिया। बच्चों ने जिस तरह से मेहनत की थी उसका रिजल्ट यहाँ की परफॉरमेंस में साफ़ नज़र आ रहा था। सभी ने ज़बरदस्त परफॉर्म किया और प्रथम स्थान हासिल किया। हालांकि कॉलेज में सांस्कृतिक विभाग की इंचार्ज भंडारी मैडम को इस की permission लेने के लिए बहुत मशक्क़त करनी पड़ी।
अगली चिठ्ठी के साथ आप से जल्द मिलूंगा तब तक के लिए जय हो !

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