Wednesday, 19 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-23

                                                               मौनी बाबा
पिछले एक लम्बे अरसे से पढ़ना लिखना जैसे छूट सा गया था। वो तो भला हो इस नईं टेक्नोलॉजी का जिस के ज़रिए बहुत कुछ देखने ,पढ़ने को मिल रहा है।
 ज़माना बहुत आगे निकल गया है ! आप बहुत पिछड़ गए हैं ! पता नहीं कहाँ जा कर रुकेगी ये दुनिया ! आप ने खुद को इस दौड़ में कभी शामिल ही नहीं किया इसलिए ऐसा तो होना ही था !
एक लम्बे अरसे से कुछ ऐसा ही दोहराया जा रहा था।
आज फेस बुक को खोलने के बाद कुछ नए लोगों की साइट्स में घुसने की कोशिश की तो पता चला के लोग तो दिल खोल कर लिखते हैं।  बेबाकी के साथ।
सादगी का तड़का कुछ इस तरह से लगा होता है मानो वो आप के अंदर की ही बात कह रहे हों।
 वो भी ऐसी बात जिसे आप बरसों से ढोह रहे होते हैं। किसी से उस का ज़िक्र भी नहीं कर पाते।
कोई ऐसी बात जिसे आप एक ऐसे संदूक में बंद कर देते हैं जिसे शायद सदियों खोला ही नहीं जाता।
 ऐसी बात जिसे आप ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर सारी  दुनिया को बतला देना चाहते हैं लेकिन ताउम्र मौनी बाबा बने रहते हैं।
आप ये सोच रहे होते हैं के समय आने पर अपनी पोटली को खोलेंगे। लेकिन आप को पता भी नहीं चलता के आप की पोटली कहीं दूर खुल चुकी होती है। 

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