Tuesday, 5 August 2014

A JOURNEY TO BAALA G DHAM - PART 1




लम्बे अरसे से दोस्तों के साथ किसी दौरे पर नहीं गया था। चार -पांच साल पहले तक दोस्तों की चौंकड़ी जमते ही कहीं न कहीं निकल लेते थे। पिछले दो सालों से मित्रमंडली में से श्यामलाल गर्ग और राकेश हर महीने बाला जी धाम सालासर राजस्थान की यात्रा पर जाते हैं। उनके साथ समीर ,राहुल ,जगदीश पाण्डे ,राजीव चौधरी,वीर प्रकाश आदि लगभग सभी साथी वहां हो आए थे। मन तो मेरा भी था लेकिन संजोग नहीं बन रहा था।
 श्यामलाल गर्ग और राकेश का 26 जुलाई को सालासर जाने का प्रोग्राम बना। शनिवार का दिन था , मैं भी हो लिया उनके साथ। मुझे बताया गया के करनाल से सालासर 370 किलोमीटर है। सुबह 8. 30 पर सफर की शुरुआत हुई और पानीपत ,रोहतक ,भिवानी ,लोहारू ,झुंझनू ,लक्ष्मणगढ़ से होते हुए हम शाम 5 बजे सालासर पहुँच गए।
रास्ते में पानीपत पर पहला टोल प्लाजा आया और उसके बाद कुल 6 जगह सड़क पर चलने के लिए एक तरफ का कुल 350 रूपए टैक्स देना पड़ा। सरकार का कहना है के जगह जगह पर लिए जाने वाले टोल टैक्स सड़कों के रखरखाव के लिए हैं। कुछ इलाकों को छोड़ कर अधिकतर सड़कें खस्ताहाल थीं। न जाने लोग इन्हें बंद करवाने के लिए एकजुट क्यों नहीं होते।
लोहारू के बाद जैसे ही राजस्थान में प्रवेश किया तो कासनी गांव में राकेश ने कार को रोक लिया। मुझे बताया गया के ये गांव नीलम प्रदीप कासनी का ससुराल है। नीलम प्रदीप कासनी हरयाणा में आई ए एस काडर की अफसर हैं और कुछ समय के लिए करनाल की डी सी भी रहीं। उनके पति भी हरयाणा में आई ए एस अफसर हैं। आगे चल कर बख्तावर पुरा  गांव के बारे में बताते हुए राकेश ने बताया के ये एक मॉडल विलेज है। बख्तावर पूरा की खासीयत ये है के इस गांव में कोई नाली नहीं है

रास्ते में दो जगह रुक कर चाय पी और खाना खाया। रास्ते में गाड़ी को उन्हीं जगह पर रोक गया जहाँ वो हर बार रुकते थे। रास्ते में होटल न्यू सुख सागर में खाना खाया और कुछ देर आराम किया। इस जगह का ज़िक्र राकेश और श्याम लाल अक्सर किया करते थे। यहाँ की आवभगत और खासतौर पर हुक्के का ज़िक्र करते हुए दोनों थकते नहीं थे। वापसी पर भी यहाँ रुके लेकिन दोनों बार हुक्का नदारद था।

 पूरे सफर में राकेश एक गाइड की तरह मुझे हर उस चीज़ की जानकारी  देता रहा। रास्ते में मरुस्थल के जहाज़ के नाम से मशहूर ऊँट की सवारी आम थी। गधों को ईंट के भट्ठों पर ईंट की ढुलाई ,धोबियों के पास कपड़ों की ढुलाई और गावों में सामान इधर -उधर पहुंचाने के प्रयोग में आम  देखा था लेकिन गधों को ठेला खींचते हुए देखना अजब संजोग था। लोकल आने जाने के लिए लोग थ्री व्हीलर का प्रयोग करते हैं। यहाँ चलने वाले थ्री व्हीलर्स का डिज़ाइन भी कमाल का है।

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