Wednesday, 8 January 2014

PUTTAR MOH....!

बलवान सिंह फ़ौज में इंस्पेक्टर था। जैसा नाम वैसे ही था बलवान सिंह। मज़बूत कद काठी। जवानी के दिनों में पांच पांच के साथ अकेले भिड़ जाता। ताक़त के साथ-साथ दिखने में भी ख़ूब सुंदर। जिधर से निकल जाता लड़कियां एक बार मुड़ कर ज़रूर देखतीं।छोटी उम्र में ही शादी हो गई थी।किस्मत का इतना धनी के बीवी भी बलां की ख़ूबसूरत मिली उसको। सुंदरता के साथ साथ बहुत सुशील थी बलवंत कौर। बलवंत कौर पूरे कुनबे में मिसाल थी। बलवान सिंह के किसी काम में वो कभी दख़ल नहीं देती। स्वभाव ऐसा मानो के जैसे गाय हो।

बलवान सिंह मे देश भक्ति का ऐसा जज़बा के घरवालों के विरोध के बावज़ूद दोनों बेटों को फ़ौज में ही भर्ती करवाया।वो अपने बेटों से बहुत प्यार करता था। बेटे भी पूरे आज्ञाकारी। बाप ने जो कह दिया समझो बेटों के लिए पत्थर पे लकीर। बाप बेटों के प्यार की बात दूर दूर तक के गावों में की जाती। एक भरा पूरा परिवार।बलवान सिंह किसी बादशाह से कम नहीं समझता अपने को । बेटियों की शादी भी अच्छे परिवारों में की। घर में नाती पोते जब भी आते उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहता। एक पोता तो पूरा गबरू जवान हो चुका था। बिल्कुल अपने दादा पर गया था। अभी ग्रेजुएशन के फाइनल इयर में था और रिश्ते के लिए लोग आने लगे थे।

 बलवान सिंह की रिटायरमेंट को अभी पांच साल बाकी थे।सब ठीक ठाक चल रहा था। अगले दो वर्षों में उस पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। बड़ा बेटा बॉर्डर पर तैनात था। पड़ोसी देश की फ़ौज द्वारा की गई फायरिंग में उसकी जान चली गई। अभी छः महीने भी नहीं बीते थे के दूसरा  बेटा भी शहीद हो गया। बलवान सिंह तो जैसे टूट सा गया।उसने किसी से भी बात करना बंद कर दिया।

बलवान सिंह अब अगर किसी से कोई बातचीत करता तो वो थी उस की बीवी बलवंत कौर। वो उसको "बलवन्ते" कह कर बुलाता था।जिन पोते पोतियों को वो अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था अब उनसे वो कोई बात न करता।वो तो जैसे बेटों के जाने के बाद ग़ुम सा  हो गया था। कभी कभी तो वो अपनी बीवी के पल्लू में सर छिपा कर कईं  कईं घंटे रोता। और जब आंसू सूख जाते तो धीरे से बोलता ,"बलवन्ते, ए रब्ब ने मेरे साथ कौन से जन्मों का बदला लिया है। मैं तो कभी किसी से हारा नहीं था। "

बलवान सिंह को समझाते हुए बलवंत बोली,"रब्ब से थोड़ा जीता जा सकता है सरदार जी। उस को जो मंज़ूर है वो तो सब को मानना पड़ता है। " बलवान एक दम से चुप  सा होकर छत की और देखने लगा,थोड़ी देर बाद ही चुप्पी को चीरते हुए वो ज़ोर से चिल्लाया ,"क्यों नहीं जीत सकता ?" ये कहते ही वो फिर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा।रोते रोते वो बड़बड़ाने लगा," मैं क्या बूढ़ा हो गया हूँ जो जीत नहीं सकता।" ये कहते हुए उसने बलवंत कौर को इस तरह देखा मानो वो उस की हामी भरवाना चाहता हो।थकावट के कारण बलवंत सो चुकी थी। रात भी बहुत हो चुकी थी।    

बलवान सिंह अगली  सुबह उठा तो बलवंत कौर उस को देख कर दंग रह गई। सुबह उठ कर उसने वही जवानी वाले अंदाज़ में  तैयार होना शुरू किया। पगड़ी बांधने शीशे के सामने ऐसा खड़ा हुआ के जब तक वो ख़ुद संतुष्ट नहीं हुआ वहीँ जमा रहा। बलवंत कौर बलवान सिंह में आए इस आकस्मिक परिवर्तन को देख कर मंद मंद मुस्कुराने लगी।हमेशा चुप रहने वाली बलवन्ते को न जाने क्या सूझी के मसख़री करते हुए बोली ,"सरदार जी क्या इरादा है ,इस बुढ़ापे में कोई दूसरी करने की सोच ली है क्या।" ये कहते ही वो ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी।

बलवान सिंह पगड़ी बांधते हुए शीशे में से ही पीछे की और देखते हुए बोला ,"कुछ ऐसा ही समझ ले बलवन्ते" बलवंत को लगा बलवान जैसे मज़ाक कर रहा है। वो हंसते हुए दोबारा बोली ,"तेरी मत्त तो नहीं मारी गई सरदारा। इस बुढ़ापे में किस ने लगना है तेरे साथ।" बलवान की तो जैसे सच में मत्त मारी गई थी। उसने मुड़ते ही बलवंत को कस कर पकड़ लिया और बोला ,"बलवन्ते मैं सच में दूसरी करने जा रहा हूँ। और उम्मीद करता हूँ तू इस में मेरा साथ देगी। बेटा चाहिए मुझे बेटा।"  ये कहते ही उसने बलवंत को ज़ोर से धक्का दिया और तेज़ क़दमों के साथ घर से बाहर  निकल गया।

बलवान सिंह तो जैसे रब्ब से ही लड़ना चाहता था। बलवंत उसे बाहर जाते हुए देखती रही। सारा दिन कुछ नहीं खाया और सोचते सोचते कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। वो जानती थी के बलवान अपनी जुबां का पक्का है। जो एक बार सोच लिया उसे पूरा कर के ही दम लेता है। ये विचार उसके मन में आते ही उसके अंदर बुरे विचारों का जैसे तूफ़ान आ गया। वो एकदम बाहर की तरफ भागी।रात ज्यादा हो चुकी थी। बलवंत निढाल हो कर वहीँ गिर गई।

जब उसे होश आया तो उसकी दुनिया बदल चुकी थी। आँगन में छन छन करती पाजेब की झंकार को सुनते ही उसे समझते देर न लगी के बलवान ने अपनी ज़िद पूरी कर ली है।उसकी छाती पर जैसे सांप लोटने लगा। एक बारगी तो उसके मन में आया के ख़ुद को फांसी लगा ले। पर वो तो बलवान से इन्तेहा प्यार करती थी। जीवन के ३२ बरस जो बिताए थे उसके साथ। बलवान की देखभाल कौन करेगा ये सोच कर उसने फांसी का इरादा छोड़ दिया।

बलवान आँगन में घूमते हुए ज़ोर ज़ोर से दातुन को अपने दांतों पर रगड़ रहा था। अपने को सम्भालते हुए बलवंत कौर ने आँगन में प्रवेश किया।मुहं धोकर जैसे ही बलवान पीछे की और मुड़ा तो सामने बलवंत खड़ी थी। जैसे ही उस से बच कर वो कमरे की और जाने लगा,बलवंत ने उसकी बनियान खींच ली। बिना कुछ बोले उसने बलवान की आँखों में आँखें डाल दी। मानो उस के साथ हुई बेवफाई का हिसाब मांग रही हो। हमेशा बलवंत की आँखों में आँखें डाल कर उस की तारीफ़ करने वाले बलवान से आज कुछ नहीं बोला गया।

समय के साथ घाव भी भर जाते हैं। इस घर में भी कुछ ऐसा ही हुआ।समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहा था ,छोटी बहु पेट से थी। डॉ को चेक अप करवाया तो पता चला पेट में जुड़वां बच्चे पल रहे हैं। बलवान ने जुगाड़ कर ये भी पता करवा लिया के पेट में लड़कियां हैं।बलवान पर तो जैसे लड़कों का भूत सवार था। उसने गर्भ गिरवाने की तैयारी कर ली। बलवंत को जब इस बात का पता चला तो उसने बलवान को ख़ूब समझाने की कौशिश की। पर सब दलील और अपील उस के सामने फेल हो गई।

बलवान जब छोटी बहु को गर्भपात के लिए डॉ के ले जाने लगा तो बलवंत ने बलवान के पैर पकड़ लिए और देने लगी रब्ब की दुहाई,"ओ सरदारा रब्ब से डर ,उसने तो तेरी इच्छा पूरी कर दी है। दोनों लड़कों को एक साथ वापिस भेज दिया है।ये ज़ुल्म न कर, इन्हें ही अपना ले। नहीं तो ऊपर रब्ब को क्या जवाब देगा। "

बलवान कहाँ किसी की सुनने वाला था। उसने बच्चियों को गिरवा दिया। कुछ ही दिनों में छोटी बहु फिर पेट से थी। लेकिन इस बार लड़का था। बलवंत कौर के तो जैसे पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ते थे। भाग भाग कर काम करती। छोटी बहु की देखरेख में  उस ने कोई कोर कसर बाकि न छोड़ी। छोटी बहू को कोई काम न करने देती। बलवंत कौर तो ऐसे खुश थी मानो उसी का बेटा एक लम्बे समय के बाद छुट्टी पर घर वापिस आ रहा हो।

बलवान को जिस दिन का इंतज़ार था वो घड़ी भी आ गई। बेटे की किलकारियों से घर का आँगन खनक उठा। गाँव वालों को दावत दी गई। लोगों के बधाई देने का सिलसिला जैसे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। बलवान लोगों से बधाई लेते हुए फूला नहीं समा रहा था। देर रात तक जश्न चलता रहा। जब सब चले गए तो बलवान वहीँ आँगन में ही चारपाई पर चित हो गया।

अगली सुबह जब बलवंत कौर उठी तो अलसुबह उठने वाला बलवान बेसुध सोया था। बलवंत कौर ने उसे धीरे से हिलाया। उसे समझते देर न लगी के बलवान अब कभी नहीं उठेगा। वो ज़ोर से चिल्लाते हुए छोटी बहु के कमरे की और भागी। छोटी बहु अपने कमरे में नहीं थी।वो कहीं न मिली। उस का ध्यान बच्चे के पालने की और गया। बच्चा दुनिया से बेख़बर बलवंत की ओर देख रहा था।बलवंत ने तुरंत बच्चे को उठा कर अपनी छाती से लगा लिया !
  

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