Sunday, 5 January 2014

Pension...!

सरदार जरनैल सिंह ,उम्र करीब ८०  वर्ष ,अपनी साइकिल पर चक्कर लगाते हुए गॉंव के हर घर के आगे रुकता ,एक सन्देश देता और आगे की और चल देता। अपने घर के बाहर प्यारा सिंह को बैठे देख जरनैल सिंह ने वहाँ भी अपनी साइकिल को ब्रेक लगाई और दूर से ही प्यारा सिंह को सन्देश देने लगा। प्यारे के साथ ही बैठी उस की पत्नी को जरनैल सिंह की बात समझ नहीं आई।गॉंव में सभी प्यारा सिंह और उसकी पत्नी को चाचा चाची कह कर पुकारते हैं।चाची ने तुरंत प्यारे को हिलाते हुए कहा ,"देखियो जरनैल क्या कह रहा है। "प्यारा सिंह को ऊँचा सुनने लगा था और धूप सेंकते सेंकते उस की आँख लग गई थी। पत्नी की ऊँची आवाज़ से प्यारा जैसै अचानक नींद से जगा। इस से पहले कि प्यारा कुछ समझ पाता प्यारे की पत्नी ने अपनी बात दोहराई। प्यारे ने जरनैल की और देखा।जरनैल ने भी अपनी बात दोहराई।  इस बार भी प्यारे की पत्नी को जरनैल की बात समझ नहीं आई। लेकिन प्यारे को जरनैल की बात समझते देर ना लगी। बेशक़ वो ऊँचा सुनता था। बात समझ आते ही प्यारे के चेहरे पर जैसे बिजली सी चमक गई।

प्यारे ने अपनी पत्नी को कहा ,"जरनैल कह रह्या के पिल्सन आ गई है। " यह सुनते ही चाची की भी जैसे बांछें खिल गई। शहर से आई चाचा चाची की भतीजी याशिका को उनकी बात समझ नहीं आई और वो उनकी और आश्चर्य से देखने लगी। साथ ही बैठे उसके मामा ने याशिका की और देखा और समझाते हुए बोले ,"बेटा, सरकार की और से बुजुर्गों को हर महीने बुढ़ापा पेंशन दी जाती है। " मामा की बात सुनते ही पिल्सन और पेंशन के मायने याशिका को समझ आ गए।

धीरे धीरे गॉंव के सभी बुज़ुर्ग प्यारे चाचे के घर के आगे जमा होने लगे। पेंशन बंटने की ख़बर गॉंव में आग की  तरह फैल चुकी थी। घुटनों में दर्द की आम शिकायत के बावजूद सभी बुज़ुर्ग प्यारे के घर की और ऐसे भाग रहे थे मानो सारा दर्द फुर्र हो गया हो। हो भी क्यों न तीन महीने के बाद जो पेंशन बंटने जा रही थी।पेंशन बांटने वाला अभी वहाँ पहुंचा नहीं था। निंदा रस की चासनी के साथ बहु और बेटों की कहानियों और किस्सों को एक दूसरे के साथ बांटा जाने लगा।

याशिका इन किस्से कहानियों को बहुत गौर से सुन रही थी। उसने मुस्कुराते हुए अपने मामा की और देखा। मामा ने धीरे से कहा ,"यही हर घर की कहानी है। कोई अपनी बहु तो कोई अपने बेटों से परेशान है। असल में ८०० रूपए प्रति माह मिलने वाली इस पेंशन से ये बुज़ुर्ग अपने आप को आत्म निर्भर महसूस करने लगते हैं। अपनी छोटी मोटी ज़रूरतों को पूरा कर लाते हैं। आज तो इन को तीन महीने की पेंशन इकठ्ठा मिलने वाली थी। "

इतने में प्यारे चाचा के सात  साल के पोते ने वहाँ प्रवेश किया और चॉकलेट खाने कि ज़िद करने लगा। प्यारे ने अपनी फतूही की जेब में से एक पोटली को खोला और अपने पोते को चूमने के बाद १० रूपए का नोट उसे थमा दिया।इस से पहले के प्यारा चाचा अपने पोते को ये कहता के ध्यान से जाइयो पुत्तर अभिराज सामने की दुकान पर चॉकलेट खरीदने के लिए पहुँच चुका था।

 मुझे पेंशन से मिलने वाली ख़ुशी के मायने समझ आ चुके थे !   

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