आम चुनाव नज़दीक हैं। देश की सभी पार्टियों के नेता जैसे अपनी कुम्भकर्णी नींद से जाग उठे हैं। ऐसा लगता है मानो सोए सोए इन सब को स्वपन आया के ,"जनता जाग उठी है ,तुम अभी तक सोए हो। इस तरह तो तुम्हारा भला नहीं होने वाला। नेतागण जनता के बीच जाओ।" सपने से जागते ही जैसे इन सब के अन्दर जनमोह जाग गया हो।
देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक रैलियों के ज़रिए जनता के दुःख दर्द को समझने की जैसे बाढ़ सी आ गई है। सब आम आदमी के बीच जा कर उनकी तकलीफों को समझने की बात करने लगे हैं।समय का फेर देखिए आज आम आदमी ख़ास हो गया है। अपने आप को हमेशा ख़ास की श्रेणी में रखने वाले राजनेता आम आदमी की तरह भीख माँगते नज़र आ रहे हैं।
भारतीय गणतंत्र की यही तो ख़ासियत है के जो होता है वो दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता वो होता है। पूरे देश में कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी और भारतीय जनता पार्टी द्वारा घोषित प्रधानमंत्री के उम्मीदवार आदरणीय श्री नरेंदर मोदी जी को लेकर हर नुक्कड़ पर बहस का मुद्दा यही है के देश का प्रधानमंत्री कौन होगा । मोदी ख़ुश हैं के उन के लुभावने भाषणों को सुनने के लिए जनता जुट रही है। हज़ारों वर्ष पुरानी पार्टी की दुहाई देकर राहुल गांधी अपने पार्टी वर्करों को जनता के बीच जाकर संवाद करने पर ज़ोर दे रहे हैं।जिस तरह बी जे पी के नेता मोदी के भाषणों से मंत्र मुग्ध हैं उसी तरह राहुल के तीख़े अंदाज़ से सोनिया व् कांग्रेसी भी खुश नज़र आ रहे हैं।
मीडिया की तो जैसी पौह बारह हो गई हो। दो बिल्लियों की लड़ाई में जैसे इनकी चल निकली है। क्या अखबारें ,छोटे बड़े सभी टीवी चैनल अपनी श्रद्धा अनुसार पार्टियों और नेताओं को कवर करने में जुटे हैं। लाख टके की बात ये के इन सब का धंधा चल निकला है। बहस ,बातचीत ,टॉक शो ,चर्चाओं व अन्य प्रोग्रामों के ज़रिए लोगों को उन के ही मन की बात बताने की कोशिश की जा रही है। मानों जनता ने अपना फैंसला सुना ही दिया हो।
जैसा मैंने पहले भी कहा के जो होता है वो दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता वो होता है। मीडिया लाख पब्लिक सर्वेक्षण दिखाए पर स्तिथि अभी भी सपष्ट नहीं है। इस पूरे खेल में असली सूत्रधार इस बार प्रादेशिक पार्टियाँ ही होंगी।मीडिया इन पार्टियों को लाख अनदेखा करे पर आगामी चुनावों में इनकी भूमिका अहम् होगी।
मुझे ऐसा लगता है के पंजाब में बादल की गर्जन ,हरयाणा में चौटाला की चोट ,यू पी में मुलायम की सख्ती और मायावती की माया,दिल्ली में केजरीवाल का बर्ताव , बिहार से लालू का लाड, पासवान की नज़दीकियां और नीतीश का झुकाव ,तमिलनाडू से जयललिता का प्रेम ,ओड़िसा से बीजू का समर्थन ,पश्चिम बंगाल से दीदी की ममता और वामपंथियों की नीतियां ही तय करेंगे के देश का अगला प्रधान मंत्री कौन होगा। इसलिए ये कहना के चुनावों के परिणाम वही होंगे जो जनता चाहेगी कतई ठीक नहीं है।
जनता को ये समझ लेना होगा के "हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं"।ये पार्टियां चुनाव जनता के लिए नहीं बल्कि सत्ता लोलुपता के लिए लड़ती हैं। चुनावों के बाद भी बहुत सारे समीकरण बनते हैं।हाल ही में दिल्ली के चुनाव परिणामों और सरकार बनाने की प्रक्रिया से तो सभी वाकिफ़ ही हैं।
चंद दिनों के लिए ख़ास बनी इस जनता को ये भी समझ लेना होगा के इस बार चुनाव प्रधानमंत्री की गद्दी का नहीं बल्कि जनता की ज़रूरतों को पूरा करने की प्रतिबधत्ता का है। रोटी कपडा और मकान जैसी मूलभूत ज़रूरतों के साथ साथ आज तकनीकी व् सस्ती शिक्षा ,बढ़िया स्वास्थय सेवाएँ ,गरीबी उन्मूलन ,रोज़गार व्य्वस्था ,प्रदूषण फ्री वातावरण,बच्चों और महिलाओं को सरंक्षण ,जनसँख्या नियंतरण जैसी योजनाओं को लागू करने वाली सरकार की ज़रुरत है।25 जनवरी को पूरे राष्ट्र में मत दाता दिवस मनाया गया है। इस लिए जनता को बहुत सोच समझ कर मतदान करने की ज़रुरत है। प्रधानमंत्री बेशक़ कोई भी हो !
देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक रैलियों के ज़रिए जनता के दुःख दर्द को समझने की जैसे बाढ़ सी आ गई है। सब आम आदमी के बीच जा कर उनकी तकलीफों को समझने की बात करने लगे हैं।समय का फेर देखिए आज आम आदमी ख़ास हो गया है। अपने आप को हमेशा ख़ास की श्रेणी में रखने वाले राजनेता आम आदमी की तरह भीख माँगते नज़र आ रहे हैं।
भारतीय गणतंत्र की यही तो ख़ासियत है के जो होता है वो दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता वो होता है। पूरे देश में कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी और भारतीय जनता पार्टी द्वारा घोषित प्रधानमंत्री के उम्मीदवार आदरणीय श्री नरेंदर मोदी जी को लेकर हर नुक्कड़ पर बहस का मुद्दा यही है के देश का प्रधानमंत्री कौन होगा । मोदी ख़ुश हैं के उन के लुभावने भाषणों को सुनने के लिए जनता जुट रही है। हज़ारों वर्ष पुरानी पार्टी की दुहाई देकर राहुल गांधी अपने पार्टी वर्करों को जनता के बीच जाकर संवाद करने पर ज़ोर दे रहे हैं।जिस तरह बी जे पी के नेता मोदी के भाषणों से मंत्र मुग्ध हैं उसी तरह राहुल के तीख़े अंदाज़ से सोनिया व् कांग्रेसी भी खुश नज़र आ रहे हैं।
मीडिया की तो जैसी पौह बारह हो गई हो। दो बिल्लियों की लड़ाई में जैसे इनकी चल निकली है। क्या अखबारें ,छोटे बड़े सभी टीवी चैनल अपनी श्रद्धा अनुसार पार्टियों और नेताओं को कवर करने में जुटे हैं। लाख टके की बात ये के इन सब का धंधा चल निकला है। बहस ,बातचीत ,टॉक शो ,चर्चाओं व अन्य प्रोग्रामों के ज़रिए लोगों को उन के ही मन की बात बताने की कोशिश की जा रही है। मानों जनता ने अपना फैंसला सुना ही दिया हो।
जैसा मैंने पहले भी कहा के जो होता है वो दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता वो होता है। मीडिया लाख पब्लिक सर्वेक्षण दिखाए पर स्तिथि अभी भी सपष्ट नहीं है। इस पूरे खेल में असली सूत्रधार इस बार प्रादेशिक पार्टियाँ ही होंगी।मीडिया इन पार्टियों को लाख अनदेखा करे पर आगामी चुनावों में इनकी भूमिका अहम् होगी।
मुझे ऐसा लगता है के पंजाब में बादल की गर्जन ,हरयाणा में चौटाला की चोट ,यू पी में मुलायम की सख्ती और मायावती की माया,दिल्ली में केजरीवाल का बर्ताव , बिहार से लालू का लाड, पासवान की नज़दीकियां और नीतीश का झुकाव ,तमिलनाडू से जयललिता का प्रेम ,ओड़िसा से बीजू का समर्थन ,पश्चिम बंगाल से दीदी की ममता और वामपंथियों की नीतियां ही तय करेंगे के देश का अगला प्रधान मंत्री कौन होगा। इसलिए ये कहना के चुनावों के परिणाम वही होंगे जो जनता चाहेगी कतई ठीक नहीं है।
जनता को ये समझ लेना होगा के "हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं"।ये पार्टियां चुनाव जनता के लिए नहीं बल्कि सत्ता लोलुपता के लिए लड़ती हैं। चुनावों के बाद भी बहुत सारे समीकरण बनते हैं।हाल ही में दिल्ली के चुनाव परिणामों और सरकार बनाने की प्रक्रिया से तो सभी वाकिफ़ ही हैं।
चंद दिनों के लिए ख़ास बनी इस जनता को ये भी समझ लेना होगा के इस बार चुनाव प्रधानमंत्री की गद्दी का नहीं बल्कि जनता की ज़रूरतों को पूरा करने की प्रतिबधत्ता का है। रोटी कपडा और मकान जैसी मूलभूत ज़रूरतों के साथ साथ आज तकनीकी व् सस्ती शिक्षा ,बढ़िया स्वास्थय सेवाएँ ,गरीबी उन्मूलन ,रोज़गार व्य्वस्था ,प्रदूषण फ्री वातावरण,बच्चों और महिलाओं को सरंक्षण ,जनसँख्या नियंतरण जैसी योजनाओं को लागू करने वाली सरकार की ज़रुरत है।25 जनवरी को पूरे राष्ट्र में मत दाता दिवस मनाया गया है। इस लिए जनता को बहुत सोच समझ कर मतदान करने की ज़रुरत है। प्रधानमंत्री बेशक़ कोई भी हो !
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