सन १९४७ और २०१४ के केलेंडर को बिल्कुल एक बताया जा रहा है। आज़ादी के ६६ बरस बाद भी स्थितियां जस की तस हैं।देश की आज़ादी के समय लोगों को उम्मीद की एक किरण नज़र आई थी उन्हें लगा था के अब वो खुली हवा में सांस ले पायेंगे।आज जिस तरह आम आदमी पार्टी ने देश की राजधानी में राजनितिक परिवर्तन कर अपना धावा बोला है उससे पुनः आम आदमी को उम्मीद जगी है। अन्यथा आज़ादी से पूर्व देश की जनता सफ़ेद चमड़ी वालों की ग़ुलाम थी तो अब सफ़ेद पोश नेताओं के चंगुल में फँसी नज़र आ रही है।
२०१४ की शुरुआत में भी सन १९४७ वाली रौशनी नज़र आई है। देश कि राजधानी दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हुआ है और आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है उससे तो ऐसा लगने लगा है के लोकतंत्र लौट आया है और हम असल आज़ादी के नज़दीक हैं। १९४७ का इतिहास दोहराने का समय लौट आया है क्यों कि आम चुनाव इसी बरस २०१४ में होने हैं।
जिसे हम आम आदमी कहते हैं वो असल में किसी भी देश की शक्ति है। ये आम आदमी ही है जो अपनी मेहनत ,लगन ,बहादुरी और शक्ति से हर ड्रीम प्रोजेक्ट की नींव रखने से लेकर पूरा करने का काम करता है। हम क्यों भूल जाते हैं के पहाड़ों से रास्ता बनाने,ज़मी से पानी निकालने ,धरती पर सोना उगाने ,बड़ी से बड़ी बिल्डिंग्स की नींव से छत डालने ,फैक्टिरियों में अपना पसीना बहा कर देश को इकनॉमिकली सुदृढ़ बनाने वाला आम आदमी ही है।
ये विडम्बना ही है के देश की आज़ादी के ६६ साल बाद भी ये मेहनतकश आम आदमी की स्तिथि ज्यों कि त्यों बनी हुई है।स्तिथि सुधारना तो दूर की बात बल्कि बिगड़ी ही है। देश के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान पैदा करने वाला ये आम आदमी आज भी इन सब से वंचित है।मानव संसाधन को सुदृढ़ करने वाले दो मुख्य कारक शिक्षा और स्वास्थय तो जैसे दूर की कोड़ी हैं।
गरीबी, भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी ,महंगाई ,लूटेरी कानून व्यवस्था ,अपंग स्वास्थय सेवा ,खड़खड़ाता ट्रांसपोर्ट क्षेत्र , अनपढ़ शिक्षा प्रणाली ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें सिरे से दुरुस्त करने की ज़रुरत है। जिधर भी नज़र दौडाओ कहीं कुछ व्यस्थित नज़र नहीं आता।किसी भी तरक्की के लिए ये ज़रूरी है के उसका मानव संसाधन मज़बूत हो। उसकी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के साथ साथ स्वास्थय और शिक्षा की और सुधार किए जाऐं।
क़ानून पास करने पर ज़ोर देने की बजाय उस को लागू सही ढंग से किए जाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। तभी शायद आम आदमी अपने को ठगा हुआ महसूस नहीं करेगा। राजनीतिक पार्टियों को भी अब ये समझ लेना होगा के वो जिसे आम आदमी समझते हैं वो शक्तिविहीन नहीं है। उसे यदि सही दिशा ,विचार और मार्गदर्शक मिल जाए तो वो असम्भव को भी सम्भव बना सकता है।
शिक्षा का अधिकार एक विशेष चैलेंज है।मिड डे मील के ज़रिए फ्री खाना खिलाने ,मुफ़त किताबें बांटने , फ्री लैपटॉप देने या फिर प्राइवेट स्कूलों में आरक्षण से समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता। यही नहीं प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को आरक्षण की घोषणा मात्र से ही सभी शिक्षित नहीं हो जाएंगे।ज़रुरत तो शिक्षा के ढांचे में बदलाव की है।
प्राइवेट स्कूलों में आरक्षण के ज़रिए दाखिला दिलवाने की सरकार की हठ से एक नई चुनौती आन खड़ी हुई है। हर माँ बाप अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहता है। फ्री शिक्षा के कारण मेह्नतकश माँ बाप का रुझान इस और बढ़ा है। कौन माँ बाप नहीं चाहता के उनके बच्चे पढ़ लिखकर अपने पाँव पर खड़े हों या फिर कोई बड़ा अफसर बने। वे ख़ुद अनपढ़ता का दंश आखिर झेल चुके हैं।
हाल ही में शहर के दो नामी गिरामी स्कूलों में पढ़ने वाली पाँचवीं की बच्चियां जब शाम तक घर नहीं पहुँची तो हड़कम्प मच गया।दोनों के पिता किसी फैक्ट्री में मज़दूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे थे। इसी वर्ष जब उन्हें राइट टू एजुकेशन के बारे में पता चला तो दोनों ने अपनी बच्चियों को सरकारी स्कूल से निकाल कर शहर के नामी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिल करवा दिया।
दोनों अपने बच्चों को हर रोज़ स्कूल छोड़ कर आते और वापिसी दोनों ख़ुद आ जाती। दोनों फूले नहीं समाते। जो कोई भी मिलता इस बात की चर्चा ज़रूर करते के उन की बच्चियां इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती हैं। बच्चियां जब देर तक घर नहीं लौटी तो इस की सूचना पुलिस को दी गयी। लड़कियों का मामला था। पुलिस भी तुरंत हरकत में आ गयी। घर पर माँ का रो रो कर बुरा हाल था। मन में बुरे बुरे विचार आने लगे। ना जाने बच्चियां कहाँ होंगी।
आखिर बच्चियों को खोज निकाला गया। दोनों शहर से दूर किसी गाँव में स्टापू खेलते हुए मिली। दोनों बच्चियां दुनिया से बेफ़िक़र् पूरी मस्ती से वहाँ खेल रही थी। जब उन से भागने का कारण पूछा गया तो दिल दहला देने वाले तथ्य सामने आए। वो अब कभी इंग्लिश मीडियम स्कूल में नहीं जाना चाहतीं थीं। क्यों कि बड़े घर के बच्चे उन्हें हीन भावना से देखते और प्रताड़ित करते थे।वहाँ उनसे कोई बात नहीं करता था। यही नहीं स्कूल के टीचर भी उनसे भेदभाव करते थे। घर पर उन्हें कोई पढ़ाने वाला नहीं था और प्राइवेट ट्यूशन के लिए माँ बाप के पास पैसे नहीं थे।
ये कहानी इन दो बच्चियों की नहीं बल्कि सड़े और अव्यवस्थित सिस्टम की है।यहाँ ज़रुरत है ज़मीनी स्तर पर समस्या को समझने और ढांचागत वयवस्था में सुधार की । ताकि एक विचार से समाज में सम्भाव लाया जा सके !
२०१४ की शुरुआत में भी सन १९४७ वाली रौशनी नज़र आई है। देश कि राजधानी दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हुआ है और आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है उससे तो ऐसा लगने लगा है के लोकतंत्र लौट आया है और हम असल आज़ादी के नज़दीक हैं। १९४७ का इतिहास दोहराने का समय लौट आया है क्यों कि आम चुनाव इसी बरस २०१४ में होने हैं।
जिसे हम आम आदमी कहते हैं वो असल में किसी भी देश की शक्ति है। ये आम आदमी ही है जो अपनी मेहनत ,लगन ,बहादुरी और शक्ति से हर ड्रीम प्रोजेक्ट की नींव रखने से लेकर पूरा करने का काम करता है। हम क्यों भूल जाते हैं के पहाड़ों से रास्ता बनाने,ज़मी से पानी निकालने ,धरती पर सोना उगाने ,बड़ी से बड़ी बिल्डिंग्स की नींव से छत डालने ,फैक्टिरियों में अपना पसीना बहा कर देश को इकनॉमिकली सुदृढ़ बनाने वाला आम आदमी ही है।
ये विडम्बना ही है के देश की आज़ादी के ६६ साल बाद भी ये मेहनतकश आम आदमी की स्तिथि ज्यों कि त्यों बनी हुई है।स्तिथि सुधारना तो दूर की बात बल्कि बिगड़ी ही है। देश के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान पैदा करने वाला ये आम आदमी आज भी इन सब से वंचित है।मानव संसाधन को सुदृढ़ करने वाले दो मुख्य कारक शिक्षा और स्वास्थय तो जैसे दूर की कोड़ी हैं।
गरीबी, भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी ,महंगाई ,लूटेरी कानून व्यवस्था ,अपंग स्वास्थय सेवा ,खड़खड़ाता ट्रांसपोर्ट क्षेत्र , अनपढ़ शिक्षा प्रणाली ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें सिरे से दुरुस्त करने की ज़रुरत है। जिधर भी नज़र दौडाओ कहीं कुछ व्यस्थित नज़र नहीं आता।किसी भी तरक्की के लिए ये ज़रूरी है के उसका मानव संसाधन मज़बूत हो। उसकी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के साथ साथ स्वास्थय और शिक्षा की और सुधार किए जाऐं।
क़ानून पास करने पर ज़ोर देने की बजाय उस को लागू सही ढंग से किए जाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। तभी शायद आम आदमी अपने को ठगा हुआ महसूस नहीं करेगा। राजनीतिक पार्टियों को भी अब ये समझ लेना होगा के वो जिसे आम आदमी समझते हैं वो शक्तिविहीन नहीं है। उसे यदि सही दिशा ,विचार और मार्गदर्शक मिल जाए तो वो असम्भव को भी सम्भव बना सकता है।
शिक्षा का अधिकार एक विशेष चैलेंज है।मिड डे मील के ज़रिए फ्री खाना खिलाने ,मुफ़त किताबें बांटने , फ्री लैपटॉप देने या फिर प्राइवेट स्कूलों में आरक्षण से समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता। यही नहीं प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को आरक्षण की घोषणा मात्र से ही सभी शिक्षित नहीं हो जाएंगे।ज़रुरत तो शिक्षा के ढांचे में बदलाव की है।
प्राइवेट स्कूलों में आरक्षण के ज़रिए दाखिला दिलवाने की सरकार की हठ से एक नई चुनौती आन खड़ी हुई है। हर माँ बाप अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहता है। फ्री शिक्षा के कारण मेह्नतकश माँ बाप का रुझान इस और बढ़ा है। कौन माँ बाप नहीं चाहता के उनके बच्चे पढ़ लिखकर अपने पाँव पर खड़े हों या फिर कोई बड़ा अफसर बने। वे ख़ुद अनपढ़ता का दंश आखिर झेल चुके हैं।
हाल ही में शहर के दो नामी गिरामी स्कूलों में पढ़ने वाली पाँचवीं की बच्चियां जब शाम तक घर नहीं पहुँची तो हड़कम्प मच गया।दोनों के पिता किसी फैक्ट्री में मज़दूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे थे। इसी वर्ष जब उन्हें राइट टू एजुकेशन के बारे में पता चला तो दोनों ने अपनी बच्चियों को सरकारी स्कूल से निकाल कर शहर के नामी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिल करवा दिया।
दोनों अपने बच्चों को हर रोज़ स्कूल छोड़ कर आते और वापिसी दोनों ख़ुद आ जाती। दोनों फूले नहीं समाते। जो कोई भी मिलता इस बात की चर्चा ज़रूर करते के उन की बच्चियां इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती हैं। बच्चियां जब देर तक घर नहीं लौटी तो इस की सूचना पुलिस को दी गयी। लड़कियों का मामला था। पुलिस भी तुरंत हरकत में आ गयी। घर पर माँ का रो रो कर बुरा हाल था। मन में बुरे बुरे विचार आने लगे। ना जाने बच्चियां कहाँ होंगी।
आखिर बच्चियों को खोज निकाला गया। दोनों शहर से दूर किसी गाँव में स्टापू खेलते हुए मिली। दोनों बच्चियां दुनिया से बेफ़िक़र् पूरी मस्ती से वहाँ खेल रही थी। जब उन से भागने का कारण पूछा गया तो दिल दहला देने वाले तथ्य सामने आए। वो अब कभी इंग्लिश मीडियम स्कूल में नहीं जाना चाहतीं थीं। क्यों कि बड़े घर के बच्चे उन्हें हीन भावना से देखते और प्रताड़ित करते थे।वहाँ उनसे कोई बात नहीं करता था। यही नहीं स्कूल के टीचर भी उनसे भेदभाव करते थे। घर पर उन्हें कोई पढ़ाने वाला नहीं था और प्राइवेट ट्यूशन के लिए माँ बाप के पास पैसे नहीं थे।
ये कहानी इन दो बच्चियों की नहीं बल्कि सड़े और अव्यवस्थित सिस्टम की है।यहाँ ज़रुरत है ज़मीनी स्तर पर समस्या को समझने और ढांचागत वयवस्था में सुधार की । ताकि एक विचार से समाज में सम्भाव लाया जा सके !
No comments:
Post a Comment