Friday, 3 January 2014

HURRY UP...!

मेरा ख्याल है के हम सब जल्दी नामक बीमारी से ग्रस्त होते जा रहे हैं। जो कुछ भी कर रहे हैं----------सब जल्दी जल्दी। अपने आसपास नज़र दौड़ायें तो लगेगा जैसे सब भागमभाग में फंसे हुए हैं।अब देखिए अगर आप शादी शुदा हैं ,बच्चे स्कूल जाते हैं और अपनी बीवी की तरह आप भी नौकरी करते हैं तो आप के दिन की शुरुआत कुछ इस तरह होगी।

"अर्रे आज ऑफिस जल्दी जाना था और आज ही आँख लेट खुली।" उठते ही सब कुछ जल्दी जल्दी करने लगते हैं हम। "बेटा जल्दी उठो वर्ना स्कूल  बस निकल जायगी। पापा आज आप को स्कूल छोड़ने नहीं जा सकते ,उन्हें भी जल्दी निकलना है। आप भी जल्दी नहा लो ,नाश्ता तैयार है ,कहीं आप भी लेट न हो जाएं।" सुबह से लेकर शाम तक सब कुछ जल्दी।शाम को किसी बस स्टॉप पर फ़ोन बतियाते ये बातचीत आम हो गई है-------मैं कब से इंतज़ार कर रही हूँ ,जल्दी आओ।  रात को बिस्तर में जाने के बाद भी माँ की ये आवाज़ एक बारगी तो बच्चे के कान में ज़रूर गूंजती है-------"बेटा जल्दी सो जाओ ,सुबह स्कूल जल्दी जाना है।"

जीवन में सब कुछ जल्दी होने लगा है। शायद इस वजह से आदमी की बिदाई भी जल्दी होने लगी है।  उम्र कम होने लगी है आदमी की। क्या रिश्ते और क्या राजनीति----------सब कुछ जल्दी। आज कल झट मंगनी पट बयाह का तो जैसे फैशन सा हो गया है। शायद इसी कारण रिश्ते कमज़ोर होते जा रहे हैं।

 अब देश की राजनीति पर नज़र दौड़ायें तो वहाँ भी सब जल्दी जल्दी हो रहा है। अन्ना चाहते थे लोकपाल बिल जल्दी पास हो। केजरीवाल जल्दी समझ गए के राजनीति में घुसे बिना कुछ सम्भव नहीं।  जल्दी  जल्दी  के चक्कर में अन्ना के आंदोलन की हवा निकल गई और रालेगन सिद्धि वापिस जाना पड़ा।

 केजरीवाल ने आप पार्टी बना ली। लोगों ने इलेक्शन में कितनी जल्दी आप पार्टी को सता के नज़दीक पहुंचा दिया। केजरीवाल ने कितनी जल्दी से मुख्य मंत्री की कुर्सी हासिल कर ली।कमाल तो देखिये "आप" की सरकार का-----  कितनी जल्दी दिल्ली में पानी माफ कर दिया और बिजली की दरें भी आधी कर दी।लोगों को इस का फायदा कब मिलेगा ये भी जल्दी ही पता लग जायगा।

  विपक्षी पार्टियॉ को तो जैसे मुद्दा मिल गया है ! भाजपाई जल्दी में हैं के आप की सरकार गिरे और उन्हें दिल्ली में सता हासिल हो।  वहीँ कांग्रेस ने आप से जल्दी जल्दी इस लिए हाथ मिला लिया ताकि आप जल्दी से हर मोर्चे पर फ़ैल हो जाये और लोकसभा चुनावों के बाद राहुल को भी जल्दी जल्दी प्रधानमंत्री की कुर्सी का स्वाद चखाया जा सके।    

अब मुझे ही देखिए ३१ दिसंबर २०१३ को एक ब्लॉग लिखा "IMAGES.....2013" जल्दी में लिखा ताकि जल्दी पूरा करके नववर्ष से पहले ही पोस्ट कर सकूं।दलजिंदर ने जालंधर से फ़ोन कर ब्लॉग में अपना नाम गायब होने पर अपनी नाराज़गी जताई। वहीँ मुम्बई से मोहिंदर ने अपने बारे एक लाइन में समेटने पर  कमेन्ट किया। मुझे भी लगा जैसे जल्दी के चक्कर में बहुत कुछ छूट जाता है।

 सहज पक्के सो मीठा होए वाली कहावत में कितना दम है ये सब आप ख़ुद तय करें ! 

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