कल बहन से बात हो रही थी। उसका बेटा भूपिंदर सिंह उर्फ़ बिन्नी हैदराबाद में फ्लाइंग ऑफिसर की ट्रेंनिंग कर रहा है। आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उसने बताया के बिन्नी की "चिठ्ठी" आई है। फ़ोन पर उसने बताया के फ़ोर्स की ट्रेनिंग में घर वालों से बातचीत का ज़रिया केवल चिठ्ठी ही है। अभी एक महीना भी तो नहीं हुआ था बिन्नी को ट्रेनिंग पर गए।
2 जनवरी को ही तो छोड़ कर आए थे बिन्नी को दिल्ली। जहाँ से अगले दिन उसे हैदराबाद की फ्लाइट पकड़नी थी। बहुत सारी बातों का ज़िक्र किया बहन ने। मुझे जो बात सब से अच्छी लगी वो ये के ट्रेनिंग के पहले दिन ही सब को ये बात समझा दी गई के "वो सब देश की सम्पति हैं।अब उनके कन्धों पर अपने साथ साथ देश की जनता की ज़िम्मेदारी भी है" !
नए साल की शुरूआत ऐसी ख़बर से हुई के सीना चौड़ा होना स्वाभाविक ही था। सर्दियों की छुट्टियों का एलान हो चुका था।दिल्ली से लौटने के अगले दिन ही बच्चों के साथ घूमने का कार्यक्रम बन गया। हमेशा की तरह इस बार भी गॉंव की तरफ निकल लिए। गावों में आज भी सादगी और मेहमान नवाज़ी का कोई मुकाबला नहीं।
इस दौरान मुम्बई से अमितोष नागपाल ने ख़बर दी ,"आशू शर्मा के पिता की मृत्य़ु हो गई है।" अमितोष और आशू दोनों आजकल मुम्बई में फिल्मों में काम कर रहे हैं। दोनों ने अपने कॉलेज के समय करनाल में ख़ूब थिएटर किया। आशू से जब बात हुई तो उसने बताया के उस के पिता को कैंसर था।आशु के पिता हरियाणा पब्लिक रिलेशन में कार्यरत रहते हुए हरयाणवी संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए हमेशा प्रयासरत रहे। भगवान् उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !
7 जनवरी को जब घर वापिस लौटा तो एक और मृत्यु सन्देश से मन दुःखी हो गया। बिमला चोपड़ा हालांकि बुज़ुर्ग थी परन्तु उन की कहानी ने अंदर तक दहला दिया। आख़िरी समय में उनकी कोई देखरेख करने वाला कोई नहीं था। उनका बेटा किसी विदेशी कंपनी में लाखों रूपए कमाता है परन्तु व्यस्तता के कारण वो अपनी माँ की देखभाल नहीं कर सका।लोगों की ज़ुबानी सुना के यदि समय रहते उनका इलाज़ हो जाता तो शायद इतनी जल्दी संसार से उनकी विदाई न होती। मैं सोचने लगा के क्या इसी लिए आज भी पुत्र जन्म पर जश्न मनाया जाता है।10 जनवरी को उनकी आत्मिक शान्ति के लिए आयोजित कार्यक्रम में मैं भी शामिल हुआ।
इस बीच जालंधर से मेरे एक मित्र दलजिंदर ने बताया के पुराने सभी मित्र जालंधर में इकठ्ठा हो रहे हैं। असल में हम सभी चण्डीगढ़ में इंडियन थिएटर में साथ साथ थे। वो सब इंडियन थिएटर से पास होने की सिल्वर जुबली मना रहे थे। 25 बरस के बाद दोस्तों से मिलने की चाहत के कारण मैंने दलजिंदर के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। इसी बीच अमितोष का एक और सन्देश आया ,"सर ,एम आर धीमान नही रहे।" मैंने दलजिंदर को इत्लाह दी। असल में धीमान साहेब की पत्नी गीता धीमान ने भी दलजिंदर के साथ ही इंडियन थिएटर किया था।
11-12 जनवरी जालंधर में बीते।कुछ नए लोगों के किस्से कहानियां और पुराने साथियों को ख़ूब याद किया। दुःख हुआ के किसी ने गीता के पति की मृत्यु का ज़िक्र भर भी नहीं किया । एम आर धीमान नॉर्थ इंडिया में थिएटर के मजबूत स्तम्भ थे।उन के द्वारा निर्देशित नाटक बाल भगवान आज भी मील के पत्थर की तरह नाटक प्रेमियों के दिल में बसा हुआ है।वो हमेशा हमारे दिलों में बने रहेंगे !
दलजिंदर ,रघवीर,पुनीत सहगल ,दलजीत सिंह ,सुनील जोशी,राजेश पवार ,सुरेंदर बाठ ,जितेंदर फ़लोरा और रवि शर्मा से मुलाकात हुई। ख़ूब धमाल मचाया सब ने मिलकर। बातों का सिलसिला ऐसे शुरू हुआ के रात बीती और कब सुबह हो गई किसी को पता ही नहीं चला। रात 12 बजे चाय पीने की ललक के कारण सब ठंढ में ही रेलवे स्टेशन पहुँच गए।
राजेश पवार द्वारा घर में स्कूटी खरीदने पर घर के सदस्यों की एक्टिंग ,सुरेंदर बाठ द्वारा जवानी के दिनों में अपनी गरीबी के किस्से ,सुनील जोशी, रवि शर्मा और दलजीत का एक फ़िल्म न बना पाने का दर्द,जितेंदर फ़लोरा का आप पार्टी का बख़ान ,पुनीत का बात बात पर ज़ोर हँसना ,दलजिंदर का हमेशा की तरह अपने में खोए रहने के बाद पार्टी में बने रहना और रघवीर का हँस हँस कर पागल की हद तक पहुँच जाना देर तक मानस पटल पर छपा रहेगा।
................................................. TO BE CONTINUED
2 जनवरी को ही तो छोड़ कर आए थे बिन्नी को दिल्ली। जहाँ से अगले दिन उसे हैदराबाद की फ्लाइट पकड़नी थी। बहुत सारी बातों का ज़िक्र किया बहन ने। मुझे जो बात सब से अच्छी लगी वो ये के ट्रेनिंग के पहले दिन ही सब को ये बात समझा दी गई के "वो सब देश की सम्पति हैं।अब उनके कन्धों पर अपने साथ साथ देश की जनता की ज़िम्मेदारी भी है" !
नए साल की शुरूआत ऐसी ख़बर से हुई के सीना चौड़ा होना स्वाभाविक ही था। सर्दियों की छुट्टियों का एलान हो चुका था।दिल्ली से लौटने के अगले दिन ही बच्चों के साथ घूमने का कार्यक्रम बन गया। हमेशा की तरह इस बार भी गॉंव की तरफ निकल लिए। गावों में आज भी सादगी और मेहमान नवाज़ी का कोई मुकाबला नहीं।
इस दौरान मुम्बई से अमितोष नागपाल ने ख़बर दी ,"आशू शर्मा के पिता की मृत्य़ु हो गई है।" अमितोष और आशू दोनों आजकल मुम्बई में फिल्मों में काम कर रहे हैं। दोनों ने अपने कॉलेज के समय करनाल में ख़ूब थिएटर किया। आशू से जब बात हुई तो उसने बताया के उस के पिता को कैंसर था।आशु के पिता हरियाणा पब्लिक रिलेशन में कार्यरत रहते हुए हरयाणवी संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए हमेशा प्रयासरत रहे। भगवान् उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !
7 जनवरी को जब घर वापिस लौटा तो एक और मृत्यु सन्देश से मन दुःखी हो गया। बिमला चोपड़ा हालांकि बुज़ुर्ग थी परन्तु उन की कहानी ने अंदर तक दहला दिया। आख़िरी समय में उनकी कोई देखरेख करने वाला कोई नहीं था। उनका बेटा किसी विदेशी कंपनी में लाखों रूपए कमाता है परन्तु व्यस्तता के कारण वो अपनी माँ की देखभाल नहीं कर सका।लोगों की ज़ुबानी सुना के यदि समय रहते उनका इलाज़ हो जाता तो शायद इतनी जल्दी संसार से उनकी विदाई न होती। मैं सोचने लगा के क्या इसी लिए आज भी पुत्र जन्म पर जश्न मनाया जाता है।10 जनवरी को उनकी आत्मिक शान्ति के लिए आयोजित कार्यक्रम में मैं भी शामिल हुआ।
इस बीच जालंधर से मेरे एक मित्र दलजिंदर ने बताया के पुराने सभी मित्र जालंधर में इकठ्ठा हो रहे हैं। असल में हम सभी चण्डीगढ़ में इंडियन थिएटर में साथ साथ थे। वो सब इंडियन थिएटर से पास होने की सिल्वर जुबली मना रहे थे। 25 बरस के बाद दोस्तों से मिलने की चाहत के कारण मैंने दलजिंदर के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। इसी बीच अमितोष का एक और सन्देश आया ,"सर ,एम आर धीमान नही रहे।" मैंने दलजिंदर को इत्लाह दी। असल में धीमान साहेब की पत्नी गीता धीमान ने भी दलजिंदर के साथ ही इंडियन थिएटर किया था।
11-12 जनवरी जालंधर में बीते।कुछ नए लोगों के किस्से कहानियां और पुराने साथियों को ख़ूब याद किया। दुःख हुआ के किसी ने गीता के पति की मृत्यु का ज़िक्र भर भी नहीं किया । एम आर धीमान नॉर्थ इंडिया में थिएटर के मजबूत स्तम्भ थे।उन के द्वारा निर्देशित नाटक बाल भगवान आज भी मील के पत्थर की तरह नाटक प्रेमियों के दिल में बसा हुआ है।वो हमेशा हमारे दिलों में बने रहेंगे !
दलजिंदर ,रघवीर,पुनीत सहगल ,दलजीत सिंह ,सुनील जोशी,राजेश पवार ,सुरेंदर बाठ ,जितेंदर फ़लोरा और रवि शर्मा से मुलाकात हुई। ख़ूब धमाल मचाया सब ने मिलकर। बातों का सिलसिला ऐसे शुरू हुआ के रात बीती और कब सुबह हो गई किसी को पता ही नहीं चला। रात 12 बजे चाय पीने की ललक के कारण सब ठंढ में ही रेलवे स्टेशन पहुँच गए।
राजेश पवार द्वारा घर में स्कूटी खरीदने पर घर के सदस्यों की एक्टिंग ,सुरेंदर बाठ द्वारा जवानी के दिनों में अपनी गरीबी के किस्से ,सुनील जोशी, रवि शर्मा और दलजीत का एक फ़िल्म न बना पाने का दर्द,जितेंदर फ़लोरा का आप पार्टी का बख़ान ,पुनीत का बात बात पर ज़ोर हँसना ,दलजिंदर का हमेशा की तरह अपने में खोए रहने के बाद पार्टी में बने रहना और रघवीर का हँस हँस कर पागल की हद तक पहुँच जाना देर तक मानस पटल पर छपा रहेगा।
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