Thursday, 30 January 2014

A LETTER......EK CHITHEE PART-1

कल बहन से बात हो रही थी। उसका बेटा भूपिंदर सिंह उर्फ़ बिन्नी हैदराबाद में फ्लाइंग ऑफिसर की ट्रेंनिंग कर रहा है। आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उसने बताया के बिन्नी की "चिठ्ठी" आई है। फ़ोन पर उसने बताया के फ़ोर्स की ट्रेनिंग में घर वालों से बातचीत का ज़रिया केवल चिठ्ठी ही है। अभी एक महीना भी तो नहीं हुआ था बिन्नी को ट्रेनिंग पर गए।

 2 जनवरी को ही तो छोड़ कर आए थे बिन्नी को दिल्ली। जहाँ से अगले दिन उसे हैदराबाद की फ्लाइट पकड़नी थी। बहुत सारी बातों का ज़िक्र किया बहन ने। मुझे जो बात सब से अच्छी लगी वो ये के ट्रेनिंग के पहले दिन ही सब को ये बात समझा दी गई के "वो सब देश की सम्पति हैं।अब उनके कन्धों पर अपने साथ साथ देश की जनता की ज़िम्मेदारी भी है" !

नए साल की शुरूआत ऐसी ख़बर से हुई के सीना चौड़ा होना स्वाभाविक ही था। सर्दियों की छुट्टियों का एलान हो चुका था।दिल्ली से लौटने के अगले दिन ही बच्चों के साथ घूमने का कार्यक्रम बन गया। हमेशा की तरह इस बार भी गॉंव की तरफ निकल लिए। गावों में आज भी सादगी और मेहमान नवाज़ी का कोई मुकाबला नहीं।

 इस दौरान मुम्बई से अमितोष नागपाल ने ख़बर दी ,"आशू शर्मा के पिता की मृत्य़ु हो गई है।" अमितोष और आशू दोनों आजकल मुम्बई में फिल्मों में काम कर रहे हैं। दोनों ने अपने कॉलेज के समय करनाल में ख़ूब थिएटर किया। आशू से जब बात हुई तो उसने बताया के उस के पिता को कैंसर था।आशु के पिता हरियाणा पब्लिक रिलेशन में कार्यरत रहते हुए हरयाणवी संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए हमेशा प्रयासरत रहे। भगवान् उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !

 7 जनवरी को जब घर वापिस लौटा तो एक और मृत्यु सन्देश से मन दुःखी हो गया। बिमला चोपड़ा हालांकि बुज़ुर्ग थी परन्तु उन की कहानी ने अंदर तक दहला दिया। आख़िरी समय में उनकी कोई देखरेख करने वाला कोई नहीं था। उनका बेटा किसी विदेशी कंपनी में लाखों रूपए कमाता है परन्तु व्यस्तता के कारण वो अपनी माँ की देखभाल नहीं कर सका।लोगों की ज़ुबानी सुना के यदि समय रहते उनका इलाज़ हो जाता तो शायद इतनी जल्दी संसार से उनकी विदाई न होती। मैं सोचने लगा के क्या इसी लिए आज भी पुत्र जन्म पर जश्न मनाया जाता है।10 जनवरी को उनकी आत्मिक शान्ति के लिए आयोजित कार्यक्रम में मैं भी शामिल हुआ।   

इस बीच जालंधर से मेरे एक मित्र दलजिंदर ने बताया के पुराने सभी मित्र जालंधर में इकठ्ठा हो रहे हैं। असल में हम सभी चण्डीगढ़ में इंडियन थिएटर में साथ साथ थे। वो सब इंडियन थिएटर से पास होने की सिल्वर जुबली मना रहे थे। 25 बरस के बाद दोस्तों से मिलने की चाहत के कारण मैंने दलजिंदर के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। इसी बीच अमितोष का एक और सन्देश आया ,"सर ,एम आर धीमान नही रहे।"  मैंने दलजिंदर को इत्लाह दी। असल में धीमान साहेब की पत्नी गीता धीमान ने भी दलजिंदर के साथ ही इंडियन थिएटर किया था।

11-12 जनवरी जालंधर में बीते।कुछ नए लोगों के किस्से कहानियां और पुराने साथियों को ख़ूब याद किया।  दुःख हुआ के किसी ने गीता के पति की मृत्यु का ज़िक्र भर भी नहीं किया । एम आर धीमान नॉर्थ इंडिया में थिएटर के मजबूत स्तम्भ थे।उन के द्वारा निर्देशित नाटक बाल भगवान आज भी मील के पत्थर की तरह नाटक प्रेमियों के दिल में बसा हुआ है।वो हमेशा हमारे दिलों में बने रहेंगे  !

 दलजिंदर ,रघवीर,पुनीत सहगल ,दलजीत सिंह ,सुनील जोशी,राजेश पवार ,सुरेंदर बाठ ,जितेंदर फ़लोरा और रवि शर्मा से मुलाकात हुई। ख़ूब धमाल मचाया सब ने मिलकर। बातों का सिलसिला ऐसे शुरू हुआ के रात बीती और कब सुबह हो गई किसी को पता ही नहीं चला।  रात 12 बजे चाय पीने की ललक के कारण सब ठंढ में ही रेलवे स्टेशन पहुँच गए।

राजेश पवार द्वारा घर में स्कूटी खरीदने पर घर के सदस्यों की एक्टिंग ,सुरेंदर बाठ द्वारा जवानी के दिनों में अपनी गरीबी के किस्से ,सुनील जोशी, रवि शर्मा और दलजीत का एक फ़िल्म न बना पाने का दर्द,जितेंदर फ़लोरा का आप पार्टी का बख़ान ,पुनीत का बात बात पर ज़ोर  हँसना ,दलजिंदर का हमेशा की तरह अपने में खोए रहने के बाद पार्टी में बने रहना और रघवीर का हँस हँस कर पागल की हद तक पहुँच जाना देर तक मानस पटल पर छपा रहेगा।



................................................. TO BE CONTINUED

Monday, 27 January 2014

Prime Minister.....!

आम चुनाव नज़दीक हैं। देश की सभी पार्टियों के नेता जैसे अपनी कुम्भकर्णी नींद से जाग उठे हैं। ऐसा लगता है मानो सोए सोए इन सब को स्वपन आया के ,"जनता जाग उठी है ,तुम अभी तक सोए हो। इस तरह तो तुम्हारा भला नहीं होने वाला। नेतागण जनता के बीच जाओ।"  सपने से जागते ही जैसे इन सब के अन्दर जनमोह जाग गया हो।

देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक रैलियों के ज़रिए जनता के दुःख दर्द को समझने की जैसे बाढ़ सी आ गई है। सब आम आदमी के बीच जा कर उनकी तकलीफों को समझने की बात करने लगे हैं।समय का फेर देखिए आज आम आदमी ख़ास हो गया है। अपने आप को हमेशा ख़ास  की श्रेणी में रखने वाले राजनेता आम आदमी की तरह भीख माँगते नज़र आ रहे हैं।

भारतीय गणतंत्र की यही तो ख़ासियत है के जो होता है वो दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता वो होता है। पूरे देश में कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी और भारतीय  जनता पार्टी द्वारा घोषित प्रधानमंत्री के उम्मीदवार आदरणीय श्री नरेंदर मोदी जी को लेकर हर नुक्कड़ पर बहस का मुद्दा यही है के देश का प्रधानमंत्री कौन होगा । मोदी ख़ुश हैं के उन के लुभावने भाषणों को सुनने के लिए जनता जुट रही है। हज़ारों वर्ष पुरानी पार्टी की दुहाई देकर राहुल गांधी अपने पार्टी वर्करों को जनता के बीच जाकर संवाद करने पर ज़ोर दे रहे हैं।जिस तरह बी जे पी के नेता मोदी के भाषणों से मंत्र मुग्ध हैं उसी तरह राहुल के तीख़े अंदाज़ से सोनिया व् कांग्रेसी भी खुश नज़र आ रहे हैं।

मीडिया की तो जैसी पौह बारह हो गई हो। दो बिल्लियों की लड़ाई में जैसे इनकी चल निकली है। क्या अखबारें ,छोटे बड़े सभी टीवी चैनल अपनी श्रद्धा अनुसार पार्टियों और नेताओं को कवर करने में जुटे हैं। लाख टके की बात ये के इन सब का धंधा चल निकला है। बहस ,बातचीत ,टॉक शो ,चर्चाओं व अन्य  प्रोग्रामों के ज़रिए लोगों को उन के ही मन की बात बताने की कोशिश की जा रही है। मानों जनता ने अपना फैंसला सुना ही दिया हो।

जैसा मैंने पहले भी कहा के जो होता है वो दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता वो होता है। मीडिया लाख पब्लिक सर्वेक्षण दिखाए पर स्तिथि अभी भी सपष्ट नहीं है। इस पूरे खेल में असली सूत्रधार इस बार प्रादेशिक पार्टियाँ ही होंगी।मीडिया इन पार्टियों को लाख अनदेखा करे पर आगामी चुनावों में इनकी भूमिका अहम् होगी।

 मुझे ऐसा लगता है के पंजाब में बादल की गर्जन ,हरयाणा में चौटाला की चोट ,यू पी में मुलायम की सख्ती और मायावती की माया,दिल्ली में केजरीवाल का बर्ताव , बिहार से लालू का लाड, पासवान की नज़दीकियां और नीतीश का झुकाव ,तमिलनाडू से जयललिता का प्रेम ,ओड़िसा से बीजू का समर्थन ,पश्चिम बंगाल से दीदी की ममता और वामपंथियों की नीतियां ही तय करेंगे के देश का अगला प्रधान मंत्री कौन होगा। इसलिए ये कहना के चुनावों के परिणाम वही होंगे जो जनता चाहेगी कतई ठीक नहीं है।

जनता को ये समझ लेना होगा के "हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं"।ये पार्टियां चुनाव जनता के लिए नहीं बल्कि सत्ता लोलुपता के लिए लड़ती हैं। चुनावों के बाद भी बहुत सारे समीकरण बनते हैं।हाल ही में दिल्ली के चुनाव परिणामों और सरकार बनाने की प्रक्रिया से तो सभी वाकिफ़ ही हैं।

  चंद दिनों के लिए ख़ास बनी इस जनता को ये भी समझ लेना होगा के इस बार चुनाव प्रधानमंत्री की गद्दी का नहीं बल्कि जनता की ज़रूरतों को पूरा करने की प्रतिबधत्ता का है। रोटी कपडा और मकान जैसी मूलभूत ज़रूरतों के साथ साथ आज तकनीकी व् सस्ती शिक्षा ,बढ़िया स्वास्थय सेवाएँ ,गरीबी उन्मूलन ,रोज़गार व्य्वस्था ,प्रदूषण फ्री वातावरण,बच्चों और महिलाओं को सरंक्षण ,जनसँख्या नियंतरण जैसी योजनाओं को लागू करने वाली सरकार की ज़रुरत है।25 जनवरी को पूरे राष्ट्र में मत दाता दिवस मनाया गया है। इस लिए जनता को बहुत सोच समझ कर मतदान करने की ज़रुरत है। प्रधानमंत्री बेशक़ कोई भी हो !


     

Thursday, 23 January 2014

DHUNDH...!

जैसे जैसे धुंध बढ़ती गई ,परिवार में बैठे सभी लोगों की चिंता भी बढ़ती गई। रीना टीवी के सामने बैठी बार बार चेनल बदल रही थी। लेकिन उसे मौसम की जानकारी कहीं से नहीं मिल रही थी। रिमोट को दूसरे हाथ पर मारते हुए वो बोली ,"ये धुंध को भी आज ही पड़ना था। " बगल में खिड़की के साथ बैठा रीना का छोटा भाई संजय अपने लैपटॉप पर लगातार अपनी अंगुलियां घुमा रहा था। बाहर खिड़की में से झांकते हुए संजय बोला ,"फ्लाइट तीन घंटे लेट है। "

फ्लाइट के लेट होने की खबर सुनते ही संजय के पिता सुंदर लाल अपनी अँगुलियों पर हिसाब करने में व्यस्त हो गए।जब सही हिसाब हो गया तो बोले ,"इस हिसाब से तो शाम के पांच बजे से पहले नहीं पहुंचेगा रवि। " संजय के बड़े भैया रवि पिछले तीन साल से मुम्बई में थे। सभी की चिंता बढ़ती जा रही थी।रसोई में किसी काम में व्यस्त शान्ति भी अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए कमरे  में प्रवेश कर गई और अपने हाथ पोंछते हुए बोलीं ,"अम्मा को भी अभी जाना था , कुछ दिन और रुक जाती तो ये मुसीबत तो न झेलनी पड़ती। ख़ुद तो चली गईं पर इतनी धुंध में सब जो परेशान होंगे उसके बारे में कतई नहीं सोचा !"

ये कहते कहते रीना की माँ दोबारा रसोई में चली गई।रीना ने बड़े भाई रवि को कईं बार फ़ोन पर बताया था के अम्मा की तबियत ठीक नहीं है ,आकर मिल जाता तो अच्छा होता। अम्मा सब से अधिक प्रेम भी रवि से ही करती थी। घर में सब से बड़ा जो ठहरा। अम्बाला में रहते हुए अपनी दादी की ख़ूब सेवा की थी रवि ने।


 रिश्तेदारों और पड़ोसियों का शोक प्रकट करने का सिलसिला शुरू हो चुका था।रीना के दोनों बच्चे पप्पू और बबली दुनिया से बेफ़िकर लुडो पर साँप सीढ़ी खेलने में मस्त थे। बीच बीच में आने जाने वालों को देख भर लेते थे।संजय अपने लैपटॉप पर वयस्त था। अम्मा को मरे अभी कुछ ही घंटे हुए थे। धुंध और कड़ाके की सर्दी के कारण माँ को अपने बेटे और रिश्तेदारों को आने वाली तकलीफ की चिंता थी। पड़ोस में रहने वाले तुली साहब इस बात से सतुंष्ट थे के ढंड के मौसम में लाश को कुछ नहीं होगा।

रीना धुंध के कारण देरी से आए अखबार के पन्ने पलट रही थी। मुख पृष्ठ पर धुंध के कारण एक दिन  पहले एकसिडेंट से चार लोगों की मौत वाली ख़बर से रीना विचलित हो गई थी। लैपटॉप पर व्यस्त संजय को रीना बार बार मौसम की जानकारी लेने को कह रही थी। पड़ोसियों की आवाजाही के कारण टीवी को बंद जो कर दिया गया था।रीना चिंता में थी क्योंकि उसके पति पंजाब से सड़क के रास्ते अकेले गाड़ी ड्राइव कर के आ रहे थे।

 संजय रवि भाई का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहा था। भय्या लम्बे समय के बाद जो घर लौट रहा था। भैया संजय के लिए नया लैपटॉप  लेकर आ रहे थे। संजय ने नेट पर जैसे ही मौसम का हाल देखा उसने अपनी बहन को आवाज़ लगाई। संजय ने बिना ये सोचे के लोग घर में शोक प्रकट करने आए हुए हैं  ज़ोर से चिल्लाया ,"ये धुंध जल्द ही छट जायगी और अगले दो दिन तक मौसम साफ़ रहेगा।"

कमरे में साँप सीढ़ी खेल रहे पप्पू और बबली संजय मामा की बात सुन कर ज़ोर से चिल्लाने लगे ,मानो खेल खेल में उनको ही सांप काट गया हो। जब सब ने पप्पू और बबली से रोने का कारण पूछा तो पप्पू रोते रोते बोला ,"धुंध खत्म हो जायगी तो हमारी छुट्टियां आगे नहीं बढ़ेंगी। "

असल में पिछले तीन सालों से ढंड और धुंध की वजह से सर्दियों की छुट्टियों को बढ़ा दिया जाता था। पप्पू और बबली सर्दियों की छुट्टियां मनाने अपने नाना नानी के घर आए हुए थे !          

Tuesday, 21 January 2014

BANTWARA...!

सर्दियों की छुट्टियों में गॉंव जाने का मौका मिला। आज भी यहाँ की ज़िन्दगी शहरों से बिल्कुल अलग है। सादगी ,शान्ति ,संतुष्टि ,सहजता,साफगोही और सच्चाई तो जैसे यहाँ के गहने हैं।सिहंपुर भी बहुत सारे ऐसे गॉंवों की तरह ही है। शहर के नज़दीक है सिहंपुर। शहर का प्रभाव भी इस गॉंव पर साफ़ नज़र आता है।अधिकतर घरों के बाहर खड़ी कारें ,हीरो होंडा मोटर साइकिल ,छतों के ऊपर सूरज की तरह चमकती गोल गोल डिश और घर के अंदर लम्बी चौड़ी एल सी डी सम्पन्नता की गवाह भी हैं।

पंजाब के इस गॉंव सिंहपुर में दो दिन बिताए।मेरे दोस्त सविंदर सिंह ने ख़ूब आवभगत की। रात को बिस्तर में देर से घुसने के बावजूद भी छिंदे ने अलसुबह उठा दिया। सविंदर को प्यार से सभी छिंदा कह कर बुलाते हैं। उठते ही छिंदा कहने लगा ,"क्यों जी चलां सैर पर।" असल में रात को बातों बातों में छिंदे ने सुबह सैर करने की आदत के बारे में मुझे बता दिया था। मैने खिड़की के बाहर झाँका कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। धुंध इतनी के बाहर कुछ नज़र नहीं आ रहा था। मैंने छिंदे को धुंध का हवाला देते हुए रहम करने की गुहार लगाई। असल में ठण्ड भी बहुत थी और मैं रजाई में ही दुबके रहना चाहता था।

 छिंदा कहाँ मानने वाला था।थोड़ी देर के बाद फिर सैर पर चलने के लिए कहने लगा। मुझे पूरा विश्वास हो चला के अब मेरी दाल नहीं गलने वाली। बिस्तर को जल्द वापिस लौटने का वायदा कर जूते बांधे और चल दिया छिंदे के साथ।खेतों के बीच में से निकलते हुए छिंदा बोला,"ये खेत भी कईं सालों के बाद आबाद हुए।" छिंदे की आधी अधूरी बात सुन कर मैंने भी वैसा ही प्रशन किया ,"क्यों ,क्या हुआ।" 

छिंदे को तो जैसे चाबी भर दी गई हो। लगा बताने आबाद हुए खेतों की कहानी ,"राम दास और गंगा राम के खेत हैं ये। पिछले १० साल से केस चल रहा था इन पर। ज़बरदस्त प्यार था दोनों में।भाइयों के प्यार के किस्से दूर-दूर के गावों में सुने और सुनाए जाते थे। न जाने क्या हुआ ,पता नहीं किस की नज़र लगी दोनों भाइयों को-------दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन बैठे।" "ऐसा क्या हुआ दोनों के बीच ?" मैंने उत्सुकता से पूछा। "यही तो आज तक किसी को भी पता नहीं चला।" आश्चर्य भरी नज़रों से मेरी और देखते हुए छिंदा बोला। इस से पहले के छिंदा आगे कुछ बताता ,मैंने कहा ,"आम तौर पर औरतों के कारण ऐसे झगड़े होते हैं। "

"यही तो बात है-------हर आदमी ऐसा ही सोचता है। दोनों की औरतें भी भाइयों के इस निर्णय से सकते में थीं। दोनों भाइयों की बीवियों ने भी दोनों को बहुत समझाया के मुट्ठी बंद रहे तो लाख की होती है।अलग अलग हो जाऐंगे तो जग हंसाई होगी। गंगा राम पर जैसे बंटवारे का भूत सवार था।गंगा राम ने बंटवारे के लिए कोर्ट में केस ठोक दिया। कोर्ट में दस साल केस चलने के बाद ज़मीन का बंटवारा हो गया। १० सालों के बाद खेतों में लहराती सरसों को देख कर पूरे इलाके के लोग खुश हैं।" ये बात करते करते छिंदा जैसे शून्य में चला गया।

मैंने छिंदे को कहा ,"ये तो अच्छा हुआ ,सब शांति से निपट गया।" छिंदा जैसे नींद से जगा और बोला,"अच्छा क्या ख़ाक हुआ ! जिस ज़मीन के लिए दस साल लड़ते रहे दोनों भाई, उस का सुख तो नहीं भोग पाए दोनों।" इस से पहले के मैं छिंदे से कुछ पूछता ,छिंदा भरे हुए मन से बोला ,"कोर्ट के फैंसले के ६ महीने के अंदर दोनों पूरे हो गए। इसी ज़मीन में दफ़नाया गया दोनों भाइयों को। "

बात को पूरी करते करते छिंदे की आँखें भर आईं। रोते रोते कहने लगा ,"मैंने तो अपने भाई राजे को बहुत समझाया है। उस की अक्ल पर तो जैसे पत्थर पड़ गए हैं। न जाने उस को क्या हो गया है। दिन रात पीने लगा है। जब ज्यादा पी लेता है तो बंटवारे की बात करने लगता है।"

अपनी बात पूरी करने से पहले ही छिंदा फ़फ़क फ़फ़क कर रोने लगा था !

     

RAJNITI KA DENGUE....!

भारत में २०१४ में होने वाले आम चुनाव का बिगुल बज चुका है। देश के अलग अलग हिस्सों में अपनी मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। कहीं कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे अध्यापक अपने आप को पक्का किए जाने की मांग कर रहे हैं तो कहीं रोडवेज वर्कर्स ने चक्का जाम कर दिया है। कहीं हेल्थ वर्कर बीमार हुई वयवस्था से नाराज़ हैं तो कहीं पानी बिजली को ले कर प्रदर्शन जारी है।कहीं धर्म जाति के नाम पर आरक्षण  की मांग हो रही है तो कहीं राजनीतिज्ञों के घपलों की जांच की।  और कमाल तो देखिए दिल्ली में तो मुख्यमंन्त्री ही हड़ताल पर बैठा है।

हाल ही में देश के चार राज्यों में इलेक्शन परिणाम क्या आए ! आम आदमी के वोट और इमोशंस पर राज करने वाली पार्टियों के तथाकथित आकाओं को जैसे जनता सुध का बुखार सा लग गया हो।ऐसे लगने लगा है जैसे डेंगू और जनता सुध बुखार एक जैसे हों। उतर से दक्षिण ,पूर्व से पश्चिम सभी जगह डेंगू और देश की राजनीति का ज़िक्र है। दिल्ली में आम आदमी ने किसी के दबाव में आए बिना अपने वोट का इस्तमाल क्या किया। सभी पार्टियों को आम आदमी का ध्यान रखना ज़रूरी लगने लगा है।

सभी राजनीतिक पार्टियों के आका अब आम आदमी के बीच जा कर इस बात की दुहाई देने लगे हैं के वो आम आदमी के दुःख दर्द को बेहतर समझते हैं। क्या सोनिया की कांग्रेस ,हिंदुओं की भारतीय जनता पार्टी ,माया रचित दलितों की बसपा ,मुसलमानों की हिमायती मुलायम की समाजवादी पार्टी या फिर अलग अलग राज्यों में रंग ,भाषा ,जाति ,धर्म और वाणिजय के आधार पर लोगों को ग़ुमराह कर सही राह दिखाने का चश्मा पहनाने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के तो जैसे सांस फूलने लगे है। आम आदमी की टोपी पहन कर दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने वाले केजरीवाल की सत्ता लोलुपता तो देखिए अब वो लोगों को अराजकता का पाठ पढ़ाने लगे हैं।

केजरीवाल शायद ये भूल गए हैं के आम आदमी की टोपी मान सम्मान का प्रतीक होती है। अगर वो इसी तरह आम आदमी की टोपी सड़कों पर उछालने लगेंगे तो आम आदमी को दुःख होगा। आज आम आदमी अपनी मूलभूत ज़रूरतों रोटी कपडा और मकान के लिए जूझ रहा है।आप के पास सत्ता आई है ,बेहतर होता यदि केजरीवाल एंड कंपनी इस ओर ध्यान देती।मुझे तो ऐसा लगने लगा है कि आप की  सरकार अपने किए वायदों को पूरा करने में असमर्थ महसूस कर रही है।लगता अब ऐसा है के केजरीवाल एंड कंपनी इसी वजह से लोगों का ध्यान इस और से हटाना चाहती है।

ख़बरदार आप पार्टी ,आप लोगों की भावनाओं के साथ कदापि खिलवाड़ नहीं कर सकते। अब आम आदमी ही ये कहने लगा है के आप असल मुद्दों से भटक गए हैं। ऐसा न हो के जिस आम आदमी ने आप को अपना सरताज बनाया है वही आम आदमी आप पर थू -थू न करने लगे। क्योंकि आम आदमी का पेट धरनों ,प्रदर्शनों या फिर कोरे वायदों से नहीं भरता। आम आदमी को तो काम चाहिए ,रोज़गार चाहिए। आम आदमी तो आम आदमी है। आम आदमी को अगर काम के साथ थोड़ा सम्मान मिल जाए तो वो अपने आप को वैसे ही धन्य मानने लगेगा।   

आम आदमी सावधान !   

Tuesday, 14 January 2014

BULBUL KA BACHHA...!

डॉ डेंग की दुकान पर आज एक व्यक्ति अपनी कार बेचने के लिए आया। बातचीत में पता चला के उसने एक बरस पहले ही ठेकेदारी का काम शुरू किया था। काम चल निकला था। काम के सिलसिले में इधर उधर जाने के लिए काफी दिक्कत होती थी। एक महीना पहले ही कार खरीदी थी। मैं ऐसे ही पूछ बैठा ,"ऐसी क्या दिक्कत आन पड़ी कार बेचने की।" बिटटू कुछ नहीं बोला। कार बेचने वाले को सभी बिटटू के नाम से ही बुला रहे थे।

बिटटू से ज्यादा मुझे डॉ डेंग जल्दी में नज़र आ रहा था। डॉ डेंग की जल्दी का कारण भी था। कार सस्ते में जो मिल रही थी। एक महीने पहले खरीदी गई कार बिटटू को ५०००० रूपए सस्ते में बेचनी पड़ रही थी। "बाज़ार का ये दस्तूर है के यदि कोई चीज़ खरीदने जायो तो मिलती नहीं और बेचने जायो तो बिकती नहीं", डॉ डेंग ने अपने पार्टनर को कहा। पार्टनर ने भी डॉ डेंग की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ,"फँसी में है ससुरा वर्ना कहाँ मिलती है ऐसी साफ कार। बिल्कुल बुलबुल का बच्चा है। "

बिटटू बाहर किसी से मोबाइल पर बात कर रहा था। बिटटू अपनी साख़ नहीं खोना चाहता था। उसे अपनी लेबर को तय समय पर पेमेन्ट का भुगतान करना था। पैसे की तंगी के कारण बिटटू घाटे में कार बेच रहा था। लाख यत्न के बाद भी जब बिटटू से लेबर को पेमेन्ट करने के लिए पैसे का इन्तज़ाम नहीं हुआ तो वो कार बेचने पर राज़ी हो गया।

फाइनल डील के बाद डॉ डेंग का पार्टनर बिटटू को अपनापन जताते हुए बोला ,"भाई बिटटू अगर तेरी गाड़ी कहीं महंगी बिकती हो तो तूँ बेच सकता है। मैं तो तेरी हेल्प के वास्ते ये गाड़ी ख़रीद रहा हूँ और वो भी मार्केट रेट पर। अब वो मेरी किस्मत है के ये गाड़ी सस्ती बिको या महंगी। " असल में बिटटू डॉ डेंग के पार्टनर का परिचित था और कुछ समय के लिए पैसे माँगने आया था।

 जब बिटटू पेमेन्ट ले कर डॉ डेंग की दुकान से बाहर निकलने लगा तो भारी मन से बोला ,पिछले दो महीनों में ५०००० हज़ार कमाए थे ,उसी का घाटा हो गया पर शुक्र है के साख़ बच गई। बिटटू के दुकान से बाहर निकलते ही डॉ डेंग और उस के पार्टनर अपनी जीत पर ऐसे खुश हुए मानो उन्होंने कोई क़िला फ़तह कर लिया हो। वो दोनों खुश थे के आज ५०००० हज़ार का फ़ायदा हो गया था।

लगभग २५ साल पहले डिपार्टमेन्ट ऑफ़ इंडियन थिएटर ,चण्डीगढ़ में अलख नंदन जी के निर्देशन में किए एक नाटक "आगरा बाज़ार " में नज़ीर की ये पंक्तियाँ याद आ गई------------

"बैठे हैं सभी दुकाने लगा लगा ,कहता है कोई ले रे ले , कहता है कोई ला रे ला ! "

Wednesday, 8 January 2014

PUTTAR MOH....!

बलवान सिंह फ़ौज में इंस्पेक्टर था। जैसा नाम वैसे ही था बलवान सिंह। मज़बूत कद काठी। जवानी के दिनों में पांच पांच के साथ अकेले भिड़ जाता। ताक़त के साथ-साथ दिखने में भी ख़ूब सुंदर। जिधर से निकल जाता लड़कियां एक बार मुड़ कर ज़रूर देखतीं।छोटी उम्र में ही शादी हो गई थी।किस्मत का इतना धनी के बीवी भी बलां की ख़ूबसूरत मिली उसको। सुंदरता के साथ साथ बहुत सुशील थी बलवंत कौर। बलवंत कौर पूरे कुनबे में मिसाल थी। बलवान सिंह के किसी काम में वो कभी दख़ल नहीं देती। स्वभाव ऐसा मानो के जैसे गाय हो।

बलवान सिंह मे देश भक्ति का ऐसा जज़बा के घरवालों के विरोध के बावज़ूद दोनों बेटों को फ़ौज में ही भर्ती करवाया।वो अपने बेटों से बहुत प्यार करता था। बेटे भी पूरे आज्ञाकारी। बाप ने जो कह दिया समझो बेटों के लिए पत्थर पे लकीर। बाप बेटों के प्यार की बात दूर दूर तक के गावों में की जाती। एक भरा पूरा परिवार।बलवान सिंह किसी बादशाह से कम नहीं समझता अपने को । बेटियों की शादी भी अच्छे परिवारों में की। घर में नाती पोते जब भी आते उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहता। एक पोता तो पूरा गबरू जवान हो चुका था। बिल्कुल अपने दादा पर गया था। अभी ग्रेजुएशन के फाइनल इयर में था और रिश्ते के लिए लोग आने लगे थे।

 बलवान सिंह की रिटायरमेंट को अभी पांच साल बाकी थे।सब ठीक ठाक चल रहा था। अगले दो वर्षों में उस पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। बड़ा बेटा बॉर्डर पर तैनात था। पड़ोसी देश की फ़ौज द्वारा की गई फायरिंग में उसकी जान चली गई। अभी छः महीने भी नहीं बीते थे के दूसरा  बेटा भी शहीद हो गया। बलवान सिंह तो जैसे टूट सा गया।उसने किसी से भी बात करना बंद कर दिया।

बलवान सिंह अब अगर किसी से कोई बातचीत करता तो वो थी उस की बीवी बलवंत कौर। वो उसको "बलवन्ते" कह कर बुलाता था।जिन पोते पोतियों को वो अपनी जान से ज्यादा प्यार करता था अब उनसे वो कोई बात न करता।वो तो जैसे बेटों के जाने के बाद ग़ुम सा  हो गया था। कभी कभी तो वो अपनी बीवी के पल्लू में सर छिपा कर कईं  कईं घंटे रोता। और जब आंसू सूख जाते तो धीरे से बोलता ,"बलवन्ते, ए रब्ब ने मेरे साथ कौन से जन्मों का बदला लिया है। मैं तो कभी किसी से हारा नहीं था। "

बलवान सिंह को समझाते हुए बलवंत बोली,"रब्ब से थोड़ा जीता जा सकता है सरदार जी। उस को जो मंज़ूर है वो तो सब को मानना पड़ता है। " बलवान एक दम से चुप  सा होकर छत की और देखने लगा,थोड़ी देर बाद ही चुप्पी को चीरते हुए वो ज़ोर से चिल्लाया ,"क्यों नहीं जीत सकता ?" ये कहते ही वो फिर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा।रोते रोते वो बड़बड़ाने लगा," मैं क्या बूढ़ा हो गया हूँ जो जीत नहीं सकता।" ये कहते हुए उसने बलवंत कौर को इस तरह देखा मानो वो उस की हामी भरवाना चाहता हो।थकावट के कारण बलवंत सो चुकी थी। रात भी बहुत हो चुकी थी।    

बलवान सिंह अगली  सुबह उठा तो बलवंत कौर उस को देख कर दंग रह गई। सुबह उठ कर उसने वही जवानी वाले अंदाज़ में  तैयार होना शुरू किया। पगड़ी बांधने शीशे के सामने ऐसा खड़ा हुआ के जब तक वो ख़ुद संतुष्ट नहीं हुआ वहीँ जमा रहा। बलवंत कौर बलवान सिंह में आए इस आकस्मिक परिवर्तन को देख कर मंद मंद मुस्कुराने लगी।हमेशा चुप रहने वाली बलवन्ते को न जाने क्या सूझी के मसख़री करते हुए बोली ,"सरदार जी क्या इरादा है ,इस बुढ़ापे में कोई दूसरी करने की सोच ली है क्या।" ये कहते ही वो ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी।

बलवान सिंह पगड़ी बांधते हुए शीशे में से ही पीछे की और देखते हुए बोला ,"कुछ ऐसा ही समझ ले बलवन्ते" बलवंत को लगा बलवान जैसे मज़ाक कर रहा है। वो हंसते हुए दोबारा बोली ,"तेरी मत्त तो नहीं मारी गई सरदारा। इस बुढ़ापे में किस ने लगना है तेरे साथ।" बलवान की तो जैसे सच में मत्त मारी गई थी। उसने मुड़ते ही बलवंत को कस कर पकड़ लिया और बोला ,"बलवन्ते मैं सच में दूसरी करने जा रहा हूँ। और उम्मीद करता हूँ तू इस में मेरा साथ देगी। बेटा चाहिए मुझे बेटा।"  ये कहते ही उसने बलवंत को ज़ोर से धक्का दिया और तेज़ क़दमों के साथ घर से बाहर  निकल गया।

बलवान सिंह तो जैसे रब्ब से ही लड़ना चाहता था। बलवंत उसे बाहर जाते हुए देखती रही। सारा दिन कुछ नहीं खाया और सोचते सोचते कब शाम हो गई पता ही नहीं चला। वो जानती थी के बलवान अपनी जुबां का पक्का है। जो एक बार सोच लिया उसे पूरा कर के ही दम लेता है। ये विचार उसके मन में आते ही उसके अंदर बुरे विचारों का जैसे तूफ़ान आ गया। वो एकदम बाहर की तरफ भागी।रात ज्यादा हो चुकी थी। बलवंत निढाल हो कर वहीँ गिर गई।

जब उसे होश आया तो उसकी दुनिया बदल चुकी थी। आँगन में छन छन करती पाजेब की झंकार को सुनते ही उसे समझते देर न लगी के बलवान ने अपनी ज़िद पूरी कर ली है।उसकी छाती पर जैसे सांप लोटने लगा। एक बारगी तो उसके मन में आया के ख़ुद को फांसी लगा ले। पर वो तो बलवान से इन्तेहा प्यार करती थी। जीवन के ३२ बरस जो बिताए थे उसके साथ। बलवान की देखभाल कौन करेगा ये सोच कर उसने फांसी का इरादा छोड़ दिया।

बलवान आँगन में घूमते हुए ज़ोर ज़ोर से दातुन को अपने दांतों पर रगड़ रहा था। अपने को सम्भालते हुए बलवंत कौर ने आँगन में प्रवेश किया।मुहं धोकर जैसे ही बलवान पीछे की और मुड़ा तो सामने बलवंत खड़ी थी। जैसे ही उस से बच कर वो कमरे की और जाने लगा,बलवंत ने उसकी बनियान खींच ली। बिना कुछ बोले उसने बलवान की आँखों में आँखें डाल दी। मानो उस के साथ हुई बेवफाई का हिसाब मांग रही हो। हमेशा बलवंत की आँखों में आँखें डाल कर उस की तारीफ़ करने वाले बलवान से आज कुछ नहीं बोला गया।

समय के साथ घाव भी भर जाते हैं। इस घर में भी कुछ ऐसा ही हुआ।समय जैसे पंख लगा कर उड़ रहा था ,छोटी बहु पेट से थी। डॉ को चेक अप करवाया तो पता चला पेट में जुड़वां बच्चे पल रहे हैं। बलवान ने जुगाड़ कर ये भी पता करवा लिया के पेट में लड़कियां हैं।बलवान पर तो जैसे लड़कों का भूत सवार था। उसने गर्भ गिरवाने की तैयारी कर ली। बलवंत को जब इस बात का पता चला तो उसने बलवान को ख़ूब समझाने की कौशिश की। पर सब दलील और अपील उस के सामने फेल हो गई।

बलवान जब छोटी बहु को गर्भपात के लिए डॉ के ले जाने लगा तो बलवंत ने बलवान के पैर पकड़ लिए और देने लगी रब्ब की दुहाई,"ओ सरदारा रब्ब से डर ,उसने तो तेरी इच्छा पूरी कर दी है। दोनों लड़कों को एक साथ वापिस भेज दिया है।ये ज़ुल्म न कर, इन्हें ही अपना ले। नहीं तो ऊपर रब्ब को क्या जवाब देगा। "

बलवान कहाँ किसी की सुनने वाला था। उसने बच्चियों को गिरवा दिया। कुछ ही दिनों में छोटी बहु फिर पेट से थी। लेकिन इस बार लड़का था। बलवंत कौर के तो जैसे पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ते थे। भाग भाग कर काम करती। छोटी बहु की देखरेख में  उस ने कोई कोर कसर बाकि न छोड़ी। छोटी बहू को कोई काम न करने देती। बलवंत कौर तो ऐसे खुश थी मानो उसी का बेटा एक लम्बे समय के बाद छुट्टी पर घर वापिस आ रहा हो।

बलवान को जिस दिन का इंतज़ार था वो घड़ी भी आ गई। बेटे की किलकारियों से घर का आँगन खनक उठा। गाँव वालों को दावत दी गई। लोगों के बधाई देने का सिलसिला जैसे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। बलवान लोगों से बधाई लेते हुए फूला नहीं समा रहा था। देर रात तक जश्न चलता रहा। जब सब चले गए तो बलवान वहीँ आँगन में ही चारपाई पर चित हो गया।

अगली सुबह जब बलवंत कौर उठी तो अलसुबह उठने वाला बलवान बेसुध सोया था। बलवंत कौर ने उसे धीरे से हिलाया। उसे समझते देर न लगी के बलवान अब कभी नहीं उठेगा। वो ज़ोर से चिल्लाते हुए छोटी बहु के कमरे की और भागी। छोटी बहु अपने कमरे में नहीं थी।वो कहीं न मिली। उस का ध्यान बच्चे के पालने की और गया। बच्चा दुनिया से बेख़बर बलवंत की ओर देख रहा था।बलवंत ने तुरंत बच्चे को उठा कर अपनी छाती से लगा लिया !
  

Sunday, 5 January 2014

Pension...!

सरदार जरनैल सिंह ,उम्र करीब ८०  वर्ष ,अपनी साइकिल पर चक्कर लगाते हुए गॉंव के हर घर के आगे रुकता ,एक सन्देश देता और आगे की और चल देता। अपने घर के बाहर प्यारा सिंह को बैठे देख जरनैल सिंह ने वहाँ भी अपनी साइकिल को ब्रेक लगाई और दूर से ही प्यारा सिंह को सन्देश देने लगा। प्यारे के साथ ही बैठी उस की पत्नी को जरनैल सिंह की बात समझ नहीं आई।गॉंव में सभी प्यारा सिंह और उसकी पत्नी को चाचा चाची कह कर पुकारते हैं।चाची ने तुरंत प्यारे को हिलाते हुए कहा ,"देखियो जरनैल क्या कह रहा है। "प्यारा सिंह को ऊँचा सुनने लगा था और धूप सेंकते सेंकते उस की आँख लग गई थी। पत्नी की ऊँची आवाज़ से प्यारा जैसै अचानक नींद से जगा। इस से पहले कि प्यारा कुछ समझ पाता प्यारे की पत्नी ने अपनी बात दोहराई। प्यारे ने जरनैल की और देखा।जरनैल ने भी अपनी बात दोहराई।  इस बार भी प्यारे की पत्नी को जरनैल की बात समझ नहीं आई। लेकिन प्यारे को जरनैल की बात समझते देर ना लगी। बेशक़ वो ऊँचा सुनता था। बात समझ आते ही प्यारे के चेहरे पर जैसे बिजली सी चमक गई।

प्यारे ने अपनी पत्नी को कहा ,"जरनैल कह रह्या के पिल्सन आ गई है। " यह सुनते ही चाची की भी जैसे बांछें खिल गई। शहर से आई चाचा चाची की भतीजी याशिका को उनकी बात समझ नहीं आई और वो उनकी और आश्चर्य से देखने लगी। साथ ही बैठे उसके मामा ने याशिका की और देखा और समझाते हुए बोले ,"बेटा, सरकार की और से बुजुर्गों को हर महीने बुढ़ापा पेंशन दी जाती है। " मामा की बात सुनते ही पिल्सन और पेंशन के मायने याशिका को समझ आ गए।

धीरे धीरे गॉंव के सभी बुज़ुर्ग प्यारे चाचे के घर के आगे जमा होने लगे। पेंशन बंटने की ख़बर गॉंव में आग की  तरह फैल चुकी थी। घुटनों में दर्द की आम शिकायत के बावजूद सभी बुज़ुर्ग प्यारे के घर की और ऐसे भाग रहे थे मानो सारा दर्द फुर्र हो गया हो। हो भी क्यों न तीन महीने के बाद जो पेंशन बंटने जा रही थी।पेंशन बांटने वाला अभी वहाँ पहुंचा नहीं था। निंदा रस की चासनी के साथ बहु और बेटों की कहानियों और किस्सों को एक दूसरे के साथ बांटा जाने लगा।

याशिका इन किस्से कहानियों को बहुत गौर से सुन रही थी। उसने मुस्कुराते हुए अपने मामा की और देखा। मामा ने धीरे से कहा ,"यही हर घर की कहानी है। कोई अपनी बहु तो कोई अपने बेटों से परेशान है। असल में ८०० रूपए प्रति माह मिलने वाली इस पेंशन से ये बुज़ुर्ग अपने आप को आत्म निर्भर महसूस करने लगते हैं। अपनी छोटी मोटी ज़रूरतों को पूरा कर लाते हैं। आज तो इन को तीन महीने की पेंशन इकठ्ठा मिलने वाली थी। "

इतने में प्यारे चाचा के सात  साल के पोते ने वहाँ प्रवेश किया और चॉकलेट खाने कि ज़िद करने लगा। प्यारे ने अपनी फतूही की जेब में से एक पोटली को खोला और अपने पोते को चूमने के बाद १० रूपए का नोट उसे थमा दिया।इस से पहले के प्यारा चाचा अपने पोते को ये कहता के ध्यान से जाइयो पुत्तर अभिराज सामने की दुकान पर चॉकलेट खरीदने के लिए पहुँच चुका था।

 मुझे पेंशन से मिलने वाली ख़ुशी के मायने समझ आ चुके थे !   

Saturday, 4 January 2014

MEHAR HAI UPPAR WAALAY KI........!

 हरियाणा ,ज़िला अम्बाला ,गॉंव मण्डौर। ससुराल है मेरा मण्डौर। शहर से करीब २ किलोमीटर की दूरी पर है गॉंव मण्डौर। मॉडल विलेज /आदर्श गॉंव होने के कारण शहरों जैसी सभी सुविधायें हैं इस गॉंव में। पक्की सड़कें ,रात में जलने वाली स्ट्रीट लाइट्स ,व्यवस्थित सिवरेजे सिस्टम ,एक शानदार हर्बल पार्क ,पंचायत घर ,खुले- साफ सुथरे घर और गलियां ,बारात घर ,मिनी स्टेडियम, पशुओं के लिए स्विमिंग पूल की तरह शानदार जोहड़ और सुचारु जल व्यवस्था। क्या क्या नहीं है इस गॉंव में। अगर नहीं है तो शोर शराबा और प्रदूषण।

जनवरी का महीना और कड़ाके की सर्दी का दिन है आज। सर्दी के कारण सूर्य देव के दर्शन सुबह थोड़ी देर से हुए। धूप सेंकने के लिए घर के सामने हर्बल पार्क में चला गया। बिल्कुल शांत वातावरण। पार्क के दूसरे कोने पर जब मेरी नज़र गई। वहाँ दो लोग जोगेंदर और रणधीर पार्क के रखरखाव में मग्न थे। जब मैं उनके नज़दीक पहुंचा तो दोनों काम रोक कर खड़े हो गए। दोनों से दुआ सलाम के बाद मैंने उनके परिवार का हालचाल पूछा तो दोनों एक साथ बोले ,"मेहर है जी ऊपर वाले की ।" दोनों संतुष्ट नज़र आ रहे थे।

गॉंव के लोगों की ये खासियत होती है के एक बार बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ नहीं के उन्होंने सारे परिवार की जानकारी हासिल कर के ही दम लेना है। दौरे बातचीत का सिलसिला चला ही था के गॉंव का ही एक युवा सिम्मी किसी की माँ बहन एक करता हुआ हमारी टीम  में शामिल हो गया। उसने जोगेंदर रणधीर को मुख़ातिब होते हुए अपनी बात जारी रखी ,"चाचा ठेकेदार नू यू चेक दे कै अपने पीसे ले आओ। "सिम्मी की बात सुनते ही जोगेंदर बोला ,"यू ठेकेदार नै मार दिए हम तो। चार चक्कर तो पहले मार लिए। पहलां ई  दे देंदा यो पिसे। "ठेकेदार से किसी पेमेंट के बारे में बातचीत की इन लोगों ने।

दोनों के चेहरे जैसे दमक उठे। जोगेंदर और रणधीर दोनों ठेकेदार को मिलने के लिए अपने साइकिल पर बैठ कर तुरंत रवाना हो लिए। पार्क में अब मैं और सिम्मी रह गए। सिम्मी बोला ,''सरकार ने इन को पार्क के रखरखाव के लिए ठेके पर रखा हुआ है।सिर्फ ४००० हज़ार रूपए महीना मिलते हैं इनको। पिछले तीन महीने से पगार नहीं मिली है। आज अक्टूबर महीने की  तनख्वाह मिलेगी। अब आप ही बताओ कैसे गुज़ारा करते होंगे ये बेचारे !  अपने सवाल का ख़ुद जवाब देते हुए वो फिर बोला ,"ये तो गॉंव में कोई खर्चे नी हैं ,बच्चे सरकारी स्कूल में पड़ते हैं ,बस इसी लिए गुज़ारा चल जाता है। "

इसी बीच सिम्मी के मोबाइल की घण्टी बज गई ,वो फिर से गालियां निकालने लगा। जोगेंदर और रणधीर के पहुंचने से पहले ही ठेकेदार अपने किसी ज़रूरी काम से कहीं चला गया था।

मैं उन दोनों द्वारा मिलने के समय कहे शब्दों को दोहराने लगा ,''मेहर है ऊपर वाले की !"



     

Friday, 3 January 2014

HURRY UP...!

मेरा ख्याल है के हम सब जल्दी नामक बीमारी से ग्रस्त होते जा रहे हैं। जो कुछ भी कर रहे हैं----------सब जल्दी जल्दी। अपने आसपास नज़र दौड़ायें तो लगेगा जैसे सब भागमभाग में फंसे हुए हैं।अब देखिए अगर आप शादी शुदा हैं ,बच्चे स्कूल जाते हैं और अपनी बीवी की तरह आप भी नौकरी करते हैं तो आप के दिन की शुरुआत कुछ इस तरह होगी।

"अर्रे आज ऑफिस जल्दी जाना था और आज ही आँख लेट खुली।" उठते ही सब कुछ जल्दी जल्दी करने लगते हैं हम। "बेटा जल्दी उठो वर्ना स्कूल  बस निकल जायगी। पापा आज आप को स्कूल छोड़ने नहीं जा सकते ,उन्हें भी जल्दी निकलना है। आप भी जल्दी नहा लो ,नाश्ता तैयार है ,कहीं आप भी लेट न हो जाएं।" सुबह से लेकर शाम तक सब कुछ जल्दी।शाम को किसी बस स्टॉप पर फ़ोन बतियाते ये बातचीत आम हो गई है-------मैं कब से इंतज़ार कर रही हूँ ,जल्दी आओ।  रात को बिस्तर में जाने के बाद भी माँ की ये आवाज़ एक बारगी तो बच्चे के कान में ज़रूर गूंजती है-------"बेटा जल्दी सो जाओ ,सुबह स्कूल जल्दी जाना है।"

जीवन में सब कुछ जल्दी होने लगा है। शायद इस वजह से आदमी की बिदाई भी जल्दी होने लगी है।  उम्र कम होने लगी है आदमी की। क्या रिश्ते और क्या राजनीति----------सब कुछ जल्दी। आज कल झट मंगनी पट बयाह का तो जैसे फैशन सा हो गया है। शायद इसी कारण रिश्ते कमज़ोर होते जा रहे हैं।

 अब देश की राजनीति पर नज़र दौड़ायें तो वहाँ भी सब जल्दी जल्दी हो रहा है। अन्ना चाहते थे लोकपाल बिल जल्दी पास हो। केजरीवाल जल्दी समझ गए के राजनीति में घुसे बिना कुछ सम्भव नहीं।  जल्दी  जल्दी  के चक्कर में अन्ना के आंदोलन की हवा निकल गई और रालेगन सिद्धि वापिस जाना पड़ा।

 केजरीवाल ने आप पार्टी बना ली। लोगों ने इलेक्शन में कितनी जल्दी आप पार्टी को सता के नज़दीक पहुंचा दिया। केजरीवाल ने कितनी जल्दी से मुख्य मंत्री की कुर्सी हासिल कर ली।कमाल तो देखिये "आप" की सरकार का-----  कितनी जल्दी दिल्ली में पानी माफ कर दिया और बिजली की दरें भी आधी कर दी।लोगों को इस का फायदा कब मिलेगा ये भी जल्दी ही पता लग जायगा।

  विपक्षी पार्टियॉ को तो जैसे मुद्दा मिल गया है ! भाजपाई जल्दी में हैं के आप की सरकार गिरे और उन्हें दिल्ली में सता हासिल हो।  वहीँ कांग्रेस ने आप से जल्दी जल्दी इस लिए हाथ मिला लिया ताकि आप जल्दी से हर मोर्चे पर फ़ैल हो जाये और लोकसभा चुनावों के बाद राहुल को भी जल्दी जल्दी प्रधानमंत्री की कुर्सी का स्वाद चखाया जा सके।    

अब मुझे ही देखिए ३१ दिसंबर २०१३ को एक ब्लॉग लिखा "IMAGES.....2013" जल्दी में लिखा ताकि जल्दी पूरा करके नववर्ष से पहले ही पोस्ट कर सकूं।दलजिंदर ने जालंधर से फ़ोन कर ब्लॉग में अपना नाम गायब होने पर अपनी नाराज़गी जताई। वहीँ मुम्बई से मोहिंदर ने अपने बारे एक लाइन में समेटने पर  कमेन्ट किया। मुझे भी लगा जैसे जल्दी के चक्कर में बहुत कुछ छूट जाता है।

 सहज पक्के सो मीठा होए वाली कहावत में कितना दम है ये सब आप ख़ुद तय करें ! 

Thursday, 2 January 2014

A COMMON MAN........ EK AAM AADMI

सन १९४७ और २०१४ के केलेंडर को बिल्कुल एक बताया जा रहा है। आज़ादी के ६६ बरस बाद भी स्थितियां जस की तस हैं।देश की आज़ादी के समय लोगों को उम्मीद की एक किरण नज़र आई थी उन्हें लगा था के अब वो खुली हवा में सांस ले पायेंगे।आज जिस तरह आम आदमी पार्टी ने देश की राजधानी में राजनितिक परिवर्तन कर अपना धावा बोला है उससे पुनः आम आदमी को उम्मीद जगी है। अन्यथा  आज़ादी से पूर्व देश की जनता सफ़ेद चमड़ी वालों की ग़ुलाम थी तो अब सफ़ेद पोश नेताओं के चंगुल में फँसी नज़र आ रही है।

 २०१४ की शुरुआत में भी सन १९४७ वाली रौशनी नज़र आई है। देश कि राजधानी दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हुआ है और आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है उससे तो ऐसा लगने लगा है के लोकतंत्र लौट आया है और हम असल आज़ादी के नज़दीक हैं। १९४७ का इतिहास दोहराने का समय लौट आया है क्यों कि आम चुनाव इसी बरस २०१४ में होने  हैं।

 जिसे हम  आम आदमी कहते हैं वो असल में किसी भी देश की शक्ति है। ये आम आदमी ही है जो अपनी मेहनत ,लगन ,बहादुरी और शक्ति से हर ड्रीम प्रोजेक्ट की नींव रखने से लेकर पूरा करने का काम करता है। हम क्यों भूल जाते हैं के पहाड़ों से रास्ता बनाने,ज़मी से पानी निकालने ,धरती पर सोना उगाने ,बड़ी से बड़ी बिल्डिंग्स की नींव से छत डालने ,फैक्टिरियों में अपना पसीना बहा कर देश को इकनॉमिकली सुदृढ़ बनाने वाला आम आदमी ही है।

ये विडम्बना ही है के देश की आज़ादी के ६६ साल बाद भी ये मेहनतकश आम आदमी की स्तिथि ज्यों कि त्यों बनी हुई है।स्तिथि  सुधारना तो दूर की बात बल्कि बिगड़ी ही है। देश के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान पैदा करने वाला ये आम आदमी आज भी इन सब से वंचित है।मानव संसाधन को सुदृढ़ करने वाले दो मुख्य कारक शिक्षा और स्वास्थय तो जैसे दूर की कोड़ी हैं।   


गरीबी, भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी ,महंगाई ,लूटेरी कानून व्यवस्था ,अपंग स्वास्थय सेवा ,खड़खड़ाता  ट्रांसपोर्ट क्षेत्र , अनपढ़ शिक्षा प्रणाली ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें सिरे से दुरुस्त करने की  ज़रुरत है। जिधर भी नज़र दौडाओ कहीं कुछ व्यस्थित नज़र नहीं आता।किसी भी तरक्की के लिए ये ज़रूरी है के उसका मानव संसाधन मज़बूत हो। उसकी  मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के साथ साथ स्वास्थय और शिक्षा की और सुधार किए जाऐं।

क़ानून पास करने पर ज़ोर देने की बजाय उस को लागू सही ढंग से किए जाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। तभी शायद आम आदमी अपने को ठगा हुआ महसूस नहीं करेगा। राजनीतिक पार्टियों को भी अब ये समझ लेना होगा के वो जिसे आम आदमी समझते हैं वो शक्तिविहीन नहीं है। उसे यदि सही दिशा ,विचार और मार्गदर्शक मिल जाए तो वो असम्भव को भी सम्भव बना सकता है।

 शिक्षा का अधिकार एक विशेष चैलेंज है।मिड डे मील के ज़रिए फ्री खाना खिलाने ,मुफ़त किताबें बांटने , फ्री लैपटॉप देने या फिर प्राइवेट स्कूलों में आरक्षण से समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता। यही नहीं प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को आरक्षण की घोषणा मात्र से ही सभी शिक्षित नहीं हो जाएंगे।ज़रुरत तो शिक्षा के ढांचे में बदलाव की है।

प्राइवेट स्कूलों में आरक्षण के ज़रिए  दाखिला दिलवाने की सरकार की हठ से एक नई चुनौती आन खड़ी हुई है। हर माँ बाप अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहता है। फ्री शिक्षा के कारण मेह्नतकश माँ बाप का रुझान इस और बढ़ा है। कौन माँ बाप नहीं चाहता के उनके बच्चे पढ़ लिखकर अपने पाँव पर खड़े हों या फिर कोई बड़ा अफसर बने। वे ख़ुद अनपढ़ता का दंश आखिर  झेल चुके हैं।

हाल ही में शहर के दो नामी गिरामी स्कूलों में पढ़ने वाली पाँचवीं की बच्चियां जब शाम तक घर नहीं पहुँची तो हड़कम्प मच गया।दोनों के पिता किसी फैक्ट्री में मज़दूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे थे। इसी वर्ष जब उन्हें राइट टू एजुकेशन के बारे में पता चला तो दोनों ने अपनी बच्चियों को सरकारी स्कूल से निकाल कर शहर के नामी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिल करवा दिया।

दोनों अपने बच्चों को हर रोज़ स्कूल छोड़ कर आते और वापिसी दोनों ख़ुद आ जाती। दोनों फूले  नहीं समाते। जो कोई भी मिलता इस बात की चर्चा ज़रूर करते के उन की बच्चियां इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती हैं। बच्चियां जब देर तक घर नहीं लौटी तो इस की सूचना पुलिस को दी गयी। लड़कियों का मामला था। पुलिस भी तुरंत हरकत में आ गयी। घर पर माँ का रो रो कर बुरा हाल था। मन में बुरे बुरे विचार आने लगे। ना जाने बच्चियां कहाँ होंगी।

आखिर बच्चियों को खोज निकाला गया। दोनों शहर से दूर किसी गाँव में स्टापू खेलते हुए मिली। दोनों बच्चियां दुनिया से बेफ़िक़र् पूरी मस्ती से वहाँ खेल रही थी। जब उन से भागने का कारण पूछा गया तो दिल दहला देने वाले तथ्य सामने आए। वो अब कभी इंग्लिश मीडियम स्कूल में नहीं जाना चाहतीं  थीं। क्यों कि बड़े घर के बच्चे उन्हें हीन भावना से देखते और प्रताड़ित करते थे।वहाँ उनसे कोई बात नहीं करता था। यही नहीं स्कूल के टीचर भी उनसे भेदभाव करते थे। घर पर उन्हें कोई पढ़ाने वाला नहीं था और प्राइवेट ट्यूशन के लिए माँ बाप के पास पैसे नहीं थे।

ये कहानी इन दो बच्चियों की नहीं बल्कि सड़े और अव्यवस्थित सिस्टम की है।यहाँ ज़रुरत है ज़मीनी स्तर पर समस्या को समझने और ढांचागत वयवस्था में सुधार की । ताकि एक विचार से समाज में सम्भाव  लाया जा सके !