Tuesday, 30 September 2014

SAFAI ABHIYAN

    पूरे देश में इस बात की चर्चा है के गांधी जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री इस बार स्वयं झाड़ू लगा कर "सफाई अभियान " की शुरूआत करने जा रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री अगर झाड़ू लगाएं तो जन जन का भी ये दायित्व बनता है के वो भी देश को साफ़ सुथरा रखने के लिए इस अभियान में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें। ऐसा नहीं के ये पहली बार हो रहा है। जब जब बापू का जन्म दिवस आता है इस तरह के आयोजन सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा किए जाते हैं।
लेकिन इस बार बात कुछ अलग है। क्योंकि ख़ुद प्रधानमंत्री झाड़ू लगाने जा रहे हैं। सभी वर्ग के लोगों में इस बात को लेकर चर्चाओं का सिलसिला शुरू हो चुका है। सभी अपने अपने ढंग से इस पर अपने विचार रख रहे हैं। लेकिन सरकारी तबके के लोगों में इस विषय को लेकर कुछ चिंता का माहौल है। सरकारी महकमों में इस बात की सुगबुगाहट है के यदि प्रधानमंत्री झाड़ू लगा रहे हैं तो उन्हें भी झाड़ू लगाने के आदेश आ सकते हैं।
नमालूम इस को लेकर सरकारी फरमान जारी हुआ या नहीं लेकिन सरकारी अवकाश रद्द किए जाने की ख़बर आग की तरह फ़ैल चुकी है। "सरकारी अवकाश" की कुर्बानी पर इस "सफाई अभियान" के मायने उन्हें समझ नहीं आ रहे हैं।
सरकारी तबका मायूस है !

STATUE OF MAHATMA

       कल  2 अक्टूबर  को महात्मा गांधी का जन्म दिवस है।
                    झाड़ू लगने शुरू हो गए हैं। फोटोज़ अपलोड होने लगी हैं।
                  एक अरसे के बाद बुतों को साफ़ किया जा रहा है । साफ पानी से नहलाया जा रहा है।     
                  कल महात्मा के बुतों पर मालार्पण के लिए होड़ लगी रहेगी।
                   सड़कों ,बाज़ारो ,मोहल्लों और गलियों में झाड़ू लगाए जाने की प्रतिस्पर्धा सा माहौल होगा । 
                   फोटो खिंचवाए जाएंगे। देश को साफ सुथरा बनाए रखने की कसमें खाई जांएगी। 
                  अख़बारों की सुर्खियां भी यही होंगी। 
                   इस बार लोगों में जोश कुछ ज़्यादा है। देश के प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत का नारा जो दिया है।
                  लोगों को लग रहा है के महात्मा आज खुश होंगे। 
                  "महा आत्मा" आज भी दुःखी और आहत है !
                 क्योंकि सड़कों -गलियों को साफ़ करने के साथ बहुत सारे ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ सच में
                 सफाई की ज़रुरत है।  असल में ज़रुरत है मनोवृती बदलने की। 
                 अगर मनोवृती शुद्धिकरण लोगों के " बूते" की बात नहीं है तो देश को हर रोज़ साफ़ करने के 
                कस्मे वायदे तो बरसों से सुनते आ रहे हैं !
              
             

Sunday, 28 September 2014

NAQAAB

कबीर का बाप राम सिंह पिछले 35 वर्षों से इसी शहर की पटरी पार बस्ती में रह रहा था। हर तबके के लोगों में उठना बैठना था उसका। चुनाव के दिन चल रहे थे। सभी राजनीतिक पार्टी के लोग जानते थे के अगर रामसिंह हामी भर दे तो अच्छी खासी वोटों पर कब्ज़ा किया जा सकता है।
हालांकि राम सिंह ने कभी किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष को तवज्जो नहीं दी थी। फिर भी सभी पार्टीयों  के लोग उसकी चोखट पर माथा ज़रूर टेकते। सभी जानते थे के वो अपने मताधिकार का प्रयोग करने के साथ अपने सभी साथियों को वोट डलवाने के लिए ज़रूर ले जाता था। जहाँ और जिस पार्टी को वोट डालने के लिए राम सिंह बोल देता वो पत्थर पर लकीर की तरह होता। बस्ती के सभी लोग वहीं वोट डालते जहाँ राम सिंह बोल देता। किसी की क्या मज़ाल के कोई भी बस्ती के लोगों की वोट खरीदने की कोशिश करे।
राम सिंह सच बोलने से कभी डरता नहीं था। नेताओं को वो मौका परस्त ,गिरगिट ,लूटेरे ,डाकू , मतलबी , नकाबपोश और न जाने किस -किस नाम से सम्बोधित करता। जब भी कोई राजनीति पर बात करता तो वो शहर की दुर्दशा की दुहाई देते हुए उन्हें ज़रूर लताड़ता।लेकिन कोई भी उसकी बात का बुरा न मानता।
इस बार फिर सभी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रामसिंह के द्वार पर दस्तक देनी शुरू कर दी थी। लेकिन इस बार राम सिंह कुछ बदला बदला नज़र आ रहा था। जब भी कोई वोट मांगने के लिए उसके द्वार पर आता ,वो हंस कर उसका स्वागत करता। जो भी आता उसी को वोट डालने की हामी भर देता। शायद इस बार राम सिंह ने भी नेताओं की तरह अपने चेहरे पर नक़ाब डाल लिया था। यही कारण था किसी को भी अब तक अंदाज़ नहीं हुआ था के ऊंट किस करवट बैठने वाला है। राम सिंह ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले थे।
35 साल के तज़ुर्बे से राम सिंह को इतना तो समझ आ ही गया था के सत्ता हाथ आने के बाद सभी नेता नपुंसक की तरह हो जाते हैं। जो चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकते। उनके पास कुछ रह जाता है तो बस वायदे और केवल वायदे। मतदान को एक दिन बाकी था। राम सिंह ने सब साथियों को बुलाया और लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोटिंग मशीन पर छपे नए बटन "NOTA"(not other than above) के बारे में बताया।  सभी राम सिंह की बात सुन कर अपने अपने घरों की ओर चल दिए।
रात को सहसा शोर सुन कर राम सिंह ने खिड़की से बाहर झाँका तो दंग रह गया। बस्ती के लोग वहां खड़े एक ट्रक से चावल ,दाल ,गेहूँ ,शराब और रोज़मर्रा काम आने वाले सामान को उतार कर अपने -अपने घरों में रखने में मशगूल थे। राम सिंह सभी को रोकने की कोशिश करने लगा। लेकिन किसी पर भी राम सिंह की बातों का कोई असर नहीं हो रहा था।
राम सिंह को समझ आ चुका  था के बस्ती वालों ने भी अपने चेहरों पर नक़ाब पहन लिया है। 

Thursday, 25 September 2014

A LETTER... EK CHITHEE PART-20


                                                                      "पुस्तक मेला "
दोस्तों नमस्कार !
ये आप को मेरी 20 वीं चिठ्ठी है। उम्मीद करता हूँ के आप मेरी चिठियां ज़रूर पढ़ रहे होंगे। वैसे आज कल लोगों का ये मानना है के चिठियों के दिन लद चुके हैं। इंटरनेट ,व्हाट्स एप्प और फेस बुक के इस युग में चिठ्ठी outdated हो गई है। लेकिन मेरा मानना है के चिठ्ठी में जो अपनापन ,संवेदना और संजीदगी है वो फेस बुक या व्हाट्स एप्प में नहीं है। मैंने तो आज भी अपने दोस्तों, रिश्तेदारों की बहुत सारी चिठियों को सहेज कर रखा हुआ है और जब भी समय मिलता है मैं उन्हें बांचने बैठ जाता हूँ। फुर्सत के पलों में चिठियां बांचते हुए बीते हुए दिनों का जो चलचित्र उभर कर आता है उस एहसास को बयां करना शायद बहुत कठिन है।
चिठियों की तरह पुस्तकों के बारे में भी बहुतेरे लोगों का ये मानना है के इस ओर रुझान कम हुआ है। लोगों का मानना है के इलेक्ट्रॉनिक और इंटरनेट के इस युग में किताबें लोगों की मित्र नहीं रहीं खासतोर पर बच्चे किताबों से दूर भागते हैं। मैं तो इस बात से भी इत्तफ़ाक़ नहीं रखता। मेरा तो ये मानना है के पुस्तकों की importance कभी भी कम नहीं हो सकती। बेशक़ सरिता ,धर्मयुग ,चंपक ,फेंटम ,लोटपोट या चाचा चौधरी सरीखी किताबें बाज़ार से गायब हो गई हों।
पिछले दिनों स्कूल में एक पुस्तक मेले का आयोजन किया था। बच्चों का किताबों के प्रति रुझान देखते ही बनता था। उनके चेहरे ये साफ़ बयां कर रहे थे के वो सब किताबें खरीद लें। दरअसल competition के इस युग में  हम ने बच्चों को स्वयं उस तोते की तरह बना दिया है जिसे बंद पिंजरे में रहने की आदत सी हो गई है और वो चाहते हुए भी बाहर की दुनिया से कोई वास्ता नहीं रख पाता। हम ने खुद उनके सपनों को पिंजरे में बंद कर दिया है।
निःसंदेह आज समय और संस्कृति दोनों बदल रहे हैं। हमें ये कतई नहीं भूलना है के सृजन सपनों से ही होता है। इसलिए आज समय की मांग है कि हम बच्चों को सपने बुनने दें ताकि वो दुनिया को अपने  नज़रिये से देखें ,सोचें ,समझें और बुनें।
चलते -चलते बता दूँ के बीते साल की तरह इस बार भी एक कॉलेज में नाटक करवा रहा हूँ। रिहर्सल शुरू हो चुकी है। अगस्त महीना बहुत  busy रहा। अगली चिठ्ठी में पिछले महीने के कुछ खट्टे मीठे संस्मरणों के साथ जल्द ही आप से फिर भेंट करने के साथ आप से विदा लेता हूँ।
"बाकी रब्ब राखा !" 

Monday, 22 September 2014

 टू टूज़ा फोर और ए फॉर एप्पल वाली पद्धति शायद अब पुरानी हो गई है।शिक्षा प्रणाली में बदलाव की ज़रुरत है। 

Saturday, 20 September 2014

"Ek Sawaal"

                                                                "पुतले"
दियों से हम बुराई के प्रतीक "रावण "का पुतला फूंकते आ रहे हैं !
 इस बार फिर तैयारी चल रही है, पुतले बनाए जा रहे हैं।
 हम पुतले बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते।
लेकिन हम इन पुतलों को फूंकने की औपचारिकता भर करते हैं।
 क्या ऐसा नहीं हो सकता के हम पुतले बनाएं ही न ताकि हमें इन्हें फूंकने की औपचारिकता न करनी पड़े ?

Friday, 19 September 2014

Aazaadi

देश को आज़ाद हुए लगभग 67 वर्ष बीत चुके हैं। पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो बहुत कुछ बदल गया है।हालाँकि देश ने पिछले सालों में खूब तरक्की की है।मेरा भारत महान के नारे भी लगते रहे हैं। लेकिन अभी भी बहुत सारी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें चुस्त दुरुस्त करने की ज़रुरत है। 15 अगस्त 2014 आज़ादी की पूर्व संध्या पर ये ब्लॉग लिख दिया था। लेकिन पोस्ट नहीं कर पाया। आज इसे पोस्ट कर रहा हूँ  ……………………… 
रोज़गार के लिए गांव से लोग शहरों में बसने लगे हैं। शहरों के लोग गांवों में बसना चाहते हैं।
जनसँख्या लगातार बढ़ती जा रही है। विश्व में दूसरा स्थान है हमारा। जानकारों का कहना है अगर इसी तरह जनसँख्या बढ़ती रही तो हम जल्द ही चीन को पछाड़ कर नम्बर एक हो जाएंगे।
कुछ साल पहले तक भी माहौल शांत था। आजकल इतनी गाड़ियां हो गई हैं आम आदमी का सड़कों पर चलना ही मुश्किल हो गया है। शोरशराबे और वायु प्रदुषण के कारण लोगों में हाइपर टेंशन ,माइग्रेन  जैसी बीमारियां आम हो गई हैं। यही नहीं कैंसर और हार्ट अटैक के लिए भी प्रदुषण मुख्य कारक है।
भ्रष्टाचार का तो पूछो ही मत। यह पूरी तरह से हमारी संस्कृति में रच -बस गया है । अफसरों से लेकर राजनेता तक सब इस का रसपान करना अपना धर्म समझते हैं। एक राशन कार्ड ,ड्राइविंग लाईसेंस ,या कोई भी सरकारी काम हो आपको बाबू लोगों की मुट्ठी बंद करनी ही पड़ती है। घूसखोरों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।
दलालों की कोई कमी नहीं है हमारे देश में। कोई काम हो ,सरकारी ठेका हो या फिर कोई खरीद -फरोख्त आप को दलाल की ज़रुरत पड़ती ही है। वर्ना आप की फ़ाइल दबी रहेगी और धूल फांकती रहेगी।
गरीबी और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। रोज़गार के लिए कोई ठोस नीति सरकार के पास नहीं है। गरीब और अमीर के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।
राजनेता और धर्म के ठेकेदार विभाजन को अपने अस्त्र की तरह प्रयोग करते हैं। ये लोग आज भी धर्म /जाति के नाम पर समाज को दो फाड़ करने में कतई नहीं चूकते हैं।
कानून अँधा होता है इस के मायने देश की कानून व्यवस्था को देख कर कोई भी लगा सकता है। हर रोज़ लूट , हत्या ,बलात्कार के समाचार देश के लोगों के लिए आम हो गए हैं। पुलिस को आम आदमी "वर्दी वाला गुंडा" कह कर पुकारता है।  
शिक्षा समय के साथ साथ महंगी और निरर्थक हो गई है। युवा डिग्री हासिल तो कर लेता है परन्तु कर्म क्षेत्र में पहुँचते ही डिग्री युक्तिहीन हो जाती है।
सरकारी तंत्र को तो जैसे दीमक ने खोखला कर दिया है। मानव संसाधन को चुस्त दुरुस्त करने के लिए सरकार कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती है ये कोई समझ नहीं पाया है। शिक्षा ,स्वास्थ्य ,दूरसंचार ,दूरदर्शन ,ट्रांसपोर्ट ,सीवरेज ,सड़कें आदि क्षेत्र चरमराये हुए हैं।
क्या आप को भी देश की व्यवस्था और कार्य प्रणाली " नाम बड़े और दर्शन छोटे " की तरह नहीं लगती हैं ?
 क्या इसी का नाम आज़ादी है ?
   क्या सब कुछ इसी तरह से चलता रहेगा ?
  

Monday, 15 September 2014

HANUMAAN KI SENA


घर के सभी लोग टी वी पर रामायण देखने में व्यस्त थे। 7 - 8 साल का नन्हां कबीर अपनी दादी की गोद में बैठा था। वो बार बार अपनी दादी माँ का पल्लू खींच कर कोई सवाल पूछना चाह रहा था। लेकिन दादी माँ चुप करवा देती। कमर्शियल ब्रेक में दादी माँ ने कबीर की और मुखातिब होते हुए पूछा ,"हाँ अब बता क्या पूछना है तुझे ?" कबीर बोला ,"दादी माँ , वो बन्दर कौन था जो अपनी पूँछ पर आग लगा कर सब कुछ जला रहा था ?" दादी माँ झल्ला कर बोली ,"बेटा ऐसा नहीं बोलते। ये वानर राज भगवान हनुमान हैं और बाकी सभी वानर हनुमान की सेना ! इन्होंने ही मैय्या सीता को बचाने में भगवान राम की सहायता की थी।"
 दादी ने आगे बताया के कल घर में हनुमान चालीसा का आयोजन किया जाएगा। अगले दिन घर में हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। सभी पूजा पाठ  में व्यस्त थे। अचानक बाहर शोर हुआ और सभी बाहर की ओर भागे। रसोई में बन रहे प्रसाद पर बंदरों के एक झुण्ड ने धावा बोल दिया था। कोई लाठी तो कोई बम बजा कर बंदरो को डराने लगा। सभी शोर मचाकर बंदरों को भगाने लगे।
कबीर दादी माँ के पल्लू को पकड़ कर ये सब नज़ारा देख रहा था। उसने दादी माँ का पल्लू खींचा । दादी ने कबीर की ओर देखा तो कबीर तुरंत बोला ," दादी माँ ,ये तो प्रभु राम भक्त हनुमान की सेना  है न ! फिर सभी इस को भगा क्यों रहे हैं ?"
दादी माँ के पास कबीर के प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। 

Sunday, 14 September 2014

PATENT

धर्म संसद में युद्ध छिड़ गया है.………… !
अपने -२ भगवान को बचाने का संकट आन पड़ा है। 
अब तो भगवान को पूजने के लिए भी मंज़ूरी लेनी पड़ सकती है। 
 अब समय आ गया है के अपने अपने भगवान का "पेटेंट " करवा लिया जाए ताकि भविष्य में किसी तरह की कोई दिक्कत न झेलनी पड़े

Friday, 12 September 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-19

दोस्तों नमस्कार।
मैं आप से खूब बातें करता रहता हूँ।  इस बार सोचा के क्यों न ये जाना जाए के आप के मन में क्या चल रहा है।
क्या आप ने कहीं पढ़ा या सुना है के स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में सार्वजानिक जगहों पर धुम्रपान करने पर लगाए जाने वाले जुर्माने को २०० से बढ़ा कर २०००० रूपए का प्रस्ताव दिया है। ये एक अच्छा निर्णय है या आप को प्रजातंत्र में तुग़लकी फरमान जैसा लगता है ? ये आप खुद तय करें !
 हरयाणा के विधान सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। हरयाणा हमेशा दल बदलूओं के लिए मशहूर रहा है। लोकसभा में भाजपा की सुनामी क्या चली दूसरे दलों के नेताओं को जैसे अपनी पार्टी से एलर्जी होने लगी। हरयाणा के नेताओं ने तो कमाल ही कर दिया है इधर से उधर पाला इस तरह बदल रहे हैं मानो उनके लिए राजनीति का मतलब केवल सत्ता हासिल करना हो। जनता की उन्हें कोई चिंता नहीं। ऐसे में इन जैसे लोगों को वोट देना चाहिए या नहीं ? ये आप खुद तय करें !
पांच वर्ष पूर्व  ( सी। बी। एस। ई। ) सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ स्कूल एजुकेशन द्वारा सी। सी। ई। प्रणाली को शुरू किया गया था। मकसद केवल एक था के बच्चों को बस पास होना चाहिए। बेशक़ वो जीवन की परीक्षा में फेल हो जाए। उस समय खूब हो हल्ला मचा के इस से शिक्षा का स्तर गिर जाएगा।  अब समाचार ये है के पहले की तरह दोबारा वार्षिक परीक्षा होंगी। अब पास वही होगा जो किताबों को पढ़ कर लिखने में सक्षम होगा। हमारी शिक्ष प्रणाली ठीक है या गलत ? ये आप खुद तय करें !
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में तापी नदी ने जिस तरह से प्रकोप बरपाया है उससे तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति को अपने साथ अब और छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं है। ये तो हम सब जानते हैं के आपदा कभी दस्तक दे कर नहीं आती परन्तु देश के अलग अलग भागों में जिस तरह प्राकृतिक विसंगतियां होने लगी हैं ये  बिल्कुल दस्तक  देने जैसा ही है। इस सब के लिए दोषी कौन है ? ये आप खुद तय करें !
एक जर्मन कवि फ्रेडरिक होल्डरलिन ने लिखा है ," धरती इस लिए नरक बन रही है ,क्योंकि मनुष्य इसे अपना स्वर्ग बनाने  कोशीश कर रहा है।" हम इस धरती को स्वर्ग बना रहे हैं या नरक ? ये आप खुद तय करें !
अच्छा दोस्तों फिर मिलते हैं। कुछ तय कर लें तो मुझे ज़रूर बताइएगा !

Saturday, 6 September 2014

A LETTER .. EK CHITHEE PART-18

दोस्तों नमस्कार।
लिखने को तो "बहुत कुछ " है पर जीवन की भागमभाग में जैसे बहुत कुछ छूट सा जाता है।इसी वजह से ये चिठ्ठी लिखने में कुछ देरी भी हो गई। लेकिन ये चिठ्ठी लिखना एक ऐसा माध्यम बन गया है के इसके लिखने से मन की "भड़ास"तो निकल ही जाती है। 
इस बार कर्ण भूमि करनाल के लोग सावन में बरसात को तरसते रहे परन्तु भादों में बरखा ने गर्मी को कम कर दिया है। "लोगों के साथ -साथ मौसम भी बदल रहा है !"
" नाटक करना भी जैसे युद्ध जीतना है। पिछले वर्ष की तरह इस बार भी  कॉलेज में नाटक की तैयारी करवा रहा हूँ। प्रिंसिपल कहती हैं ,"नाटक विनिंग होना चाहिए !  नाटक में हार -जीत क्या होता है ,अभी तक समझ नहीं पाया हूँ !" 2000 की संख्या वाले कॉलेज में फ़क़त 8 लड़कियों को नाटक में PARTICIPATE करवाने के लिए पूरे कॉलेज की टीम मशक्क़त कर रही है। "नाटक को लेकर बच्चियां जो तर्क देती हैं उससे अब समझ आने लगा है ज़िन्दगी भी एक नाटक है  !
भाई मोहिन्दर से पिछले कईं दिनों से हर रोज़ बात हो जाती है। पिछले साल की तरह इस बार भी मोहिन्दर ही नाटक की स्क्रिप्ट लिख रहा है। पिछले साल "मोहिन्दर "द्वारा लिखित नाटक "पल पल जीती हर पल मरती" नाटक का मंचन किया था। मोहिन्दर ने बताया के फिल्म भुजंग का पोस्ट प्रोडक्शन लगभग पूरा होने वाला है। फिल्म का पहला पोस्टर रिलीज़ हो चुका है। पोस्टर मोहिन्दर की पत्नि ऋचा ने डिज़ाइन किया है। "ऋचा बधाई ,बहुत सुन्दर बना है पोस्टर ! " फिल्म का डायरेक्शन और लेखन मोहिन्दर ने खुद किया है।
अगस्त 2014 काफी व्यस्त रहा। पहले पांच दिन मोहिन्दर के साथ बीत गए। मोहिन्दर मुंबई से घर छुटियाँ मनाने आया था। जिस तरह से अगस्त महीने के पहले पांच दिन बीते " हमारी भी ईद हो गई ! "
अगले 10 -15  दिन स्कूल में आज़ादी ,तीज ,ईद , राखी ,मुंशी प्रेम चंद के जन्मोत्सव मनाने में बीत गए। हर वर्ष की भांति इस बार भी  स्कूल में "सद्भावना पखवाड़ा " मनाया गया। स्वतंत्रता समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत मेरे कॉलेज समय के केमिस्ट्री के प्रोफेसर डॉ अशोक महता ने की। डॉ अशोक महता की सादगी और नम्रता का मैं हमेशा कायल रहा हूँ। "कॉलेज के दिनों में बेशक केमिस्ट्री  में हाथ तंग रहा लेकिन ज़िन्दगी की केमिस्ट्री का अपना ही मज़ा है !"
1987 में दयाल  सिंह कॉलेज करनाल से ग्रेजुएशन पास किया था । 1984  में दयाल सिंह कॉलेज की और से भारत सरकार द्वारा सांस्कृतिक सद्भावना के उदेशय से आयोजित "अपना उत्सव "कार्यक्रम में मैंने हरयाणा को रिप्रेजेंट किया था । वहीं अंबाला से अपना उत्सव में भागेदारी कर रहे बबलू, हंस और मनबीर तथा यमुनानगर से अमित डांगे से मिलना हुआ। 27 साल बीत जाने के बाद आज भी उन से मुलाकात होती रहती है। बाद में बबलू ने भी इंडियन थिएटर से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आज कल बबलू अमेरिका में किसी "संधू "नाम की गारमेंट कंपनी में नौकरी करता है। इस से पहले उस के पास  दुबई का चार्ज था।अमेरिका जाते हुए करनाल कुछ देर रुक कर गया। उससे बातचीत और मुलाकात बढ़िया रही। "जीवन की किताब के पुराने पन्ने खुले तो बहुत सारी भूली बिसरी यादें ताज़ा हो गई !"
चिठ्ठी लिखते लिखते सावन के सूखे को भादों की बरखा ने हरा कर दिया है। सावन में यहाँ सूखा रहा लेकिन भादों में बरखा जम के बरस रही है। लोग खुश हैं के मौसम में ढंडक हो गई है लेकिन किसान इस बेमौसमी बरखा से निराश है।"जो किसान पानी के लिए आसमान की ओर देख रहा था आज वही अभी ना बरसने की गुहार लगा रहा है !"
अगली चिठ्ठी में कुछ और संस्मरणों के साथ फिर मुलाक़ात होती है। तब तक के अलविदा दोस्तों !
TO BE CONTINUED.......................