बच्चों कि दुनिया भी कमाल की दुनिया होती है। यदि उनकी बातों को ध्यान से सुना जाए तो उनकी चुलबुली बातें ख़ुद को बचपन में ले जाती हैं। सब से बेख़बर------बस जो कह दिया, सो कह दिया। उनकी बात को सुन कर कोई क्या कहेगा या सोचेगा इस से बेफ़िक़र् वो अपनी बात को बड़ी सादगी से कह जाते हैं।
कल ही की तो बात है ,मैंने स्टाफ को बुला कर कहा था ,"टीचर्स ,क्या आप को नहीं लगता के स्कूल में बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं। "मेरी बात पूरी होने से पहले ही एक अध्यापिका बोली ,"हाँ सर,थर्ड क्लास के बच्चे तो किसी की सुनते ही नहीं हैं। इस क्लास में अधिकतर बच्चे ऐसे हैं जिन्हें कंट्रोल करना बहुत मुश्किल हो गया है। "एक और मैडम ने सुषमा की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ,"सच में सर ,थर्ड क्लास ने तो हद कर दी है , ऐसी गालियां निकालते हैं... …… बस मैं आप को बता नहीं सकती। "
टीचर्स की बात सुनकर एक बारगी तो मुझे लगा मानो तीसरी कक्षा के बच्चे सच में "थर्ड क्लास" का व्यवहार करने लगे हैं। इस से पहले भी बच्चों की ऐसी शिकायतें मेरे पास आ चुकी थीं। असेंबली में समझाने और दूसरे कईं तरीके अपनाने के बावजूद भी "थर्ड क्लास" के बच्चों पर कोई असर नहीं हो रहा था।
असल में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों में अधिकतर मेहनतकश परिवारों से हैं। परिवार में अधिकतर लोग कम पढ़े लिखे होने के कारण, अक्सर अपनी आम भाषा में कुछ ख़ास गालिओं का प्रयोग करते हैं.…………… ये मैं अच्छी तरह से जानता था। कईं बार तो गालिओं का तड़का इस कद्र लगा होता है मानो वो बात न करके गालियां सुनाने का कोई कम्पटीशन लड़ रहे हों।
यहीं से शुरू होता है बच्चों के गाली सीखने और उन्हें अपनी आम भाषा में प्रयोग करने का सिलसिला। कईं बार गाली देते हुए बच्चे ऐसे एक्शन करते हैं मानो सृजन की प्रतिमूर्ति ये बालक ही हों। बेशक़ इनको किसी भी चीज़ के मायने पता नहीं होते हैं।
एक तरफ़ मेरी ये ज़िम्मेदारी थी के बच्चों को इस लत से छुटकारा दिलवाया जाये और दूसरी तरफ़ बच्चों के सृजन कार्यों का मैं कायल भी था। गाली निकालने का अंदाज़,अपने टीचर्स की हूबहू नक़ल उतारना ,किसी कमज़ोर बच्चे को तंग करने के नए -नए तरीक़े अपनाना ,शरारत करने के बाद अपने साथी को फँसवा देना ,टीचर विशेष के मुँह मोड़ते ही उस के पीछे डांस की मुद्रा बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता था।
बच्चे क्या हम भी तो जाने अनजाने अपने आसपास के लोगों की नक़ल करते हैं। इसलिए बच्चों की इन चुलबुली बातों पर मुझे गुस्सा कम ही आता था। आज जब मैं अपने रूम में बैठा था तो एक आवाज़ मेरे कानों में गूंजी ,"चुप ,ख़बरदार अगर अब आवाज़ आई तो। "असल में ये भंडारी मैडम की आवाज़ थी। मेरे लिए ये आवाज़ चिरपरिचित थी।
पिछले एक दो दिन से चल रही प्रक्रिया से मैं दुःखी तो था लेकिन भंडारी मैडम की गर्जन ने मेरे अंदर का आर्टिस्ट जगा दिया। मैं भी बच्चा बन गया। सोचने लगा ," अगर भंडारी मैडम पुलिस में होती तो बड़े से बड़े खूंखार मुज़रिम थर थर काँपते। " मैं ये सोच ही रहा था के मेरे चेहरे पर मैंने एक अजीब सी मुस्कान को महसूस किया। मैं अकेला हँसने लगा। मैं चूंकि अपने कमरे में अकेला बैठा था , मैं भंडारी मैडम के डायलाग दोहराने लगा ," चुप ,ख़बरदार अगर अब आवाज़ आई तो। " मेरे दिमाग में उनका ख़तरनाक़ सा चेहरा घूमने लगा। उन की इस गर्जन से बच्चे डरते भी होंगे--------------- ये सोच कर मैं फिर हँसने लगा।
नवज्योत मैडम ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा ," क्या बात हुई सर ,अकेले अकेले क्यों हँसे जा रहे हो। " मैंने कहा ," कुछ नहीं, बस यूँ ही।" नवज्योत तुरन्त बोली ," कुछ तो बात है सर। "मैंने भंडारी मैडम का डायलॉग सुनाते हुए पूछा ," क्या सच में भंडारी मैडम की गर्जन से बच्चे डरते हैं ?" मेरा कमरा नवज्योत के ठहाके से गूंजने लगा। वो कुछ इस तरह से हँसी के मैं भी अपनी हँसी को रोक न सका। मैने हँसते हुए पूछा , "ऐसा क्या हुआ भई ,मैंने कोई ग़लत सवाल पूछा क्या ?"
नवज्योत अपनी हँसी पर नियंत्रण करते हुए बोली ,"डरना तो दूर ,बच्चे जो मैडम के बारे में बोलते हैं उसे सुनोगे तो आप भी दंग रह जाओगे। "मैडम कि इस बात ने मेरे अंदर उत्सुकता का भाव जगा दिया। मैंने तुरन्त अपना सवाल दोहराया, " ऐसा क्या हुआ ?
नवज्योत ने कहा , "दो बच्चियाँ आपस में बात कर रही थीं। वो अपनी बात में पूरी तरह मग्न थीं। मैं उनकी बात को सुनने के लिए रुक गई। " एक ने ग्राउंड में खड़ी भंडारी मैडम की और इशारा करते हुए कहा , "वो देख मोटी मैडम , कैसे डांटती रहती है सब को। " असल में भंडारी मैडम ग्राउंड में खेल रहे बच्चों को डांट रही थी। दूसरी बच्ची बोली ,"मेरा मन तो करता है के इस पर तेल छिड़क कर आग लगा दूँ।"
मैं अपनी हँसी को रोक न पाया। मैंने पूछा ," कौन सी क्लास की बच्चियाँ थी। "
मैडम ने कहा ," थर्ड क्लास !" इतने में स्कूल की घण्टी बज गई ,नवज्योत ने अपना पर्स उठा कर जाने की इच्छा ज़ाहिर की। मैं सोचने लगा के आखिर इस *थर्ड क्लास* के लिए ज़िम्मेदार कौन है ?
कल ही की तो बात है ,मैंने स्टाफ को बुला कर कहा था ,"टीचर्स ,क्या आप को नहीं लगता के स्कूल में बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं। "मेरी बात पूरी होने से पहले ही एक अध्यापिका बोली ,"हाँ सर,थर्ड क्लास के बच्चे तो किसी की सुनते ही नहीं हैं। इस क्लास में अधिकतर बच्चे ऐसे हैं जिन्हें कंट्रोल करना बहुत मुश्किल हो गया है। "एक और मैडम ने सुषमा की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ,"सच में सर ,थर्ड क्लास ने तो हद कर दी है , ऐसी गालियां निकालते हैं... …… बस मैं आप को बता नहीं सकती। "
टीचर्स की बात सुनकर एक बारगी तो मुझे लगा मानो तीसरी कक्षा के बच्चे सच में "थर्ड क्लास" का व्यवहार करने लगे हैं। इस से पहले भी बच्चों की ऐसी शिकायतें मेरे पास आ चुकी थीं। असेंबली में समझाने और दूसरे कईं तरीके अपनाने के बावजूद भी "थर्ड क्लास" के बच्चों पर कोई असर नहीं हो रहा था।
असल में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों में अधिकतर मेहनतकश परिवारों से हैं। परिवार में अधिकतर लोग कम पढ़े लिखे होने के कारण, अक्सर अपनी आम भाषा में कुछ ख़ास गालिओं का प्रयोग करते हैं.…………… ये मैं अच्छी तरह से जानता था। कईं बार तो गालिओं का तड़का इस कद्र लगा होता है मानो वो बात न करके गालियां सुनाने का कोई कम्पटीशन लड़ रहे हों।
यहीं से शुरू होता है बच्चों के गाली सीखने और उन्हें अपनी आम भाषा में प्रयोग करने का सिलसिला। कईं बार गाली देते हुए बच्चे ऐसे एक्शन करते हैं मानो सृजन की प्रतिमूर्ति ये बालक ही हों। बेशक़ इनको किसी भी चीज़ के मायने पता नहीं होते हैं।
एक तरफ़ मेरी ये ज़िम्मेदारी थी के बच्चों को इस लत से छुटकारा दिलवाया जाये और दूसरी तरफ़ बच्चों के सृजन कार्यों का मैं कायल भी था। गाली निकालने का अंदाज़,अपने टीचर्स की हूबहू नक़ल उतारना ,किसी कमज़ोर बच्चे को तंग करने के नए -नए तरीक़े अपनाना ,शरारत करने के बाद अपने साथी को फँसवा देना ,टीचर विशेष के मुँह मोड़ते ही उस के पीछे डांस की मुद्रा बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता था।
बच्चे क्या हम भी तो जाने अनजाने अपने आसपास के लोगों की नक़ल करते हैं। इसलिए बच्चों की इन चुलबुली बातों पर मुझे गुस्सा कम ही आता था। आज जब मैं अपने रूम में बैठा था तो एक आवाज़ मेरे कानों में गूंजी ,"चुप ,ख़बरदार अगर अब आवाज़ आई तो। "असल में ये भंडारी मैडम की आवाज़ थी। मेरे लिए ये आवाज़ चिरपरिचित थी।
पिछले एक दो दिन से चल रही प्रक्रिया से मैं दुःखी तो था लेकिन भंडारी मैडम की गर्जन ने मेरे अंदर का आर्टिस्ट जगा दिया। मैं भी बच्चा बन गया। सोचने लगा ," अगर भंडारी मैडम पुलिस में होती तो बड़े से बड़े खूंखार मुज़रिम थर थर काँपते। " मैं ये सोच ही रहा था के मेरे चेहरे पर मैंने एक अजीब सी मुस्कान को महसूस किया। मैं अकेला हँसने लगा। मैं चूंकि अपने कमरे में अकेला बैठा था , मैं भंडारी मैडम के डायलाग दोहराने लगा ," चुप ,ख़बरदार अगर अब आवाज़ आई तो। " मेरे दिमाग में उनका ख़तरनाक़ सा चेहरा घूमने लगा। उन की इस गर्जन से बच्चे डरते भी होंगे--------------- ये सोच कर मैं फिर हँसने लगा।
नवज्योत मैडम ने कमरे में प्रवेश करते हुए कहा ," क्या बात हुई सर ,अकेले अकेले क्यों हँसे जा रहे हो। " मैंने कहा ," कुछ नहीं, बस यूँ ही।" नवज्योत तुरन्त बोली ," कुछ तो बात है सर। "मैंने भंडारी मैडम का डायलॉग सुनाते हुए पूछा ," क्या सच में भंडारी मैडम की गर्जन से बच्चे डरते हैं ?" मेरा कमरा नवज्योत के ठहाके से गूंजने लगा। वो कुछ इस तरह से हँसी के मैं भी अपनी हँसी को रोक न सका। मैने हँसते हुए पूछा , "ऐसा क्या हुआ भई ,मैंने कोई ग़लत सवाल पूछा क्या ?"
नवज्योत अपनी हँसी पर नियंत्रण करते हुए बोली ,"डरना तो दूर ,बच्चे जो मैडम के बारे में बोलते हैं उसे सुनोगे तो आप भी दंग रह जाओगे। "मैडम कि इस बात ने मेरे अंदर उत्सुकता का भाव जगा दिया। मैंने तुरन्त अपना सवाल दोहराया, " ऐसा क्या हुआ ?
नवज्योत ने कहा , "दो बच्चियाँ आपस में बात कर रही थीं। वो अपनी बात में पूरी तरह मग्न थीं। मैं उनकी बात को सुनने के लिए रुक गई। " एक ने ग्राउंड में खड़ी भंडारी मैडम की और इशारा करते हुए कहा , "वो देख मोटी मैडम , कैसे डांटती रहती है सब को। " असल में भंडारी मैडम ग्राउंड में खेल रहे बच्चों को डांट रही थी। दूसरी बच्ची बोली ,"मेरा मन तो करता है के इस पर तेल छिड़क कर आग लगा दूँ।"
मैं अपनी हँसी को रोक न पाया। मैंने पूछा ," कौन सी क्लास की बच्चियाँ थी। "
मैडम ने कहा ," थर्ड क्लास !" इतने में स्कूल की घण्टी बज गई ,नवज्योत ने अपना पर्स उठा कर जाने की इच्छा ज़ाहिर की। मैं सोचने लगा के आखिर इस *थर्ड क्लास* के लिए ज़िम्मेदार कौन है ?
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