मेरे एक दोस्त हैं.…………मस्त ,मिलनसार और सीधी स्पाट बात कहने वाले।उम्र करीब ४० वर्ष। सब उन्हें चौधरी साब कह कर बुलाते हैं।ख़ाने पीने के शौक़ीन हैं हमारे चौधरी साब। जैसा नाम---- वैसा ही काम करने और जीने का अन्दाज़ भी। बीवी डॉक्टर हैं और बेटा इसी साल आई आई टी में सेलेक्ट हुआ है।चौधरी साब अपने बेटे और बीवी से बहुत प्यार करते हैं। ऐसा नहीं के चौधरी साब कोई काम नहीं करते। दो तीन व्यवसायिक केन्द्र हैं। लाखों किराया आता है। यानि के फुल मस्त लाइफ।
एक दिन उदासी में थे चौधरी साब। कहने लगे बड़े कठिन दौर देखे हैं। इस के बाद उन्होंने अरोड़ा का किस्सा सुनाना शुरू कर दिया। असल में बात लगभग १० बरस पुरानी है। चौधरी साब ने शहर के नामीगिरामी व्यापारी अरोड़ा जी को करीब १२ - १५ लाख रूपए ब्याज पर दे रखे थे। अरोड़ा जी मोटा ब्याज देते थे -------शहर की कईं पार्टीओं ने भी अपना पैसा अरोड़ा जी को दे रखा था। उन दिनों चौधरी साब का अधिकतर समय अरोरा जी के ऑफिस में ही बीतता था। एक दिन ये ख़बर शहर में आग कि तरह फैल गई के अरोड़ा शहर छोड़ कर भाग गया। अरोड़ा जी से वो व्यापारी, चोर और डाकू अरोड़ा हो गया। शहर के कईं लोगों के करोड़ों रूपए लेकर जो भाग गया था अरोड़ा।
अरोड़ा की ख़ोज शुरू हुई लेकिन उसका कुछ पता न चला। अरोड़ा के चक्कर में कईं लोगों की लुटिया डूब गई।चौधरी साब का तो जैसे जहाज़ ही डूब गया था।चाँद बाऊ जी और लाली भी मोटे ब्याज के चक्कर में अरोड़ा का शिकार हो गए थे।जब भी मिलते अरोड़ा को भारी भारी गालियाँ निकालते। जबकि उन दोनों को एक दो लाख से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था।
सब से ज्यादा झटका चौधरी साब को लगा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इधर उधर के कुछ प्लॉट बेचकर चौधरी साब ने मार्केट की देनदारी उतारी और बन गए असल चौधरी। मार्केट का हिसाब बराबर करने के बाद वो एक बात अक्सर गुनगुनाया करते ,"शुक्र है दाते दा ,जो उस ने लाज रख लई। कोई और होता तो आत्म हत्या ही कर लेता। "असल में उन्होंने अपने दूसरे कामों के लिए मार्केट से पैसा उधार उठा रखा था।
कईं काम किए हैं चौधरी साब ने अपने जीवन में। कईं नामी कम्पनियों की दवाइयों के होल सेल का काम था भले ज़माने में। मेडिकल स्टोर ,प्रॉपर्टी डीलिंग ,होटल ,फाइनेंस और न जाने कितने काम किए थे चौधरी साब ने। काम सभी चल निकले थे। इसे भाग्य कहें या फिर प्लॉनिंग में कोई कमी और या फिर चौधरी साब का काम करने का अन्दाज़------किसी भी काम में चौधरी साब जम नहीं पाए। काम करने की इतनी ललक थी के पूना ,बंगलौर,दिल्ली ,नॉएडा और देश के कईं हिस्सों में चक्कर लगा आए। देहरादून मंसूरी में तो उन्होने एक शानदार होटल भी खोल दिया था। अपने पार्टनर दोस्त के साथ जमी नहीं तो वो भी छोड़ घर लौट आए। जो तीन चार साल का समय ख़राब हुआ वो तो हुआ सो हुआ ,जो पैसे का नुक्सान हुआ वो अलग। चौधरी साब फिर भी मस्त।
मुझे अपने मन की बातें बता दिया करते थे चौधरी साब। काम करने के साथ पैसा कमाने की ललक ही थी के एक बार चौधरी साब ने विदेश जाने का मन बना लिया। आनन फ़ानन में पासपोर्ट बनवाया गया और दिल्ली के एक एजेन्ट को ४ लाख़ रूपए और पासपोर्ट थमा दिए गए।चौधरी साब खाने पीने के शौकीन थे। जब भी कोई महफ़िल जमती, विदेश के किस्से कहानियों का ज़िक्र चलता। कईं साल पहले अपने एक ख़ास दोस्त राजेश भाटिया की मदद कर विदेश भेजा था चौधरी साब ने।वो जब भी इंडिया आता वहाँ की ज़िन्दगी के बारे में बताता। बस अब तो जैसे चौधरी साब पँख लगा कर उड़ जाना चाहते थे।
इस के बाद दिल्ली आने जाने का जो सिलसिला शुरू हुआ बस पूछो ही मत।पहले वीज़ा के लिए और बाद में पासपोर्ट वापिस लेने के लिए। असल में जिस एजेंट को पैसे और पासपोर्ट दिया गया था वो गायब हो गया। यहाँ भी चौधरी साब की दाल नहीं गली।एजेंट को खोजने में कई चक्कर दिल्ली के लग गए। खैर चौधरी साब ने हार नहीं मानी। एजेंट को ख़ोज ही निकाला। लेकिन वो पैसे वापिस करने में आनाकानी करने लगा। वो तो भला हो कम्पल भाई का जिस ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर के पैसे और पासपोर्ट वापिस दिलवा दिए। कम्पल भाई दिल्ली पुलिस में इंस्पेक्टर तैनात है।
ये सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। एक दिन चौधरी साब अपने साथ किसी नई शख्सियत को लेकर आए। नये आदमी को देख कर महफ़िल के सभी लोगों ने एक दूसरे से आँखें मिलाई। समझते देर ना लगी के चौधरी साब कोई नई कहानी की नींव रखने जा रहे हैं। " ये अपने मित्र हैं ,कम्बोज जी ",बातों और परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। समीर ने कम्बोज की पहचान के लोगों के नाम गिनवाने शुरू किए तो कुछ देर ही कम्बोज चिर परिचित लगने लगा। कम्बोज भी सभी में जल्दी ही घुलमिल गया।
गोल मटोल चेहरा ,कद लगभग ५ फुट २ इंच ,भारी भरकम पेट. ............. क़द काठी जैसी भी थी कम्बोज साब रहते बनठन कर थे।ब्रांडेड कपड़े ,माथे पर तिलक लगा कर रहना उन की फितरत में था। पहली मुलाक़ात के बाद उन का आनाजाना आम हो गया था। चौधरी साब की यारी कम्बोज से ऐसी लगी के महफ़िल के लोग उन पर ताने कसने लगे। दोनों की लम्बी - लम्बी मुलाकातें होने लगी,चौधरी साब ने महफ़िल में भी बैठना कम कर दिया।
मैं और समीर एक दिन बैठे बातें कर रहे थे।दूसरी तरफ़ से कम्बोज और चौधरी साब आते दिखाई दिए। तभी पता नहीं समीर के मन में क्या सूझा ,"ए चौधरी दी अजकल कम्बोज नाल बड़ी गुटरगूँ चल रही है।चौधरी दी ऐसी तैसी फेरेगा ए कम्बोज। " दोनों ने ज़ोर का ठहाका लगाया और इधेर उधर की बातें करने लगे । वैसे अब तक सब को पता चल चुका था के चौधरी कम्बोज के जाल में फँस चुका है।
असल में चौधरी साब अपनी डॉक्टर बीवी को सरकारी नौकरी लगवाना चाहते थे। इसी चक्कर में वो ४ -५ लाख कम्बोज को भी फँसा बैठे थे।ऐसा नहीं के मिसेज चौधरी में काबलियत नहीं थी। गोल्ड मेडलिस्ट थीं वो। स्कूल से लेकर डिग्री हासिल करने तक हर क्लास में फर्स्ट आती थीं मिसेज चौधरी।नौकरी के लिए पैसे देने की नौबत इस लिए आई क्यों के इससे पहले भी वो तीन बार टेस्ट पास कर चुकी थी परन्तु इंटरव्यू में रह जाती थी। सरकार में कोई सिफारिश जो न थी।
यहाँ भी चौधरी का फंडा बिलकुल साफ़ था के बीवी की सरकारी नौकरी लग जायगी तो एक फिक्स इनकम घर में आने लगेगी और वो ख़ुद कोई भी काम कर लेंगे।आजकल उनकी हर बात में मैडम का ज़िक्र ज़रूर होता। मोहिंदर भी जब कभी करनाल आता तो चुटकी लेकर वो चौधरी साब से ये ज़रूर पूछता ,"भाभी जी दा की हाल है चौधरी साब। "फिर बाद में मुझे स्माइल देते हुए ये ज़रूर कहता ,"बहुत प्यार करते हैं चौधरी साब अपनी बीवी से। अपनी बीवी का ज़िक्र ज़रूर करते हैं हर बात में। "
ये सिलसिला करीब ३ -४ साल तक चलता रहा। नौकरी की लिस्ट फाइनल होने की तारीख़ ज्यों ज्यों नज़दीक आने लगी,कम्बोज का फ़ोन बंद रहने लगा। आपस में मिलने का सिलसिला भी कम हो गया था।जिस का डर था वही हुआ।लिस्ट जारी हो चुकी थी लेकिन मिसेज चौधरी का नाम कहीं न था। चौधरी साब हताश हो गए। कम्बोज को उन्होंने बहुत गालियाँ निकाली। एक उम्मीद थी वो भी धाराशाई हो कर बिखर गई।
पिछले १२ साल से कोशिश कर रहे थे नौकरी के लिए और इस बार ये आखरी चान्स भी था। कम्बोज अंडर ग्राउंड हो चुका था। अब कम्बोज को ढूंढ़ने और पैसे वापिस लेने की क़वायद शुरू हो चुकी थी । वैसे अंदर की बात ये है के पैसे अभी तक वापिस नहीं आए हैं और चौधरी साब इस उम्मीद पर ज़िन्दा हैं ,"उन की हक़ हलाल की कमाई है पैसे वापिस ज़रूर आयेंगे। "
चौधरी साब तो जैसे टूट से गए थे । थोड़ा ब्लड प्रेशर भी बढ़ने लगा था। बात -बात पर गुस्सा करना उन की आदत में शामिल हो चुका था।पिछले दिनों बीमार भी रहे।बातें भी कुछ उटपटांग सी करने लगे थे। उनके व्यवहार से ऐसा लगने लगा था मानो डिप्रेशन का शिकार हो गए हों। लगभग एक डेढ साल तक इलाज चला, खूब पैसा भी लगा पर मर्ज़ ऐसी के जाने का नाम नहीं ले रही थी। चौधरी साब सब से अलग चुपचाप रहने लगे।जैसे जीने का कोई मक़सद ही न हो।
पिछले पाँच महीनों से चौधरी साब में ज़बरदस्त बदलाव आ गया था। बेटा आई आई टी में सेलेक्ट हो गया था।जैसे बिमारी वीमारी कोई थी ही नहीं। चेहरा भी पहले कि तरह टमाटर की तरह लाल हो गया था। महफ़िलों का दौर फिर से शुरू हो गया था। रिजल्ट से पहले ही आई आई टी से पास हो कर निकलने वाले बच्चों के पैकेज की बात अब अक्सर होने लगी थी। कोई भी बात होती घूम फिर कर उस का अन्त आई आई टी के बच्चों को मिलने वाले पैकेज से ही होता। उस दिन जब मैंने चौधरी साब को अख़बार में छपी एक ख़बर का ज़िक्र किया तो वो बोले ,"५० -६० लाख का पैकेज तो कुछ भी नहीं आजकल तो डेढ़ से दो करोड़ तक का पैकेज मिलने लगा है बच्चों को। ये बात कहते ही उन के चेहरे पर संतुष्टी के जो भाव आए वो सचमुच ऐसे थे मानो उन्हें उनकी लम्बी तपस्या का फल मिल गया हो।
जिस दिन आई आई टी का रिजल्ट आया चौधरी साब की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। कईं दिन तक रिश्तेदारों और दोस्तों में मिठाई बाँटने का सिलसिला चलता रहा। चौधरी साब के तो पाँव जैसे ज़मीन पर ही नहीं पड़ रहे थे। २० -२५ हज़ार की मिठाई बाँट दी गई थी और दोस्तों को पार्टी देने में जो खर्च हुआ उस का तो हिसाब किताब ही नहीं। महफ़िल के दौर चल रहे थे बधाई देने के लिए आने वालों का सिलसिला बदस्तूर जारी था।
एक दिन महफ़िल जमी हुई थी। रणबीर भी पार्टी में था। रणबीर ,चौधरी साब के देहरादून वाले होटल में पार्टनर था। पार्टनरशिप टूटने के बावजूद भी रणबीर और चौधरी अक्सर मिलते रहते थे। रणबीर चौधरी साब के शाही अंदाज़ पर अक्सर चुटकी लेता रहता था। आज भी रणबीर ने चुटकी लेते हुए कहा ,"यू चौधरी सब ते पहलां मरेगा। कामकाज तो यो कुछ करदा नी। अर इस की मौज मस्ती तो देखो। " इस से पहले के रणबीर की बात पर कोई रियेक्ट करता चौधरी साब फुँफकारते हुए चिल्लाए ,"तेरे बाप की नहीं ख़ाता हूँ। जब देखो उल्टा ही बोलेगा। " महफ़िल में सन्नाटा छा गया था। रणबीर को तो जैसे साँप ही सूँघ गया था।
धीरे धीरे सब सरकने लगे थे। मैने धीरे से चौधरी साब के कंधे पर हाथ रखते हुए शांत होने का इशारा किया तो चौधरी साब फूट फूट कर रोने लगे। सिसकियाँ लेते हुए वो बोले ,"अभी तो एक उम्मीद जगी थी और जीने का मज़ा आने लगा था पता नहीं कैसी कैसी उल्टी बातें करता है।जब देखो मरने की ही बातें करता रहता है। " मैंने उन को समझाते हुए जब ये कहा " रणबीर का आपको दुःख पहुँचाने का कोई उदेशय नहीं था।"चौधरी साब झट से बोले ,"मलिक साब आप को नहीं पता, कईं बार आदमी के मुहँ में सरस्वती बैठी होती है। "
मन तो बहुत हुआ के उसी वक्त ज़ोर से ठहाका लगाऊँ। परन्तु स्तिथि ऐसी थी के मैं उस समय हँस नहीं पाया।
एक दिन उदासी में थे चौधरी साब। कहने लगे बड़े कठिन दौर देखे हैं। इस के बाद उन्होंने अरोड़ा का किस्सा सुनाना शुरू कर दिया। असल में बात लगभग १० बरस पुरानी है। चौधरी साब ने शहर के नामीगिरामी व्यापारी अरोड़ा जी को करीब १२ - १५ लाख रूपए ब्याज पर दे रखे थे। अरोड़ा जी मोटा ब्याज देते थे -------शहर की कईं पार्टीओं ने भी अपना पैसा अरोड़ा जी को दे रखा था। उन दिनों चौधरी साब का अधिकतर समय अरोरा जी के ऑफिस में ही बीतता था। एक दिन ये ख़बर शहर में आग कि तरह फैल गई के अरोड़ा शहर छोड़ कर भाग गया। अरोड़ा जी से वो व्यापारी, चोर और डाकू अरोड़ा हो गया। शहर के कईं लोगों के करोड़ों रूपए लेकर जो भाग गया था अरोड़ा।
अरोड़ा की ख़ोज शुरू हुई लेकिन उसका कुछ पता न चला। अरोड़ा के चक्कर में कईं लोगों की लुटिया डूब गई।चौधरी साब का तो जैसे जहाज़ ही डूब गया था।चाँद बाऊ जी और लाली भी मोटे ब्याज के चक्कर में अरोड़ा का शिकार हो गए थे।जब भी मिलते अरोड़ा को भारी भारी गालियाँ निकालते। जबकि उन दोनों को एक दो लाख से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था।
सब से ज्यादा झटका चौधरी साब को लगा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इधर उधर के कुछ प्लॉट बेचकर चौधरी साब ने मार्केट की देनदारी उतारी और बन गए असल चौधरी। मार्केट का हिसाब बराबर करने के बाद वो एक बात अक्सर गुनगुनाया करते ,"शुक्र है दाते दा ,जो उस ने लाज रख लई। कोई और होता तो आत्म हत्या ही कर लेता। "असल में उन्होंने अपने दूसरे कामों के लिए मार्केट से पैसा उधार उठा रखा था।
कईं काम किए हैं चौधरी साब ने अपने जीवन में। कईं नामी कम्पनियों की दवाइयों के होल सेल का काम था भले ज़माने में। मेडिकल स्टोर ,प्रॉपर्टी डीलिंग ,होटल ,फाइनेंस और न जाने कितने काम किए थे चौधरी साब ने। काम सभी चल निकले थे। इसे भाग्य कहें या फिर प्लॉनिंग में कोई कमी और या फिर चौधरी साब का काम करने का अन्दाज़------किसी भी काम में चौधरी साब जम नहीं पाए। काम करने की इतनी ललक थी के पूना ,बंगलौर,दिल्ली ,नॉएडा और देश के कईं हिस्सों में चक्कर लगा आए। देहरादून मंसूरी में तो उन्होने एक शानदार होटल भी खोल दिया था। अपने पार्टनर दोस्त के साथ जमी नहीं तो वो भी छोड़ घर लौट आए। जो तीन चार साल का समय ख़राब हुआ वो तो हुआ सो हुआ ,जो पैसे का नुक्सान हुआ वो अलग। चौधरी साब फिर भी मस्त।
मुझे अपने मन की बातें बता दिया करते थे चौधरी साब। काम करने के साथ पैसा कमाने की ललक ही थी के एक बार चौधरी साब ने विदेश जाने का मन बना लिया। आनन फ़ानन में पासपोर्ट बनवाया गया और दिल्ली के एक एजेन्ट को ४ लाख़ रूपए और पासपोर्ट थमा दिए गए।चौधरी साब खाने पीने के शौकीन थे। जब भी कोई महफ़िल जमती, विदेश के किस्से कहानियों का ज़िक्र चलता। कईं साल पहले अपने एक ख़ास दोस्त राजेश भाटिया की मदद कर विदेश भेजा था चौधरी साब ने।वो जब भी इंडिया आता वहाँ की ज़िन्दगी के बारे में बताता। बस अब तो जैसे चौधरी साब पँख लगा कर उड़ जाना चाहते थे।
इस के बाद दिल्ली आने जाने का जो सिलसिला शुरू हुआ बस पूछो ही मत।पहले वीज़ा के लिए और बाद में पासपोर्ट वापिस लेने के लिए। असल में जिस एजेंट को पैसे और पासपोर्ट दिया गया था वो गायब हो गया। यहाँ भी चौधरी साब की दाल नहीं गली।एजेंट को खोजने में कई चक्कर दिल्ली के लग गए। खैर चौधरी साब ने हार नहीं मानी। एजेंट को ख़ोज ही निकाला। लेकिन वो पैसे वापिस करने में आनाकानी करने लगा। वो तो भला हो कम्पल भाई का जिस ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर के पैसे और पासपोर्ट वापिस दिलवा दिए। कम्पल भाई दिल्ली पुलिस में इंस्पेक्टर तैनात है।
ये सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। एक दिन चौधरी साब अपने साथ किसी नई शख्सियत को लेकर आए। नये आदमी को देख कर महफ़िल के सभी लोगों ने एक दूसरे से आँखें मिलाई। समझते देर ना लगी के चौधरी साब कोई नई कहानी की नींव रखने जा रहे हैं। " ये अपने मित्र हैं ,कम्बोज जी ",बातों और परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। समीर ने कम्बोज की पहचान के लोगों के नाम गिनवाने शुरू किए तो कुछ देर ही कम्बोज चिर परिचित लगने लगा। कम्बोज भी सभी में जल्दी ही घुलमिल गया।
गोल मटोल चेहरा ,कद लगभग ५ फुट २ इंच ,भारी भरकम पेट. ............. क़द काठी जैसी भी थी कम्बोज साब रहते बनठन कर थे।ब्रांडेड कपड़े ,माथे पर तिलक लगा कर रहना उन की फितरत में था। पहली मुलाक़ात के बाद उन का आनाजाना आम हो गया था। चौधरी साब की यारी कम्बोज से ऐसी लगी के महफ़िल के लोग उन पर ताने कसने लगे। दोनों की लम्बी - लम्बी मुलाकातें होने लगी,चौधरी साब ने महफ़िल में भी बैठना कम कर दिया।
मैं और समीर एक दिन बैठे बातें कर रहे थे।दूसरी तरफ़ से कम्बोज और चौधरी साब आते दिखाई दिए। तभी पता नहीं समीर के मन में क्या सूझा ,"ए चौधरी दी अजकल कम्बोज नाल बड़ी गुटरगूँ चल रही है।चौधरी दी ऐसी तैसी फेरेगा ए कम्बोज। " दोनों ने ज़ोर का ठहाका लगाया और इधेर उधर की बातें करने लगे । वैसे अब तक सब को पता चल चुका था के चौधरी कम्बोज के जाल में फँस चुका है।
असल में चौधरी साब अपनी डॉक्टर बीवी को सरकारी नौकरी लगवाना चाहते थे। इसी चक्कर में वो ४ -५ लाख कम्बोज को भी फँसा बैठे थे।ऐसा नहीं के मिसेज चौधरी में काबलियत नहीं थी। गोल्ड मेडलिस्ट थीं वो। स्कूल से लेकर डिग्री हासिल करने तक हर क्लास में फर्स्ट आती थीं मिसेज चौधरी।नौकरी के लिए पैसे देने की नौबत इस लिए आई क्यों के इससे पहले भी वो तीन बार टेस्ट पास कर चुकी थी परन्तु इंटरव्यू में रह जाती थी। सरकार में कोई सिफारिश जो न थी।
यहाँ भी चौधरी का फंडा बिलकुल साफ़ था के बीवी की सरकारी नौकरी लग जायगी तो एक फिक्स इनकम घर में आने लगेगी और वो ख़ुद कोई भी काम कर लेंगे।आजकल उनकी हर बात में मैडम का ज़िक्र ज़रूर होता। मोहिंदर भी जब कभी करनाल आता तो चुटकी लेकर वो चौधरी साब से ये ज़रूर पूछता ,"भाभी जी दा की हाल है चौधरी साब। "फिर बाद में मुझे स्माइल देते हुए ये ज़रूर कहता ,"बहुत प्यार करते हैं चौधरी साब अपनी बीवी से। अपनी बीवी का ज़िक्र ज़रूर करते हैं हर बात में। "
ये सिलसिला करीब ३ -४ साल तक चलता रहा। नौकरी की लिस्ट फाइनल होने की तारीख़ ज्यों ज्यों नज़दीक आने लगी,कम्बोज का फ़ोन बंद रहने लगा। आपस में मिलने का सिलसिला भी कम हो गया था।जिस का डर था वही हुआ।लिस्ट जारी हो चुकी थी लेकिन मिसेज चौधरी का नाम कहीं न था। चौधरी साब हताश हो गए। कम्बोज को उन्होंने बहुत गालियाँ निकाली। एक उम्मीद थी वो भी धाराशाई हो कर बिखर गई।
पिछले १२ साल से कोशिश कर रहे थे नौकरी के लिए और इस बार ये आखरी चान्स भी था। कम्बोज अंडर ग्राउंड हो चुका था। अब कम्बोज को ढूंढ़ने और पैसे वापिस लेने की क़वायद शुरू हो चुकी थी । वैसे अंदर की बात ये है के पैसे अभी तक वापिस नहीं आए हैं और चौधरी साब इस उम्मीद पर ज़िन्दा हैं ,"उन की हक़ हलाल की कमाई है पैसे वापिस ज़रूर आयेंगे। "
चौधरी साब तो जैसे टूट से गए थे । थोड़ा ब्लड प्रेशर भी बढ़ने लगा था। बात -बात पर गुस्सा करना उन की आदत में शामिल हो चुका था।पिछले दिनों बीमार भी रहे।बातें भी कुछ उटपटांग सी करने लगे थे। उनके व्यवहार से ऐसा लगने लगा था मानो डिप्रेशन का शिकार हो गए हों। लगभग एक डेढ साल तक इलाज चला, खूब पैसा भी लगा पर मर्ज़ ऐसी के जाने का नाम नहीं ले रही थी। चौधरी साब सब से अलग चुपचाप रहने लगे।जैसे जीने का कोई मक़सद ही न हो।
पिछले पाँच महीनों से चौधरी साब में ज़बरदस्त बदलाव आ गया था। बेटा आई आई टी में सेलेक्ट हो गया था।जैसे बिमारी वीमारी कोई थी ही नहीं। चेहरा भी पहले कि तरह टमाटर की तरह लाल हो गया था। महफ़िलों का दौर फिर से शुरू हो गया था। रिजल्ट से पहले ही आई आई टी से पास हो कर निकलने वाले बच्चों के पैकेज की बात अब अक्सर होने लगी थी। कोई भी बात होती घूम फिर कर उस का अन्त आई आई टी के बच्चों को मिलने वाले पैकेज से ही होता। उस दिन जब मैंने चौधरी साब को अख़बार में छपी एक ख़बर का ज़िक्र किया तो वो बोले ,"५० -६० लाख का पैकेज तो कुछ भी नहीं आजकल तो डेढ़ से दो करोड़ तक का पैकेज मिलने लगा है बच्चों को। ये बात कहते ही उन के चेहरे पर संतुष्टी के जो भाव आए वो सचमुच ऐसे थे मानो उन्हें उनकी लम्बी तपस्या का फल मिल गया हो।
जिस दिन आई आई टी का रिजल्ट आया चौधरी साब की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। कईं दिन तक रिश्तेदारों और दोस्तों में मिठाई बाँटने का सिलसिला चलता रहा। चौधरी साब के तो पाँव जैसे ज़मीन पर ही नहीं पड़ रहे थे। २० -२५ हज़ार की मिठाई बाँट दी गई थी और दोस्तों को पार्टी देने में जो खर्च हुआ उस का तो हिसाब किताब ही नहीं। महफ़िल के दौर चल रहे थे बधाई देने के लिए आने वालों का सिलसिला बदस्तूर जारी था।
एक दिन महफ़िल जमी हुई थी। रणबीर भी पार्टी में था। रणबीर ,चौधरी साब के देहरादून वाले होटल में पार्टनर था। पार्टनरशिप टूटने के बावजूद भी रणबीर और चौधरी अक्सर मिलते रहते थे। रणबीर चौधरी साब के शाही अंदाज़ पर अक्सर चुटकी लेता रहता था। आज भी रणबीर ने चुटकी लेते हुए कहा ,"यू चौधरी सब ते पहलां मरेगा। कामकाज तो यो कुछ करदा नी। अर इस की मौज मस्ती तो देखो। " इस से पहले के रणबीर की बात पर कोई रियेक्ट करता चौधरी साब फुँफकारते हुए चिल्लाए ,"तेरे बाप की नहीं ख़ाता हूँ। जब देखो उल्टा ही बोलेगा। " महफ़िल में सन्नाटा छा गया था। रणबीर को तो जैसे साँप ही सूँघ गया था।
धीरे धीरे सब सरकने लगे थे। मैने धीरे से चौधरी साब के कंधे पर हाथ रखते हुए शांत होने का इशारा किया तो चौधरी साब फूट फूट कर रोने लगे। सिसकियाँ लेते हुए वो बोले ,"अभी तो एक उम्मीद जगी थी और जीने का मज़ा आने लगा था पता नहीं कैसी कैसी उल्टी बातें करता है।जब देखो मरने की ही बातें करता रहता है। " मैंने उन को समझाते हुए जब ये कहा " रणबीर का आपको दुःख पहुँचाने का कोई उदेशय नहीं था।"चौधरी साब झट से बोले ,"मलिक साब आप को नहीं पता, कईं बार आदमी के मुहँ में सरस्वती बैठी होती है। "
मन तो बहुत हुआ के उसी वक्त ज़ोर से ठहाका लगाऊँ। परन्तु स्तिथि ऐसी थी के मैं उस समय हँस नहीं पाया।
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