Wednesday, 18 December 2013

MASTER MIND.........

आज सुबह जैसे ही  मुझे " बिन्दे " के बारे में पता चला तो मैने समीर को इत्लाह  करना ठीक समझा। समीर को फ़ोन करते करते मुझे ध्यान आया के वो कुछ देर पहले ही तो चण्डीगढ़ के लिए निकला है। इस से पहले के मैं फ़ोन काटता समीर की उधर से आवाज़ आई ,"बस टोल प्लाजा पहुँच गए हैं ,लेकिन  धुंध बहुत है रास्ते में। " मैंने समीर को कहा ,"भाई ध्यान से जाइओ। " समीर  बोला ,"चिन्ता  न कर। " समीर की  फ़ितरत  ही ऐसी है,  जब भी कोई बात करो ,उस ने मज़ाक करना ही है।लेकिन आज वो सीरियस ही था।
 मैंने उसे पूछा ,"बिन्दे का पता चला ?"समीर धीरे से बोला," हाँ ,सवेरे ही फ़ोन आ गया था। " आज जब मैं सुबह स्कूल जा रहा था तो रास्ते में चोपड़ा ने आवाज़ लगा कर रोका। चोपड़ा बोला ,"बिन्दा पूरा हो गया है। "मेरे पाँव के नीचे से जैसे ज़मीं ख़िसक  गई हो। मैंने संभलते हुए पूछा ,"कैसे हुआ। " चोपड़ा बोला, "बस कईं दिन से बीमार चल रहा था ,रात बुखार में ही शराब पी ली। "मैंने संस्कार का टाइम पूछा और अपनी एक्टिवा स्टार्ट कर स्कूल की  और चल दिया।बिन्दा और चोपड़ा दोनों हमप्याला थे। 
आज ठण्ड बहुत थी। जैसे ही मैने अपनी एक्टिवा को रेस दी ,मेरी आँखों से पानी निकलने लगा। मैने जैसे ही अपनी आँखों को पोंछा मेरे सामने शंटी ,बिन्दे ,पण्डत ,टिड्डे ,समीर और उनकी मित्र मण्डली के साथ बिताए दिन याद  आने लगे। असल में ये सभी समीर के बचपन के दोस्त थे। मैं इनकी मण्डली में थोड़ा  लेट शामिल हुआ था। हम सभी कुछ इस तरह से घुलमिल गये थे के पता ही नहीं चलता था कौन किस की वजह से इस मित्र  मण्डली का हिस्सा है। वैसे सच कहूँ तो समीर ही  इस ' चंडाल चौकड़ी 'का मुखिया था।
हालांकि पिछले तीन सालों से ये चंडाल चौकड़ी जम  नहीं रही थी। लेकिन मुझे याद आने लगे इन के साथ बिताय वो पल।शहर के बीचों बीच समीर की दुकान पर सुबह से ही जमावड़ा शुरू हो जाता था। मण्डली का एक भी मेम्बर वहाँ पहुँचा समझो चींटिओं की  तरह वहाँ सभी जमा हो गए। और जो नहीं पहुँचता था उसे फ़ोन कर के जल्द से जल्द पहुंचने  का अल्टीमेटम दे दिया जाता था। किसी की क्या मज़ाल  के वो वहाँ समय पर न पहुँचे।
समीर के अड्डे पर पहुँचने वालों को चण्डाल चौकड़ी का नाम इस लिये दिया गया क्यों के वहाँ कोई नियम या क़ायदा नहीं था। जब जिस का दिल करता दारु की बोतल खोल कर बैठ जाता और महफ़िल ऐसी जमती के समीर की दुकान कब मधुशाला  में बदल जाती पता ही नहीं चलता था। सुबह  पीने बैठते और शाम कब हो जाती पता ही नहीं चलता था।पुराने किस्से कहानियों ,गालियों  ,गिले शिकवों ,शरारतों, छेड़खानियों ,पुरानी यादों का ऐसा सिलसिला शुरू होता के शाम  का तभी पता चलता जब घर से बीवियों के फ़ोन की घण्टी  बजने लगती।
 कईं बार तो सभा इस लिए भी  बर्खास्त करनी पड़ती क्यों की कभी बिन्दा या शंटी उलझ जाते या पण्डित इस लिए गालियां निकालने लगता के शंटी ने उस की बीवी के सामने भारद्वाज साहेब कहने कि बजाय ' पण्डत 'कह दिया। असल में शाखा ग्राउंड में साथ साथ खेलने वाले शंटी का काम आज कल मंदा चल रहा था और पण्डत की वकालत चल निकली थी। मैं तो कईं बार कह भी देता था ,"पण्डत यार तू दारु पी के एडवोकेट जनरल क्यों बन जाता है। मेरी साफगोही का बिन्दा  कायल था। वो झट से मेरा हाथ चूम लेता और कहने लगता ,"तुसी ग्रेट हो सर  जी ,सच्ची तुसी मास्टर माइंड हो सर जी। " ये बात वो कईं बार दोहराता और फिर फ़फ़क फ़फ़क कर रोने लगता। सब तितर बितर हो जाते बचते अब समीर और मैं ------बिंदे को समझाते  और चुप करवाने की कोशिश  करते।
बिन्दा कहाँ चुप होता वो तो और ज़ोर ज़ोर से रोने लगता। समीर का हाथ पकड़ कर वो अपना डायलॉग दोहराता " तुस्सी मास्टर माइंड हो सर जी ,मेरे बच्चे अब आप के हवाले हैं। " असल में समीर के स्कूल में बिन्दे  के दोनों बच्चे पढ़ते थे। पढ़ने में बिल्कुल नालायक़ ,ऊपर से बदमाशी में भी पाँव जमाने लगे  थे। बच्चों की शिकायतों से बिन्दा बहुत परेशान था। उन की  फरमाइशें पूरी करते करते बिन्दा  जैसे थक टूट चुका  था।

बिन्दा उर्फ़ बलविंदर सिंह मठारू कोई छोटी मोटी चीज़ नहीं था। ऐसा ' लोहा कुट ' कारीगर था बिन्दा के एक बार कोई डिज़ाइन देख लेता उसे हूबहू बना देता। शहर में कारीगिरी के लिए लोग उस की मिसाल देते थे। लोग अपनी बिल्डिंगस या कोठियों की ग्रिल बनवाने के लिए एडवांस भी दे जाते थे। सब ठीकठाक चल रहा था। पता नहीं बिन्दे को क्या हुआ के बिन्दे ने सुबह से ही पीनी शुरू कर दी। ये शराब बिन्दे को ऐसी लगी के बिन्दे का  काम लगभग खत्म सा ही  हो गया। मण्डली के लोगों ने उसे ख़ूब समझाया पर अब तो जैसे उस का काम में मन ही नहीं लगता था।
नौबत यहाँ तक आ गई के बिन्दा आगे आगे पैसे लेने वाले पीछे पीछे। कोई ऐसा दोस्त नहीं था जिस से बिन्दे ने पैसा न लिया हो। एक मोटरसाइकिल फाइनेंस करवाया था ,किशतें न देने की वजह से फाइनेंस वालों के गुर्गे वो भी उठा कर ले गए। बिन्दा अब सड़क पर आ चुका था।काम  मिलना भी बंद हो चुका था। क़र्ज़ लेने वालों की फहरिस्त लम्बी होती जा रही थी। बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। सुबह सजधज कर बिल्कुल 'नवज्योत सिद्धू 'स्टाइल ड्रेस अप हो कर निकलने वाला बिन्दा अब गायब रहने लगा था। 
अड्डा बंद हो चुका था। चण्डाल चौकड़ी के लोग इधर उधर शिफ्ट हो गए थे ,कभी कभी मिलना होता था। असल में समीर की दुकान पर *ए*टी*एम *लग गया था। बिन्दे ने एक नौकरी ज्वाइन कर ली थी। कभी आते जाते बिन्दे से दुआ सलाम हो जाती थी। मास्टर माइंड  बिन्दा जैसे फेल हो गया था। सदाबहार बिन्दे को जैसे चुप्पी लग गई थी।
३ -४ महीने पहले समीर की बिटिया की शादी पर बिन्दे से फिर मुलाक़ात हुई। बहुत ही जोश से मिला बिन्दा। मिलते ही बोला, चमचम भी आई हुई है। असल में बिन्दे की पत्नी जब भी मायके जाती तो अपने घर से रसगुल्ले की तरह की एक मिठाई चमचम   ज़रूर ले कर आती। बस इसी वजह से भाभी को सभी चमचम के नाम से पुकारने लगे थे।
भाभी को मिलने के बाद मैं और बिन्दा  पण्डाल  से बाहर  आ गए। लगभग तीन साल के बाद मिलना हुआ था। मैने बच्चों का हालचाल पूछा। बिन्दा रो पड़ा। उसका एक बेटा किसी जुर्म में जेल में था। दूसरा बेटा  भी अभी कोई काम नहीं कर रहा था। बिन्दा बोला ,"सर जी तुस्सी ते  मास्टर माइंड  हो ,ये बच्चों ने सारा काम ख़राब कर दिया है जी। "आँसूं पोंछते ही बिन्दे ने साथ ही रखी दारु की  बोतल में से एक जाम बनाया और अपने अंदर उड़ेलते ही बोला ,"सर जी चियर्स ,सर जी तुस्सी मास्टरमाइंड हो। ये बोलते बोलते बिन्दा वापिस पण्डाल में चला गया।
मैं मास्टर माइंड को पण्डाल में जाते हुए देखता रहा-----भीड़ में वो कहीं खो गया।
ना मुफलिसी हो तो ,कितनी हसीन है दुनिया ----------मैं फ़िराक की ये पंक्तियाँ गुनगुनाने लगा।                            
मास्टर माइंड के साथ ये मेरी आखिरी मुलाक़ात थी।      




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