Saturday, 28 December 2013

Waqt...........!

कोई बात चले और महंगाई का ज़िक्र न हो ये आज के ज़माने में सम्भव ही नहीं। आज घर जाते हुए चाँद बाऊ जी से मुलाक़ात हो गई। पिछले २ वर्षों से चाँद बाऊ परेशान चल रहे हैं। कानूनी लड़ाई लड़ते लड़ते थक से गए हैं बाऊ जी। कुछ उम्र का तकाज़ा और दूसरे भाईयों से जायदाद का झगड़ा और ऊपर से महंगाई की मार।

ऑफिस में टी वी चल रहा था।मोदी के जादू के बाद दिल्ली में केजरीवाल की ताजपोशी की  ख़बरों का सिलसिला बदस्तूर जारी था। टी वी देखते हुए चाँद बाऊ जी बोले ,"हुंण  दस्सो केजरीवाल ने कदी सोच्या सी के ओ दिल्ली दा मुखमंत्री बनेगा। " मैंने उनकी इस बात में हामी  भरते हुए कहा ,"हाँ जी कमाल कर दिया केजरी ने। "

बात का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा ,"असल में लोग मौजूदा सिस्टम से तंग आ चुके हैं। भ्रष्टाचार ,गरीबी ,बेरोज़गारी और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। आज कल तो परिवार पालना  मुश्किल हो गया है चाँद बाऊ  जी। "

चाँद बाऊ जी की यादास्त कमाल की है। जब भी किसी बात का ज़िक्र करते हैं, दिन,महीना ,साल और समय का ज़िक्र न हो तो ऐसा लगता है मानो बाऊ जी कुछ भूल रहे हैं। मैंने महंगाई का ज़िक्र क्या किया-----------बाऊ  जी तो बस शुरू हो गए। बाऊ  जी बोले ,"बस पूछो ही न जी। सन १९७५ की बात है ,मैं ट्रक चलाता था। 80 पैसे प्रति लीटर डीज़ल और 1 रूपए 75 पैसे प्रति लीटर पेट्रोल का रेट था उन दिनों।"

आदतानुसार दिन,महीने और साल का ज़िक्र करते हुए बाऊ जी आगे बोले ,"लगातार 6 महीने तक नागपुर से संगतरे लोड कर के दिल्ली लाते थे हम। उस टाइम संगतरे का क्या रेट होगा?"उन्होंने ये प्रश्न मेरे ऊपर दाग़ा। इस से पहले मैं उन के इस प्रश्न का जवाब देता बाऊ जी ने अपनी बात का सिलसिला जारी रखते हुए कहा ,"5 रूपए सैंकड़ा का रेट था संगतरों का उन दिनों। " उन्होंने आगे बताया कि वो नागपुर से 10 रूपए के 200 संगतरे ख़रीद  कर अपना सफ़र शुरू करते थे। क्लींडर संगतरे छील कर देता रहता था और यारां  दी ग ड्डी दिल्ली कब पहुँच जाती पता ही नहीं चलता था। "

किस्से और कहानियों का तो जैसे ख़ज़ाना हो बाऊ जी के पास।वो आगे बोले ,"2 रूपए में भरपेट खा लिया करते थे उनदिनों। 50 पैसे की दाल और 10 पैसे की रोटी। साथ में दही और बाद में चाय भी।" जब खाने पीने की बात चली तो मैने चाँद बाऊ से पूछा ,"क्या मूरथल  के ढ़ाबे भी होते थे उन दिनों। "उन्होंने आहूजा नम्बर 1 ढ़ाबे  का ज़िक्र करते हुए कहा ,"ये पहले प्यारे का ढ़ाबा  के नाम से मशहूर था। आहूजा उसके पास काम करता था। "करनाल से दिल्ली जाते हुए सोनीपत के नज़दीक मूरथल के ढ़ाबे आज भी मशहूर हैं।

चाँद बाऊ ने बहुत मेहनत की है अपने जीवन में। मैंने उन से पूछा ,"कब से शुरू किया था आप ने ट्रक चलाना ?"वो झट से बोले ,"सन 1968 में ड्रिवेरी शुरू कर दी थी मैंने,1970 में लाइसेंस बनवाया और 1977 में ट्रक चलाना छोड़ मैं पंजाब चला गया था।

 "कहानी को आगे बढ़ाते हुए बाऊ जी बोले,"बस यहाँ से मेरी ज़िन्दगी का यू टर्न शुरू हुआ समझो।यहाँ मैंने हवाई चप्पलों का काम शुरू किया। 1 रूपए दर्जन कमीशन मिलती थी उन दिनों। इस काम में मज़ा आने लगा और दो साल के बाद अपनी फैक्ट्री खोल ली। "

फैक्ट्री के लिए खरीददारी से लेकर बेचने का काम ख़ुद बाऊ जी करते थे। धीरे धीरे मार्किट की समझ आने लगी तो हैंडलूम का काम शुरू कर दिया। एक बाऊ जी की मेहनत और दूसरे किस्मत का जोर। मिट्टी को भी हाथ लगाते तो सोना हो जाती।

 ख़ूब कमाई होने लगी चाँद बाऊ की।दो छोटे भाई थे उनके। बच्चों की तरह पाला बाऊ जी ने उनको।काम के बढ़ने के साथ साथ दोनों भाई भी बड़े हो चुके थे।काम की ज़िम्मेदारी भी सम्भालने लगे थे दोनों।अपने बड़े भाई को राम की तरह पूजते थे दोनों छोटे भाई। चाँद बाऊ भी अपने भाइयों की तारीफ करते नहीं थकते थे।  भाइयों का साथ मिलते ही चाँद बाऊ को तो जैसे पँख लग गए। पूरे हिंदुस्तान में चाँद बाऊ जी के कम्बल सप्लाई होने लगे। पैसा तो जैसे बरसने लगा था.

जैसे जैसे पैसा आने लगा बाऊ जी ने प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करना शुरू कर दिया।काम के साथ साथ प्रोपर्टी के दाम भी बढ़ते गए।बाऊ जी ने जो कुछ भी खरीदा सांझे में खरीदा यानि के तीनों भाईओं की के नाम। आज बाऊ जी के पास तीन मंज़िला मकान ,एक आलिशान फार्म हाउस ,शहर के बीचों बीच कईं कमर्शियल दुकानें ,दो हैंडलूम मिल और न जाने क्या क्या। आज की मार्केट के हिसाब से वैल्यू लगाई जाय तो 100 करोड़ का माल तो होगा चाँद जी के पास।

महँगाई की बात चल ही रही थी ,मैने वैसे ही पूछ लिया ,"ये फार्म हाउस कितने में ख़रीदा था आपने ?"

बाऊ जी तुरन्त बोले ,"तुस्सी विश्वाश नहीं करोगे ,मेन जी टी रोड ते है फॉर्म हाउस ,सन 1983 में 22 रूपए प्रति गज का रेट था ,कोई जाता नहीं था उस साइड ,उस भले ज़माने में डबल रेट में खरीदी थी वो जगह। " "आजकल क्या रेट है वहाँ ?" ,मैंने अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए उनसे पूछा।

चाँद बाऊ का तो जैसे सीना चौड़ा हो गया।" होगा यही कोई 10 -12 करोड़ रूपए।यही कोई 30 -40 हजार प्रति गज।  8 लाख रूपए की खरीदी थी ये जगह।" ये कहते ही जैसे बाऊ जी अपने भूत काल में खो गए।

 मैंने उन्हें हिलाया ,बाऊ जी रुआंसे से हो गए। अपने को सम्भालते हुए बोले ,"सत्यानाश कर दिया इन भाइयों ने। ये दिन देखने थे बुढ़ापे में।

वक़्त ने ऐसा पलटा खाया के चाँद बाऊ  जी की तो जैसे दुनिया ही बदल गई। दोनों भाई बाग़ी हो गए। क्या फार्म हाउस और कम्बल बनाने की दोनों मिलें---- सब पर कब्ज़ा कर लिया छोटे भाइयों ने।राम के लक्ष्मण और भरत ने राक्षशी चोला डाल लिया था।जहाँ भी मिलते अपने बड़े भाई को माँ -बहन की गालियां ऐसे निकालते मानो एक माँ के पेट से जन्म न लिया हो।

कईं बार पंचायत हुई बंटवारे के लिए। चाँद बाऊ ने भरी पंचायत में कईं बार हाथ जोड़ कर कहा ,"मुझे और कुछ नहीं बस मेरा हिस्सा दे दो। "छोटे भाइयों का तो जैसे ख़ून पानी हो चुका था।वो पंचायत की किसी भी बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे। न जाने किस जन्म का बदला ले  रहे थे।        

असल में चाँद बाऊ जी पुलिस स्टेशन से हो कर आ रहे थे।भाई अक्सर गाली गलौच और मारपीट करने लगे थे। बातों बातों में कहने लगे ,"बिना पैसे लिए तो काम ही नहीं करते पुलिस वाले। कोर्ट में रिपोर्ट देने के 2000 हजार रूपए दे कर आया हूँ। एक ज़माना था ,जब हम ट्रक चलाते थे ,अगर कोई पुलिस वाला रोक लेता तो 2 -5 रूपए में पुलिस वाले खुश हो जाते थे।

 प्रॉपर्टी बँटवारे का केस भी कोर्ट में डाल दिया था।कोर्ट तो कोर्ट हैं--------न जाने कितना समय लगे। मेरे घर जाने का समय हो चुका था। बाऊ जी की कहानी सुनते सुनते मेरा भी मन भर आया। मेरा ध्यान उन के बेटे की तरफ चला गया। मैंने  उनसे पूछा ,"बेटे का क्या हाल है। " बाऊ जी तो जैसे अन्दर  तक टूट गए आँखें भर आई और बोले ,"राज करने के दिन थे उस के ,पर वक़्त को पता नहीं क्या मंज़ूर है। आज कल नौकरी कर रहा है बेटा। "

इतने में चाँद बाऊ जी के फ़ोन की घण्टी बजी ,उन्होंने टेबल से अपनी टोपी उठा कर सिर पर डाली। कहने लगे, "पुलिस स्टेशन से फ़ोन है। मैं उन्हें देखता रहा और वो पुलिस स्टेशन की ओर रवाना हो गए। चाँद बाऊ कब मेरी आँखों से ओझल हो गए  मुझे पता ही नहीं चला। 

    

    


   

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