Sunday, 29 December 2013

THUMBS UP.............!

"पल पल जीती हर पल मरती",लड़किओं कि एक ऐसी कहानी जिस में लेखक ने उन की  रोज़मर्रा ज़िन्दगी में होने वाली मुश्किलात का बाखूबी  वर्णन किया है। बात लगभग दो माह पूर्व की है जब मुझे लड़कियों  के एक स्थानीय कॉलेज में नाटक करवाने का मौका मिला। जब लड़कियों  के मुद्दे पर नाटक करने की बात आई तो कोई अच्छी स्क्रिप्ट उपल्बध  नहीं हुई।  ऐसे में स्क्रिप्ट फाइनल होने से पहले कुछ इम्प्रोविज़ेशन्स पर काम चलता रहा। सहसा मुझे अपने लेखक  दोस्त का ध्यान आया।









 मैंने  मोहिंदर को फ़ोन लगाया उस ने तुरन्त  मेरी समस्या का हल ये कहते हुए कर दिया ,"तू चिंता न कर मैं शाम तक तुझे कुछ लिख कर भेजता हूँ। " ये डायलॉग सुन कर मैं ज़ोर से हँसा और दूसरी तरफ से मोहिंदर का ठहाका सुन कर मैं भी और ज़ोर से हँसने लगा।  हम दोनों को ये समझने में देर न लगी के हम क्यों हँस  रहे  हैं।
हँसते  हँसते  मोहिंदर बोला,"अरे ,मुझे भी अरोड़ा  साब  या सुधीर समझ लिया क्या ?'असल में मैं मोहिंदर को पहले -"चिन्ता  न करो "के बारे में एक किस्सा सुना चुका था।किस्सा असल में यूं था की मेरे कई नाटकों में  अरोड़ा जी ने music दिया और मैं जब भी उन्हें रिहर्सल के लिए बोलता तो वो हर बार मुझे यही कहते , " चिंता न करो मैं संभाल लूँगा " मोहिंदर आजकल मुम्बई में फ़िल्म निर्माण और लेखन के साथ साथ अपनी एक एडवर्टीज़िंग कम्पनी चला रहा है।

ख़ैर , स्क्रिप्ट आ गई और रिहर्सल शुरू गई। नाटक की  शुरूआत से ही कई किस्से जुड़ने लगे  थे। नाटक की  कहानी चूँकि  लड़कियों  की आम ज़िन्दगी और समस्याओं से जुड़ी हुई थी इसलिए डायलॉग भी थोड़े बोल्ड थे।
रिहर्सल शुरू हुई , दो -तीन दिन रिहर्सल के साथ साथ लड़कियों  से बातचीत भी करता रहा। बातचीत से ये बात तो स्पष्ट हो गई के लड़कियां अपनी समस्याओं के प्रति जागरूक हैं लेकिन आवाज़ उठाने के नाम पर कुछ डर  महसूस करती हैं और खुल कर बोलने से कतराती हैं। ज्यों ज्यों रिहर्सल आगे बढ़ती गई नये किस्से कहानियाँ  भी बनते गए।

रिहर्सल के दूसरे  दिन ही नाटक में लीड रोल  करने वाली एक लड़की गायब थी। हालाँकि वो होस्टल  में रहती थी। जब इस बारे प्रियंका और काजल से पूछा  गया तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ़  देखा और बिना कोई जवाब दिए मुस्करा दीं। ये दोनों भी हॉस्टल में रहती थी इस् लिए मैने दोबारा पूछा ,"आख़िर  बात क्या  हुई पता तो चले कि ज्योति के न आने का कारण क्या है।" लड़की के न आने का कारण सुन कर मैं हैरान हो गया। ज्योति ने अपनी बात कुछ इस तरह से रखी ,"सर ,असल में  बात ये है के ज्योति पानीपत की रहने वाली है और पानीपत के  जिस कॉलेज में इस बार यूथ फेस्टिवल होने जा रहा है वहाँ  उसका भाई पढ़ता  है।अगर उस के घर वालों को को ये पता चल गया कि ज्योति नाटक में भाग ले रही है तो हँगामा हो जाएगा। " मुझे समझते देर न लगी के आख़िर क्यों ज्योति रिहर्सल पर नहीं आई।


मुझे  नाटक का डायलॉग याद आ गया  ,"क्या आप जानना चाहते हैं के रेप  कब शुरू हुआ था----------रेप शुरू हुआ था उस दिन ,जिस दिन आप ने अपनी बेटी को नज़रें झुका कर चलने के लिए बोला था। "

रिहर्सल के दौरान चाय देने के लिए एक महिला हर रोज़ आती थी। लड़कियां उसे विमला ऑंटी  कह कर सम्बोधित करती थीं। चाय देने के बाद विमला कुछ देर के लिए नाटक देखती और अपने काम पर लौट जाती। इसी तरह कॉलेज की  छात्राएँ  भी हॉल में आतीं ,नाटक की  रिहर्सल देखती और बिना कोई कमेंट दिए  वापिस लौट जाती। रिहर्सल कॉलेज के हॉल में हो रही थी ,इस लिए जब भी कोई पीरियड फ्री होता वो घूमते फिरते नाटक की रिहर्सल देखने हॉल का चक्कर लगा लेती। रिहर्सल करते १० दिन हो चुके थे। लड़कियों  ने नाटक को समझना शुरू कर दिया था। रिहर्सल के वो पूरी लय में होती। अब विमला ने चाय देने के बाद ज्यादा  देर नाटक देखना शुरू कर दिया था , इधर उधर खड़े हो कर नाटक देखने वाली इक्का दुक्का , लड़कियां अब ग्रुप में------मैं इसे झुण्ड में कहूँ तो बेमानी न होगी,आ कर नाटक देखने लगी थी।


 आज नाटक की  फुल रिहर्सल थी। जब मैं हॉल में पहुंचा तो लगभग २०० लड़कियाँ  इधर उधर घूम रहीं थीं। शायद कॉलेज में कोई फंक्शन था और वो सब उस का फायदा उठा कर अपने फ़ोन पर बातें करने में मशगूल थीं।ऑडिटोरियम फुल प्रूफ पी.सी.ओ.बना हुआ था। मैंने लड़कियों को धीरे से नाटक शुरू करने के लिए कहा। उन्होंने भी बिना किसी  देरी के नाटक शुरू कर दिया। इतने दिनों साथ काम करते करते वो मेरे इशारे को भी समझने लगी थीं। मैं आज की  रिहर्सल से ये जानना चाहता था के नाटक लड़कियों के  दिल के कितने करीब है।

रिहर्सल स्टार्ट होते ही लड़कियाँ स्टेज के आसपास इकठ्ठा होने लगी। जैसे जैसे नाटक आगे बढ़ा हॉल में सन्नाटा छा  गया। फिर क्या था नाटक के हर डायलॉग  पर दर्शक बनी लड़कियों के चेहरे के भाव मैं अच्छी तरह पढ़ पा  रहा था।  मॉडर्न बनी कोमल के एक डायलॉग ,"अब क्या है दादी ,मेरी टाँगें दिख रही हैं तो क्या हुआ ,कोई *लेग पीस *समझ कर खा थोड़े ही जाएगा। " लड़कियों ने ज़ोर  से ठहाका लगाया।

  प्रियंका और काजल के एक दूसरे डायलॉग ,"अरे क्या हुआ तुझे ,क्या सोच रही है ?मैं सोच रही हूँ के हर बार लड़की या औरत को ही दोषी क्यों ठहराया जाता है। क्या समाज के ठेकेदारों पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सकता। कोई कहता है के लड़कियों का पहरावा ही दुष्कर्म को बढ़ावा देता है। या फिर कोई ख़ाप का चौधरी एक तुग़लकी फरमान जारी करता है और किसी प्रेमी जोड़े को भाई बहन के रिश्ते में बाँध दिया जाता है। कभी कोई वकील कहता है ,मेरी बेटी होती तो मैं उसे ज़िंदा जला देता।कभी कोई धर्म गुरु कहता है के अगर भईआ बोलती तो छोड़ देता। "ने ऑडिटोरियम में जैसे खामोशी भर दी।

दोनों कि बातें सुन रही खुशबू के डायलॉग ,"जिसने रॉड अन्दर तक घुमा दी वो भला किसी पे कैसे रहम करता।"ने जैसे सब को सोचने पर विवश कर दिया। दर्शक दीर्घा में खड़ी लड़कियाँ जैसे बुत हो गई।चाय पिलाने वाली विमला रोने लगी।लड़ीवार डायलॉग का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ था। अगले डायलॉग ने तो जैसे पूरे समाज की कलई ही खोल कर रख दी।

 प्रियंका भरे मन से दर्शकों से रूबरू होते हुए बोली,"मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूँ के अगर लड़कियों का पहरावा ही दुष्कर्म को बढ़ावा देता है तो हर रोज़ छोटी बच्चियों और बुज़ुर्ग औरतों के साथ दुष्कर्म की ख़बरें टीवी और समाचार पत्रों की सुर्खियाँ क्यों बनती हैं। काजल के अगले डायलॉग,"हम आपको बताना चाहते हैं के सेक्स कोई फिजिकल एक्ट नहीं बल्कि एक मनोवृति है ,जिसे समझना बहुत ज़रूरी है। " ने तो जैसे सब को चिंतन के लिए मजबूर कर दिया।

कईं दिनों से लड़कियों की हिफाज़त के नाम पर ड्यूटी पर तैनात कॉलेज की अध्यापिका अम्बिका को तो जैसे नाटक अन्दर तक छू गया। वो अपनी कुर्सी से उठी और मेरी तरफ थम्स अप करते हुए बोली," सर कमाल  कर दिया।मैंने भी नम्रता पूर्वक अम्बिका मैडम का धन्यवाद करते हुए कहा ,"मैडम ये सब कमाल तो बच्चों की मेहनत और जानदार स्क्रिप्ट का है। "

धन्यवाद मोहिंदर प्रताप सिंह और कॉलेज प्रशासन व विशेषकर भण्डारी ,संगीता ,काद्यान ,अम्बिका और वो सभी अध्यापिकायें जो समय समय पर लड़कियों को नाटक के लिए प्रोत्साहित करती रहीं। कॉलेज के वो सभी        
कर्मचारी जिन्होंने सेट और अन्य कामों में नाटक मण्डली की मदद की। नाटक मण्डली की सभी नायिकाओं को भी मेरा सलाम। क्यों कि आप के दृढ़ निश्चय और लग्न से ही ये सब सम्भव हो सका। 

सच में मोहिंदर आप ने क़माल का नाटक लिखा है !

दुष्यंत की ये पंक्तियाँ मैं अक्सर दोहराता हूँ।
"हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
कोशिश है के तस्वीर बदलनी चाहिए।"


No comments:

Post a Comment