Thursday, 19 December 2013

PARTY

दौरे जाम चल रहे थे ,महफ़िल में वही गिनेचुने साथी -------राहुल, डॉ डेंग ,भाटिया ,चौधरी साब,रणबीर,बबलू  और समीर। समय के साथ साथ दोस्त और अड्डा भी बदल चुका था। ऐसा नहीं के पुराने दोस्तों के साथ किनारा कर लिया गया था। दो जाम अंदर जाते ही सब का ज़िक्र शुरू हो जाता था। हर महफ़िल में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सब को जोड़ने और ज़िंदा रखने का काम करते हैं। इस महफ़िल में ये काम चौधरी साब और समीर कर रहे थे। 

इस महफ़िल में तो जैसे जमावड़े का बहाना ढूंढ़ते ते सब लोग। किसी की चोरी हुई एक्टिवा मिली हो या फिर किसी का कोई घर बिक गया हो,बस हो गई पार्टी ----------सब लोग जैसे पार्टी का बहाना ढूंढते थे।एक दिन तो चौधरी सब ने कमाल ही कर दिया। पम्मी लगभग २० दिन के बाद महफ़िल में लौटा था।उस के पिता की मृत्यु के बाद वो पहली बार आया था। थोड़ी देर की बातचीत के बाद कहा  था ,"पम्मी  जी इस बार तो grand party होगी।" पम्मी के मुख पर एक ख़ास मुस्कान थी। असल में पम्मी के पिता करोड़ों की सम्पति छोड़ गए थे। पम्मी उस का अकेला वारिस था।

 कल  पम्मी ने बातों ही बातों में बताया के नीलोखेड़ी से करनाल  आते हुए उस का एक्सीडेंट होते होते बच गया। सब ने उसका  हालचाल या कारण पूछने के बजाये एक स्वर में  कहा ,"पम्मी जी फिर तो पार्टी हो जाए।" पम्मी सकपका कर बोला ,"कमाल है आप लोगों की ,मैं मरते मरते बचा हूँ और तुम लोगों को पार्टी की सूझ रही है। 

समीर कि हाज़िर जवाबी के सब कायल थे। उस के बिना महफ़िल अधूरी लगती थी। क्या ग़म क्या ख़ुशी ------वो एक ऐसी फुलझड़ी छोड़ता ,सब हँस  हँस  कर लोटपोट हो जाते। पम्मी की बात सुन कर भी समीर से रहा न गया वो तपाक से बोला ,"पम्मी जी जान बची सो लाखों पाए ,लाखों रूपए की जान बच गई है तेरी----------- ४ -५ सौ खर्च कर भी  देगा तो भी लाखों का प्रॉफिट है तुझे। "असल में पार्टी का दबाव उसी पर बनाया जाता था जो पार्टी देने में ज़यादा आनाकानी करता था। समीर की बात सुन कर सब ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। पम्मी ने अपनी आदत के अनुसार समीर को एक मोटी सी गाली निकाली। अपनी झेंप मिटाते हुए वो बाहर  का रुख करने लगा। समीर ने पम्मी की बाहँ  पकड़ते हुए हँसते हुए  एक जुमला और छोड़ा " जान के साथ साथ पम्मी  पार्टी के पैसे भी बचा गया है.----- भाइयो। " पम्मी अपना हाथ छुड़वा कर बाहर  निकल गया।''


सब का हँसते हँसते  बुरा हाल हो चुका था। पेट में बल पड़ने के साथ साथ सब की  आँखों में आँसूं निकल आए  थे। हँसी हो या ग़मी समीर का तो जैसे जीने का अंदाज़ ही अलग था। समीर ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, ,"हँस लो ,हँस लो ,अगली बारी तुम्हारी ही है।अगला विकेट तुम में से किसी का गिरने वाला है। " सब ने समझा मानो समीर पार्टी के बारे में कह रहा है। चौधरी साब तुरन्त  बोले ," मुझे  तो जब कहोगे पार्टी दे दूंगा। डॉ डेंग भी बोला ,"मैं भी कभी पीछे नहीं हटता ,क्यों चौधरी साब। " डॉ डेंग ने चौधरी साब की हामी भरवा कर जैसे अपनी बात पर मोहर  लगवा ली थी। "

असल में पम्मी और डॉ डेंग का स्वभाव बिल्कुल एक जैसा था। पैसा खर्च करने के नाम पर दोनों को जैसे साँप सूंघ जाता हो । हालांकि डॉ डेंग का स्वभाव पिछले कुछ दिनों से बदल चुका था। समीर ने माहौल का मिजाज़ बदलते हुआ कहा ,"भई मेरा मतलब पार्टी से नहीं बल्कि विकेट गिरने से है।" क्रिकेट का प्लेयर होने के वजह से समीर अपनी बातों में क्रिकेट को ज़रूर जोड़ देता था। सब टेलिविज़न की और देखने लगे। असल में टेलिविज़न पर भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच क्रिकेट मैच चल रहा था ।

समीर हँसते हँसते  फिर बोला ,"तीन विकेट गिर चुकी हैं आप की टीम की। बिन्दा ,शंटी और कक्कड़।" अभी पाँच  दिन ही तो हुए थे बिन्दे  की मौत को। शंटी लगभग डेढ साल पहले ही टीम को छोड़ कर जा चुका था। कक्कड़ के बारे में मुझे कोई ख़बर  न थी। मैंने हैरानी से समीर की और देखा। समीर ने भी मेरी तरफ हैरानगी से देखते हुए कहा ,"परसों ही तो कक्कड़ की क्रिया थी।मैं भी नहीं जा सका वहाँ। "

शंटी ,बिन्दा और कक्कड़ समीर के पुराने साथी थे। अड्डा और समय  बदलने के कारण महफ़िल के पुराने साथियों से मिलना कम ज़रूर हो गया था लेकिन उन्हें भूला  कोई नहीं था। बेशक़ शंटी की विकेट गिरे और टीम का साथ छोड़े डेढ बरस हो गया था ,पर कोई ही ऐसा दिन होता होगा के जब चार यार इकठा हों और शंटी को याद न किया जाता हो। क्योंकि शंटी बंदा ही  ऐसा था------यारों का यार।

समीर की  बात समझ आते ही सब दोबारा ज़ोर ज़ोर से हँसने  लगे। समीर का अंदाज़े बयाँ ही कुछ ऐसा था के चाहते हुए भी कोई अपनी हँसी नहीं रोक सकता था। जैसे ही चौधरी साब को समीर की बात समझ आई वो कमरे का गेट खोल  कर बाहर  निकल गए। ऐसे क्रिकेट मैच में चौधरी साब का कोई इंटरेस्ट नहीं था। क्यों के चौधरी साब को तो ये विश्वास हो चुका था के आदमी के मुख में लक्ष्मी का वास होता है। इस लिए वो कोई ऐसा मैच नहीं खेलना चाहते थे ,जिससे उन का विकेट गिर जाए और वो आउट हो जाएँ।असल में चौधरी साब कईं दिनों से बीमार चल रहे थे और वो फील्ड  में रह कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे।

हँसते हँसते एकदम से महफ़िल में सन्नाटा छा गया था। चौधरी साब मैच छोड़ कर जा चुके थे। महफ़िल में जमा सभी खिलाड़ी फिर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। वो ऐसे हँस  रहे थे मानो उनकी विकेट कभी नहीं गिरने वाली थी।  सभी ने टेबल पर रखा अपना अपना अपना आखिरी जाम उठाया और "चीयर्स " बोलकर अपने अपने घर रवाना हो गए।

मैंने भी अपनी एक्टिवा स्टार्ट की ,ये वही एक्टिवा थी जो चोरी होने के २ साल बाद मुझे मिली थी बिलकुल कंडम हालत में।मुझे लगभग १० हज़ार का नुक्सान हुआ था। पर यारों को तो इस बात की ख़ुशी थी की एक्टिवा घर वापिस आ गई थी और पार्टी  लिए बिना मुझे बख्शा नहीं गया था । धुंध बहुत हो गई थी। मेरी एक्टिवा धुंध को चीरती हुई आगे की और बढ़ चुकी थी।"पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए" गुनगुनाते मैं कब घर पहुँच गया मुझे पता ही न चला।

1 comment:

  1. YE SAALI ZINDAGI BHI CRICKET MATCH KI TARAH HAI PATA NAHIN KAB KIS KI WICKET GIR JAAIAY........CHEERS

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