Sunday, 17 November 2013

CHINTA NA KARO,KOI PROBLEM NAHIN HOGI....."Don't worry there will be no problem"

एक बार बच्चों के साथ थिएटर वर्कशॉप  कर रहा था। बच्चों कि उम्र कोई ७ साल से १५ साल की  रही होगी।मेरी आशा के अनुरूप  सभी बच्चे  काफ़ी होशियार और तेज़ थे।मैंने  उनको बताया के नाटक  करना अपने आप में  एक  जूनून होता है। हर व्यक्ति  के बस की बात भी नहीं है नाटक करना।आप यहाँ आये हैं तो इस लिए आप ख़ुद  को स्पेशल समझें। मैंने  अपनी बात दोहराई -"हर व्यक्ति  के बस कि बात नहीं है नाटक करना।"वर्कशॉप के शुरुआत में  कही गई ये बात शायद उन्हें समझ आ गई  थी।बच्चों ने ख़ूब  मेहनत की और वर्कशॉप के दौरान बताए गये टिप्स ,  अपनी एक्टिंग ,इमेजिनेशन ,ऑब्जरवेशन और लगन से ये सिद्ध कर दिया के बच्चे सोच समझ में किसी से कम नहीं होते।

बच्चों की  इस परफॉरमेंस की सभी ने सराहना की। थिएटर वर्कशॉप का प्रबंधन स्थानीय सामाजिक संस्था द्वारा किया गया था। भाग्यवश संस्था के डायरेक्टर गीतकार होने के साथ साथ संगीतकार भी थे। मैने उन को नाटक के बारे में बताया और गुज़ारिश की ,"नाटक में यदि गीत संगीत में आप हमारी मदद कर देंगे तो नाटक में चार चाँद लग जाऐंगे। उन्होनें हमेशा की  तरह अपने एक ख़ास  अंदाज़ में कहा ,"चिंता ना  करो ,कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। क्या पहले आप को कभी प्रॉब्लम आई है? " उन के इस प्रशन का मैं कोई  जवाब देता,वो  अपने शिषयों को किसी राग के बारे में बतलाने लगे।

 इस बार मैं अरोरा जी,(गीतकार व  संगीतकार) को साफ़ साफ़ कह  देना चाहता था के हमेशा आप ही की वज़ह से नाटक के साँस फूल जाते हैं। असल में मैं अरोरा जी  के साथ कईं  सालों से काम कर रहा था। ऐसा नहीं के मैंने पहले उन को  कभी ऐसा नहीं कहा था ,लेकिन इस बार मैं सीरियस था। लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी वही हुआ जिस का मुझे डर था।रिहर्सल्स शुरू हो चुकी थी , २०-२५ दिन से बच्चे कड़ी मशक़त कर रहे थे। इस दौरान  अरोड़ा जी से कईं  बार मुलाक़ात हुई पर उन्होने नाटक के म्यूजिक बारे कभी कोई बात नहीं की। मेरे द्वारा म्यूजिक की  बात किए जाने पर उन्होंने हमेशा की तरह बस यही कहा ,"चिंता ना  करो कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। "

जिस का डर  था वही हुआ -नाटक बढ़िया हुआ ,बच्चों की  एक्टिंग को भी सराहा गया लेकिन सभी ने ये ज़रूर कहा ,"म्यूजिक ठीक से होता तो परफॉरमेंस में चार चाँद लग जाते। "मुझे कोई ज्यादा  दुःख नहीं हुआ, मैं म्यूजिक वालों के इस फैशन से वाक़िफ था। परफॉरमेंस वाले दिन शो से कुछ देर पहले केसिओ पर उँगलिआ  घुमाई और पूरे कॉन्फिडेंस से बोला ,"चिंता ना  करो कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। या फिर कभी कभी कोई ये भी कह देता है ,"चिंता न करो ,मैं संभाल  लूँगा। "

 वैसे हम ज़िन्दगी में भी  हर रोज़ नए क़िरदार  निभाते हैं पर असल ज़िन्दगी और स्टेज पर दिखने वाले करक्टेरस में  काफ़ी  अंतर होता है। दोनों में फ़र्क़ ये  है के असल ज़िन्दगी का  करक्टेर थोड़ा  पेचीदा और  मुश्किल होता है।   असल ज़िन्दगी का करक्टेर जो दिखाई देता है वो होता नहीं और जो वो होता है वो दिखाई नहीं देता।  इस के बिल्कुल  विपरीत स्टेज पर एक्टर के द्वारा  जो करक्टेर निभाया जा रहा होता है  वो अपने अंदर और बाहर पूरी सच्चाई  लिए होता है। यही फर्क सिनेमा और स्टेज में  भी है। सिनेमा में  मीटर को  सुविधानुसार ऊपर नीचे किया जा सकता है लेकिन स्टेज पर जो दिखाई देता है वही  वास्तविकता होती है।

नाटक करने वाले जानते हैं के इस दौरान एक्टर्स और डायरेक्टर स्वयं को न जी  कर उन पात्रों  को जी  रहे होते हैं जिन्हें उन्हें स्टेज पर जीवान्त  करना होता है। नाटक एक ऐसी विधा है जिस में संगीत ,गीत,अभिनय,श्रृंगार ,सेट और मेकअप का अपना अपना महत्व होता है। यदि ये सभी सलीके से नाटक में प्रयोग हो जाएं तो  नाटक में  सात्विकता आ जाती है। और फिर नाटक -नाटक न रह  कर असल ज़िन्दगी बन जाता है।नाट्य शास्त्र में भी इस बात का वर्णन है के कोई भी नाटक सात्विक तभी कहलाता है जब उस में सभी विधाएँ पूरी तरह से एक -दूसरे के साथ सामजस्य बना लेती हैं। 

पिछले कईं सालों  के अनुभव पर जब नज़र दौड़ाता हूँ तो लगता है जैसे बहुत कुछ और किया जा सकता था।   लेकिन फिर ये एहसास मन में  सुकून पहुँचाता  है के जितना किया "भरपूर" किया। इस बात का हमेशा अफ़सोस रहा के जब भी नाटक किया म्यूजिक वालों ने हमेशा दग़ा  दिया।

हाल ही में  बच्चों के साथ नाटक किया ,"पल पल जीती हर पल मरती। "

 इस बार स्तिथि कुछ अलग थी। यहाँ अरोड़ा  जी  नहीं बल्कि सुधीर जी  थे। सुधीर जी  को भी मैंने वही  बात दोहराई। मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ना रहा जब सुधीर जी  ने कहा ,"एक बार रिहर्सल देख लेते हैं तभी पता चल पायेगा कि आप कि क्या रेकुइरेमेंट है। रिहर्सल शुरू हुई ,सुधीर जी   ने बड़े ध्यान से नाटक देखा। नाटक को देखने के  बाद कुछ सीरियस होते हुए सुधीर जी  बोले ,"नाटक तो अच्छा है ,लेकिन मेरे पास वयस्तता कुछ ज्यादा  है। मैं आप को सिर्फ ३-४ दिन ही दे पाऊँगा।"मैं ख़ुश था , सुधीर जी को ये  समझ तो है के नाटक में म्यूज़िक के लिए रिहर्सल  ज़रुरत होती है। मैने दोबारा अपने एक्सपीरियंस का ज़िक्र करते हुए कहा ,"कईं  सालों से नाटक करवा रहा हूँ लेकिन  म्यूजिक के कारण हमेशा नाटक ढीला रह  जाता है।आप से ही उम्मीद है इस बार। " मेरे इन शब्दों में गुज़ारिश के साथ साथ थोड़ी  माखनबाज़ी  भी थी।

तय दिन पर ,शो से तीन दिन पहले मैंने  सुधीर जी  को फ़ोन लगाया। उधर से आवाज़ आई ,"बस १० मिनट में  पहुँच रहा हूँ। " मेरी ख़ुशी का कोई  ठिकाना न रहा। रिहर्सल शुरू हो गई। कुछ देर में  सुधीर जी  भी पहुँच गये। सुधीर जी  के साथ एक ऍकम्पनिस्ट भी था। "जल्द से आप मुझे गाने लिख कर दो ,नाटक तो मैंने  देख ही लिया था। मैं आप को कल रिहर्सल करवा दूंगा। " बच्चों से बातचीत करते हुए  उन्होंने धीरे से कहा। मैंने  उस की तरफ आश्चर्य से देखा तो मुझे अपने पक्ष में  लेते  हुए  कहा ,"आप भी प्रोफेशनल हैं ,क्या है कि आजकल सीजन है। एक्चुअल  में  बात ये है कि अम्बाला और यमुनानगर में  भी करनाल  की  तरह यूथ  फ़ेस्टिवल  चल रहे हैं। वहाँ भी काम पकड़ा हुआ हैं ,आप थोड़ा  एडजस्ट कर लेंगे तो हमारा काम चल जायगा। "मुझे एक बार तो ऐसा लगा मानो  मेरे और सुधीर के बीच कोर्ट में  कोई केस चल रहा है ,ऐसे में  सुधीर मेरे से कोई समझोता करना चाहता है और वो भी कोर्ट के बाहर ही।  "

इस से पहले के मैं उस की  इस बात का कोई जवाब देता ,मैंने  देखा सुधीर अपना केसिओ  अपने काले झोले में  पैक कर चुका  था,ऍकम्पनिस्ट भी ग़ायब  हो चुका  था। मुझे ऐसा लगा मानो किसी मदारी ने अपना खेल दिखा दिया है और अब कह  रहा है ,"बच्चा लोग बजाओ ताली ,ज़िंदगी  रही तो फिर मिलेंगे। "ग़ुस्सा  तो बहुत आ रहा था ,मैंने चेहरे  पर नक़ली मुस्कान बिखेरते हुए  कहा ,"सुधीर जी। "इस से आगे मैं कुछ बोल पाता सुधीर बोला ,"सर आप चिंता न करो ,कोई प्रॉब्लम नहीं होगी मैं सब संभाल  लूँगा। "ये कहते कहते सुधीर बाहर  खड़ी अपनी मोटरसाइकिल तक पहुँच चुका  था। उस ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की  और बोला,"ठीक है सर कल मिलते हैं। "

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