Saturday, 1 March 2014

A LETTER......EK CHITHEE PART-6

 चिठ्ठी पहले सेक्रेसी का सूचक हुआ करती थी। चाहे वो पर्सनेल हो या ऑफिसियल। इंटरनेट के इस युग में पर्सनेल तो कुछ रहा ही नहीं। यही नहीं सूचना के अधिकार ( R.I.T.) RIGHT TO INFORMATION ने तो सब को नंगा ही कर के रख दिया है।
चिठ्ठी एक ऐसा माध्यम है जिस के ज़रिए आप अपनी बात दिल खोल कर कह सकते हैं।
दिल तो मेरा भी ये करता है के एक ऐसी ही चिठ्ठी लिख डालूं। जिसमें कोई बंदिश न हो।
जिस में हो मेरी बात ,तेरी बात ,उसकी बात , इसकी बात ,आप की बात ,सब की बात !
बिना बल छल के! बिल्कुल साफगोही से!
लेकिन क्या करें ये दुनिया वाले कहने ही नहीं देते ----बिना बल -छल के, बिल्कुल साफगोही से !
ये चिठ्ठी मैं ख़ास अपने छोटे भाई पन्नु के लिए लिख रहा हूँ।
पिछले हफ्ते की ही तो बात है अखबारों में चन्द्र शेखर आज़ाद और भगत सिंह को लेकर कुछ ख़बरें और तस्वीरें देखीं। मन को अच्छा नहीं लगा तो लिख दिया "अख़बारों में तस्वीरें छपने लगी हैं,ब्लॉग्स पोस्ट किए जा रहे हैं , रिकार्ड्स बनाने की तैयरीयां शुरू हो गई हैं , बुतों को नहलाया जा रहा है , बुतों पर फूल मालाएं डाली जा रही हैं , राजनेता शहीदों को स्मरण करने लगे हैं , पत्रकार ख़बरें लिखने में मशगूल हैं ,प्रेस फोटोग्राफर्स धड़ाधड़ तस्वीरें खींच रहे हैं ,लेखक पुस्तकें छपवा रहे है ………………२३ मार्च को शहीदे आज़म भगत सिंह का शहादत दिवस है। "
"शहीदी दिवस मनाने का ये अंदाज़े बयां भी ख़ूब है !"
मेरे हरदिल अजीज़ प्रितपाल  सिंह पन्नु को मेरा ये कहना कतई अच्छा नहीं लगा। उसने भी तुरंत लिख डाला ,"Bahut asan hai kisi par b ungli utha dena, Bahut mushkil hai kisi ka haath pakar lena..Bahut asan hai har irade pe shak karna...bhaut mushkil hai iradon ko bulandi dena...Record banane ke liye logon ko prerit karna padta hai Guru Ji. smay nikalna padta hai....comment karne mein to kuchh shabd hi type krne hote hain..." 

असल में आजकल सब कुछ इंस्टेंट हो गया है। मैग्गी हो कॉफ़ी हो या हमारे विचार या भावनाएं। सब कुछ फटाफट। पहले चिठ्ठी लिखी जाती थी सोच सोच कर। अगर अच्छी नहीं लगी तो फाड़ कर दोबारा लिखी जाती थी चिठ्ठी। ऐसा नहीं के ब्लॉग या फेस बुक पर ऐसा करने का आप्शन नहीं है। यहाँ भी आप डिलीट या एडिट से कांट - छांट कर सकते हैं। लेकिन जब तक आप अपने मन की बात को बदलने का बटन दबाते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आप की बात कईं लोगों के अकाउंट में हाई जैक हो चुकी होती है। या फिर आपसी रिश्तों कड़वाहट आ चुकी होती है।  इन चिठ्ठीयों में वो आत्मिकता या आत्मीयता कहाँ !

मैं ये सब लिखना तो नहीं चाहता था परन्तु अब स्वयं को रोक भी नहीं पा रहा हूँ।  सच में प्रितपाल तुम में मैं अपना अक्स देखता हूँ। जो काम सालों पहले मैं करना चाहता था उसे तुम पूरा कर रहे हो। गुरु कहते हो तो एक मशवरा है मेरा ,"जब आप किसी मिशन पर हों और आपके इरादे नेक हों तो कोई क्या कहता है इस की परवाह कतई नहीं करनी चाहिए। " जब आप गाड़ी की सर्विस या सिस्टम की ओवरहॉलिंग करने लगते हैं तो लोग सलाह मशवरा देने लगते हैं। यही नहीं किसी की मय्यत पर भी जाओ तो लोग तो वहाँ भी बाज नहीं आते। "मोटी लकड़ियां नीचे रखो ,अर्रे नहीं ,सिर के नीचे फट्टियां न रखो ,पैरों की तरफ वो रखो ये रखो। लोग तो मृत्यु शैया पर भी अपनी सलाह देने से नहीं चूकते।"
इसलिए जो अच्छा लगे उसे अपना लो और जो मन को न भाए उसे छोड़ दो। ये मत भूलो को दूसरों को भी अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है।
तुम्हें या किसी व्यक्ति विशेष को दुःख पहुंचाने का मेरा कोई ख्याल या इरादा नहीं था। सभी को अपने अपने ढंग से काम करने की स्वतंत्र्ता है और आप को भी। मैं जानता हूँ तुम सच्चाई से इस भ्रष्ट सिस्टम को चुस्त -दुरुस्त करने में लगे हुए हो। मैं तो अक्सर दुष्यंत की ये पंक्तियाँ दोहराता हूँ ,
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।" 

मेरी शुभ कामनाएँ !
   

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