दोस्तों !
आशा करता हूँ सब मंगलमय है। अब कल की ही तो बात है एक पेंच को दीवार में लगवाना था।एक तस्वीर को टांगने के लिए। ड्रिल मशीन नहीं थी मेरे पास। मिस्त्री को बुलवाया १८० रूपए ले गया। मेरी तो जीभ निकल आई। ये जानते हुए भी के महंगाई ,भ्रष्टाचार ,गरीबी और बेरोज़गारी लगातार बढ़ रही है।सच में ऐसे दौर में मंगलकामना मज़ाक सा ही लगता है।
हालाँकि समय की रफ़्तार एक सी है !फिर भी समय को लेकर लोगों के अलग अलग विचार हैं। किसी के लिए समय बहुत तेजी से बीतता है तो किसी के लिए ये थम सा जाता है।कहते हैं के समय सब के लिए एक सा नहीं होता।
मार्च को महीना शुरू हो चुका है। मौसम भी बदल चुका है। फरवरी महीने में जिस धूप का बेसब्री से इंतज़ार किया जाता था उसी धूप में गर्माहट बढ़ने के कारण उससे बचा जाने लगा है।समय के साथ साथ मौसम और इच्छाएँ भी बदलने लगती हैं।
स्कूलों में बच्चों के फाइनल एग्जाम शुरू हो चुके हैं। परीक्षा में सफलता के लिए बच्चे मेहनत करते हैं। साल दर साल परीक्षा पास करते हैं और जीवन की असल परीक्षा में वो या तो फेल हो जाते हैं और या फिर ठगा सा महसूस करते हैं। क्योंकि जीवन की असल परीक्षा तो कर्मक्षेत्र में ही होती है।समय की विडंबना ही है के विधालयों में कर्म क्षेत्र में लड़ने की कोई विद्या नहीं दी जाती।
बचपन में कईं सर्वव्यापी सत्य पढ़ाए जाते थे। सत्य की हमेशा जीत होती है , सूर्य पूर्व से उदय होता है और पश्चिम में अस्त। इस के साथ ही एक यूनिवर्सल ट्रुथ के बारे में और भी बताया जाता था। जीवन "समय चक्र" की तरह है।बताया जाता था के समय परिवर्तनशील है। जाटों को अन्य अनुसूचित जाति (O.B.C.) श्रेणी में शामिल कर लिया गया है।घड़ी की सुइयों का ऊपर से नीचे ,नीचे से ऊपर आना आज समझ आ रहा है। ये कुछ और नहीं "समय चक्र" है।
आम चुनाव नज़दीक हैं। केंद्र सरकार ने कुम्भकर्णी नींद से जागते हुए लोगों को लुभाने के लिए घोषणाओं का पिटारा खोल दिया है। ये पिटारा पहले खोला होता तो अच्छा होता।सरकारी घोषणाएं अब झुनझुना लगने लगी हैं। समय निकल चुका है।
मार्च के इस महीने में रंगों के त्यौहार होली का सब को बेसब्री से इंतज़ार रहता है। टी वी के अलग अलग चेनलों पर होली गीत दिखाए जाने लगे हैं। समय के साथ होली का रंग कुछ फीका पड़ गया है। कुछ लोग तो इस त्यौहार के बारे में ये भी कहते हैं ,"होली तो हो ली !"
"क्या ज़माना था के इक ज़माना हो गया है !"
"शेष अगले ख़त में !" TO BE CONTINUED....................................
आशा करता हूँ सब मंगलमय है। अब कल की ही तो बात है एक पेंच को दीवार में लगवाना था।एक तस्वीर को टांगने के लिए। ड्रिल मशीन नहीं थी मेरे पास। मिस्त्री को बुलवाया १८० रूपए ले गया। मेरी तो जीभ निकल आई। ये जानते हुए भी के महंगाई ,भ्रष्टाचार ,गरीबी और बेरोज़गारी लगातार बढ़ रही है।सच में ऐसे दौर में मंगलकामना मज़ाक सा ही लगता है।
हालाँकि समय की रफ़्तार एक सी है !फिर भी समय को लेकर लोगों के अलग अलग विचार हैं। किसी के लिए समय बहुत तेजी से बीतता है तो किसी के लिए ये थम सा जाता है।कहते हैं के समय सब के लिए एक सा नहीं होता।
मार्च को महीना शुरू हो चुका है। मौसम भी बदल चुका है। फरवरी महीने में जिस धूप का बेसब्री से इंतज़ार किया जाता था उसी धूप में गर्माहट बढ़ने के कारण उससे बचा जाने लगा है।समय के साथ साथ मौसम और इच्छाएँ भी बदलने लगती हैं।
स्कूलों में बच्चों के फाइनल एग्जाम शुरू हो चुके हैं। परीक्षा में सफलता के लिए बच्चे मेहनत करते हैं। साल दर साल परीक्षा पास करते हैं और जीवन की असल परीक्षा में वो या तो फेल हो जाते हैं और या फिर ठगा सा महसूस करते हैं। क्योंकि जीवन की असल परीक्षा तो कर्मक्षेत्र में ही होती है।समय की विडंबना ही है के विधालयों में कर्म क्षेत्र में लड़ने की कोई विद्या नहीं दी जाती।
बचपन में कईं सर्वव्यापी सत्य पढ़ाए जाते थे। सत्य की हमेशा जीत होती है , सूर्य पूर्व से उदय होता है और पश्चिम में अस्त। इस के साथ ही एक यूनिवर्सल ट्रुथ के बारे में और भी बताया जाता था। जीवन "समय चक्र" की तरह है।बताया जाता था के समय परिवर्तनशील है। जाटों को अन्य अनुसूचित जाति (O.B.C.) श्रेणी में शामिल कर लिया गया है।घड़ी की सुइयों का ऊपर से नीचे ,नीचे से ऊपर आना आज समझ आ रहा है। ये कुछ और नहीं "समय चक्र" है।
आम चुनाव नज़दीक हैं। केंद्र सरकार ने कुम्भकर्णी नींद से जागते हुए लोगों को लुभाने के लिए घोषणाओं का पिटारा खोल दिया है। ये पिटारा पहले खोला होता तो अच्छा होता।सरकारी घोषणाएं अब झुनझुना लगने लगी हैं। समय निकल चुका है।
मार्च के इस महीने में रंगों के त्यौहार होली का सब को बेसब्री से इंतज़ार रहता है। टी वी के अलग अलग चेनलों पर होली गीत दिखाए जाने लगे हैं। समय के साथ होली का रंग कुछ फीका पड़ गया है। कुछ लोग तो इस त्यौहार के बारे में ये भी कहते हैं ,"होली तो हो ली !"
"क्या ज़माना था के इक ज़माना हो गया है !"
"शेष अगले ख़त में !" TO BE CONTINUED....................................
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