Tuesday, 31 December 2013

Baavan Budhi......!

डॉ डेंग पशुओं के मशहूर डॉक्टर। सरकारी नौकरी मतलब बेफिकरी। अफसरों के  साथ पक्का गठजोड़। ड्यूटी पर गए तो गए।  न गए तो भी कोई डर नहीं। बनिया जात खाली बैठना तो जैसे सीखा ही न हो। हर वक़्त दिमाग घूमता के दो के चार कैसे किए जायें।एक बार परिवार के दबाव में डॉ डेंग कार खरीद लाए। ख़ूब रिसर्च की कार खरीदने के लिए। रिसर्च का फायदा ये हुआ के कार मार्केट रेट से सस्ती मिल गई।

अच्छी चीज़ का तो हर कोई ग्राहक होता है। डॉ डेंग कार क्या लाए बार बार डोर बेल्ल बजने लगी। कार बेचने के लिए तो लाए नहीं थे। एक कहावत है के बनिया बावन बुद्धि होता है। कार की डिमांड देख डॉ के दिमाग की तो जैसे घंटी बजने लगी।  डॉ की कार घर के लिए नहीं जैसे बिकने के लिए आई हो। हुआ भी वही डॉ की कार बिक गई। डॉ को भले ज़माने में प्रॉफिट हुआ २०००० हजार। बोले तो शुद्ध लाभ।

डॉ को तो जैसे ख़ून मुहँ लग गया। अब डॉ का मन नौकरी में कम कारों की रिसर्च में ज्यादा लगने लगा। कभी दिल्ली तो कभी चंडीगढ़ डॉ को जहाँ से भी कार सस्ती मिलती खरीद लाता। इस काम में डॉ को ख़ूब मज़ा आने लगा।डॉ की तो जैसे पोह बारह हो गई। हररोज़ चलाने को नई गाड़ी और बिकने पर प्रोफिट अलग।   आम के आम गुठलिओं के दाम। 

डॉ डेंग दोस्तों में बेशक़ कंजूस के नाम से मशहूर थे। लेकिन अपने और घर के लोगों पर कभी कंजूसी नहीं करते थे। शाही अंदाज़ से रहते डॉ डेंग। ब्रांडेड कपड़े ,बढ़िया खानपान ,क्लासिक की सिगरेट ,रीबॉक के जूते और कार में घूमना उनके अंदाज़ में शामिल था।शाही शौंक हो भी क्यों न एक तो सरकारी नौकरी दूसरे कारों की सेल परचेज़ का बिज़नस भी जमने लगा था।

कमाई होने लगी तो डॉ डेंग ने अपने बेटे को ऑस्ट्रेलिया भेजने का मन बना लिया। बेटे को विदेश भेजने के चक्कर में डॉ ने सारे घोड़े खोल दिए। डॉ को समझ आ गई थी के अगर बेटा विदेश सेट्ल हो गया तो लक्ष्मी बरसने लगेगी।बस फिर बेटे को विदेश भेज कर ही साँस लिया।

अब सरकारी नौकरी के साथ डॉ ने कारों की सेल परचेज़ की दुकान भी खोल ली। डॉ का भुरभुरा स्वभाव और मिलन शैली के कारण दुकान पर अखाड़ा बंधने लगा। धंधा जम ही चुका था।आने जाने वालों के लिए डॉ की दुकान आरामगाह बन गई थी।गर्मियों के दिनों में दुकान खुलते ही ए सी ऑन हो जाता। जो एक बार वहाँ आ जाता वहीँ जम जाता। किसी की मत मारी थी के चिलचिलाती गर्मी में कोई बाहर जाता। किसी का अगर घर से फ़ोन भी खड़कता तो कोई न कोई बहाना लगा दिया जाता। और अगर कोई घर चला भी जाता तो फटाफट ए सी में पहुँचने की कोशिश करता।

आमतौर पर डॉक्टरों को सम्मान से बुलाया जाता है। पर डॉ डेंग ऐसे जैसे मान सम्मान की कोई परवाह ही न हो। डॉक्टर को तो बस माया से प्रेम। जो कोई भी बुलाता ओ डॉक्टर कह के बुलाता।स्वभाव ऐसा के डॉ डेंग किसी की बात का बुरा न मानते।डॉ के स्वभाव के कारण ही सब वहाँ जमा हो जाते।

डॉ डेंग किसी से कोई छुपाव नहीं रखते। क्या कितने में बेचा या ख़रीदा सब को मालूम होता। कार बेचने पर कमीशन मिले या कोई प्रॉफिट हो ,सब डॉ को इस तरह से बधाई देते मानो उनके घर में लड़का पैदा हुआ हो। पर डॉ डेंग भी ऐसे पक्के के किसी की बात पर कोई ध्यान न देते। गाँठ के इतने पक्के के एक पैसा न खर्च करते। डॉ डेंग का ये रोज़ का काम जो ठहरा। बात भी सही है के वो हर ख़रीद फ़रोख़त पर पार्टी देने लगे तो कर ली कमाई।

दोस्तों का जमावड़ा खूब जमने लगा था। खाने पीने का दौर भी चलता। माहौल ऐसा बन गया के सभी बारी बारी से खर्च करने लगे ताकि एक पर बोझ न पड़े। "बिल्कुल इंग्लिश सिस्टम।" पैसे देते देते कोई न कोई ये ज़रूर बोल देता ,"दोस्ती पक्की खर्च अपना अपना।" खर्च करने में डॉ कँजूस तो था ही इस लिए आमतौर पर डॉ डेंग की कोशिश होती के बिना खर्च काम चल जाए तो समझो सोने पे सुहागा।

लेकिन आज तो जैसे तस्वीर बदली हुई थी।हर वक़त खुश रहने वाला डॉ उदास नज़र आ रहा था।सिगरेट का धुआं इतना फैल गया था मानो दुकान में ईंटों का भट्ठा चल रहा हो। बातों बातों में पता चला के आज डॉ लगभग ४० सिगरेट पी गया है। कोई न कोई फ़िक़र तो थी जो इतना धुआँ उड़ाया जा रहा था।

बात खुली तो पता चला के डॉ के बेटे ने ऑस्ट्रेलिया में ही किसी गौरी मेम से शादी कर ली है। शादी को पाँच महीने हो गए हैं और डॉ डेंग दादा बनने वाला है। मैने पूरे जोश खरोश से डॉ को बधाई दी। लेकिन डॉ ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। सब डॉ को समझाने लगे के आज कल ज़माना बदल गया है।

लेकिन डॉ को तो जैसे चुप्पी लग गई थी। सपने जैसे चूर -चूर हो गए थे। जब डॉ पर किसी का कोई असर नहीं हुआ तो एक साथी मज़ाक भरे लहज़े से बोला ,"भाई यू डॉ क्योंकर खुश होवेगा,छोरा उरै ब्याह करदा तो ४० -५० लाख मिलदे। यू नुक्सान के थोड़ा है। " इस बात पर सभी ने ज़ोर का ठहाका लगाया और डॉ के चेहरे पर भी एक कटु सी हँसी फैल गई।

बावन बुद्धि को जैसे सच में शॉक लगा और शॉर्ट सर्कट को ठीक होने में कुछ समय तो लगना ही था !  

   






      

IMAGES.......2013

अलविदा २०१३----------------------------
ख़ूब अदभुत रहा वर्ष २०१३।

हमेशा की तरह कईं खट्टी मीठी यादें जुड़ी इस बरस भी ।

घर में माँ बाप ,पत्नी और बच्चों का भरपूर प्रेम और सहयोग मिला।परिवार व रिश्तेदारों से बढ़िया सामजस्य बना रहा।

दोस्तों की चंडाल चौंकड़ी का भी भरपूर सहयोग बना रहा।

 शंटी पहले ही साथ छोड़ गया था और बिंदा इसी वर्ष दलबदल कर शंटी की टीम  में शामिल हो गया।

 महफिलें साल भर जमती रहीं।

 समीर बड़ी बेटी की शादी कर गंगा नहा लिया।

 राहुल की ज़िन्दगी में काफी उतार चढाव रहे। कभी ट्रांसपोर्ट की चिंता तो कभी नौकरी की परेशानियां। फिर भी पार लगता रहा।

 भाटिया साब उर्फ़ प्रकाश वीर उर्फ़ वीर प्रकाश अपनी स्पेयर पार्ट्स की दूकान में अपने छोटे भाई संजू और नए पार्टनर सिंधी के साथ मस्त और वयस्त रहे। डेंगू की  पकड़ में भी आए पर जैसे उन की तो लॉटरी लग गई हो। दुकान से छुट्टी कर के लगभग १ महीना आराम किया।

चौधरी साब के बेटे का आई आई टी इलाहबाद दाखिला हो गया। बेटे के चककर में दो बार इलाहबाद घूम आए। सब दोस्तों ने ख़ूब दावतें उड़ाई। तबियत नासाज़ रहने लगी है चौधरी साब की आजकल।

 बबलू का इस्  साल चावलों का बिसनेस चल निकला। नया हीरो मोटर साइकिल खरीद लिया।

 लाली कभी कभी मिलता रहा। इस बात की चर्चा पूरे वर्ष रही के "मोटी मुर्गी आण्डा छोटा देती है। "असल में जब से लाली उर्फ़ मनमोहन सिंह की लाखों रूपए की ज़मीन बिकी वो पैसे खर्च करने में कंजूसी बरतने लगा था।

मोहिंदर इस बार दीपावली पर मुम्बई से करनाल  नहीं आया।

फेस बुक के ज़रिए कुछ नए पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई। जे पी ,मल्होत्रा संजय ,उपिंदर कौशल उर्फ़ बबलू फेस बुक के ज़रिए ही मिले।

पम्मी अपने बाप की मौत के बाद बिल्कुल बदल गया। बाप लाखों रूपए, जायदाद ,शेयर और बैंक बैलेंस छोड़ गया। बाप ताउम्र पम्मी को समझाता रहा के कोई अच्छी नौकरी कर ले। पम्मी ठहरा पम्मी -----बाप की एक ना मानी। कईं बिज़नेस किए लाखों का घाटा खाया पर नौकरी नहीं की। बाप क्या गया पम्मी किसी डॉक्टर के पास नौकर हो गया।

काम्बोज ने अपनी गॉंव की ज़मीन बेच कर शहर में थोड़ी सी जगह खरीद ली। आजकल उस पर कंस्ट्रक्शन करवाने में व्यस्त  है। दाड़ी ख़ूब बढ़ा रखी है जो कतई अच्छी नहीं लगती।

नवीन की प्रॉपर्टी की दुकान पर काम करने वाला रवि अपनी मेहनत और लग्न से ख़ुद प्रॉपर्टी डीलर हो गया है। नवीन माया के चक्कर में न जाने कहाँ खो गया है।

एडवोकेट भारद्वाज शराब छोड़ गया है। एक दिन दारू के नशे में गाड़ी ठोक दी और एक रात हवालात में काटनी  पड़ी। वो दिन और आज का दिन पंडित जी ने दारु को छुआ तक नहीं।

टिड्डा उर्फ़ सहगल फिर यार हो गया है। दारु के नशे में एक दिन वैसे ही उलझ गया और मूँछ का सवाल बना बैठा।

पण्डत उर्फ़ सीमान्त शर्मा इक नई दुनिया में ८० गुणा १०० के चक्कर में रहता है।

डॉ डेंग ने कईं सालों से सपने संजो कर रखे थे के बेटा जब भी ऑस्ट्रेलिया से लौट कर आए गा तो धूमधाम से उस की शादी करेंगे। आज ही ख़बर आई है के आशु ने वहीँ किसी गोरी मेम से शादी कर ली है।  वो बाप बनने वाला है और डॉ डेंग दादा। डॉ डेंग ख़ुशी मनाने की बजाय उदास है। नामालूम पार्टी कब होगी। सब उसकी पार्टी का इंतज़ार कर रहे हैं।

इन खट्टे मीठे संस्मरणों के बीच समीर के फ़ोन की घंटी बजने लगी है। डॉ डेंग पार्टी दे न दे नए बरस २०१४ के आगमन व स्वागत के लिए पार्टी की तैयारी है।

आप सब के लिए भी नववर्ष मंगलमय हो !

Sunday, 29 December 2013

THUMBS UP.............!

"पल पल जीती हर पल मरती",लड़किओं कि एक ऐसी कहानी जिस में लेखक ने उन की  रोज़मर्रा ज़िन्दगी में होने वाली मुश्किलात का बाखूबी  वर्णन किया है। बात लगभग दो माह पूर्व की है जब मुझे लड़कियों  के एक स्थानीय कॉलेज में नाटक करवाने का मौका मिला। जब लड़कियों  के मुद्दे पर नाटक करने की बात आई तो कोई अच्छी स्क्रिप्ट उपल्बध  नहीं हुई।  ऐसे में स्क्रिप्ट फाइनल होने से पहले कुछ इम्प्रोविज़ेशन्स पर काम चलता रहा। सहसा मुझे अपने लेखक  दोस्त का ध्यान आया।









 मैंने  मोहिंदर को फ़ोन लगाया उस ने तुरन्त  मेरी समस्या का हल ये कहते हुए कर दिया ,"तू चिंता न कर मैं शाम तक तुझे कुछ लिख कर भेजता हूँ। " ये डायलॉग सुन कर मैं ज़ोर से हँसा और दूसरी तरफ से मोहिंदर का ठहाका सुन कर मैं भी और ज़ोर से हँसने लगा।  हम दोनों को ये समझने में देर न लगी के हम क्यों हँस  रहे  हैं।
हँसते  हँसते  मोहिंदर बोला,"अरे ,मुझे भी अरोड़ा  साब  या सुधीर समझ लिया क्या ?'असल में मैं मोहिंदर को पहले -"चिन्ता  न करो "के बारे में एक किस्सा सुना चुका था।किस्सा असल में यूं था की मेरे कई नाटकों में  अरोड़ा जी ने music दिया और मैं जब भी उन्हें रिहर्सल के लिए बोलता तो वो हर बार मुझे यही कहते , " चिंता न करो मैं संभाल लूँगा " मोहिंदर आजकल मुम्बई में फ़िल्म निर्माण और लेखन के साथ साथ अपनी एक एडवर्टीज़िंग कम्पनी चला रहा है।

ख़ैर , स्क्रिप्ट आ गई और रिहर्सल शुरू गई। नाटक की  शुरूआत से ही कई किस्से जुड़ने लगे  थे। नाटक की  कहानी चूँकि  लड़कियों  की आम ज़िन्दगी और समस्याओं से जुड़ी हुई थी इसलिए डायलॉग भी थोड़े बोल्ड थे।
रिहर्सल शुरू हुई , दो -तीन दिन रिहर्सल के साथ साथ लड़कियों  से बातचीत भी करता रहा। बातचीत से ये बात तो स्पष्ट हो गई के लड़कियां अपनी समस्याओं के प्रति जागरूक हैं लेकिन आवाज़ उठाने के नाम पर कुछ डर  महसूस करती हैं और खुल कर बोलने से कतराती हैं। ज्यों ज्यों रिहर्सल आगे बढ़ती गई नये किस्से कहानियाँ  भी बनते गए।

रिहर्सल के दूसरे  दिन ही नाटक में लीड रोल  करने वाली एक लड़की गायब थी। हालाँकि वो होस्टल  में रहती थी। जब इस बारे प्रियंका और काजल से पूछा  गया तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ़  देखा और बिना कोई जवाब दिए मुस्करा दीं। ये दोनों भी हॉस्टल में रहती थी इस् लिए मैने दोबारा पूछा ,"आख़िर  बात क्या  हुई पता तो चले कि ज्योति के न आने का कारण क्या है।" लड़की के न आने का कारण सुन कर मैं हैरान हो गया। ज्योति ने अपनी बात कुछ इस तरह से रखी ,"सर ,असल में  बात ये है के ज्योति पानीपत की रहने वाली है और पानीपत के  जिस कॉलेज में इस बार यूथ फेस्टिवल होने जा रहा है वहाँ  उसका भाई पढ़ता  है।अगर उस के घर वालों को को ये पता चल गया कि ज्योति नाटक में भाग ले रही है तो हँगामा हो जाएगा। " मुझे समझते देर न लगी के आख़िर क्यों ज्योति रिहर्सल पर नहीं आई।


मुझे  नाटक का डायलॉग याद आ गया  ,"क्या आप जानना चाहते हैं के रेप  कब शुरू हुआ था----------रेप शुरू हुआ था उस दिन ,जिस दिन आप ने अपनी बेटी को नज़रें झुका कर चलने के लिए बोला था। "

रिहर्सल के दौरान चाय देने के लिए एक महिला हर रोज़ आती थी। लड़कियां उसे विमला ऑंटी  कह कर सम्बोधित करती थीं। चाय देने के बाद विमला कुछ देर के लिए नाटक देखती और अपने काम पर लौट जाती। इसी तरह कॉलेज की  छात्राएँ  भी हॉल में आतीं ,नाटक की  रिहर्सल देखती और बिना कोई कमेंट दिए  वापिस लौट जाती। रिहर्सल कॉलेज के हॉल में हो रही थी ,इस लिए जब भी कोई पीरियड फ्री होता वो घूमते फिरते नाटक की रिहर्सल देखने हॉल का चक्कर लगा लेती। रिहर्सल करते १० दिन हो चुके थे। लड़कियों  ने नाटक को समझना शुरू कर दिया था। रिहर्सल के वो पूरी लय में होती। अब विमला ने चाय देने के बाद ज्यादा  देर नाटक देखना शुरू कर दिया था , इधर उधर खड़े हो कर नाटक देखने वाली इक्का दुक्का , लड़कियां अब ग्रुप में------मैं इसे झुण्ड में कहूँ तो बेमानी न होगी,आ कर नाटक देखने लगी थी।


 आज नाटक की  फुल रिहर्सल थी। जब मैं हॉल में पहुंचा तो लगभग २०० लड़कियाँ  इधर उधर घूम रहीं थीं। शायद कॉलेज में कोई फंक्शन था और वो सब उस का फायदा उठा कर अपने फ़ोन पर बातें करने में मशगूल थीं।ऑडिटोरियम फुल प्रूफ पी.सी.ओ.बना हुआ था। मैंने लड़कियों को धीरे से नाटक शुरू करने के लिए कहा। उन्होंने भी बिना किसी  देरी के नाटक शुरू कर दिया। इतने दिनों साथ काम करते करते वो मेरे इशारे को भी समझने लगी थीं। मैं आज की  रिहर्सल से ये जानना चाहता था के नाटक लड़कियों के  दिल के कितने करीब है।

रिहर्सल स्टार्ट होते ही लड़कियाँ स्टेज के आसपास इकठ्ठा होने लगी। जैसे जैसे नाटक आगे बढ़ा हॉल में सन्नाटा छा  गया। फिर क्या था नाटक के हर डायलॉग  पर दर्शक बनी लड़कियों के चेहरे के भाव मैं अच्छी तरह पढ़ पा  रहा था।  मॉडर्न बनी कोमल के एक डायलॉग ,"अब क्या है दादी ,मेरी टाँगें दिख रही हैं तो क्या हुआ ,कोई *लेग पीस *समझ कर खा थोड़े ही जाएगा। " लड़कियों ने ज़ोर  से ठहाका लगाया।

  प्रियंका और काजल के एक दूसरे डायलॉग ,"अरे क्या हुआ तुझे ,क्या सोच रही है ?मैं सोच रही हूँ के हर बार लड़की या औरत को ही दोषी क्यों ठहराया जाता है। क्या समाज के ठेकेदारों पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सकता। कोई कहता है के लड़कियों का पहरावा ही दुष्कर्म को बढ़ावा देता है। या फिर कोई ख़ाप का चौधरी एक तुग़लकी फरमान जारी करता है और किसी प्रेमी जोड़े को भाई बहन के रिश्ते में बाँध दिया जाता है। कभी कोई वकील कहता है ,मेरी बेटी होती तो मैं उसे ज़िंदा जला देता।कभी कोई धर्म गुरु कहता है के अगर भईआ बोलती तो छोड़ देता। "ने ऑडिटोरियम में जैसे खामोशी भर दी।

दोनों कि बातें सुन रही खुशबू के डायलॉग ,"जिसने रॉड अन्दर तक घुमा दी वो भला किसी पे कैसे रहम करता।"ने जैसे सब को सोचने पर विवश कर दिया। दर्शक दीर्घा में खड़ी लड़कियाँ जैसे बुत हो गई।चाय पिलाने वाली विमला रोने लगी।लड़ीवार डायलॉग का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ था। अगले डायलॉग ने तो जैसे पूरे समाज की कलई ही खोल कर रख दी।

 प्रियंका भरे मन से दर्शकों से रूबरू होते हुए बोली,"मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूँ के अगर लड़कियों का पहरावा ही दुष्कर्म को बढ़ावा देता है तो हर रोज़ छोटी बच्चियों और बुज़ुर्ग औरतों के साथ दुष्कर्म की ख़बरें टीवी और समाचार पत्रों की सुर्खियाँ क्यों बनती हैं। काजल के अगले डायलॉग,"हम आपको बताना चाहते हैं के सेक्स कोई फिजिकल एक्ट नहीं बल्कि एक मनोवृति है ,जिसे समझना बहुत ज़रूरी है। " ने तो जैसे सब को चिंतन के लिए मजबूर कर दिया।

कईं दिनों से लड़कियों की हिफाज़त के नाम पर ड्यूटी पर तैनात कॉलेज की अध्यापिका अम्बिका को तो जैसे नाटक अन्दर तक छू गया। वो अपनी कुर्सी से उठी और मेरी तरफ थम्स अप करते हुए बोली," सर कमाल  कर दिया।मैंने भी नम्रता पूर्वक अम्बिका मैडम का धन्यवाद करते हुए कहा ,"मैडम ये सब कमाल तो बच्चों की मेहनत और जानदार स्क्रिप्ट का है। "

धन्यवाद मोहिंदर प्रताप सिंह और कॉलेज प्रशासन व विशेषकर भण्डारी ,संगीता ,काद्यान ,अम्बिका और वो सभी अध्यापिकायें जो समय समय पर लड़कियों को नाटक के लिए प्रोत्साहित करती रहीं। कॉलेज के वो सभी        
कर्मचारी जिन्होंने सेट और अन्य कामों में नाटक मण्डली की मदद की। नाटक मण्डली की सभी नायिकाओं को भी मेरा सलाम। क्यों कि आप के दृढ़ निश्चय और लग्न से ही ये सब सम्भव हो सका। 

सच में मोहिंदर आप ने क़माल का नाटक लिखा है !

दुष्यंत की ये पंक्तियाँ मैं अक्सर दोहराता हूँ।
"हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
कोशिश है के तस्वीर बदलनी चाहिए।"


Saturday, 28 December 2013

Waqt...........!

कोई बात चले और महंगाई का ज़िक्र न हो ये आज के ज़माने में सम्भव ही नहीं। आज घर जाते हुए चाँद बाऊ जी से मुलाक़ात हो गई। पिछले २ वर्षों से चाँद बाऊ परेशान चल रहे हैं। कानूनी लड़ाई लड़ते लड़ते थक से गए हैं बाऊ जी। कुछ उम्र का तकाज़ा और दूसरे भाईयों से जायदाद का झगड़ा और ऊपर से महंगाई की मार।

ऑफिस में टी वी चल रहा था।मोदी के जादू के बाद दिल्ली में केजरीवाल की ताजपोशी की  ख़बरों का सिलसिला बदस्तूर जारी था। टी वी देखते हुए चाँद बाऊ जी बोले ,"हुंण  दस्सो केजरीवाल ने कदी सोच्या सी के ओ दिल्ली दा मुखमंत्री बनेगा। " मैंने उनकी इस बात में हामी  भरते हुए कहा ,"हाँ जी कमाल कर दिया केजरी ने। "

बात का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा ,"असल में लोग मौजूदा सिस्टम से तंग आ चुके हैं। भ्रष्टाचार ,गरीबी ,बेरोज़गारी और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। आज कल तो परिवार पालना  मुश्किल हो गया है चाँद बाऊ  जी। "

चाँद बाऊ जी की यादास्त कमाल की है। जब भी किसी बात का ज़िक्र करते हैं, दिन,महीना ,साल और समय का ज़िक्र न हो तो ऐसा लगता है मानो बाऊ जी कुछ भूल रहे हैं। मैंने महंगाई का ज़िक्र क्या किया-----------बाऊ  जी तो बस शुरू हो गए। बाऊ  जी बोले ,"बस पूछो ही न जी। सन १९७५ की बात है ,मैं ट्रक चलाता था। 80 पैसे प्रति लीटर डीज़ल और 1 रूपए 75 पैसे प्रति लीटर पेट्रोल का रेट था उन दिनों।"

आदतानुसार दिन,महीने और साल का ज़िक्र करते हुए बाऊ जी आगे बोले ,"लगातार 6 महीने तक नागपुर से संगतरे लोड कर के दिल्ली लाते थे हम। उस टाइम संगतरे का क्या रेट होगा?"उन्होंने ये प्रश्न मेरे ऊपर दाग़ा। इस से पहले मैं उन के इस प्रश्न का जवाब देता बाऊ जी ने अपनी बात का सिलसिला जारी रखते हुए कहा ,"5 रूपए सैंकड़ा का रेट था संगतरों का उन दिनों। " उन्होंने आगे बताया कि वो नागपुर से 10 रूपए के 200 संगतरे ख़रीद  कर अपना सफ़र शुरू करते थे। क्लींडर संगतरे छील कर देता रहता था और यारां  दी ग ड्डी दिल्ली कब पहुँच जाती पता ही नहीं चलता था। "

किस्से और कहानियों का तो जैसे ख़ज़ाना हो बाऊ जी के पास।वो आगे बोले ,"2 रूपए में भरपेट खा लिया करते थे उनदिनों। 50 पैसे की दाल और 10 पैसे की रोटी। साथ में दही और बाद में चाय भी।" जब खाने पीने की बात चली तो मैने चाँद बाऊ से पूछा ,"क्या मूरथल  के ढ़ाबे भी होते थे उन दिनों। "उन्होंने आहूजा नम्बर 1 ढ़ाबे  का ज़िक्र करते हुए कहा ,"ये पहले प्यारे का ढ़ाबा  के नाम से मशहूर था। आहूजा उसके पास काम करता था। "करनाल से दिल्ली जाते हुए सोनीपत के नज़दीक मूरथल के ढ़ाबे आज भी मशहूर हैं।

चाँद बाऊ ने बहुत मेहनत की है अपने जीवन में। मैंने उन से पूछा ,"कब से शुरू किया था आप ने ट्रक चलाना ?"वो झट से बोले ,"सन 1968 में ड्रिवेरी शुरू कर दी थी मैंने,1970 में लाइसेंस बनवाया और 1977 में ट्रक चलाना छोड़ मैं पंजाब चला गया था।

 "कहानी को आगे बढ़ाते हुए बाऊ जी बोले,"बस यहाँ से मेरी ज़िन्दगी का यू टर्न शुरू हुआ समझो।यहाँ मैंने हवाई चप्पलों का काम शुरू किया। 1 रूपए दर्जन कमीशन मिलती थी उन दिनों। इस काम में मज़ा आने लगा और दो साल के बाद अपनी फैक्ट्री खोल ली। "

फैक्ट्री के लिए खरीददारी से लेकर बेचने का काम ख़ुद बाऊ जी करते थे। धीरे धीरे मार्किट की समझ आने लगी तो हैंडलूम का काम शुरू कर दिया। एक बाऊ जी की मेहनत और दूसरे किस्मत का जोर। मिट्टी को भी हाथ लगाते तो सोना हो जाती।

 ख़ूब कमाई होने लगी चाँद बाऊ की।दो छोटे भाई थे उनके। बच्चों की तरह पाला बाऊ जी ने उनको।काम के बढ़ने के साथ साथ दोनों भाई भी बड़े हो चुके थे।काम की ज़िम्मेदारी भी सम्भालने लगे थे दोनों।अपने बड़े भाई को राम की तरह पूजते थे दोनों छोटे भाई। चाँद बाऊ भी अपने भाइयों की तारीफ करते नहीं थकते थे।  भाइयों का साथ मिलते ही चाँद बाऊ को तो जैसे पँख लग गए। पूरे हिंदुस्तान में चाँद बाऊ जी के कम्बल सप्लाई होने लगे। पैसा तो जैसे बरसने लगा था.

जैसे जैसे पैसा आने लगा बाऊ जी ने प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करना शुरू कर दिया।काम के साथ साथ प्रोपर्टी के दाम भी बढ़ते गए।बाऊ जी ने जो कुछ भी खरीदा सांझे में खरीदा यानि के तीनों भाईओं की के नाम। आज बाऊ जी के पास तीन मंज़िला मकान ,एक आलिशान फार्म हाउस ,शहर के बीचों बीच कईं कमर्शियल दुकानें ,दो हैंडलूम मिल और न जाने क्या क्या। आज की मार्केट के हिसाब से वैल्यू लगाई जाय तो 100 करोड़ का माल तो होगा चाँद जी के पास।

महँगाई की बात चल ही रही थी ,मैने वैसे ही पूछ लिया ,"ये फार्म हाउस कितने में ख़रीदा था आपने ?"

बाऊ जी तुरन्त बोले ,"तुस्सी विश्वाश नहीं करोगे ,मेन जी टी रोड ते है फॉर्म हाउस ,सन 1983 में 22 रूपए प्रति गज का रेट था ,कोई जाता नहीं था उस साइड ,उस भले ज़माने में डबल रेट में खरीदी थी वो जगह। " "आजकल क्या रेट है वहाँ ?" ,मैंने अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए उनसे पूछा।

चाँद बाऊ का तो जैसे सीना चौड़ा हो गया।" होगा यही कोई 10 -12 करोड़ रूपए।यही कोई 30 -40 हजार प्रति गज।  8 लाख रूपए की खरीदी थी ये जगह।" ये कहते ही जैसे बाऊ जी अपने भूत काल में खो गए।

 मैंने उन्हें हिलाया ,बाऊ जी रुआंसे से हो गए। अपने को सम्भालते हुए बोले ,"सत्यानाश कर दिया इन भाइयों ने। ये दिन देखने थे बुढ़ापे में।

वक़्त ने ऐसा पलटा खाया के चाँद बाऊ  जी की तो जैसे दुनिया ही बदल गई। दोनों भाई बाग़ी हो गए। क्या फार्म हाउस और कम्बल बनाने की दोनों मिलें---- सब पर कब्ज़ा कर लिया छोटे भाइयों ने।राम के लक्ष्मण और भरत ने राक्षशी चोला डाल लिया था।जहाँ भी मिलते अपने बड़े भाई को माँ -बहन की गालियां ऐसे निकालते मानो एक माँ के पेट से जन्म न लिया हो।

कईं बार पंचायत हुई बंटवारे के लिए। चाँद बाऊ ने भरी पंचायत में कईं बार हाथ जोड़ कर कहा ,"मुझे और कुछ नहीं बस मेरा हिस्सा दे दो। "छोटे भाइयों का तो जैसे ख़ून पानी हो चुका था।वो पंचायत की किसी भी बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे। न जाने किस जन्म का बदला ले  रहे थे।        

असल में चाँद बाऊ जी पुलिस स्टेशन से हो कर आ रहे थे।भाई अक्सर गाली गलौच और मारपीट करने लगे थे। बातों बातों में कहने लगे ,"बिना पैसे लिए तो काम ही नहीं करते पुलिस वाले। कोर्ट में रिपोर्ट देने के 2000 हजार रूपए दे कर आया हूँ। एक ज़माना था ,जब हम ट्रक चलाते थे ,अगर कोई पुलिस वाला रोक लेता तो 2 -5 रूपए में पुलिस वाले खुश हो जाते थे।

 प्रॉपर्टी बँटवारे का केस भी कोर्ट में डाल दिया था।कोर्ट तो कोर्ट हैं--------न जाने कितना समय लगे। मेरे घर जाने का समय हो चुका था। बाऊ जी की कहानी सुनते सुनते मेरा भी मन भर आया। मेरा ध्यान उन के बेटे की तरफ चला गया। मैंने  उनसे पूछा ,"बेटे का क्या हाल है। " बाऊ जी तो जैसे अन्दर  तक टूट गए आँखें भर आई और बोले ,"राज करने के दिन थे उस के ,पर वक़्त को पता नहीं क्या मंज़ूर है। आज कल नौकरी कर रहा है बेटा। "

इतने में चाँद बाऊ जी के फ़ोन की घण्टी बजी ,उन्होंने टेबल से अपनी टोपी उठा कर सिर पर डाली। कहने लगे, "पुलिस स्टेशन से फ़ोन है। मैं उन्हें देखता रहा और वो पुलिस स्टेशन की ओर रवाना हो गए। चाँद बाऊ कब मेरी आँखों से ओझल हो गए  मुझे पता ही नहीं चला। 

    

    


   

Thursday, 26 December 2013

THE DEMOCRACY.........."LOKTANTAR"

एक छोटे से आंदोलन से जनलोकपाल के लिए संघर्ष करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने भी कभी सोचा  नहीं होगा के वो दिल्ली के मुख्यमंत्री बन जायेंगे। केजरीवाल टीम ने जिस सादगी और साफगोही से जनता के बीच अपनी पैठ बनाई उस के नतीज़े सब के सामने हैं। दिल्ली के नतीज़ों ने ये सिद्ध कर  दिया के राजनीति किसी की बपौती नहीं है।

दिल्ली की जनता ने जिस तरह कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को अंगूठा दिखाया है--------ये साफ़ और स्वस्थ राजनीति के लिए खूब बढ़िया संकेत हैं। "युद्ध और प्यार में सब कुछ सम्भव है " के जुमले को प्रयोग कर आम लोगों की भावनाओं के साथ बलात्कार करने वाली पार्टिओं को जनता ने जिस तरह से सज़ा दी है वो भविष्य़ के लिए शुभ संकेत हैं। कांग्रेस की नीतिओं का विरोध करने वाली आप पार्टी ने कांग्रेस के साथ से सरकार बनाने का जो निर्णय लिया,मेरी नज़र में तो  ये भी एक सरहानीय कदम है। ये बिलकुल अपने दुश्मन के घर में घुस कर उसी के गाल पर करारा थप्पड़ जड़ने की तरह है।

बेशक़ कांग्रेस ,भारतीय जनता पार्टी, लेफ्ट , राईट के बड़े बड़े धुरंदरों और लालू,नीतीश ,मुलायम जैसे राजनीति के पंडितों ने केजरीवाल टीम को चुनाव लड़ने का न्यौता दे कर उन का मज़ाक उड़ाने और जाल में फंसाने का प्रयास किया था।लेकिन चुनावी परिणामों ने तथाकथित राजनीतिक धुरंदरों को उनके जाल में फंसा कर उन्हें ही कहीं मुहं  दिखाने लायक नहीं रखा।

वायदे हर पार्टी करती है और आम पार्टी ने भी किए हैं। अब देखना ये है के आम पार्टी अपने वायदों को किस   तरह पूरा करती है। वैसे असंभव शब्द  मूर्खों की डिक्शनरी में होता है। मेरा ये मानना  है के अगर नियत साफ़ हो तो असम्भव को भी सम्भव में तब्दील किया जा सकता है। ख़ास बात ये है के आम पार्टी ने जिस तरह  अपने झाड़ू से विरोधियों का सफाया किया है वो जनतंत्र /लोकतंत्र को मजबूत ही करेगा। अब तक पार्टी ने जिस तरह से  निर्णयं लिए हैं उस से केजरीवाल टीम की नियत में भी कोई खोट नज़र  नहीं आता।

राजनितिक विवशता का कमाल देखिए के कांग्रेस को अपने हाथ से ही आम आदमी के लिए झाड़ू लगाना पड़ रहा है। खैर सरकार जितने भी दिन चले ,केजरीवाल को ये नहीं भूलना होगा के उन के सिर पर काँटों का ताज रखा गया है और ये कांटे भी आम जनता के हैं। उन्हें ये कांटे बड़ी संजीदगी से निकालने होंगे ,क्योंकि कांटे निकालते हुए भी कभी कभी कांटे निकलवाने वाला दर्द सहन  नहीं कर पाता और गालियां निकालने लगता है।

आने वाले दिनों में क्या होगा ये तो भविष्य़ के गर्भ में छिपा है। लेकिन दिल्ली के परिणामों ने लोकतंत्र को एक नई दिशा दी है और आम जनता को लोकतंत्र के मायने समझ आने लगे हैं। आम जनता को  इसे समझना होगा की जो ताक़त उनके हाथों में है वो भ्रष्ट और धोखेबाज़ों पर समय आने पर झाड़ू फेर कर उन का सफाया कर सकती है।

 "शुभकामनायें आम आदमी !"  
"शुभकामनायें लोकतंत्र !"


  

Thursday, 19 December 2013

PARTY

दौरे जाम चल रहे थे ,महफ़िल में वही गिनेचुने साथी -------राहुल, डॉ डेंग ,भाटिया ,चौधरी साब,रणबीर,बबलू  और समीर। समय के साथ साथ दोस्त और अड्डा भी बदल चुका था। ऐसा नहीं के पुराने दोस्तों के साथ किनारा कर लिया गया था। दो जाम अंदर जाते ही सब का ज़िक्र शुरू हो जाता था। हर महफ़िल में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सब को जोड़ने और ज़िंदा रखने का काम करते हैं। इस महफ़िल में ये काम चौधरी साब और समीर कर रहे थे। 

इस महफ़िल में तो जैसे जमावड़े का बहाना ढूंढ़ते ते सब लोग। किसी की चोरी हुई एक्टिवा मिली हो या फिर किसी का कोई घर बिक गया हो,बस हो गई पार्टी ----------सब लोग जैसे पार्टी का बहाना ढूंढते थे।एक दिन तो चौधरी सब ने कमाल ही कर दिया। पम्मी लगभग २० दिन के बाद महफ़िल में लौटा था।उस के पिता की मृत्यु के बाद वो पहली बार आया था। थोड़ी देर की बातचीत के बाद कहा  था ,"पम्मी  जी इस बार तो grand party होगी।" पम्मी के मुख पर एक ख़ास मुस्कान थी। असल में पम्मी के पिता करोड़ों की सम्पति छोड़ गए थे। पम्मी उस का अकेला वारिस था।

 कल  पम्मी ने बातों ही बातों में बताया के नीलोखेड़ी से करनाल  आते हुए उस का एक्सीडेंट होते होते बच गया। सब ने उसका  हालचाल या कारण पूछने के बजाये एक स्वर में  कहा ,"पम्मी जी फिर तो पार्टी हो जाए।" पम्मी सकपका कर बोला ,"कमाल है आप लोगों की ,मैं मरते मरते बचा हूँ और तुम लोगों को पार्टी की सूझ रही है। 

समीर कि हाज़िर जवाबी के सब कायल थे। उस के बिना महफ़िल अधूरी लगती थी। क्या ग़म क्या ख़ुशी ------वो एक ऐसी फुलझड़ी छोड़ता ,सब हँस  हँस  कर लोटपोट हो जाते। पम्मी की बात सुन कर भी समीर से रहा न गया वो तपाक से बोला ,"पम्मी जी जान बची सो लाखों पाए ,लाखों रूपए की जान बच गई है तेरी----------- ४ -५ सौ खर्च कर भी  देगा तो भी लाखों का प्रॉफिट है तुझे। "असल में पार्टी का दबाव उसी पर बनाया जाता था जो पार्टी देने में ज़यादा आनाकानी करता था। समीर की बात सुन कर सब ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। पम्मी ने अपनी आदत के अनुसार समीर को एक मोटी सी गाली निकाली। अपनी झेंप मिटाते हुए वो बाहर  का रुख करने लगा। समीर ने पम्मी की बाहँ  पकड़ते हुए हँसते हुए  एक जुमला और छोड़ा " जान के साथ साथ पम्मी  पार्टी के पैसे भी बचा गया है.----- भाइयो। " पम्मी अपना हाथ छुड़वा कर बाहर  निकल गया।''


सब का हँसते हँसते  बुरा हाल हो चुका था। पेट में बल पड़ने के साथ साथ सब की  आँखों में आँसूं निकल आए  थे। हँसी हो या ग़मी समीर का तो जैसे जीने का अंदाज़ ही अलग था। समीर ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, ,"हँस लो ,हँस लो ,अगली बारी तुम्हारी ही है।अगला विकेट तुम में से किसी का गिरने वाला है। " सब ने समझा मानो समीर पार्टी के बारे में कह रहा है। चौधरी साब तुरन्त  बोले ," मुझे  तो जब कहोगे पार्टी दे दूंगा। डॉ डेंग भी बोला ,"मैं भी कभी पीछे नहीं हटता ,क्यों चौधरी साब। " डॉ डेंग ने चौधरी साब की हामी भरवा कर जैसे अपनी बात पर मोहर  लगवा ली थी। "

असल में पम्मी और डॉ डेंग का स्वभाव बिल्कुल एक जैसा था। पैसा खर्च करने के नाम पर दोनों को जैसे साँप सूंघ जाता हो । हालांकि डॉ डेंग का स्वभाव पिछले कुछ दिनों से बदल चुका था। समीर ने माहौल का मिजाज़ बदलते हुआ कहा ,"भई मेरा मतलब पार्टी से नहीं बल्कि विकेट गिरने से है।" क्रिकेट का प्लेयर होने के वजह से समीर अपनी बातों में क्रिकेट को ज़रूर जोड़ देता था। सब टेलिविज़न की और देखने लगे। असल में टेलिविज़न पर भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच क्रिकेट मैच चल रहा था ।

समीर हँसते हँसते  फिर बोला ,"तीन विकेट गिर चुकी हैं आप की टीम की। बिन्दा ,शंटी और कक्कड़।" अभी पाँच  दिन ही तो हुए थे बिन्दे  की मौत को। शंटी लगभग डेढ साल पहले ही टीम को छोड़ कर जा चुका था। कक्कड़ के बारे में मुझे कोई ख़बर  न थी। मैंने हैरानी से समीर की और देखा। समीर ने भी मेरी तरफ हैरानगी से देखते हुए कहा ,"परसों ही तो कक्कड़ की क्रिया थी।मैं भी नहीं जा सका वहाँ। "

शंटी ,बिन्दा और कक्कड़ समीर के पुराने साथी थे। अड्डा और समय  बदलने के कारण महफ़िल के पुराने साथियों से मिलना कम ज़रूर हो गया था लेकिन उन्हें भूला  कोई नहीं था। बेशक़ शंटी की विकेट गिरे और टीम का साथ छोड़े डेढ बरस हो गया था ,पर कोई ही ऐसा दिन होता होगा के जब चार यार इकठा हों और शंटी को याद न किया जाता हो। क्योंकि शंटी बंदा ही  ऐसा था------यारों का यार।

समीर की  बात समझ आते ही सब दोबारा ज़ोर ज़ोर से हँसने  लगे। समीर का अंदाज़े बयाँ ही कुछ ऐसा था के चाहते हुए भी कोई अपनी हँसी नहीं रोक सकता था। जैसे ही चौधरी साब को समीर की बात समझ आई वो कमरे का गेट खोल  कर बाहर  निकल गए। ऐसे क्रिकेट मैच में चौधरी साब का कोई इंटरेस्ट नहीं था। क्यों के चौधरी साब को तो ये विश्वास हो चुका था के आदमी के मुख में लक्ष्मी का वास होता है। इस लिए वो कोई ऐसा मैच नहीं खेलना चाहते थे ,जिससे उन का विकेट गिर जाए और वो आउट हो जाएँ।असल में चौधरी साब कईं दिनों से बीमार चल रहे थे और वो फील्ड  में रह कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे।

हँसते हँसते एकदम से महफ़िल में सन्नाटा छा गया था। चौधरी साब मैच छोड़ कर जा चुके थे। महफ़िल में जमा सभी खिलाड़ी फिर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। वो ऐसे हँस  रहे थे मानो उनकी विकेट कभी नहीं गिरने वाली थी।  सभी ने टेबल पर रखा अपना अपना अपना आखिरी जाम उठाया और "चीयर्स " बोलकर अपने अपने घर रवाना हो गए।

मैंने भी अपनी एक्टिवा स्टार्ट की ,ये वही एक्टिवा थी जो चोरी होने के २ साल बाद मुझे मिली थी बिलकुल कंडम हालत में।मुझे लगभग १० हज़ार का नुक्सान हुआ था। पर यारों को तो इस बात की ख़ुशी थी की एक्टिवा घर वापिस आ गई थी और पार्टी  लिए बिना मुझे बख्शा नहीं गया था । धुंध बहुत हो गई थी। मेरी एक्टिवा धुंध को चीरती हुई आगे की और बढ़ चुकी थी।"पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए" गुनगुनाते मैं कब घर पहुँच गया मुझे पता ही न चला।

Wednesday, 18 December 2013

MASTER MIND.........

आज सुबह जैसे ही  मुझे " बिन्दे " के बारे में पता चला तो मैने समीर को इत्लाह  करना ठीक समझा। समीर को फ़ोन करते करते मुझे ध्यान आया के वो कुछ देर पहले ही तो चण्डीगढ़ के लिए निकला है। इस से पहले के मैं फ़ोन काटता समीर की उधर से आवाज़ आई ,"बस टोल प्लाजा पहुँच गए हैं ,लेकिन  धुंध बहुत है रास्ते में। " मैंने समीर को कहा ,"भाई ध्यान से जाइओ। " समीर  बोला ,"चिन्ता  न कर। " समीर की  फ़ितरत  ही ऐसी है,  जब भी कोई बात करो ,उस ने मज़ाक करना ही है।लेकिन आज वो सीरियस ही था।
 मैंने उसे पूछा ,"बिन्दे का पता चला ?"समीर धीरे से बोला," हाँ ,सवेरे ही फ़ोन आ गया था। " आज जब मैं सुबह स्कूल जा रहा था तो रास्ते में चोपड़ा ने आवाज़ लगा कर रोका। चोपड़ा बोला ,"बिन्दा पूरा हो गया है। "मेरे पाँव के नीचे से जैसे ज़मीं ख़िसक  गई हो। मैंने संभलते हुए पूछा ,"कैसे हुआ। " चोपड़ा बोला, "बस कईं दिन से बीमार चल रहा था ,रात बुखार में ही शराब पी ली। "मैंने संस्कार का टाइम पूछा और अपनी एक्टिवा स्टार्ट कर स्कूल की  और चल दिया।बिन्दा और चोपड़ा दोनों हमप्याला थे। 
आज ठण्ड बहुत थी। जैसे ही मैने अपनी एक्टिवा को रेस दी ,मेरी आँखों से पानी निकलने लगा। मैने जैसे ही अपनी आँखों को पोंछा मेरे सामने शंटी ,बिन्दे ,पण्डत ,टिड्डे ,समीर और उनकी मित्र मण्डली के साथ बिताए दिन याद  आने लगे। असल में ये सभी समीर के बचपन के दोस्त थे। मैं इनकी मण्डली में थोड़ा  लेट शामिल हुआ था। हम सभी कुछ इस तरह से घुलमिल गये थे के पता ही नहीं चलता था कौन किस की वजह से इस मित्र  मण्डली का हिस्सा है। वैसे सच कहूँ तो समीर ही  इस ' चंडाल चौकड़ी 'का मुखिया था।
हालांकि पिछले तीन सालों से ये चंडाल चौकड़ी जम  नहीं रही थी। लेकिन मुझे याद आने लगे इन के साथ बिताय वो पल।शहर के बीचों बीच समीर की दुकान पर सुबह से ही जमावड़ा शुरू हो जाता था। मण्डली का एक भी मेम्बर वहाँ पहुँचा समझो चींटिओं की  तरह वहाँ सभी जमा हो गए। और जो नहीं पहुँचता था उसे फ़ोन कर के जल्द से जल्द पहुंचने  का अल्टीमेटम दे दिया जाता था। किसी की क्या मज़ाल  के वो वहाँ समय पर न पहुँचे।
समीर के अड्डे पर पहुँचने वालों को चण्डाल चौकड़ी का नाम इस लिये दिया गया क्यों के वहाँ कोई नियम या क़ायदा नहीं था। जब जिस का दिल करता दारु की बोतल खोल कर बैठ जाता और महफ़िल ऐसी जमती के समीर की दुकान कब मधुशाला  में बदल जाती पता ही नहीं चलता था। सुबह  पीने बैठते और शाम कब हो जाती पता ही नहीं चलता था।पुराने किस्से कहानियों ,गालियों  ,गिले शिकवों ,शरारतों, छेड़खानियों ,पुरानी यादों का ऐसा सिलसिला शुरू होता के शाम  का तभी पता चलता जब घर से बीवियों के फ़ोन की घण्टी  बजने लगती।
 कईं बार तो सभा इस लिए भी  बर्खास्त करनी पड़ती क्यों की कभी बिन्दा या शंटी उलझ जाते या पण्डित इस लिए गालियां निकालने लगता के शंटी ने उस की बीवी के सामने भारद्वाज साहेब कहने कि बजाय ' पण्डत 'कह दिया। असल में शाखा ग्राउंड में साथ साथ खेलने वाले शंटी का काम आज कल मंदा चल रहा था और पण्डत की वकालत चल निकली थी। मैं तो कईं बार कह भी देता था ,"पण्डत यार तू दारु पी के एडवोकेट जनरल क्यों बन जाता है। मेरी साफगोही का बिन्दा  कायल था। वो झट से मेरा हाथ चूम लेता और कहने लगता ,"तुसी ग्रेट हो सर  जी ,सच्ची तुसी मास्टर माइंड हो सर जी। " ये बात वो कईं बार दोहराता और फिर फ़फ़क फ़फ़क कर रोने लगता। सब तितर बितर हो जाते बचते अब समीर और मैं ------बिंदे को समझाते  और चुप करवाने की कोशिश  करते।
बिन्दा कहाँ चुप होता वो तो और ज़ोर ज़ोर से रोने लगता। समीर का हाथ पकड़ कर वो अपना डायलॉग दोहराता " तुस्सी मास्टर माइंड हो सर जी ,मेरे बच्चे अब आप के हवाले हैं। " असल में समीर के स्कूल में बिन्दे  के दोनों बच्चे पढ़ते थे। पढ़ने में बिल्कुल नालायक़ ,ऊपर से बदमाशी में भी पाँव जमाने लगे  थे। बच्चों की शिकायतों से बिन्दा बहुत परेशान था। उन की  फरमाइशें पूरी करते करते बिन्दा  जैसे थक टूट चुका  था।

बिन्दा उर्फ़ बलविंदर सिंह मठारू कोई छोटी मोटी चीज़ नहीं था। ऐसा ' लोहा कुट ' कारीगर था बिन्दा के एक बार कोई डिज़ाइन देख लेता उसे हूबहू बना देता। शहर में कारीगिरी के लिए लोग उस की मिसाल देते थे। लोग अपनी बिल्डिंगस या कोठियों की ग्रिल बनवाने के लिए एडवांस भी दे जाते थे। सब ठीकठाक चल रहा था। पता नहीं बिन्दे को क्या हुआ के बिन्दे ने सुबह से ही पीनी शुरू कर दी। ये शराब बिन्दे को ऐसी लगी के बिन्दे का  काम लगभग खत्म सा ही  हो गया। मण्डली के लोगों ने उसे ख़ूब समझाया पर अब तो जैसे उस का काम में मन ही नहीं लगता था।
नौबत यहाँ तक आ गई के बिन्दा आगे आगे पैसे लेने वाले पीछे पीछे। कोई ऐसा दोस्त नहीं था जिस से बिन्दे ने पैसा न लिया हो। एक मोटरसाइकिल फाइनेंस करवाया था ,किशतें न देने की वजह से फाइनेंस वालों के गुर्गे वो भी उठा कर ले गए। बिन्दा अब सड़क पर आ चुका था।काम  मिलना भी बंद हो चुका था। क़र्ज़ लेने वालों की फहरिस्त लम्बी होती जा रही थी। बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। सुबह सजधज कर बिल्कुल 'नवज्योत सिद्धू 'स्टाइल ड्रेस अप हो कर निकलने वाला बिन्दा अब गायब रहने लगा था। 
अड्डा बंद हो चुका था। चण्डाल चौकड़ी के लोग इधर उधर शिफ्ट हो गए थे ,कभी कभी मिलना होता था। असल में समीर की दुकान पर *ए*टी*एम *लग गया था। बिन्दे ने एक नौकरी ज्वाइन कर ली थी। कभी आते जाते बिन्दे से दुआ सलाम हो जाती थी। मास्टर माइंड  बिन्दा जैसे फेल हो गया था। सदाबहार बिन्दे को जैसे चुप्पी लग गई थी।
३ -४ महीने पहले समीर की बिटिया की शादी पर बिन्दे से फिर मुलाक़ात हुई। बहुत ही जोश से मिला बिन्दा। मिलते ही बोला, चमचम भी आई हुई है। असल में बिन्दे की पत्नी जब भी मायके जाती तो अपने घर से रसगुल्ले की तरह की एक मिठाई चमचम   ज़रूर ले कर आती। बस इसी वजह से भाभी को सभी चमचम के नाम से पुकारने लगे थे।
भाभी को मिलने के बाद मैं और बिन्दा  पण्डाल  से बाहर  आ गए। लगभग तीन साल के बाद मिलना हुआ था। मैने बच्चों का हालचाल पूछा। बिन्दा रो पड़ा। उसका एक बेटा किसी जुर्म में जेल में था। दूसरा बेटा  भी अभी कोई काम नहीं कर रहा था। बिन्दा बोला ,"सर जी तुस्सी ते  मास्टर माइंड  हो ,ये बच्चों ने सारा काम ख़राब कर दिया है जी। "आँसूं पोंछते ही बिन्दे ने साथ ही रखी दारु की  बोतल में से एक जाम बनाया और अपने अंदर उड़ेलते ही बोला ,"सर जी चियर्स ,सर जी तुस्सी मास्टरमाइंड हो। ये बोलते बोलते बिन्दा वापिस पण्डाल में चला गया।
मैं मास्टर माइंड को पण्डाल में जाते हुए देखता रहा-----भीड़ में वो कहीं खो गया।
ना मुफलिसी हो तो ,कितनी हसीन है दुनिया ----------मैं फ़िराक की ये पंक्तियाँ गुनगुनाने लगा।                            
मास्टर माइंड के साथ ये मेरी आखिरी मुलाक़ात थी।      




Sunday, 15 December 2013

A HOPE........ EK UMMEED

मेरे एक दोस्त हैं.…………मस्त ,मिलनसार और सीधी स्पाट  बात कहने वाले।उम्र करीब ४० वर्ष। सब उन्हें चौधरी साब  कह  कर बुलाते हैं।ख़ाने पीने के शौक़ीन हैं हमारे चौधरी साब।  जैसा नाम---- वैसा ही काम करने और जीने का अन्दाज़ भी। बीवी डॉक्टर हैं और बेटा इसी साल आई आई टी में सेलेक्ट हुआ है।चौधरी साब अपने बेटे और बीवी से बहुत प्यार करते हैं। ऐसा नहीं के चौधरी साब कोई काम नहीं करते। दो तीन व्यवसायिक केन्द्र हैं। लाखों किराया आता है। यानि के फुल मस्त लाइफ।

एक दिन उदासी  में थे चौधरी साब। कहने लगे बड़े  कठिन दौर देखे हैं। इस के बाद उन्होंने अरोड़ा  का किस्सा सुनाना  शुरू कर दिया। असल में बात लगभग १० बरस पुरानी  है। चौधरी साब ने शहर के नामीगिरामी व्यापारी अरोड़ा  जी  को करीब १२ - १५ लाख रूपए ब्याज पर दे रखे थे।  अरोड़ा  जी मोटा ब्याज देते थे -------शहर की कईं  पार्टीओं ने भी अपना पैसा अरोड़ा  जी को दे रखा था। उन दिनों चौधरी साब का अधिकतर समय अरोरा जी के ऑफिस में ही बीतता था। एक दिन ये ख़बर शहर में आग कि तरह फैल गई के अरोड़ा  शहर छोड़ कर भाग गया। अरोड़ा जी से वो व्यापारी, चोर और डाकू अरोड़ा हो गया। शहर के कईं लोगों के करोड़ों रूपए लेकर जो भाग गया था अरोड़ा।

अरोड़ा की ख़ोज  शुरू हुई लेकिन उसका  कुछ पता न चला। अरोड़ा  के चक्कर में कईं  लोगों की लुटिया डूब गई।चौधरी साब का तो जैसे जहाज़ ही डूब गया था।चाँद बाऊ जी और लाली भी मोटे ब्याज के चक्कर में अरोड़ा का शिकार हो गए थे।जब भी मिलते अरोड़ा  को भारी भारी गालियाँ  निकालते। जबकि उन दोनों को एक दो लाख से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था।

 सब से ज्यादा झटका चौधरी साब को लगा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इधर उधर के कुछ प्लॉट बेचकर चौधरी साब ने मार्केट  की  देनदारी उतारी और बन गए असल चौधरी। मार्केट का हिसाब बराबर करने के बाद वो एक बात अक्सर गुनगुनाया करते ,"शुक्र  है दाते दा ,जो उस ने लाज रख लई। कोई और होता तो आत्म  हत्या ही कर लेता। "असल में उन्होंने अपने दूसरे कामों के लिए मार्केट से पैसा उधार  उठा रखा था।

कईं काम किए हैं चौधरी साब  ने अपने जीवन में। कईं नामी कम्पनियों की  दवाइयों के  होल सेल का काम था भले ज़माने में। मेडिकल स्टोर ,प्रॉपर्टी डीलिंग ,होटल ,फाइनेंस और न  जाने कितने काम किए थे चौधरी साब ने। काम  सभी चल निकले थे। इसे भाग्य कहें या फिर प्लॉनिंग में कोई कमी और या फिर चौधरी साब का काम करने का अन्दाज़------किसी भी काम में चौधरी साब जम  नहीं पाए। काम करने की इतनी ललक थी के पूना ,बंगलौर,दिल्ली ,नॉएडा और देश के कईं  हिस्सों में चक्कर लगा आए। देहरादून मंसूरी में तो उन्होने एक शानदार होटल भी खोल दिया था। अपने पार्टनर दोस्त के साथ जमी नहीं तो वो भी छोड़ घर लौट आए। जो तीन चार साल का समय ख़राब हुआ वो तो हुआ सो हुआ ,जो पैसे का नुक्सान हुआ वो अलग। चौधरी साब फिर भी मस्त।


मुझे अपने मन की  बातें बता दिया करते थे चौधरी साब। काम करने के साथ पैसा कमाने की ललक ही  थी के एक बार चौधरी साब  ने विदेश जाने का मन बना लिया। आनन फ़ानन में पासपोर्ट बनवाया गया और दिल्ली के एक एजेन्ट को ४ लाख़ रूपए और पासपोर्ट थमा दिए गए।चौधरी साब  खाने पीने के शौकीन थे। जब भी कोई महफ़िल जमती, विदेश के किस्से कहानियों का ज़िक्र  चलता। कईं  साल पहले अपने एक ख़ास  दोस्त राजेश भाटिया की मदद कर विदेश भेजा था चौधरी साब  ने।वो जब भी इंडिया आता वहाँ की ज़िन्दगी के बारे में बताता। बस अब तो जैसे चौधरी साब पँख  लगा कर उड़ जाना चाहते थे।

इस के बाद दिल्ली आने जाने का जो सिलसिला शुरू हुआ बस पूछो ही मत।पहले वीज़ा के लिए और बाद में पासपोर्ट वापिस लेने के लिए। असल में जिस एजेंट को पैसे और पासपोर्ट दिया गया था वो गायब हो गया। यहाँ भी चौधरी साब की दाल नहीं गली।एजेंट को खोजने में कई चक्कर दिल्ली के लग गए। खैर चौधरी  साब ने हार नहीं मानी। एजेंट को ख़ोज  ही  निकाला। लेकिन वो पैसे वापिस करने में आनाकानी करने लगा।  वो तो भला हो कम्पल भाई का जिस ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर के पैसे और पासपोर्ट वापिस दिलवा दिए। कम्पल भाई दिल्ली पुलिस में इंस्पेक्टर तैनात है।

ये सिलसिला यहीं खत्म  नहीं हुआ। एक दिन चौधरी साब अपने साथ किसी नई शख्सियत को लेकर आए। नये आदमी को देख कर महफ़िल के सभी लोगों ने एक दूसरे से आँखें मिलाई। समझते देर ना लगी के चौधरी साब कोई नई कहानी की नींव रखने जा रहे हैं। " ये अपने मित्र हैं ,कम्बोज जी ",बातों और परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। समीर ने कम्बोज की पहचान के लोगों के नाम गिनवाने शुरू किए तो कुछ देर ही कम्बोज चिर परिचित लगने लगा। कम्बोज भी सभी में जल्दी ही घुलमिल गया।

गोल मटोल चेहरा ,कद लगभग ५ फुट २ इंच ,भारी भरकम पेट. ............. क़द काठी जैसी भी थी कम्बोज साब रहते बनठन कर थे।ब्रांडेड कपड़े ,माथे पर तिलक लगा कर रहना उन की  फितरत में था। पहली मुलाक़ात के बाद उन का आनाजाना आम हो गया था। चौधरी साब की  यारी कम्बोज से ऐसी लगी के महफ़िल के लोग उन पर ताने कसने लगे। दोनों की लम्बी - लम्बी मुलाकातें होने लगी,चौधरी साब ने महफ़िल में भी बैठना कम कर दिया।

मैं और समीर एक दिन  बैठे बातें कर रहे थे।दूसरी तरफ़ से कम्बोज और चौधरी साब आते दिखाई दिए।  तभी पता नहीं समीर के मन में क्या सूझा ,"ए चौधरी  दी अजकल कम्बोज नाल बड़ी गुटरगूँ चल रही है।चौधरी दी ऐसी तैसी फेरेगा ए कम्बोज। " दोनों ने ज़ोर का ठहाका लगाया और इधेर उधर की  बातें करने लगे । वैसे अब तक सब को पता चल चुका था के चौधरी कम्बोज के जाल में फँस चुका है।

असल में चौधरी साब  अपनी डॉक्टर  बीवी  को सरकारी नौकरी लगवाना चाहते थे। इसी चक्कर में वो ४ -५ लाख कम्बोज को भी फँसा  बैठे थे।ऐसा नहीं के मिसेज चौधरी में काबलियत नहीं थी। गोल्ड मेडलिस्ट थीं वो। स्कूल से लेकर डिग्री हासिल करने तक हर क्लास में फर्स्ट आती थीं मिसेज चौधरी।नौकरी के लिए पैसे देने की नौबत इस लिए आई  क्यों के इससे  पहले भी वो तीन बार टेस्ट पास कर चुकी थी परन्तु इंटरव्यू में रह  जाती थी। सरकार में कोई सिफारिश जो  न थी।

 यहाँ भी चौधरी का फंडा  बिलकुल साफ़ था के बीवी की  सरकारी नौकरी लग जायगी तो एक फिक्स इनकम घर में आने लगेगी और वो ख़ुद  कोई भी काम कर लेंगे।आजकल उनकी हर बात में मैडम का ज़िक्र ज़रूर होता। मोहिंदर भी जब कभी करनाल  आता तो चुटकी लेकर वो चौधरी साब से ये ज़रूर पूछता ,"भाभी जी दा की हाल है चौधरी साब। "फिर बाद में मुझे स्माइल देते हुए  ये ज़रूर कहता ,"बहुत प्यार करते हैं चौधरी साब अपनी बीवी से। अपनी बीवी का ज़िक्र  ज़रूर करते हैं हर बात में। "

 ये सिलसिला करीब  ३ -४ साल तक चलता रहा। नौकरी की लिस्ट फाइनल होने की तारीख़ ज्यों ज्यों नज़दीक आने लगी,कम्बोज का फ़ोन बंद रहने लगा। आपस में मिलने का सिलसिला भी कम हो गया था।जिस का डर था वही हुआ।लिस्ट जारी  हो चुकी थी लेकिन मिसेज चौधरी का नाम कहीं न था। चौधरी साब हताश हो गए। कम्बोज को उन्होंने बहुत गालियाँ निकाली। एक उम्मीद थी वो भी धाराशाई हो कर बिखर गई।
 पिछले १२ साल से कोशिश  कर रहे थे नौकरी के लिए और इस बार ये आखरी चान्स  भी था। कम्बोज अंडर ग्राउंड हो चुका  था। अब  कम्बोज को ढूंढ़ने और पैसे वापिस लेने की  क़वायद शुरू हो चुकी थी । वैसे अंदर की बात ये है के पैसे अभी तक वापिस नहीं आए  हैं और चौधरी साब इस उम्मीद पर ज़िन्दा  हैं ,"उन की हक़ हलाल की कमाई है पैसे वापिस ज़रूर आयेंगे। "

 चौधरी साब तो जैसे टूट से गए थे । थोड़ा  ब्लड प्रेशर भी बढ़ने लगा था। बात -बात पर  गुस्सा करना उन की आदत में शामिल हो चुका था।पिछले दिनों बीमार भी रहे।बातें भी कुछ उटपटांग सी करने लगे थे। उनके व्यवहार से ऐसा लगने लगा था मानो  डिप्रेशन का शिकार हो गए हों। लगभग एक डेढ साल तक इलाज चला, खूब पैसा भी लगा पर मर्ज़ ऐसी के जाने का नाम नहीं ले रही थी। चौधरी साब सब से अलग चुपचाप रहने लगे।जैसे जीने का कोई मक़सद ही न हो। 

 पिछले पाँच महीनों से चौधरी साब में ज़बरदस्त बदलाव आ गया था। बेटा  आई आई टी में सेलेक्ट हो  गया था।जैसे  बिमारी वीमारी कोई थी ही नहीं। चेहरा भी पहले कि तरह टमाटर की  तरह लाल हो गया था। महफ़िलों का दौर फिर से शुरू हो गया था। रिजल्ट से पहले ही आई आई टी से पास हो कर निकलने वाले बच्चों के पैकेज की बात अब अक्सर होने लगी थी। कोई भी बात होती घूम फिर कर उस का अन्त आई आई टी के बच्चों को मिलने वाले पैकेज से ही होता। उस दिन जब मैंने चौधरी साब को अख़बार में छपी एक ख़बर  का ज़िक्र  किया तो वो बोले ,"५० -६० लाख का पैकेज तो कुछ भी नहीं आजकल तो डेढ़ से दो करोड़ तक का पैकेज मिलने लगा है बच्चों को। ये बात कहते ही  उन के चेहरे पर संतुष्टी के जो भाव आए वो सचमुच ऐसे थे मानो उन्हें  उनकी  लम्बी तपस्या का फल मिल गया हो।

जिस दिन आई आई टी का रिजल्ट आया चौधरी साब की ख़ुशी का कोई ठिकाना  न रहा। कईं  दिन तक रिश्तेदारों और दोस्तों में मिठाई  बाँटने का सिलसिला चलता रहा। चौधरी साब के तो पाँव जैसे ज़मीन पर ही नहीं पड़ रहे थे। २० -२५ हज़ार की मिठाई बाँट दी गई थी और दोस्तों को पार्टी देने में जो खर्च हुआ उस का तो हिसाब किताब ही नहीं। महफ़िल के दौर चल  रहे थे बधाई देने के लिए आने वालों का सिलसिला बदस्तूर जारी था।

एक दिन महफ़िल जमी हुई थी। रणबीर भी पार्टी में था। रणबीर ,चौधरी साब के देहरादून वाले होटल में पार्टनर था। पार्टनरशिप टूटने के बावजूद भी  रणबीर और चौधरी अक्सर मिलते रहते थे। रणबीर चौधरी साब के शाही अंदाज़ पर अक्सर चुटकी लेता रहता था। आज भी रणबीर ने चुटकी लेते  हुए कहा ,"यू चौधरी सब ते पहलां मरेगा। कामकाज तो यो कुछ करदा नी। अर इस की  मौज मस्ती तो देखो। " इस से पहले के रणबीर की बात पर कोई रियेक्ट करता चौधरी साब फुँफकारते हुए चिल्लाए ,"तेरे बाप की  नहीं ख़ाता हूँ। जब देखो उल्टा ही  बोलेगा। " महफ़िल में सन्नाटा छा  गया था। रणबीर को तो जैसे साँप  ही  सूँघ  गया था।

धीरे धीरे सब सरकने लगे थे। मैने धीरे से चौधरी साब के कंधे पर हाथ रखते हुए  शांत होने का इशारा किया तो चौधरी साब फूट फूट कर रोने लगे। सिसकियाँ लेते हुए वो बोले ,"अभी तो एक उम्मीद जगी थी और जीने का मज़ा आने लगा था पता नहीं कैसी कैसी उल्टी बातें करता है।जब देखो मरने की ही बातें करता रहता है। " मैंने उन को समझाते हुए जब ये कहा " रणबीर का आपको दुःख पहुँचाने का कोई उदेशय नहीं था।"चौधरी साब झट से बोले ,"मलिक साब आप को नहीं पता, कईं  बार आदमी के मुहँ में सरस्वती बैठी होती है। "

मन तो बहुत हुआ के उसी वक्त ज़ोर से ठहाका  लगाऊँ। परन्तु स्तिथि ऐसी थी के मैं उस समय हँस  नहीं पाया।
 
 

Saturday, 7 December 2013

THIRD CLASS...!

बच्चों कि दुनिया भी कमाल की  दुनिया होती है। यदि उनकी बातों  को ध्यान से सुना जाए तो उनकी चुलबुली बातें ख़ुद  को बचपन में ले  जाती हैं। सब से बेख़बर------बस जो कह दिया, सो कह दिया। उनकी बात को सुन कर कोई क्या कहेगा या सोचेगा इस से बेफ़िक़र् वो अपनी बात को बड़ी सादगी से कह जाते हैं।

कल ही की तो बात है ,मैंने स्टाफ को बुला कर कहा था ,"टीचर्स ,क्या आप को नहीं लगता के स्कूल में बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं। "मेरी बात पूरी होने से पहले ही एक अध्यापिका बोली ,"हाँ सर,थर्ड क्लास के बच्चे तो किसी की सुनते ही नहीं हैं। इस क्लास में अधिकतर बच्चे  ऐसे हैं जिन्हें कंट्रोल करना बहुत मुश्किल हो गया है। "एक और मैडम ने सुषमा की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ,"सच में सर ,थर्ड क्लास ने तो हद कर दी है , ऐसी  गालियां निकालते  हैं... ……  बस मैं आप को बता नहीं सकती। "

टीचर्स की बात सुनकर एक बारगी तो मुझे लगा मानो तीसरी कक्षा के बच्चे  सच में "थर्ड क्लास" का व्यवहार करने लगे  हैं। इस से पहले भी बच्चों की ऐसी शिकायतें मेरे पास आ चुकी थीं। असेंबली में समझाने और दूसरे कईं तरीके अपनाने के बावजूद भी "थर्ड क्लास" के बच्चों पर कोई असर नहीं हो रहा था।

असल में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों में अधिकतर मेहनतकश परिवारों से हैं। परिवार में अधिकतर लोग कम पढ़े लिखे होने के कारण, अक्सर अपनी आम भाषा में कुछ ख़ास गालिओं का प्रयोग करते हैं.…………… ये मैं अच्छी तरह से जानता था। कईं बार तो गालिओं का तड़का इस कद्र लगा होता है मानो वो बात न करके गालियां सुनाने का कोई कम्पटीशन लड़ रहे हों।

 यहीं से शुरू होता है बच्चों के गाली  सीखने और उन्हें अपनी आम भाषा में प्रयोग करने का सिलसिला। कईं बार गाली देते हुए बच्चे ऐसे एक्शन करते हैं मानो सृजन की प्रतिमूर्ति ये बालक ही हों। बेशक़ इनको किसी भी चीज़ के मायने पता नहीं होते हैं।

एक तरफ़  मेरी ये ज़िम्मेदारी थी के बच्चों को इस लत से छुटकारा दिलवाया जाये और दूसरी तरफ़ बच्चों के सृजन कार्यों का मैं कायल भी था। गाली निकालने का अंदाज़,अपने टीचर्स की  हूबहू नक़ल उतारना ,किसी कमज़ोर बच्चे  को तंग करने के नए -नए  तरीक़े अपनाना ,शरारत करने के बाद अपने साथी को फँसवा देना ,टीचर विशेष के मुँह मोड़ते ही उस के पीछे डांस की मुद्रा बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

बच्चे क्या हम भी तो जाने अनजाने अपने आसपास के लोगों की  नक़ल करते हैं। इसलिए  बच्चों की  इन चुलबुली बातों पर मुझे  गुस्सा कम ही आता था। आज  जब मैं अपने रूम में बैठा था तो एक आवाज़ मेरे कानों में गूंजी ,"चुप ,ख़बरदार अगर अब आवाज़ आई तो। "असल में ये भंडारी मैडम की आवाज़ थी। मेरे लिए ये आवाज़ चिरपरिचित थी।

पिछले एक दो दिन से चल रही प्रक्रिया से मैं दुःखी तो था लेकिन भंडारी मैडम की गर्जन ने मेरे अंदर का आर्टिस्ट जगा दिया। मैं भी बच्चा बन गया। सोचने लगा ,"  अगर भंडारी मैडम पुलिस में होती तो बड़े से बड़े खूंखार  मुज़रिम थर थर काँपते। " मैं ये सोच  ही रहा था के मेरे चेहरे पर मैंने एक अजीब सी मुस्कान  को महसूस किया। मैं अकेला हँसने  लगा। मैं चूंकि अपने कमरे में अकेला बैठा था , मैं भंडारी मैडम के डायलाग दोहराने लगा ," चुप ,ख़बरदार अगर अब आवाज़ आई तो। "  मेरे दिमाग में उनका ख़तरनाक़  सा चेहरा घूमने लगा।  उन की इस गर्जन से बच्चे डरते भी होंगे--------------- ये सोच कर  मैं फिर हँसने  लगा।

 नवज्योत  मैडम ने कमरे में प्रवेश करते हुए  कहा ," क्या बात हुई सर ,अकेले अकेले क्यों हँसे  जा रहे हो। " मैंने  कहा ," कुछ नहीं, बस यूँ  ही।" नवज्योत तुरन्त बोली ," कुछ तो बात है  सर। "मैंने भंडारी मैडम का डायलॉग सुनाते हुए पूछा ," क्या सच में भंडारी मैडम की गर्जन से बच्चे डरते हैं ?" मेरा कमरा नवज्योत के ठहाके से गूंजने लगा। वो कुछ इस तरह से हँसी के मैं भी अपनी हँसी को रोक न सका। मैने हँसते हुए पूछा , "ऐसा क्या हुआ भई ,मैंने  कोई ग़लत सवाल पूछा  क्या ?"

नवज्योत अपनी हँसी पर नियंत्रण करते हुए बोली ,"डरना तो दूर ,बच्चे जो मैडम के बारे में बोलते हैं उसे सुनोगे तो आप भी दंग रह  जाओगे। "मैडम कि इस  बात ने मेरे अंदर उत्सुकता का भाव जगा दिया। मैंने तुरन्त अपना सवाल दोहराया, "  ऐसा क्या हुआ ?

 नवज्योत ने कहा , "दो बच्चियाँ आपस में बात कर रही थीं। वो अपनी बात में पूरी तरह मग्न थीं। मैं उनकी बात को सुनने के लिए रुक गई। " एक ने ग्राउंड में खड़ी भंडारी मैडम की  और इशारा करते हुए कहा , "वो देख मोटी मैडम ,  कैसे डांटती रहती है सब को। " असल में भंडारी मैडम ग्राउंड में खेल रहे बच्चों को डांट  रही थी। दूसरी बच्ची बोली ,"मेरा मन तो करता है के इस पर तेल छिड़क कर आग लगा दूँ।" 

मैं अपनी हँसी को रोक न पाया। मैंने पूछा ," कौन सी  क्लास की  बच्चियाँ थी। "

मैडम ने कहा ,"  थर्ड क्लास !"  इतने में स्कूल की घण्टी बज गई ,नवज्योत ने अपना पर्स उठा कर जाने की इच्छा ज़ाहिर की। मैं सोचने लगा के आखिर  इस *थर्ड क्लास* के लिए ज़िम्मेदार कौन है ?