डॉ डेंग पशुओं के मशहूर डॉक्टर। सरकारी नौकरी मतलब बेफिकरी। अफसरों के साथ पक्का गठजोड़। ड्यूटी पर गए तो गए। न गए तो भी कोई डर नहीं। बनिया जात खाली बैठना तो जैसे सीखा ही न हो। हर वक़्त दिमाग घूमता के दो के चार कैसे किए जायें।एक बार परिवार के दबाव में डॉ डेंग कार खरीद लाए। ख़ूब रिसर्च की कार खरीदने के लिए। रिसर्च का फायदा ये हुआ के कार मार्केट रेट से सस्ती मिल गई।
अच्छी चीज़ का तो हर कोई ग्राहक होता है। डॉ डेंग कार क्या लाए बार बार डोर बेल्ल बजने लगी। कार बेचने के लिए तो लाए नहीं थे। एक कहावत है के बनिया बावन बुद्धि होता है। कार की डिमांड देख डॉ के दिमाग की तो जैसे घंटी बजने लगी। डॉ की कार घर के लिए नहीं जैसे बिकने के लिए आई हो। हुआ भी वही डॉ की कार बिक गई। डॉ को भले ज़माने में प्रॉफिट हुआ २०००० हजार। बोले तो शुद्ध लाभ।
डॉ को तो जैसे ख़ून मुहँ लग गया। अब डॉ का मन नौकरी में कम कारों की रिसर्च में ज्यादा लगने लगा। कभी दिल्ली तो कभी चंडीगढ़ डॉ को जहाँ से भी कार सस्ती मिलती खरीद लाता। इस काम में डॉ को ख़ूब मज़ा आने लगा।डॉ की तो जैसे पोह बारह हो गई। हररोज़ चलाने को नई गाड़ी और बिकने पर प्रोफिट अलग। आम के आम गुठलिओं के दाम।
डॉ डेंग दोस्तों में बेशक़ कंजूस के नाम से मशहूर थे। लेकिन अपने और घर के लोगों पर कभी कंजूसी नहीं करते थे। शाही अंदाज़ से रहते डॉ डेंग। ब्रांडेड कपड़े ,बढ़िया खानपान ,क्लासिक की सिगरेट ,रीबॉक के जूते और कार में घूमना उनके अंदाज़ में शामिल था।शाही शौंक हो भी क्यों न एक तो सरकारी नौकरी दूसरे कारों की सेल परचेज़ का बिज़नस भी जमने लगा था।
कमाई होने लगी तो डॉ डेंग ने अपने बेटे को ऑस्ट्रेलिया भेजने का मन बना लिया। बेटे को विदेश भेजने के चक्कर में डॉ ने सारे घोड़े खोल दिए। डॉ को समझ आ गई थी के अगर बेटा विदेश सेट्ल हो गया तो लक्ष्मी बरसने लगेगी।बस फिर बेटे को विदेश भेज कर ही साँस लिया।
अब सरकारी नौकरी के साथ डॉ ने कारों की सेल परचेज़ की दुकान भी खोल ली। डॉ का भुरभुरा स्वभाव और मिलन शैली के कारण दुकान पर अखाड़ा बंधने लगा। धंधा जम ही चुका था।आने जाने वालों के लिए डॉ की दुकान आरामगाह बन गई थी।गर्मियों के दिनों में दुकान खुलते ही ए सी ऑन हो जाता। जो एक बार वहाँ आ जाता वहीँ जम जाता। किसी की मत मारी थी के चिलचिलाती गर्मी में कोई बाहर जाता। किसी का अगर घर से फ़ोन भी खड़कता तो कोई न कोई बहाना लगा दिया जाता। और अगर कोई घर चला भी जाता तो फटाफट ए सी में पहुँचने की कोशिश करता।
आमतौर पर डॉक्टरों को सम्मान से बुलाया जाता है। पर डॉ डेंग ऐसे जैसे मान सम्मान की कोई परवाह ही न हो। डॉक्टर को तो बस माया से प्रेम। जो कोई भी बुलाता ओ डॉक्टर कह के बुलाता।स्वभाव ऐसा के डॉ डेंग किसी की बात का बुरा न मानते।डॉ के स्वभाव के कारण ही सब वहाँ जमा हो जाते।
डॉ डेंग किसी से कोई छुपाव नहीं रखते। क्या कितने में बेचा या ख़रीदा सब को मालूम होता। कार बेचने पर कमीशन मिले या कोई प्रॉफिट हो ,सब डॉ को इस तरह से बधाई देते मानो उनके घर में लड़का पैदा हुआ हो। पर डॉ डेंग भी ऐसे पक्के के किसी की बात पर कोई ध्यान न देते। गाँठ के इतने पक्के के एक पैसा न खर्च करते। डॉ डेंग का ये रोज़ का काम जो ठहरा। बात भी सही है के वो हर ख़रीद फ़रोख़त पर पार्टी देने लगे तो कर ली कमाई।
दोस्तों का जमावड़ा खूब जमने लगा था। खाने पीने का दौर भी चलता। माहौल ऐसा बन गया के सभी बारी बारी से खर्च करने लगे ताकि एक पर बोझ न पड़े। "बिल्कुल इंग्लिश सिस्टम।" पैसे देते देते कोई न कोई ये ज़रूर बोल देता ,"दोस्ती पक्की खर्च अपना अपना।" खर्च करने में डॉ कँजूस तो था ही इस लिए आमतौर पर डॉ डेंग की कोशिश होती के बिना खर्च काम चल जाए तो समझो सोने पे सुहागा।
लेकिन आज तो जैसे तस्वीर बदली हुई थी।हर वक़त खुश रहने वाला डॉ उदास नज़र आ रहा था।सिगरेट का धुआं इतना फैल गया था मानो दुकान में ईंटों का भट्ठा चल रहा हो। बातों बातों में पता चला के आज डॉ लगभग ४० सिगरेट पी गया है। कोई न कोई फ़िक़र तो थी जो इतना धुआँ उड़ाया जा रहा था।
बात खुली तो पता चला के डॉ के बेटे ने ऑस्ट्रेलिया में ही किसी गौरी मेम से शादी कर ली है। शादी को पाँच महीने हो गए हैं और डॉ डेंग दादा बनने वाला है। मैने पूरे जोश खरोश से डॉ को बधाई दी। लेकिन डॉ ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। सब डॉ को समझाने लगे के आज कल ज़माना बदल गया है।
लेकिन डॉ को तो जैसे चुप्पी लग गई थी। सपने जैसे चूर -चूर हो गए थे। जब डॉ पर किसी का कोई असर नहीं हुआ तो एक साथी मज़ाक भरे लहज़े से बोला ,"भाई यू डॉ क्योंकर खुश होवेगा,छोरा उरै ब्याह करदा तो ४० -५० लाख मिलदे। यू नुक्सान के थोड़ा है। " इस बात पर सभी ने ज़ोर का ठहाका लगाया और डॉ के चेहरे पर भी एक कटु सी हँसी फैल गई।
बावन बुद्धि को जैसे सच में शॉक लगा और शॉर्ट सर्कट को ठीक होने में कुछ समय तो लगना ही था !
अच्छी चीज़ का तो हर कोई ग्राहक होता है। डॉ डेंग कार क्या लाए बार बार डोर बेल्ल बजने लगी। कार बेचने के लिए तो लाए नहीं थे। एक कहावत है के बनिया बावन बुद्धि होता है। कार की डिमांड देख डॉ के दिमाग की तो जैसे घंटी बजने लगी। डॉ की कार घर के लिए नहीं जैसे बिकने के लिए आई हो। हुआ भी वही डॉ की कार बिक गई। डॉ को भले ज़माने में प्रॉफिट हुआ २०००० हजार। बोले तो शुद्ध लाभ।
डॉ को तो जैसे ख़ून मुहँ लग गया। अब डॉ का मन नौकरी में कम कारों की रिसर्च में ज्यादा लगने लगा। कभी दिल्ली तो कभी चंडीगढ़ डॉ को जहाँ से भी कार सस्ती मिलती खरीद लाता। इस काम में डॉ को ख़ूब मज़ा आने लगा।डॉ की तो जैसे पोह बारह हो गई। हररोज़ चलाने को नई गाड़ी और बिकने पर प्रोफिट अलग। आम के आम गुठलिओं के दाम।
डॉ डेंग दोस्तों में बेशक़ कंजूस के नाम से मशहूर थे। लेकिन अपने और घर के लोगों पर कभी कंजूसी नहीं करते थे। शाही अंदाज़ से रहते डॉ डेंग। ब्रांडेड कपड़े ,बढ़िया खानपान ,क्लासिक की सिगरेट ,रीबॉक के जूते और कार में घूमना उनके अंदाज़ में शामिल था।शाही शौंक हो भी क्यों न एक तो सरकारी नौकरी दूसरे कारों की सेल परचेज़ का बिज़नस भी जमने लगा था।
कमाई होने लगी तो डॉ डेंग ने अपने बेटे को ऑस्ट्रेलिया भेजने का मन बना लिया। बेटे को विदेश भेजने के चक्कर में डॉ ने सारे घोड़े खोल दिए। डॉ को समझ आ गई थी के अगर बेटा विदेश सेट्ल हो गया तो लक्ष्मी बरसने लगेगी।बस फिर बेटे को विदेश भेज कर ही साँस लिया।
अब सरकारी नौकरी के साथ डॉ ने कारों की सेल परचेज़ की दुकान भी खोल ली। डॉ का भुरभुरा स्वभाव और मिलन शैली के कारण दुकान पर अखाड़ा बंधने लगा। धंधा जम ही चुका था।आने जाने वालों के लिए डॉ की दुकान आरामगाह बन गई थी।गर्मियों के दिनों में दुकान खुलते ही ए सी ऑन हो जाता। जो एक बार वहाँ आ जाता वहीँ जम जाता। किसी की मत मारी थी के चिलचिलाती गर्मी में कोई बाहर जाता। किसी का अगर घर से फ़ोन भी खड़कता तो कोई न कोई बहाना लगा दिया जाता। और अगर कोई घर चला भी जाता तो फटाफट ए सी में पहुँचने की कोशिश करता।
आमतौर पर डॉक्टरों को सम्मान से बुलाया जाता है। पर डॉ डेंग ऐसे जैसे मान सम्मान की कोई परवाह ही न हो। डॉक्टर को तो बस माया से प्रेम। जो कोई भी बुलाता ओ डॉक्टर कह के बुलाता।स्वभाव ऐसा के डॉ डेंग किसी की बात का बुरा न मानते।डॉ के स्वभाव के कारण ही सब वहाँ जमा हो जाते।
डॉ डेंग किसी से कोई छुपाव नहीं रखते। क्या कितने में बेचा या ख़रीदा सब को मालूम होता। कार बेचने पर कमीशन मिले या कोई प्रॉफिट हो ,सब डॉ को इस तरह से बधाई देते मानो उनके घर में लड़का पैदा हुआ हो। पर डॉ डेंग भी ऐसे पक्के के किसी की बात पर कोई ध्यान न देते। गाँठ के इतने पक्के के एक पैसा न खर्च करते। डॉ डेंग का ये रोज़ का काम जो ठहरा। बात भी सही है के वो हर ख़रीद फ़रोख़त पर पार्टी देने लगे तो कर ली कमाई।
दोस्तों का जमावड़ा खूब जमने लगा था। खाने पीने का दौर भी चलता। माहौल ऐसा बन गया के सभी बारी बारी से खर्च करने लगे ताकि एक पर बोझ न पड़े। "बिल्कुल इंग्लिश सिस्टम।" पैसे देते देते कोई न कोई ये ज़रूर बोल देता ,"दोस्ती पक्की खर्च अपना अपना।" खर्च करने में डॉ कँजूस तो था ही इस लिए आमतौर पर डॉ डेंग की कोशिश होती के बिना खर्च काम चल जाए तो समझो सोने पे सुहागा।
लेकिन आज तो जैसे तस्वीर बदली हुई थी।हर वक़त खुश रहने वाला डॉ उदास नज़र आ रहा था।सिगरेट का धुआं इतना फैल गया था मानो दुकान में ईंटों का भट्ठा चल रहा हो। बातों बातों में पता चला के आज डॉ लगभग ४० सिगरेट पी गया है। कोई न कोई फ़िक़र तो थी जो इतना धुआँ उड़ाया जा रहा था।
बात खुली तो पता चला के डॉ के बेटे ने ऑस्ट्रेलिया में ही किसी गौरी मेम से शादी कर ली है। शादी को पाँच महीने हो गए हैं और डॉ डेंग दादा बनने वाला है। मैने पूरे जोश खरोश से डॉ को बधाई दी। लेकिन डॉ ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। सब डॉ को समझाने लगे के आज कल ज़माना बदल गया है।
लेकिन डॉ को तो जैसे चुप्पी लग गई थी। सपने जैसे चूर -चूर हो गए थे। जब डॉ पर किसी का कोई असर नहीं हुआ तो एक साथी मज़ाक भरे लहज़े से बोला ,"भाई यू डॉ क्योंकर खुश होवेगा,छोरा उरै ब्याह करदा तो ४० -५० लाख मिलदे। यू नुक्सान के थोड़ा है। " इस बात पर सभी ने ज़ोर का ठहाका लगाया और डॉ के चेहरे पर भी एक कटु सी हँसी फैल गई।
बावन बुद्धि को जैसे सच में शॉक लगा और शॉर्ट सर्कट को ठीक होने में कुछ समय तो लगना ही था !











