"सैंटा "
क्रिसमस का दिन था। छुट्टी के दिन कईं दिनों के बाद मैं आज घर पर था। अपने कमरे में बैठा लैपटॉप पर अंगुलियां चला रहा तो सहसा बाहर से कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। अब्बा और माँ आँगन में धूप सेक रहे थे। माँ बार बार अब्बा को हलवा बनाने के लिए कह रही थीं। माँ के बनिस्पत अब्बा का रसोई में दखल ज़्यादा रहता था। बातों से ऐसा लग रहा था मानो आज तो किसी ज़िद्दी बच्चे की तरह माँ अड़ ही गई कि हलवा ही खाएंगी। अब्बा के आगे दाल न गली तो अपनी बहु को बार -बार कहने लगीं के हलवा खाने का बहुत मन है। बहु ने लाख समझाया के आप की तबियत ख़राब है। साँस और शुगर की दिक्कत है ,इसलिए हलवा न ही खाएं तो बेहतर होगा। पर माँ तो माँ हैं कहाँ मानने लगी। खूब बहस हुई। जीत माँ की ही हुई। माँ की ये जीत पहली ना थी। दस -पंद्रह दिन में माँ कुछ नया खाने की फरमाइश कर ही देतीं। कभी खीर तो कभी हलवा। कभी चना पूरी तो कभी गुरु कृपा वाले के घी में लपा लप करते भटूरे। अपने इस खानपान में बदलाव का माँ कोई न कोई तर्क भी ज़रूर देती। गुरुपर्व , जन्माष्टमी , शिव रात्रि , दीपावली , दशहरा हो या कोई और त्यौहार ,अमावस हो या फिर पूर्णमाशी माँ को ये दिन खूब याद रहते। माँ किसी न किसी पर्व की दुहाई देतीं और ऐसे में बहु को ही पराजित होना पड़ता। कई बार कमाल तो ये होता के अगर माँ की मन पसंद चीज़ माँ को न परोसी जाती तो भूख हड़ताल की धमकी दे माँ मौन व्रत पर भी चली जातीं। माँ की ये ख़ास फरमाइश रविवार वाले दिन या फिर कभी बहू की छुट्टी वाले दिन तो ज़रूर ही होती। अपने कमरे में बैठा दोनों के बीच इस शीत युद्ध के डायलॉग सुन मुस्कुरा रहा था। ऐसे में किसी एक का पक्ष लेने का मतलब होता युद्ध के रुख को अपनी ओऱ मोड़ना। ठण्डी के मौसम में गर्म -गर्म रजाई से लिपटे हुए मैं इस आग में थोड़ी सी फूँक मार कर आग को भड़काने का काम भी कर सकता था। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया क्योंकि बार बार हलवे का ज़िक्र सुनते -सुनते मेरे भी मुहँ में भी पानी आने लगा था। अंततः मैंने युद्ध में कूदने की बजाय युद्ध विराम ही बेहतर समझा। मुझे समझ नहीं आ रहा था के माँ आज क्रिसमस पर्व को कैसे भूल गई थीं। मैने अपनी बीवी को बोला ,"भई आज christmas है ,हलवा तो बनता है। " क्रिसमस का नाम सुनते ही माँ का चेहरा ख़ुशी से खिल उठा। अधिकतर माँ के उल्टे पुल्टे तर्कों का मैं विरोध ही करता और मुझे माँ की गालियों का रसास्वादन करना पड़ता था। बीवी ने रसोई की ओर जाते हुए माँ से नज़रें चुरा आँखों को तिरछा कर के गुस्से और प्यार के तड़के वाली मुस्कराहट से मेरी तरफ देखा और हलवा बनाने के लिए रसोई में जा घुसी। बीवी की ये मुस्कुराहट मेरे लिए किसी "सैंटा" के तोहफे से कम न थी !
क्रिसमस का दिन था। छुट्टी के दिन कईं दिनों के बाद मैं आज घर पर था। अपने कमरे में बैठा लैपटॉप पर अंगुलियां चला रहा तो सहसा बाहर से कुछ आवाज़ें सुनाई दीं। अब्बा और माँ आँगन में धूप सेक रहे थे। माँ बार बार अब्बा को हलवा बनाने के लिए कह रही थीं। माँ के बनिस्पत अब्बा का रसोई में दखल ज़्यादा रहता था। बातों से ऐसा लग रहा था मानो आज तो किसी ज़िद्दी बच्चे की तरह माँ अड़ ही गई कि हलवा ही खाएंगी। अब्बा के आगे दाल न गली तो अपनी बहु को बार -बार कहने लगीं के हलवा खाने का बहुत मन है। बहु ने लाख समझाया के आप की तबियत ख़राब है। साँस और शुगर की दिक्कत है ,इसलिए हलवा न ही खाएं तो बेहतर होगा। पर माँ तो माँ हैं कहाँ मानने लगी। खूब बहस हुई। जीत माँ की ही हुई। माँ की ये जीत पहली ना थी। दस -पंद्रह दिन में माँ कुछ नया खाने की फरमाइश कर ही देतीं। कभी खीर तो कभी हलवा। कभी चना पूरी तो कभी गुरु कृपा वाले के घी में लपा लप करते भटूरे। अपने इस खानपान में बदलाव का माँ कोई न कोई तर्क भी ज़रूर देती। गुरुपर्व , जन्माष्टमी , शिव रात्रि , दीपावली , दशहरा हो या कोई और त्यौहार ,अमावस हो या फिर पूर्णमाशी माँ को ये दिन खूब याद रहते। माँ किसी न किसी पर्व की दुहाई देतीं और ऐसे में बहु को ही पराजित होना पड़ता। कई बार कमाल तो ये होता के अगर माँ की मन पसंद चीज़ माँ को न परोसी जाती तो भूख हड़ताल की धमकी दे माँ मौन व्रत पर भी चली जातीं। माँ की ये ख़ास फरमाइश रविवार वाले दिन या फिर कभी बहू की छुट्टी वाले दिन तो ज़रूर ही होती। अपने कमरे में बैठा दोनों के बीच इस शीत युद्ध के डायलॉग सुन मुस्कुरा रहा था। ऐसे में किसी एक का पक्ष लेने का मतलब होता युद्ध के रुख को अपनी ओऱ मोड़ना। ठण्डी के मौसम में गर्म -गर्म रजाई से लिपटे हुए मैं इस आग में थोड़ी सी फूँक मार कर आग को भड़काने का काम भी कर सकता था। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया क्योंकि बार बार हलवे का ज़िक्र सुनते -सुनते मेरे भी मुहँ में भी पानी आने लगा था। अंततः मैंने युद्ध में कूदने की बजाय युद्ध विराम ही बेहतर समझा। मुझे समझ नहीं आ रहा था के माँ आज क्रिसमस पर्व को कैसे भूल गई थीं। मैने अपनी बीवी को बोला ,"भई आज christmas है ,हलवा तो बनता है। " क्रिसमस का नाम सुनते ही माँ का चेहरा ख़ुशी से खिल उठा। अधिकतर माँ के उल्टे पुल्टे तर्कों का मैं विरोध ही करता और मुझे माँ की गालियों का रसास्वादन करना पड़ता था। बीवी ने रसोई की ओर जाते हुए माँ से नज़रें चुरा आँखों को तिरछा कर के गुस्से और प्यार के तड़के वाली मुस्कराहट से मेरी तरफ देखा और हलवा बनाने के लिए रसोई में जा घुसी। बीवी की ये मुस्कुराहट मेरे लिए किसी "सैंटा" के तोहफे से कम न थी !






















इस सीरियल में डॉ शर्मा ने एक्टिंग के क्षेत्र में अपना खाता खोल लिया है।
इसे संयोग ही कहेंगे कि इस सीरियल में मेरा पुराना साथी दलजिंदर सिंह मुख्य
पात्र अभिनीत कर रहा है। दलजिंदर ने 1988 में चंडीगढ़ से इंडियन थिएटर किया
था। दलजिंदर आजकल एक पंजाबी फिल्म "कप्तान " की शूटिंग में व्यस्त है।
दलजिंदर यह फिल्म Gipy Grewal के साथ कर रहा है। 





















मौका लगे तो ज़रूर पढ़ियेगा। मैं इस के लिए डॉ अजय शर्मा और दैनिक सवेरा का ज़रूर धन्यवाद करना चाहूँगा।
उसी दिन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हरियाणा के राज्यपाल महामहिम कप्तान सिंह सोलंकी द्वारा सम्मानित किए जाने की एक फोटो आप के साथ भी शेयर कर रहा हूँ।