Tuesday, 30 December 2014

खिचड़ी -3

                                                                   खिचड़ी -3 
वर्ष - 2014 को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र (भारत )में सत्ता परिवर्तन के लिए हमेशा याद किया जाएगा। देश की जनता ने धर्म जाति रंगभेद भाषा से उपर उठ कर जिस तरह बीजेपी को बहुमत दिया उससे से ये तो साफ़ हो गया के लोकतंत्र में जनता ही भगवन है। अब देखना यह है कि जनता की आशाएं कब और कैसे पूरी होती हैं। बेशक कुछ लोग इसे मोदी की लच्छे दर भाषणों का प्रभाव कहें या फिर मोदी लहर। एक लम्बे अरसे से परिवर्तन चाह रही जनता ने अपना काम बखूबी किया है। अब देखना ये है के मोदी सरकार जनता के विश्वास पर कितना खरा उतरती है। 
कर्ण पब्लिक स्कूल का वार्षिक उत्सव मनाया जाना है। सभी बच्चों  ,अध्यापकों  और स्टाफ ने खूब मेह्नत की है। धुंध और सर्दी के बावजूद बच्चों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखाई देती।  मेरा सलाम !   हमारे इन नन्हें -नन्हें बच्चे को  जो केवल अपनी परफॉरमेंस देने के लिए धुंध और सर्दी से लोहा ले रहे हैं। यही तो कमाल है हमारी शिक्षा प्रणाली का ,जो हमें ज्ञान के साथ -साथ जीवन में आने वाली विपदाओं से लड़ना और संघर्ष करना सिखाती है। हमें आगे बढ़ना सिखाती है। हमारे बच्चों में लग्न ,मेहनत ,जज़्बा  और बढ़िया perform करने की spirit छिपी हुई है ,जिसे हम सब को मिल कर को केवल देखना ही नहीं सराहना भी होगा। जब बच्चे रिहर्सल कर रहे होते हैं और मुझे जब भी उनकी रिहर्सल देखने का मौका मिलता है तो उनकी आँखों के अंदर एक ज़बरदस्त चमक दिखाई देती है ,और उस चमक को मैं बखूबी पढ़ भी पाता हूँ। सच मानिये उनकी आँखें ये पूछना चाहती हैं के क्या मैं अच्छा परफॉर्म कर रहा हूँ या नहीं। और जब उन्हें इस बात का एहसास हो जाता है के वो अच्छा कर रहे हैं तो वो सब और अच्छा करने के लिए  अपनी जान लगा देते हैं। उदेश्य यही है के हमें मिल जुल कर बच्चों के अंदर छिपी प्रतिभा को खोजना होगा, समझना होगा और तराशना होगा।क्या पता और कौन जाने इन्हीं में कोई सचिन ,धोनी ,कल्पना चावला, सायना या कोई हमारा भावी नेता या प्रधानमंत्री छिपा हुआ हो।  जब हम डिमांड के हिसाब से वाक्यों को घड़ने लगते हैं तो उसकी सरलता और सात्विकता ख़त्म हो जाती है !  तो क्या डिमांड के अनुसार चीज़ोँ या वक्तव्यों को चाशनी लगा कर प्रस्तुत किया जाना चाहिए ?मेरे कहने का मतलब भी यही है के चाहे वो लेखन हो या फिर जीवन जहाँ हम जटिलताओं की डिमांड के अनुसार  चाशनी लगाने लगते हैं तो सरलता और सादगी ख़त्म हो जाती है।
 2014 ने जाते जाते दुनिया को ऐसी ख़बरें दी हैं जिनसे दिल दहल उठा है। मलेशिया के पूर्वी तटीय इलाकों में बाढ़ ,पाकिस्तान में स्कूली बच्चों पर आतंकी हमला ,कुछ दिन पहले असम में आतंकी हमला और Air Asia के विमान का समुद्र में समा जाना। इन हमलों और त्रासदियों ने अंदर तक हिला के रख दिया है। किन्तु जीवन की सच्चाई तो यही है कि चलने का नाम ही ज़िंदगी है। इन हादसों में मारे गए सभी लोगों को मेरी श्रद्धांजलि। 
अलविदा -2014  
सभी को मेरी शुभकामनायें ! 

खिचड़ी -2

                                                            खिचड़ी -2 
  दिसम्बर महीने में दोस्तों  को comments किए और कुछ अपनी वाल पर पोस्ट किया ! इन को पढ़ रहा था तो लगा के social media के बेशक़ लाख नुकसान हों लेकिन ये आपको दोस्तों ,विचारों ,संवेदनाओं और खासतौर पर दुनिया से जोड़े रखता है।दोस्त और दुनिया के लोग क्या सोच रहे हैं हम उससे वाकिफ होते हैं। "खिचड़ी -1 " की तरह ही इस बार भी दोस्तों की wall पर जो post किया वो "खिचड़ी -2" के रूप में तैयार है। 2014 बस जाने वाला है आओ हम सब मिलकर नववर्ष 2015 का स्वागत करें।
धर्म परिवर्तन।  कुछ समझ नहीं आ रहा के देश में ये चल क्या रहा है। "न्म दिन मुबारक हो विशाल भाई। आपका जीवन हमेशा खुशियों से भरा रहे।"य हो। अच्छा डॉक्टर साहेब मुंबई पहुँच गए ! पेंदर जी  अगर आप के पास समय हो तो बात करें ? वैसे आप हैं कहाँ? Mr. India की तरह कहाँ गायब हो जाते हो ? कोई खबर नहीं ?र ते मन च रहन्दा ही है डॉ साहेब।  शिखर के छूने के सुख को मनुष्य जो पहाड़ों पर विजय पताका फहरा रहा है। और जहाँ -जहाँ मनुष्य पहुंचा है वहां सत्यानाश हुआ है। बेशक वो धरती ,आसमान ,समुद्र या फिर पहाड़ हों !
ये सब कुछ इसी तरह होता रहेगा ,जब तक हम सुनने वाली भीड़ का हिस्सा बने रहेंगे। जोगेन्दर भाई जीवन में खटास और मिठास के साथ संतुलन बना रहे। यही शुभकामना।देश में अच्छा माहौल बनाने की ज़रुरत है। आखिर हम कब तक इसी तरह की राजनीति करते रहेंगे। ये वास्तव में दुखद समझौता ही है।
लो थोड़ा घूमना हो जाए !कल मिलते हैं।लिक परिवार की ओर से ऋचा को जन्म दिन मुबारक हो।
बरदस्त फोटो है डॉ साहेब !  ये बताता है के जीना  चाहते हो अभी उपमन्यु। उपमन्यु अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा संभल जाओ ! 
कभी -कभी आतंक का दूसरा नाम लगता है पुलिस।  साल में एक दो बार चंडीगढ़ जाना होता है,शहर में घुसते ही चौंक पर शिकारी कुत्तों की तरह सूंघते पुलिस वालों को देख कर सच में डर लगने लगता है। अब रोका के अब रोका। साल में एक बार वो पकड़ ही लेते हैं। कभी हेड लाइट बुझी है तो कभी हेड लाइट क्यों जला रखी है ? चलान भुगतो या फिर जेब गर्म करो।बिलकुल नहीं डरते हैं घूस लेते हुए। पता नहीं क्यों।
 Pakistan में स्कूली बच्चों पर हुए हमले ने अंदर तक हिला के रख दिया है। सोच रहा हूँ के आदमी इतना निर्दयी भी हो सकता है ?अमानवीयता की अति है ये तो !
 हुत मर्म है आप की बात में ! "माँ " दरवाजा तकती रह गई-बच्चे स्कूल से सीधे जन्नत चले गए ।।साभार प्रदीप राठौर। क  उम्दा कविता।हुत ख़ूब जनाब ! सच्ची कहानी ! शादियों में अक्सर ऐसा सुनने को मिलता है। यही नहीं लोग अपनी प्लेटों में इतना भर लेते है मानो सदियों से भूखे हों !
 न्म दिन की मुबारक कबूल हो हमारी ! जीवन में हर ख़ुशी मिले आप को ये कामना है हमारी ! जन्म दिन मुबारक़ हो सुनील जी।  न्म दिन मुबारक़ हो प्रियंका ! जन्मदिन मुबारक़ हो समीर जी !न्मदिन मुबारक़ हो अशोक भाई !पुरानी तस्वीरें। ये तस्वीर अमानत की शादी वाले दिन खींची थी। न्म दिन मुबारक हो परविंदर पल जी  ! इसी के साथ नव वर्ष की शुभकामनायें भी स्वीकार करें। प्रभु आप को व् परिवार को खुशियां बख्शें।
 दुःख सुख ,लाभ हानि और जीवन मृत्यु हमारी रोज़मर्रा ज़िंदगी का हिस्सा हैं। 2014 बीत चुका है।  पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो यही लगता है के आज पुरे विश्व में शांति और मानवता की ज़रुरत है।  नया साल 2015 आने वाला है। आओ सब मिल कर पूरे विश्व कल्याण के लिए दुआ करें और इस के लिए सार्थक प्रयास भी करें ।
 आप सब को नववर्ष २०१५ के लिए शुभकामनायें !

Thursday, 11 December 2014

स्कूल फीस

                                                                 स्कूल फीस 
 स्कूल असेंबली का ये नियम था के हर रोज़ एक अध्यापक और कुछ बच्चे कहानी ,गीत,चुटकले ,कविता ,यात्रा संस्मरण ,सद्वचन ,आज की बात ,ताज़ा ख़बरें या फिर किसी current topic पर ज़रूर बोलते। इस के बाद प्रिंसिपल बच्चों से मुख़ातिब होते और अपने अनुभव और कुछ नई बातें बच्चों के साथ सांझा करते । आज स्कूल असेंबली को पाँच बच्चों ने conduct किया था। रीना , अमर ,ज्योति ,पवन और माया।  पांचों की presentation कमाल की थी। टीचर्स और बच्चों ने खूब enjoy किया। तालियों की गड़गड़ाहट से पाँचों बच्चे फूले नहीं समा रहे थे।
प्रिंसिपल ने बच्चों की सराहना करते हुए कहा ,"आज के बच्चे ही कल का भविष्य हैं। आप ही में से कोई कल का सचिन ,धोनी,सायना ,कल्पना या मलाला हो सकते हैं। " अपनी बात को समझाने के उदेश्य से प्रिंसिपल ने आगे बोलते हुए कहा  ,"मैं आप को बता देना चाहता हूँ के अगर जोश और जुनून साथ हो तो कोई भी विपदा आड़े नहीं आती। बस ज़रुरत है अपने आप को सही दिशा में तैयार करने की। " अपनी speech के दौरान घडी की तरफ देखते हुए प्रिंसिपल बोले,"स्कूल आप सब के लिए एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहाँ आप अपनी तैयारी सही ढंग से कर सकते हैं।"
इसी दौरान एकाउंट्स क्लर्क मीनू हाथ में एक लिस्ट लिए प्रिंसिपल के पास आकर खड़ी हो गई। प्रिंसिपल ने अपने चश्मे में से मीनू को देखा और उसने वो लिस्ट प्रिंसिपल को थमा दी। लिस्ट पर नज़र दौडाते हुए उन्होंने अपना टॉपिक change करते हुए कहा ,"देखो बेटा आज महीने की 12 तारीख हो गई है लेकिन अभी तक बहुत सारे बच्चों की फीस जमा नहीं हुई है। जिन बच्चों की फीस अभी तक जमा नहीं हुई है वो अपने पेरेंट्स को फीस जमा करवाने के लिए बोलें। आप लोगों सेबातें तो बहुत करनी थी लेकिन असेंबली का समय पूरा हो चुका है। May God  bless you all .आप से कल फिर मु लाकात होती है।" यह कहते हुए प्रिंसिपल ने अपनी वाणी को विराम दे दिया।
अपने कमरे में पहुँचते ही प्रिंसिपल ने टेबल पर रखी घंटी पर अपनी अंगुली दबा दी।  आवाज़ सुन कर रमेश  ने भागते हुए कमरे में प्रवेश किया। अपने ही स्टाइल में उसने पूछा ,"हाँ जी सर ?" प्रिंसिपल ने रमेश को एक पर्ची थमाते हुए कहा ,"इन बच्चों को जल्दी से मेरे पास भेजो। " पर्ची पर उन पाँचों के नाम थे। रमेश बाहर जा चुका था। प्रिंसिपल असेंबली वाले बच्चों को गिफ्ट देने के लिए अलमारी में से कुछ निकालने लगे। बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रिंसिपल कोई न कोई गिफ्ट देते रहते।
अपनी कुर्सी पर बैठने के बाद खिड़की में से वो बाहर की तरफ देखने लगे। उन्होंने बाहर से ज्योति को आते हुए देखा। ज्योति उन पांचों बच्चों में से एक थी। वो धीरे -धीरे प्रिंसिपल के कमरे की और बढ़ रही थी। उसके चेहरे पर उदासी साफ नज़र आ रही थी। प्रिंसिपल के कमरे में प्रवेश करते ही वो पीली पड़ गई। प्रिंसिपल ने बच्ची को घबराते हुए देखा तो वो मुस्कुराते हुए बोले , " बेटा आप को मालूम है के मैंने आप को आज किस लिए बुलाया है ?"
अपनी गर्दन हिलाते हुए हुए वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। "अरे बेटा क्या हुआ ?आप इस तरह से क्यों रो……?" इस से पहले के प्रिंसिपल अपनी बात पूरी करते ,ज्योति रोते -रोते बोली , "मेरे पापा कह रहे थे के फीस जल्द ही जमा करवा देंगे। पापा बीमार हैं। वो आज कल काम पर भी नहीं जाते। वो कह रहे थे के पैसे आते ही फीस जमा करवा देंगे। सर , क्लर्क मैडम कह रही थी कि जिन बच्चों की फीस जमा नहीं हुई है उनको दिसंबर टेस्ट में नहीं बैठने दिया जाएगा।"
कल से दिसंबर टेस्ट शुरू होने थे। ज्योति को इनाम के रूप में दिया जाने वाला पेन प्रिंसिपल के हाथ से छिटक कर नीचे गिर गया। उसने नन्ही ज्योति को अपनी छाती से लगा लिया।
बच्ची डर के मारे अभी भी रोए जा रही थी !


खिचड़ी-1

                                                               खिचड़ी-1 
ल किरयाने की एक दुकान पर खड़ा था। लाला जी किसी ग्राहक से बातचीत में मशगूल थे। वो उस को बताने लगे के दुकानदारी आसान काम नहीं है। कहने लगे के दुकान में जितना मर्ज़ी सामान डाल लो कोई न कोई ग्राहक खाली ज़रूर जाता है। ग्राहक उनसे पूछ बैठा ,"ऐसी कौन सी चीज़ है जो आप की दुकान में नहीं है ?" लाला जी सोचने लगे लेकिन उन्हें ऐसी कोई चीज़ याद न आई। दिमाग पर बहुत ज़ोर डालने के बाद बोले ,"हाँ सच ! कल एक ग्राहक खिचड़ी मांगने लगा। लेकिन मेरी दुकान में खिचड़ी का पैकेट नहीं था। "
"खिचड़ी का क्या है इसको बनाना तो बहुत ही आसान है। कोई भी दो -तीन दाल और चावल mix कर के दे देते।" लाला के साथ खड़ा व्यक्ति बोला। " मैं भी जाणू हूँ के खिचड़ी क्या होती है लेकिन वो तो किसी कंपनी का पैकेट ही मांग रहा था। " लाला जी  ने सफाई देते हुए कहा ।
घर पहुंचा तो फेसबुक पर हिंदी में लिखे comments देख कर मेरा भी मन हुआ के हिंदी  में कमेंट्स किए जाएं तो पढ़ने वाले के लिए आसान हो जाएगा। वर्ना कई बार तो अर्थ ही बदल जाता है। कंप्यूटर में हाथ तंग होने के कारण मैं ये कर नहीं पा रहा था। मैंने एक file खोल कर किसी तरह हिंदी में लिख कर copy किया और लगा face Book पर  paste करने। थोड़ी देर के बाद जब हिंदी लिखने वाली file पर पहुंचा तो  वहां बहुत बढ़िया खिचड़ी पक चुकी थी। आप भी चख कर देखिए कैसी है ये खिचड़ी !
 ज़ुल्फ़िकार भाई , अगर 27 साल के बाद दोबारा "आगरा बाज़ार " में काम करने का मौका मिलता है तो अच्छा होगा। बहुत सारी यादें जुड़ी हैं इस  नाटक के साथ। शुभकामनायें।   मोहिन्दर जी को मेरा सादर प्रणाम ज़रूर पहुँचाना। च्चन जी पहले बधाई.... …… ! बच्चन जी ,दिल से लिखते हैं आप। जीवन में सामजस्य बना कर रखना भी कोई अपराध है क्या ? ज़ुली, मोहिन्दर जी को मेरा सादर प्रणाम ज़रूर पहुँचाना। क्या शादी के बाद किसी दूसरी स्त्री से प्यार बनाना जुर्म है ? वैसे लोग ये भी तो कहते हैं के प्यार कभी एक तरफ़ा नहीं होता। बरदस्त ! विलक्षण के जन्म दिवस पर पूरे जोशी परिवार को मुबारक। प्रभू विलक्षण को सद्बुद्धि व् दीर्घायु बख्शें। धाई अंकल ! परन्तु समझ नहीं आ रहा के आप ने किसी बनिए की बही  की तरह ऐसा क्यों लिखा कि किसी को समझ ही न आये। लो अच्छा है ………इसी तरह कारवां बनता रहे। पुनः  विलक्षण को जन्मदिन मुबारक हो ! "Happy B 'Day"  हुत ही पेचीदगी है आप की इस बात में। क्या आप का ये मानना है कि पुरुष फ़िज़ूल खर्ची  है और उसी की वजह से परिवार ऋणी होता है।क समय के बाद पारिवारिक रिश्ते टूटने और बिखरने ही लगते हैं ,बेशक कारण अलग अलग हो सकते हैं। ब माया है ! दलाव मे समय तो लगता ही है। ढ़िया है जोगेन्दर भाई ! हा हा हा हाहाहाःहाहा हा हा हा हा ! ता नहीं पादने के नाम पर सब का पाद क्यों निकल जाता है। हुत अच्छे ! किसी कहानी का ज़िक्र करें तो और भी अच्छा होगा ललित जी ! ये एक बढ़िया प्रयास है समाज में फैली बुराइयों और कचरे को दूर करने के लिए किसी न किसी को तो आगे आना ही होगा। निफा टीम को बधाई ! शा करता हूँ आप दोनों सकुशल हैं ! सुप्रभात ! हाँ मोहिन्दर आप  की कहानी के हिसाब से तो ये ज़बरदस्त लग रहा है ! श्विनी ,लोगों को खुजली लगाने का ये अच्छा तरीका है। लेकिन बच्चों को तो आज तक यही पढ़ाया गया के "जनसंख्या "अभिशाप है। ये एक ऐसा भूत है जो प्रगति को डकार जाता है। और गरीबों को आगे नहीं बढ़ने देता।  हन जी ये हमारे और अंकल के बीच की गुफ्तगू थी। खैर ! मेरी यही शुभकामना है के almighty आप सब पर खुशियों रुपी पुष्प वर्षा सदैव करते रहें। मिठाई देखकर मुहं में पानी आ रहा है।
 बचपन से यहीं गाना सुनते आ रहे हैं……, "हम भी अगर बच्चे होते खाने को मिलते लड्डू। "
जय हो !

Friday, 5 December 2014

गर्म ख़ून (भाग -4)

                                                                    गर्म ख़ून ( भाग -4 )
पति को  बेहोश देखकर वो बदहवास चौधरी मलखान के कमरे की ओर चल पड़ी। मलखान भी अपने कमरे में बेसुध पड़ा था। मंद रौशनी में भी उसका बदन कुश्ती के लिए तैयार किसी पहलवान की तरह दमक रहा था। एक बारगी तो सुंदरी बाहर की ओर चल पड़ी। दरवाज़े से बाहर अपने पति को बेसुध पड़े देखा तो न जाने सुंदरी के मन में कैसा बदलाव आया। उसने अंदर से दरवाज़ा धीरे से बंद कर लिया। अपने कपडे उतारे और मलखान के बिस्तर पर जा पहुंची। जैसे ही उसने मलखान को स्पर्श किया ,वो नींद में बोला ,"मैं न कहता था सुंदरी के तू ज़रूर आएगी। " इसी के साथ ही मलखान ने सुंदरी को अपने पाश में ऐसे जकड़ा मानो उसके टुकड़े कर देगा। सुंदरी भी जैसे टूट कर चकनाचूर हो जाना चाहती थी। जब सब कुछ निपट गया तो सुंदरी के कानों में मलखान के वो शब्द गूंजने लगे ,"हमारे कुँए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन तुझ से इश्क़ हो गया है सुंदरी। " सुंदरी तो जैसे आज सच में आज़ाद हो गई थी। सुंदरी की आँखें किसी प्रतिशोध लेने वाली नागिन की तरह चमक रहीं थीं। वो मलखान की तरफ पलटी और धीरे से मलखान के कान में गुनगुनाने लगी ," जा तुझे आज़ाद किया , तुझे माफ़ किया चौधरी , लेकिन तेरी जात पर प्यार नहीं घिन आती है चौधरी !"
  पोह फटने लगी थी। चन्द्रमा की चांदनी जैसे आज ही सारा चमकना चाहती थी। सुंदरी पूरी तरह से बिखर चुकी थी। फिर भी उसने अपने आप को सँभाला। मलखान की ओर एक ज़हरीली नज़र से देखते हुए सुंदरी मंद मंद मुस्कुराने लगी। बेसुध पड़े मलखान को वो पूरी तरह निचोड़ चुकी थी। सुंदरी का व्यक्तित्व बिल्कुल दो धारी तलवार की तरह लग  रहा था। मलखान बदहवास और बेसुध अपनी चारपाई पर पड़ा था। बिल्कुल एक नंगी लाश की तरह।  सुंदरी ने धीरे से मलखान का चुम्बन लिया दरवाज़ा खोला और खेत के बीचों बीच मोरनी की तरह नाचते हुए अपनी कोठरी में जा पहुंची। 
 कुछ समय बाद गांव में ये बात आग की तरह फैल गई के सुंदरी पेट से है । गांव ओर  परिवार के लोग खुश थे। नरेश तो फूला नहीं समा रहा था। वो जहाँ से भी गुजरता अपना सीना चौड़ा कर लेता। नरेश की मर्दानगी पर शक करने वाले लौंडे उसे बधाई देते नहीं थकते थे। नरेश जब भी रात को सुंदरी से मिलता वो उसके पेट पर धीरे धीरे अंगुलियां फेरते हुए बस एक ही बात दोहराता ," मैं न कहता था सुंदरी भगवान के घर देर है , अंधेर नहीं ।" नरेश की ये बात सुन कर सुंदरी भी धीरे से उसकी हाँ में हाँ मिलाती और नरेश के बालों में अपने सख्त  हाथों की अंगुलियां फेरने लगती।
एक अर्सा  हो गया था इन बातों को। सुंदरी का बेटा दिलावर जवान हो चुका था। वो गांव में जहाँ से भी गुज़रता ,अगड़ों के छोकरों को रश्क होने लगता। पुरे इलाके में दिलावर जैसा कोई न था। सभी कहते माँ पर गया है। माँ की तरह बिल्कुल गोरा चिट्टा। अगड़ों की जवान छोकरियाँ भी अपनी खिड़कियों की दरारों में से उसे देखती और ठंडी ठंडी आहें भरती। अगड़ों को दिलावर एक आँख न सुहाता। जब भी मौका मिलता वो उसे घेर लेते। दिलावर तो जैसे फौलाद का बना हुआ था। दस -बारह से अकेला भीड़ जाता। हर बार एक दो को फोड़ कर ही उसको शांती मिलती। पिछले एक वर्ष से करीब २० लोगों को अस्पताल पहुंचा चुका था। दिलवार ने पिछले हफ्ते ही मलखान के बेटे का सिर भी फोड़ दिया था। आज उसी सिलसिले में पंचायत रखी गई थी। 
पंचायत में सभी पंच और सरपंच अपना अपना स्थान ग्रहण कर चुके थे। चौपाल खचा खच भरी हुई थी। जगतार ने सब को राम राम कहते हुए बोलना शुरू किया ,"मैं तो बस इतना कहना चाहूँ सूं के सुंदरी के बेटे दिलावर ने जो आतंक फैला राख्या है वो अब सहन नहीं होता। " सुंदरी ने भी अपने घूँघट के पल्लू को मुहँ में से  निकलाते हुए कहा ," अपणी जाण बचाणे का अधिकार भी न है दिलावर नै। सारे अपणे दिल पर हाथ रख कर बताओ के शुरुआत कौन करे है ? आखिर मेरे छोरे का दोष के है जो थम सारे उसकी जान के दुश्मण हो रहे
 हो ?" जगतार इस बार गर्म होते हुए बोला ,"तेरे छोरे ने आतंक फैला राख्या है ,बहुत उबाले मार रह्या है तेरे छोरे का खून। इसी तरह उबाले मारता रहा तो ठंडा होते देर न लगेगी तेरे छोरे का गर्म ख़ून।
सुंदरी रोज़ रोज़ के तानो से तंग आ चुकी थी। पिछले महीने से ये पांचवीं पंचायत थी। जगतार की बात सुन कर रहा न गया उससे । वो अंदर तक टूट गई। सुंदरी तैश में आकर जगतार की तरफ अंगुली उठाते हुए बोली ,"क्यों मेरा मुहं खुलवाओ हो चौधरी !" आज तक गांव में कभी किसी ने इस तरह अगड़ों का विरोध नहीं किया था।  सुंदरी के इस व्यवाहर से सभी सकते में थे। जगतार भी तैश में आ गया और बोला ,"ऐसा क्या ले रही है मुहं में सुंदरी जो उगले नहीं बणदा। " अब की बार सुंदरी चुप थी। पंचायत में खुसरपुसर होने लगी। मलखान जो बहुत देर से चुप बैठा था सहसा खड़ा हो गया।  सुंदरी की तरफ इशारा करते हुए वो बोला ," गर्म ख़ून तो चौधरियां का होता है। ज़्यादा गर्मी दिखावेगा तो ठंडा होते देर न लगेगी। " मलखान के मुहं से ये बात सुन कर सुंदरी के तन -बदन में जैसे आग लग गई। वो चिल्लाते हुए बोली , "उबाले तो मारेगा ही यो खून चौधरी, आखिर यू गर्म ख़ून चौधरी तेरा ही तो है । इब बी ठंडा करणे का जी करे है तो कर लियो ठंडा। ये कहते ही सुंदरी वहां से निकल पड़ी।
 पंचायत में सन्नाटा पसर चुका था ! सभी चौधरी की तरफ देख रहे थे !

Thursday, 4 December 2014

गर्म ख़ून ( भाग -3 )

                              
                                                             गर्म ख़ून  ( भाग -3 ) 
रात को थक हार कर जब भी नरेश और सुंदरी मिलते तो बस एक ही बात करते।आखिर ऐसा कौन सा पाप किया है जो बच्चा नहीं हो रहा हो रहा। नरेश बेशक सुन्दर नहीं था। लेकिन दिल से वो राजा था। उसकी सादगी,शराफत और ईमानदारी का पूरा गांव कायल था। अपनी औकात से ज़्यादा पैसा खर्च कर के नरेश ने दोनों के डॉक्टरी टेस्ट भी करवाए थे। सब कुछ ठीक ठाक था। 
 उस दिन के बाद न जाने क्या हुआ , मलखान ने सुंदरी को कुछ नहीं कहा। सुबह ही खेतों में निकल जाता। दिन भर खेत जोहता। जब थक जाता तो दारू के दो पेग लगा कर प्यार भरे गीत गुनगुनाने लगता। मलखान को  जैसे सच में इश्क़ हो गया था। अब मलखान टुबवेल पर ही सोने लगा था। मलखान की सेवा में लगा नरेश अपने चौधरी में आए इस बदलाव को देख कर हैरान था।  नरेश रात को घर पहुंच कर जैसे ही खाना खाने लगा उसका ध्यान मलखान की ओर चला गया। दुनिया से बेखबर नरेश को भी आज न जाने क्या सूझी। वो सुंदरी के आगे मलखान सिंह का ज़िक्र कर बैठा।  नरेश सुंदरी से बोला ,"आज कल चौधरी को न जाने क्या हो गया है,  हर वक़्त गुनगुनाता रहता है। जब दिल करता है पीने बैठ जाता है। " सुंदरी बिना कोई खास ध्यान दिए नरेश की बातें सुनती रही। आज से पहले नरेश ने बाहर की किसी बात का ज़िक्र घर में नहीं किया था।
 कई दिन इसी तरह बीत गए। एक लम्बे अरसे के बाद आज मलखान सिंह  दुरुस्त नज़र आ रहा था। उसके चाचा के बेटे की शादी थी। दोस्त रिश्तेदार जुड़ने शुरू हो चुके थे। वो आज खुश था के उसके सभी पुराने दोस्त आ रहे हैं। परिवार में जब भी कोई कार्यक्रम होता मलखान के खास दोस्तों की मण्डली टुबवेल पर ही जमती। खेतों के बीचों बीच टयूबवेल के नज़दीक मलखान चारपाई पर बैठा नरेश को हुकुम दिए जा रहा था। गिलास धो लिए न ! सलाद काट लिया ! सोडा फ्रिज में लगा दिया है ! देख बड़ी देर से कुकर की सीटी नहीं बजी ! खेत में से ताज़ी मूली निकाल ला ! बेचारा नरेश अकेली जान फिरकी की तरह कभी इधर तो कभी उधर भाग भाग कर काम किए जा रहा था।
जैसे ही गाड़ी की आवाज़ मलखान सिंह के कान में पड़ी वो  चिल्लाया ,"ओये कुत्ते तुझे कहा था न के यारों के आने से पहले सब कुछ सेट होना चाहिए ! देख जल्दी से पानी का जग टेबल पर रख दे ! " ये कहते-कहते मलखान सिंह ने चारपाई के नीचे रखी जूती में अपने पाँव घुसाए और गाड़ियों की तरफ भाग लिया। खेतों के बीचों बीच धूल उड़ाती गाड़ियां जैसे ही उसके नज़दीक आकर रुकीं मलखान सिंह ने एक मोटी गाली निकाल कर अपने यारों का स्वागत किया। सब ज़ोर का ठाहका लगाते हुए टेबल की और बढ़ गए।
 इससे पहले के शेर सिंह ,जगतार सिंह  ,समर सिंह , किशन सिंह और दलबीर सिंह मलखान के गले मिलते उन्होंने टेबल पर रखे ग्लासों को अपने हाथ में उठाया और चियर्स कहते हुए सब से पहले अपने हलक को तर किया। यही इन के मिलने का स्टाइल भी था। जिस के अड्डे पर मिलते मेजबान पहले से ही ग्लास तैयार रखता।
जब तक नरेश खेत में से मूली तोड़ कर लाता ,सभी के अंदर दो दो पेग जा चुके थे। एक दूसरे से घर परिवार का हालचाल पूछने के बाद जब बच्चों की बातें होने लगी तो मलखान ने सभी के गिलास में एक -एक पेग और डाल दिया। एक ही सांस में पीने के बाद सभी को खाली गिलास दिखाते हुए बोला , "आह !अब थोड़ा सिर घूमा है !" बोतल ख़त्म हो हो चुकी थी। नरेश खाली बोतल उठा कर ले गया और भरी हुई टेबल पर रख गया।
इसी बीच कुकर की सीटी बज गई। मलखान ने नरेश को कुकर टेबल पर रखने को कहा। कुकर में से गैस निकालते हुए मलखान बोला ,"आज ऐसा माल बनाया है के सभी उँगलियाँ चाटते रह जाओगे।" शेर सिंह की तरफ जैसे ही चिकेन की प्लेट आई तो वो मलखान की तारीफ़ करते हुए बोला ,"खुशबू ही इतनी लाजवाब है तो माल तो बढ़िया होगा ही !" शेर सिंह ने माल शब्द पर ज़ोर देकर अपनी बात को कुछ इस तरह कहा के सभी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगे। इस बीच दूसरी बोतल का तला भी दिखाई देने लगा था। नरेश ने एक बोतल और लाकर रख दी। दारू पीते पीते शेर सिंह को पता नहीं क्या सूझा उस ने दही की फरमाइश कर डाली। दही की फरमाइश सुनते ही नरेश खेत के बीचों बीच बनी डोल पर भागता  नज़र आया। जाते जाते वो बोल गया ,"बस दहीं लेकर यूं आया चौधरी।
जब तक नरेश वापिस लौटता सभी टुन हो चुके थे। महफ़िल का रंग जमने लगा था।सभी के चेहरे सुलगे हुए कोयले की तरह लाल हो चुके थे। घर परिवार की बातों से अब वो बाहर निकल आए थे। सभी बातों बातों में कच्चे पर उतर आए और लगे अपने अपने पोतड़े उधेड़ने। सभी अपने अपने किस्से कहानियां सुनाने लगे। उन सब को अपनी मर्दानगी पर गर्व था। परन्तु किस्से और कहानियां साफ बयां कर रहे थे के मर्द जात अपना लंगोट जितना भी कस कर रखे वो कभी न कभी फिसल ही जाता है। मलखान सिंह की ज़बान और कदम दोनों डगमगाने लगे थे। अँधेरा हो चुका था। सभी दोस्तों ने विदाई ली। वो सभी भूल गए के नरेश गांव में दही लेने गया है।
जब तक नरेश दही लेकर वापिस लौटता सभी अपनी रवानगी डाल चुके थे। नरेश टुबवेल पर पहुँचते ही हांफते  हांफ़ते बोला ," क्या बात सारे जा लिए ,चौधरी ? राहदारी वाला पी के गए या नहीं ?" असल में गांव में एक प्रथा है के आप बेशक जितनी मर्ज़ी दारू पिएं ,जाते जाते टैक्स के तौर पर या यूं कहें मेज़बान अपने दोस्तों को जाते जाते एक ड्रिंक ज़रूर पिलाता है। । यही ड्रिंक राहदारी वाला पेग से मशहूर भी है। नरेश के इन दोनों प्रश्नों में अपनापन ज़्यादा झलक रहा था।
नरेश की बात को सुन कर मलखान ने दो ग्लासों में दारू की बोतल उलटी कर दी। मोटे मोटे दो पेग बनाये और एक गिलास नरेश को थमा दिया।  इससे पहले के नरेश संभलता या कुछ बोलता मलखान चियर्स करते हुए बोला ,"तो भी क्या बात है नरेश ! आज की राहदारी वाला हम तेरे साथ पी लेते है। " नरेश ने इस से पहले कभी नहीं पी थी। लेकिन चौधरियों को शराब पिलाने का काम वो बचपन से करता आ रहा था। ओंठों के साथ गिलास लगाते ही उसने सारी की सारी एक बार में अपने अंदर उढ़ेल दी।
मलखान अपनी थरथराती आवाज़ में नरेश को सब कुछ समेटने के लिए कह कर  टुबवेल पर बने कमरे में सोने के लिए चल दिया। नरेश सफाई में जुट गया। थोड़ी देर बाद ही नरेश की हालत पतली होने लगी। नरेश तो लगा करने उल्टियाँ। उससे अब खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था।  लड़खड़ा कर टुबवेल के पास ही गिर गया। रात काफी हो चुकी थी। नरेश के घर वाले सभी शादी में काम करवाने गए हुए थे। सुंदरी घर पर अकेली थी। वो नरेश को लेकर परेशान हो गई। नरेश की यह आदत थी के उसे जब भी देरी का कोई अंदेशा होता वो भाग कर घर बतला आता। आज तो खुद नरेश बेसुध था।
रात के दस बज चुके थे। सुंदरी के मन में न जाने क्या आया वो अपने नरेश को देखने खेतो की ओर चल दी। वो कब टुबवेल पर पहुँची उसे खुद भी पता नहीं चला। टुबवेल पर लटके जीरो वॉट के बल्ब से आती मंद मंद रोशनी में कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। बिखरा हुआ सामान किसी उजड़े  हुए चमन की तरह लग रहा था। सुंदरी की नज़र सहसा नरेश पर पड़ी। सुंदरी के तो जैसे होश ही उड़ गए। उसने नरेश को इधर उधर हिलाया लेकिन वो तो धरती पर चित पड़ा था। उसे समझते देर न लगी के नरेश ने शराब पी है। उसका जैसे विश्वास ही टूट गया। उसके मन में उलटे पुलटे विचार आने लगे। उसको एकदम से मलखान का ख्याल आया। वो भगवान से सब ठीक होने की कामना करने लगी।
आगे  ............................ (भाग -4 )

गर्म ख़ून ( भाग- 2 )


                                                                      गर्म ख़ून  ( भाग- 2 )
 बेशक गांव सुंदरी का दीवाना था। लेकिन किसी की क्या मज़ाल के उस पर हाथ डालता। जब कभी भी किसी ने कोशिश की ,सुंदरी बिना बोले इस तरह देखती मानो सामने शेरनी खड़ी हो। अपने आप को कभी ढीला नहीं होने दिया था सुंदरी ने।  मलखान का अपना रुतबा था गांव में। कई हथकंडे अपनाए मलखान ने पर सुंदरी के आगे उसकी दाल न गली।
शराब और शबाब मलखान के खास शौंक थे। जब भी स्वाद बदलने का मन होता ,खेतों में टुबवेल पर अपना अड्डा जमा लेता। खेतों में घास काटने या किसी और काम से आने वाली पिछड़ों की कई औरतों का शिकार कर चुका था मलखान । कोई पैसे के लालच तो कोई लोकलाज के डर से अपना मुहँ न खोलती। कोई बोलने की हिम्मत जुटाती तो मलखान डरा धमका कर उसका मुहँ बंद कर देता । पीड़ित औरतें बकरियों की तरह  थोड़े समय के लिए मिमियाती। लेकिन अगड़ों के ज़ुल्म , लोक लाज , गरीबी और अगड़ों के प्रभाव और दबाव के   कारण कोई अपना मुहँ न खोलती। मजबूरी के कारण वो इसे ही अपना भाग्य समझ लेती। लेकिन सुंदरी दूसरी औरतों की तरह नहीं थी। स्वाभिमान जैसे उसमें कूट कूट कर भरा हुआ था।
 सुंदरी -नरेश की शादी को दो साल बीत चुके थे। लेकिन अभी तक किसी तरह की कोई खबर नहीं थी। गांव में घुसफुस शुरू हो चुकी थी। सब के अपने अपने विचार थे। कोई नरेश को कमज़ोर कहता तो कोई सुंदरी को चैक करवाने की सलाह देता। कभी कभी मलखान भी मौका देख कर सुंदरी को दो अर्थी बात बोल देता। लेकिन सुंदरी पर इन बातों का कोई असर न होता।
एक दिन तो मलखान ने हद ही कर दी। घर के सभी लोग गांव में ही शादी पर गए हुए थे। मलखान घर पर अकेला था। सुंदरी पशुओं को चारा देने के बाद घर की ओर जाने लगी तो मलखान ने सुंदरी का हाथ पकड़ लिया। सुंदरी को अपनी ओर  खींचते हुए मलखान बोला ,"हमारे कुंएं का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। " एक बार तो सुंदरी नागिन की तरह फुँकारी लेकिन मलखान की मज़बूत पकड़ के आगे वो ढीली पड़ गई। अक्सर चुप रहने वाला  मलखान ये सब कुछ कैसे बोल गया उसे भी समझ नहीं आ रहा था। न जाने सुंदरी के अंदर एक अदम्य शक्ति कहाँ से आई। अपनी कलाई छुड़वाते हुए उसने मलखान को ज़ोर से धक्का दिया। मलखान संभल नहीं पाया और नीचे जा गिरा। मलखान कहाँ हार मानने वाला था। उसने सुंदरी को फिर पकड़ लिया। इस बार उसने सुंदरी को ज़ोर से  अपनी छाती से लगा लिया। सुंदरी पर अपनी  पकड़ मज़बूत बनाते हुए मलखान ने अपना पहले वाला डायलॉग दोहराया ,"हमारे कुंए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। " इसी के साथ अपनी पकड़ ढीली करते हुए बोला ,"जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन इश्क़ हो गया है तुझ से सुंदरी । "  सुंदरी किसी छिपकली के जबड़े से छूटी तितली की तरह छटपटाती हुई बाहर की ओर भागी। मलखान बिल्कुल फ़िल्मी हीरो की तरह सुंदरी को दूर तक जाते हुए देखता रहा। आज पहली बार किसी औरत को पकड़ने के  बाद मलखान का दिल धड़क रहा था।
सुंदरी को भी पहली बार लगा के वो कमज़ोर पड़ गई है। काम की थकावट से उसने कभी हार नहीं मानी थी। लेकिन लोगों के तानों से वो तंग आ चुकी थी। मलखान की हवेली से सीधे अपनी कोठरी में जाकर अपनी टूटी हुई चारपाई पर एक लाश की तरह धम से गिर गई। हर हाल में खुश रहने वाली सुंदरी फफक फफक कर रोने लगी। टूटी फूटी और घर में  चुल्हे से काली हुई छत की और देख कर वो अपने भाग्य को कोसने लगी। भाग्य और भगवान दो अस्त्र ही होते हैं गरीब के ,जिसके आगे वो अपने सारे शस्त्र डाल देता है। रोते रोते उसका संपर्क सीधे नीली छतरी वाले से हो गया। गरीब का तो भगवान ही सहारा होता है। सुंदरी पागलों  की तरह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए भगवान से पूछने लगी ,"क्या दोष है मेरा ? कौन सा पाप किया है मैंने ? क्यों मुझे बच्चा नहीं होता ? "
आगे ………………(भाग -3)

गर्म ख़ून ( भाग -1 )


   
                                                                      गर्म ख़ून
 गांव में पंचायत जम चुकी थी। मलखान सिंह हुक्के की गुड़ -गुड़ के साथ इधर उधर नज़र दौड़ा रहा था। शेर सिंह भी बार बार अपनी मूंछों को ताव दे रहा था। जगतार सिंह सभी को राम राम कहते हुए मलखान सिंह के बगल में बैठ गया। मलखान सिंह ने हुक्का जगतार की और बढ़ाते हुए कहा ,"ये तो हद ही हो गई। एक कमीन का लौंडा नहीं संभल रहा पूरे गांव के छोकरों से।
 इस से पहले के जगतार कुछ बोलता पंचायत में हलचल शुरू हो गई। हलचल हो भी क्यों न,सुंदरी जो आ रही थी। बला की ख़ूबसूरत थी सुंदरी। एक बार जहां से निकल जाती -क्या बूढ़ा क्या जवान साँसों पर नियंत्रण न रहता। एक बार जो उसे देख लेता ये ज़रूर कहता ,"भगवान ने बहुत ही फुर्सत में बनाया है सुंदरी को। "
अपने पचास बसंत पूरे कर चुकी थी सुंदरी लेकिन आज भी किसी "हूर" से कम नहीं थी। सुंदरता तो जैसे उसकी दासी हो। चौपाल पर आज भी गांव के मनचले वहां से निकलने की इंतज़ार में घंटों उस की बाट जोहते रहते।
१८ साल की रही होगी सुंदरी जब नरेश उसे अपने गांव टोबा ब्याह कर लाया था। कहते हैं के ख़ुदा जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। सुंदरी पर भी ख़ुदा कुछ ज़्यादा ही मेहरबान था। गठा हुआ शरीर ,उभारदार वक्ष,बल खाती कमर ,कटार जैसी आँखें। उसकी चाल बिल्कुल ऐसी थी मानो कोई नागिन दुनिया से बेफिक्र किसी बीन की धुन पर नृत्य कर रही हो। कईं बार तो मनचले उसके पीछे -पीछे उसकी नक़ल करते हुए दूर तक उसके साथ साथ चलते। कईं कच्चे छोकरों की तो सुंदरी की चाल से ही बीन बज जाती।
गोलमटोल नथुने,जब वो सांस लेती तो  उसके नथूने भटी में गर्म किए जाने वाले मक्की के दानों की तरह फूल जाते। जब कभी नसवार का तड़का लगा लेती तो उसकी खुशबू दूर तक फ़ैल जाती। माथे के बीचों बीच उसकी बिंदिया ऐसे लगती मानो आसमान में चाँद चमक रहा हो।
गांव के दूसरे छोकरों की तरह ही नरेश की शादी पर भी गांव के अगड़ों के डर से कोई शोर शराबा नहीं हुआ था। नरेश की ये दिली इच्छा थी के वो भी घोड़ी चढ़े ,बैंड बाजा हो और उसके यार दोस्त उसकी घोड़ी के सामने नाचते गाते चलें। नरेश के पिता सुखिया ने घर के सभी लोगों को पहले ही आगाह कर दिया था के सभी अगडों के हुकुम और नियमों की पालना करेंगे। नरेश न घोड़ी चढ़ा न ही  बैंड बाजा हुआ और शादी बिना किसी बिघ्न के सम्पन्न हो गई ।
नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत सुखिया पर बिल्कुल सटीक बैठती थी। सुखिया तो बस नाम का सुखिया था । उसके पुरखे कईं सालों से गांव में ज़मीदारों के खेतों की बिजाई ,जुताई और कटाई का काम करते आ रहे थे। पशुओं की नहलाई ,धुलाई ,चारा डालने से लेकर गोबर उठाने तक का काम नरेश के परिवार को करना पड़ता था। क्या बच्चे ,महिलाएं सभी गावं के अगड़ों के घर और खेतों में किसी न किसी काम में व्यस्त रहते। यही नहीं मैला ढोहने का काम भी नरेश का परिवार ही  करता।
 शादी के एक महीने बाद सुंदरी काम के लिए घर से बाहर निकली। उस को मलखान के घर की साफ़ सफाई का जिम्मा सौंपा गया। घर क्या पूरी हवेली थी। सुंदरी बरामदे में झाड़ू लगा रही थी। मलखान अपने कमरे में से निकला और उसकी नज़र सुंदरी पर पड़ी। सुंदरी को देखते ही वो बुत बन गया। उसकी सांसें थम सी गई। मलखान भी गोरा चिट्टा  गबरू जवान था। सुंदरी की नज़र जब मलखान पर पड़ी तो एक बारगी वो भी सकपका गई। उसके हाथ से झाड़ू छिटक कर नीचे गिर गया। बिल्कुल हिंदी फिल्मों की तरह झाड़ू गिरते ही दोनों झाड़ू उठाने के लिए नीचे झुके।  दोनों का हाथ से हाथ टकराया और सुंदरी संकुचाती-शर्माती झाड़ू वहीँ छोड़ कर बाहर  की ओर भाग गई।
 मलखान सिंह तो उसका खास दीवाना हो गया था। खेतों में जाने की बजाए वो हुक्के में आग सुलगा कर सुबह ही अपनी देहरी पर बैठ जाता। आँगन बुहारते हुए सुंदरी को वो ऐसे निहारता मानो वो उसे सारा का सारा पी जाना चाहता हो। इस चक्कर में वो अपना हुक्का ही पीना भूल जाता। सुंदरी कुछ पल के लिए इधर उधर होती तो वो हुक्के को अपनी और खींचता। लेकिन तब तक हुक्के की आग मंद पड़ चुकी होती और मलखान बुझे हुक्के में आग सुलगाने के लिए अपनी धोती को ठीक करते हुए चुल्हे की ओर हो लेता। जब तक मन और हुक्के की आग बुझ न जाती वो उसे निहारता रहता। ऐसा नहीं के सुंदरी कुछ समझती नहीं थी। लेकिन वो कभी भी मलखान को घास न डालती। सुंदरी उसकी परवाह किए बिना अपने काम में लगी रहती।
आगे ............. (भाग 2 )