राम राम ,सतश्रीअकाल , सलाम वालेकुम या फिर जय हिन्द।
आप को जो भी अच्छा लगे मेरी ओर से स्वीकार करें। इलेक्शन के दिन हैं पता नहीं किस को क्या अच्छा लगे क्या बुरा। कौन दुश्मन हो जाए कौन दोस्त। वो कहते हैं न के ,"प्यार और जंग में सब जायज़ है। " लेकिन अब जिस तरह की राजनीति चल रही है उस से तो ये साफ़ हो गया है के ,"राजनीति में सब जायज़ है।"
पहले तालमेल की राजनीति होती थी अब ससुरी घालमेल की हो गई है।राजनीतिज्ञों ने अपने चेहरे इस तरह से पोते हुए हैं के इन के चेहरों के हाव -भाव और भीतर घात का कुछ पता ही नहीं चलता।ऐसा चक्रव्हयू रचते हैं के आम आदमी इनके जाल में फंस ही जाता है। एक समय ऐसा आता है जब वो खुद को नपुंसक समझने लगता है।
बे पेंदी के लोटे की तरह कभी इस डगर तो कभी उस डगर। नेताओं को तो जैसे मान मर्यादा से कुछ लेना देना न हो। जिस के साथ सालों साल इकट्ठे गुज़ारे हों वही पल भर में दुश्मन हो जाता है। असल में मौकापरस्ती की राजनीति हो गई है।
धर्म निरपेक्षता का राग अलापने वाली पार्टियां लोगों के बीच धर्म ,जाति ,रंग का ऐसा ज़हर घोलती हैं के एक हाथ दूसरे हाथ से कब और किस तरह अलग हो जाता है लोगों को पता ही नहीं चलता। राम झूठ न बुलवाए राजनीति बच्चों का खेल नहीं है। ये तो सच में सिध्हस्त लोगों का ही काम है।
होली के बाद देश की जनता चुनावी रंग में रंगी जा रही है। नेता अपने चुनावी भाषणों में वायदों की पिचकारी से जनता को सम्मोहित करने लगे हैं। गरीबी ,भ्रष्टाचार ,बेरोज़गारी ,महंगाई ,कानून वय्वस्था ,शिक्षा ,स्वास्थ ,बच्चों -महिलाओं ,मज़दूरों किसानों और आम आदमी की समस्या से इन को कुछ लेना -देना नहीं। ये सब तो इन के अस्त्र -शस्त्र हैं। जब जिस की ज़रुरत हुई उसको इस्तमाल कर लिया।कभी ये पार्टी तो कभी वो पार्टी।
दोस्तों समझना होगा के वोटर उपभोग या उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि अपना और अपने देश का भाग्य विधाता है। हमें अपनी मह्ता को समझना होगा और बहुत सोच समझ कर मतदान करना होगा ताकि इन चुनावों के बाद एक बार फिर हम अपने को ठगा हुआ महसूस न करें।
जयहिंद !
आप को जो भी अच्छा लगे मेरी ओर से स्वीकार करें। इलेक्शन के दिन हैं पता नहीं किस को क्या अच्छा लगे क्या बुरा। कौन दुश्मन हो जाए कौन दोस्त। वो कहते हैं न के ,"प्यार और जंग में सब जायज़ है। " लेकिन अब जिस तरह की राजनीति चल रही है उस से तो ये साफ़ हो गया है के ,"राजनीति में सब जायज़ है।"
पहले तालमेल की राजनीति होती थी अब ससुरी घालमेल की हो गई है।राजनीतिज्ञों ने अपने चेहरे इस तरह से पोते हुए हैं के इन के चेहरों के हाव -भाव और भीतर घात का कुछ पता ही नहीं चलता।ऐसा चक्रव्हयू रचते हैं के आम आदमी इनके जाल में फंस ही जाता है। एक समय ऐसा आता है जब वो खुद को नपुंसक समझने लगता है।
बे पेंदी के लोटे की तरह कभी इस डगर तो कभी उस डगर। नेताओं को तो जैसे मान मर्यादा से कुछ लेना देना न हो। जिस के साथ सालों साल इकट्ठे गुज़ारे हों वही पल भर में दुश्मन हो जाता है। असल में मौकापरस्ती की राजनीति हो गई है।
धर्म निरपेक्षता का राग अलापने वाली पार्टियां लोगों के बीच धर्म ,जाति ,रंग का ऐसा ज़हर घोलती हैं के एक हाथ दूसरे हाथ से कब और किस तरह अलग हो जाता है लोगों को पता ही नहीं चलता। राम झूठ न बुलवाए राजनीति बच्चों का खेल नहीं है। ये तो सच में सिध्हस्त लोगों का ही काम है।
होली के बाद देश की जनता चुनावी रंग में रंगी जा रही है। नेता अपने चुनावी भाषणों में वायदों की पिचकारी से जनता को सम्मोहित करने लगे हैं। गरीबी ,भ्रष्टाचार ,बेरोज़गारी ,महंगाई ,कानून वय्वस्था ,शिक्षा ,स्वास्थ ,बच्चों -महिलाओं ,मज़दूरों किसानों और आम आदमी की समस्या से इन को कुछ लेना -देना नहीं। ये सब तो इन के अस्त्र -शस्त्र हैं। जब जिस की ज़रुरत हुई उसको इस्तमाल कर लिया।कभी ये पार्टी तो कभी वो पार्टी।
दोस्तों समझना होगा के वोटर उपभोग या उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि अपना और अपने देश का भाग्य विधाता है। हमें अपनी मह्ता को समझना होगा और बहुत सोच समझ कर मतदान करना होगा ताकि इन चुनावों के बाद एक बार फिर हम अपने को ठगा हुआ महसूस न करें।
जयहिंद !







