Wednesday, 19 March 2014

A LETTER...... EK CHITHEE PART-12

राम राम ,सतश्रीअकाल , सलाम वालेकुम या फिर जय हिन्द।

आप को जो भी अच्छा लगे मेरी ओर से स्वीकार करें। इलेक्शन के दिन हैं पता नहीं किस को क्या अच्छा लगे क्या बुरा। कौन दुश्मन हो जाए कौन दोस्त। वो कहते हैं न के ,"प्यार और जंग में सब जायज़ है। " लेकिन अब जिस तरह की राजनीति चल रही है उस से तो ये साफ़ हो गया है के  ,"राजनीति में सब जायज़ है।"

  पहले तालमेल की राजनीति होती थी अब ससुरी घालमेल की हो गई है।राजनीतिज्ञों ने अपने चेहरे इस तरह से पोते हुए हैं के इन के चेहरों के हाव -भाव और भीतर घात का कुछ पता ही नहीं चलता।ऐसा चक्रव्हयू रचते हैं के आम आदमी इनके जाल में फंस ही जाता है। एक समय ऐसा आता है जब वो खुद को नपुंसक समझने लगता है।

बे पेंदी के लोटे की तरह कभी इस डगर तो कभी उस डगर। नेताओं को तो जैसे मान मर्यादा से कुछ लेना देना न हो। जिस के साथ सालों साल इकट्ठे गुज़ारे हों वही पल भर में दुश्मन हो जाता है। असल में मौकापरस्ती की राजनीति हो गई है।

धर्म निरपेक्षता का राग अलापने वाली पार्टियां लोगों के बीच धर्म ,जाति ,रंग का ऐसा ज़हर घोलती हैं के एक हाथ दूसरे  हाथ से कब और किस तरह अलग हो जाता है लोगों को पता ही नहीं चलता। राम झूठ न बुलवाए राजनीति बच्चों का खेल नहीं है। ये तो सच में सिध्हस्त लोगों का ही काम है।

होली के बाद देश की जनता चुनावी रंग में रंगी जा रही है। नेता अपने चुनावी भाषणों में वायदों की पिचकारी से जनता को सम्मोहित करने लगे हैं। गरीबी ,भ्रष्टाचार ,बेरोज़गारी ,महंगाई ,कानून वय्वस्था ,शिक्षा ,स्वास्थ ,बच्चों -महिलाओं ,मज़दूरों किसानों और आम आदमी की  समस्या से इन को कुछ लेना -देना नहीं। ये सब तो इन के अस्त्र -शस्त्र हैं। जब जिस की ज़रुरत हुई उसको इस्तमाल कर लिया।कभी ये पार्टी तो कभी वो पार्टी।

दोस्तों समझना होगा के वोटर उपभोग या उपयोग की वस्तु नहीं बल्कि अपना और अपने देश का भाग्य विधाता है। हमें अपनी मह्ता को समझना होगा और बहुत सोच समझ कर मतदान करना होगा ताकि इन चुनावों के बाद एक बार फिर हम अपने को ठगा हुआ महसूस न करें।

जयहिंद  !  

Wednesday, 12 March 2014

A LETTER......EK CHITHEE PART-11






 जयहिन्द !! !!
इस बार जय हिन्द इसलिए ताकि मेरे देश के मतदाता सोच समझ कर अपनी सरकार चुनें। चुनाव सर पर हैं और सभी पार्टियां जनता का सर घुमाने में जुटी हैं। इस बार ऐसी सरकार हो जो गरीबों ,किसानों ,मज़दूरों ,महिलाओं और मेहनत कश लोगों के दुःख दर्द को समझे। इन के दुःख निवारण के लिए कृतसंकल्प हो और साथ साथ प्रयास भी करे। देश जब तक गरीबी और भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं होता तब तक हम सब के लिए जयहिन्द के कोई मायने नहीं। ज़रुरत है ज़मीनी स्तर पर परिवर्तन की। अन्यथा पिछले 66 साल की तरह हम इस बार भी आम चुनावों में ख़ुद को ठगा ठगा सा महसूस करेंगे। अभी मौका है , सोच और समझदारी से निर्णय लें। बकौल ज़ाहिद शाह :
ईद का दिन है ,गले आज तो मिल ले ज़ालिम, रस्में दुनिया भी है ,मौका भी है ,दस्तूर भी है ........… 
सच में ! इस बार अगर आप देश में सांस्कृतिक और धार्मिक सौहार्द बनाना और परिवर्तन के साथ -साथ    "जयहिन्द" चाहते हैं तो इस बार चुनाव रूपी ईद को बहुत ईमानदारी से मनाना होगा।      

पिछले ख़त में आपसे वायदा किया था के आप को डॉ डेंग की पार्टी के बारे में ज़रूर बताऊंगा। बढ़िया प्रबंध किया था। सब मेहमान खुश थे। लाली ने थोड़ी ज़यादा पी ली थी। डॉ खुश था। जिन लोगों को भी न्यौता दिया ,सभी पहुंचे। चाँद बाऊ जी ,दिनेश कुमार ,अमित अरोड़ा ,राजीव चौधरी , वीरप्रकाश ,राहुल राणा , समीर पॉल ,लाली उर्फ़ सरदार मनमोहन सिंह ,बबलू वल्द नाथी राम मितल ,जितेंदर उर्फ़ जीतू ,जीतू का छोटा भाई राकेश और राजबीर पाढा।
इन सभी से परिचय अपनी अगली चिट्ठियों में करता रहूंगा। बस यूं समझ लो ये ही मेरी कहानियों के मुख्य पात्र और दुःख सुख के साथी भी हैं । इस पार्टी का बखां करने की बजाय यदि मैं हरिवंश राय बच्चन की ये पंक्तियाँ लिख दूं तो आप को सब समझ आ जायेगा :
बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।


कहते हैं दुःख सुख साथ साथ चलते हैं बिल्कुल धूप और छाया की तरह। ख़ुशी के बाद एक दुःखद समाचार ने दस्तक दी। 10 मार्च को एक और साथी इस दुनिया को अलविदा कह गया। दीपक कईं दिनों से बीमार चल रहा था। दीपक ,टैगोर बाल निकेतन स्कूल में आर्ट टीचर के पद पर कार्यरत था। मैंने उस के साथ १९९७ से १९९९ तक काम किया। मनमौजी दीपक अपने काम में सिधहस्त था। रंगों का विलक्षण चितेरा था। लगभग २० वर्ष पहले पछ्चिम बंगाल से आकर हरयाणा में दीपक ने अपने आप को कला के क्षेत्र में स्थापित किया। कबीर दास की ये पंक्तियां जीवन मृत्यु की सच्चाई को बखूबी बयाँ करती हैं :
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात.                                                                                         एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।   

 अलविदा दोस्त !
 चलते चलते आप को बता दूं   ……… अमितोष द्वारा अनुवादित शेकस्पेयर के नाटक ट्वेल्वथ नाईट के हिंदी रूपांतरण "पिया बहरूपिया " को META की ओर से सर्वश्रेष्ठ नाटक घोषित किया गया है। नाटक ने कुल पाँच पुरस्कार जीते हैं।http://www.thehindu.com/features/friday-review/theatre/starry-night/article5777146.ece
 यही नहीं फ़िल्म "ग़ुलाब गैंग " रिलीज़ हो चुकी और फ़िल्म के लिए लिखित डायलॉग की भी सराहना हो रही है।इस के डायलॉग अमितोष और गीत नेहा ने लिखे हैं। अमितोष मेरे शहर करनाल का रहने वाला है। हमें तुम पर गर्व है अमितोष !   Photo: And that's a night folks!!
5 META awards for #piyabehrupiya including Best Play

5 META awards for #piyabehrupiya including Best Play
     
जयहिन्द ! फिर मिलते हैं ……………
To Be Continued.......................................

Monday, 10 March 2014

नकाबपोश


नकाबपोश....!

अब दुम हिलाते
अलग अलग टुकड़ियों में
 आप की गलियों में
इन के चक्कर लगेंगे
  ये मत समझना
के वफ़ादार हो गए हैं
 ध्यान रहे ये धोखेबाज हैं
कभी भी ठग सकते हैं।

 चुनावी रंग में रंगे
 नज़र आएंगे ये सब
आप से अपनेपन की दुहाई देंगे
 ये मत समझना
के अपने हो गए हैं
ध्यान रहे ये मौका परस्त हैं
कभी भी धोखा दे सकते हैं।

घर घर जायेंगे ये
 आप से बहुत सारे वायदे करंगे
 ये सब  मत समझना
के रक्षक हो गए हैं
ध्यान रहे ये भक्षक हैं
कभी भी हर सकते हैं।

आप की तरफ भी आ सकते हैं
आप के आस पास रहेगे
ये मत समझना
के आप का ध्यान रखेंगे
 ध्यान रहे ये बरसाती मेंढक हैं
  अब आए हैं
फिर पाँच साल बाद दिखाई देंगे।

 इन पर भरोसा मत करना
इन की नस्ल पर मत जाना
ये मत समझना
के ये सफेदपोश हैं
ध्यान रहे ये नक़ाबपोश हैं
नक़ाब पहने हैं ये।   

Saturday, 8 March 2014

A LETTER...... EK CHITHEE PART-10

दोस्तों नमस्कार !

8 मार्च को "महिला दिवस" मनाने की औपचारिकताएं सम्पन्न हो चुकी हैं।महिलाओं के साथ होने वाले शोषण में कमी के लिए पुरुषों को अपनी मनोवृति को बदलना होगा। शायद तभी बदलाव भी सम्भव है।

के। वी। ए। डी। ए। वी। कॉलेज फॉर वूमेन करनाल में मोहिंदर प्रताप सिंह द्वारा लिखित "पल पल जीती हर पल मरती " नाटक का सफल मंचन हो गया है।मैंने आप को इस बारे पहले भी लिखा था।महिलाओं के अंतर्मन में दबी इच्छाओं और समाज के महिलाओं के प्रति दोहरे चरित्र का बढ़िया चित्रण है।

आम चुनाव की घोषणा के साथ ही विभिन्न राजनितिक पार्टियों ने अपने अपने उम्मीदवारों की घोषणा शुरू कर दी है।  ब्यानबाज़ी और आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो चुका है।राजनीतिक नाटक भी शुरू हो गया है। आम आदमी पार्टी के नेता योगेंदर यादव के मुहं पर कोई कालिख पोत गया है। लगता ऐसा है -"एक नई प्रथा की शुरुआत हो चुकी है।"

पिछले दिनों अमेरिका से मेरे मित्र मंजीत चीमा का फ़ोन आया। वो मेरी चिठियाँ नियमित पढ़ रहे हैं। उन्होंने चिट्ठियों से जुड़े एक किस्से का ज़िक्र किया।  उन्होंने बताया के लगभग ३० वर्ष पूर्व पंजाब के गुरबखश सिंह विदेश में आकर बस गए थे। वो हर रोज़ अपनी बीवी को एक चिठ्ठी लिखते पर पोस्ट न करते। बाद में उन की चिट्ठियों पर एक पुस्तक प्रकाशित हुई। उस पुस्तक का नाम "चिट्ठियां जितो नूँ "  है ऐसा मुझे बताया गया।वैसे आज की पोस्ट और पहले की पोस्ट में बहुत अंतर है।

मेरे साथ स्कूल में काम करने वाली कंप्यूटर टीचर रजनी स्वीडन से ६ महीने के बाद कल ही हिंदुस्तान वापिस आई है। स्कूल का स्टाफ और उसके घर के सभी सदस्य उसके आने पर काफी खुश हैं। रजनी की बहन सीमा चोपड़ा से इस मुत्तालिक नियमित बात होती रही। शादी के कुछ दिनों बाद ही रजनी स्वीडन चली गई थी। रजनी का पति जतिन स्वीडन में सेटेल्ड है। किसी ने ये सोचा भी नहीं था के सब कुछ इतनी जल्द हो जाएगा और रजनी सात समुंदर पार जा बसेगी। समझ लो के "लिखी लिखाई आई है धुरों रोटी।" सभी उसके स्कूल आने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। अभी वो अपने ससुराल में है। दोनों को मेरी शुभकामनायें।

लम्बे अर्से के बाद लेखक मित्र डॉ अजय शर्मा से जालंधर बात हुई। बातों बातों में चाय का ज़िक्र हुआ। बोले जहाँ भी जाते हैं फीकी चाय ही पीते हैं। मीठी चाय पीने का फ़ायदा भी क्या जब जीवन में ही मिठास न हो।

ओह सच !आप को एक खुशखबरी और सुना दूं। डॉ डेंग दादा बन गया है।डॉ डेंग बाबत कहानी भी लिखी थी,"बावन बुद्धि !" उस का Reference लिख रहा हूँ : http://krishankumarmalik.blogspot.in/2013/12/baavan-budhi.html
ख़ुशी की बात ये भी है के डॉ डेंग आज पार्टी दे रहा है। यहाँ भी डॉ डेंग बावन बुद्धि प्रयोग कर रहा है। ससुर और दादा बनने की पार्टी एक साथ कर रहा है। कुछ दोस्त तो मज़ाक में चटकारे ले रहे हैं। कह रहे हैं डॉ डेंग से पार्टी लेना स्टील के थन से दूध निकालने जैसा है। हमारे यहाँ कहावत है ,"बुरा न मानो होली है। "

17 मार्च को होली है। आप सब को भी होली की शुभकामनायें।

पार्टी कैसी हुई इस बारे अगले ख़त में लिखूंगा। इस उम्मीद के साथ के फिर मिलेंगे !
तब तक के लिए अलविदा !

To Be Continued.....................................






Thursday, 6 March 2014

A LETTER......EK CHITHEE ! PART-9

दोस्तों ! कैसे हैं आप ? उम्मीद करता हूँ सब ठीक है। आज कल तो चर्चाओं में वयस्त होंगे आप सब !

इलेक्शन की तारीखें घोषित हो गई हैं। अमुक पार्टी से अमुक व्यक्ति खड़ा होगा। अमूक पार्टी के उम्मेदवार के जीतने की पूरी उम्मीद है। अमूक पार्टी की जीत पक्की है। अमूक उमीदवार को कोई हरा ही नहीं सकता।पुराने ज़माने में कहा जाता था के जिसे आप बार बार याद करते हैं उसको छींकें आने लगती हैं।अब देखना ये है के राजनेताओं की सेहत पर कितना असर पड़ता है। भूलें नहीं ये सपनों के सौदागर हैं और नज़ला आप पर ही गिरने वाला है !

यही नहीं सहारा के मुखिया सुबर्तो राए की गिरफ़्तारी भी तो आजकल चर्चा का विषय है। कोर्ट में जाते हुए उसके मुहँ पर काली स्याही ने तो मसाले के साथ तड़के का काम कर दिया।आम जनता के २०००० हज़ार करोड़ रूपए डकार गए। कमाल का मादा है हमारे यहाँ घपले बाज़ों का। कल ही पुराना दोस्त लम्बे अर्से के बाद मिल गया। मैंने पूछा , "क्या हाल हैं मिड्ढा साहेब ?"जानते हैं क्या जवाब दिया मिड्ढा साहेब ने ,बोले , "आनंद मंगलम ,जय हो भ्रष्टाचारम् !"

आप ने एक समाचार और पढ़ा या सुना होगा ? आप को इस के बारे में नहीं पता चला तो चलिए मैं ही बतला देता हूँ !

राष्ट्रीय डाटा सेंटर बम धमाकों को लेकर आंकड़े जरी किए हैं जो काफी चौंकाने वाले हैं।दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाने वाला हिंदुस्तान ,इराक और पाकिस्तान के बाद बम धमाकों के मामले में तीसरे स्थान पर है। यही नहीं दुनिया भर में होने वाले बॉम्ब ब्लास्ट में से 75 % इराक,पाकिस्तान और भारत में होते हैं। जनसंख्या वृद्धि में तो हम दूसरे स्थान पर पहले से ही हैं।  इसी तरह से चलता रहा तो जल्द ही जनसंख्या और बम धमाकों के मामले में तो हम पहला स्थान जल्द ही हासिल कर लेंगे !

गुलाब गैंग के प्रदर्शन पर माननीय कोर्ट ने रोक लगा दी है। ये इस तरह का पहला मामला नहीं है। इस से पहले भी कईं बार ऐसा हुआ है। मेरे समझ से ये बिल्कुल परे है के सेंसर बोर्ड का क्या औचित्य है। राईट टू एक्सप्रेशन की क्या अहमियत है। वैसे आप को मेरे देश में राईट के मामले में कुछ राईट नज़र आता हो तो मुझे ज़रूर इतलाह करना !

आज महिला दिवस है और २३ मार्च को शहीदी दिवस भी मनाया जाएगा। सभी अपने अपने ढंग से मनाएंगे। जैसा समझ में आएगा आप से ज़रूर साँझा करूंगा। फिर मिलते हैं  ................ !

TO BE CONTINUED.......................

  

Tuesday, 4 March 2014

Sapnay......"The Dreams"

कौन
नहीं
देखता
सपने ,
सब देखते हैं
सपने।

सच कहूँ
मैंने भी
देखे हैं
सपने।

कुछ तेरे
कुछ मेरे
सपने।

कुछ अधूरे
कुछ पूरे
सपने।

कौन
नहीं देखता
सपने ,
सब
देखते हैं
सपने।


Monday, 3 March 2014

A LETTER......EK CHITHEE PART-8

दोस्तों !
आशा करता हूँ सब मंगलमय है।  अब कल की ही तो बात है एक पेंच को दीवार में लगवाना था।एक तस्वीर को टांगने के लिए। ड्रिल मशीन नहीं थी मेरे पास। मिस्त्री को बुलवाया १८० रूपए ले गया। मेरी तो जीभ निकल आई। ये जानते हुए भी के महंगाई ,भ्रष्टाचार ,गरीबी और बेरोज़गारी लगातार बढ़ रही है।सच में ऐसे दौर में मंगलकामना मज़ाक सा ही लगता है।

हालाँकि समय की रफ़्तार एक सी है !फिर भी समय को लेकर लोगों के अलग अलग विचार हैं। किसी के लिए समय बहुत तेजी से बीतता है तो किसी के लिए ये थम सा जाता है।कहते हैं के समय सब के लिए एक सा नहीं होता।

मार्च को महीना शुरू हो चुका है। मौसम भी बदल चुका है। फरवरी महीने में जिस धूप का बेसब्री से इंतज़ार किया जाता था उसी धूप में गर्माहट बढ़ने के कारण उससे बचा जाने लगा है।समय के साथ साथ मौसम और इच्छाएँ भी बदलने लगती हैं।

स्कूलों में बच्चों के फाइनल एग्जाम शुरू हो चुके हैं। परीक्षा में सफलता के लिए बच्चे मेहनत करते हैं। साल दर साल परीक्षा पास करते हैं और जीवन की असल परीक्षा में वो या तो फेल हो जाते हैं और या फिर ठगा सा महसूस करते हैं। क्योंकि जीवन की असल परीक्षा तो कर्मक्षेत्र में ही होती है।समय की विडंबना ही है के विधालयों में कर्म क्षेत्र में लड़ने की कोई विद्या नहीं दी जाती।
 
 बचपन में कईं सर्वव्यापी सत्य पढ़ाए जाते थे। सत्य की हमेशा जीत होती है , सूर्य पूर्व से उदय होता है और पश्चिम में अस्त। इस के साथ ही एक यूनिवर्सल ट्रुथ के बारे में और भी बताया जाता था। जीवन "समय चक्र" की तरह है।बताया जाता था के समय परिवर्तनशील है।  जाटों को अन्य अनुसूचित जाति (O.B.C.) श्रेणी में शामिल कर लिया गया है।घड़ी की सुइयों का ऊपर से नीचे ,नीचे से ऊपर आना आज  समझ आ रहा है। ये कुछ और नहीं "समय चक्र" है।

आम चुनाव नज़दीक हैं। केंद्र सरकार ने कुम्भकर्णी नींद से जागते हुए लोगों को लुभाने के लिए घोषणाओं का पिटारा खोल दिया है। ये पिटारा पहले खोला होता तो अच्छा होता।सरकारी घोषणाएं अब झुनझुना लगने लगी हैं। समय निकल चुका है।

मार्च के इस महीने में रंगों के त्यौहार होली का सब को बेसब्री से इंतज़ार रहता है। टी वी के अलग अलग चेनलों पर होली गीत दिखाए जाने लगे हैं। समय के साथ होली का रंग कुछ फीका पड़ गया है। कुछ लोग तो इस त्यौहार के बारे में ये भी कहते हैं ,"होली तो हो ली !"

"क्या ज़माना था के इक ज़माना हो गया है !"

"शेष अगले ख़त में !"         TO BE CONTINUED....................................

Sunday, 2 March 2014

A LETTER......EK CHITHEE PART-7




दोस्तों !
कमाल की चीज़ है ये चिठ्ठी। मन तो ये करता है के लिखना बंद ही न करूं। लिखता रहूँ निरंतर। खैर ! ये सिलसिला अगर चलता रहा तो आप लोगों के साथ बहुत कुछ साँझा करने का मौका मिलेगा।

आप को बता दूं ७ मार्च को "गुलाब गैंग" रिलीज़ हो रही है। ज़रूर देखिएगा। आप भी  सोच रहे होंगे मेरा इस से क्या ताल्लुक़ ! ताल्लुक़ है इसीलिए आप को लिख रहा हूँ। इस फ़िल्म के डायलॉग अमितोष नागपाल ने लिखे हैं। यही नहीं फ़िल्म "गुलाब गैंग" के गीत अमितोष की पत्नी नेहा सराफ ने लिखे हैं। अमितोष में गजब की एनर्जी के साथ साथ बहुगुणी प्रतिभा है। इस से पहले वो शेक्सपियर के नाटक "ट्वेल्फ़्थ नाईट " का हिंदी रूपांतरण कर चुका है। "पिया बहरूपिया" के नाम से इस के शो देश विदेश में पसंद किए जा रहे हैं। इस नाटक में दोनों ने अभिनय भी किया है। अतुल कुमार  द्वारा निर्देशित इस नाटक में नेहा ने लाजवाब काम किया है।

अमित इस से पहले कईं फिल्मों में अपने अभिनय की छाप छोड़ चुका है। हाल ही में प्रदर्शित "बेशर्म",रंगरेज़ ","आरक्षण" व  "दबंग" में उसने अपने अभिनय से सब को प्रभावित किया है। "

मेरे संपर्क में अमितोष कईं साल पहले करनाल (हरयाणा ) में खालसा कॉलेज में एक नाटक करवाने के दोरान आया।  "मुंशी प्रेम चंद " की कहानी पर आधारित नाटक "कफ़न" में अमितोष ने ज़बरदस्त अभिनय किया। कमाल का जुनून था उसमें। नाटक के बाद भी अमित ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। हर रोज़ मुझे खोज लेता और एक ओर नाटक करवाने की ज़िद करने लगता। नाटक तो मैं भी करना चाहता था परन्तु पेट और परिवार के चक्कर में समय न निकाल पाता। अमितोष पर किसी बात का असर न होता। वो तो बस नाटक करवाने की ज़िद पर अड़ा रहता। मैं उस को कहता ,"येड़ा है क्या ? " तो वो बिल्कुल पागलों की तरह कहता ,"जो कुछ मर्ज़ी  समझ लो गुरु जी।"

अगले बरस मुझे करनाल के दयाल सिंह कॉलेज में नाटक करवाने का मौका मिला। वहाँ "डॉ कँवल नयन कपूर " द्वारा लिखित नाटक "चिड़िया मुझे बना दो राम " नाटक करवा रहा था। मैंने अमित को इस का कोई ज़िक्र न किया। लेकिन अमित तो अमित ,पता नहीं उसे कहाँ से भनक लगी और आ धमका रिहर्सल पर। यहाँ उसने  मेरी खूब मदद की। जब भी खाली समय मिलता ,एक नाटक करवाने की ज़िद दोहराता।

इसके बाद उसने  मिलने का सिलसिला और तेज़ कर दिया। एक दिन मैं उसे कह बैठा " एक्टर्स के बिना नाटक कैसे होगा। तेरे अकेले को कैसे नाटक करवाऊं। " मेरी इस बात को सुन कर वो उठा और अपनी ख़ास मुस्कान बिखेरते  हुए बोला," कोई न गुरु जी ! अब देखता हूँ के कैसे बचोगे।" हर रोज़ दो तीन लोगों को पकड़ लाता। पकड़ने से मेरा मतलब ये है के हर रोज़ एक नया आता और एक पुराना चला जाता।

जब मुझे लगा के अमितोष के आगे मेरी दाल नहीं गलने वाली तो रिहर्सल का सिलसिला शुरू हो गया। आग तो मेरे अंदर भी धधक रही थी , अमित ने उसमें चिंगारी लगा दी। नाटक की रिहर्सल शुरू हो गई। कभी मेरे घर कि छत पर तो कभी अटल पार्क में। धीरे -धीरे लोग जुड़ने लगे और कारवां बनता चला गया। मेरे साथ कॉलेज में पढ़ने वाले सुदर्शन के एक स्कूल में भी नाटक की रिहर्सल का सिलसिला चलता रहा। बाद में समीर के स्कूल गुरु हर किशन पब्लिक स्कूल के साइकिल स्टैंड में भी रिहर्सल करते रहे। समीर ने मेरे हर नाटक में प्रत्य़क्ष-अप्रत्यकश दोनों तरह से मेरी मदद की है।

"सआदत हसन मंटो " की कहानी "हतक " के लिए नाटक करने के लिए कोई लड़की तैयार न होती। जो भी आती भाग जाती। पता नहीं अमितोष ने क्या घुट्टी पिलाई आख़िरकार दो लड़कियां नाटक करने के लिए तैयार हो गईं। कभी देर हो जाती तो अपनी साइकिल पर कईं किलोमीटर लड़कियों को उन के घर छोड़ कर भी आता।

इसी बीच कॉलेज में मुझे मेरा पहला नाटक करवाने वाले मेरे गुरु विजय साहनी से मुलाक़ात हो गई। उन्होंने सुझाव दिया के नाटक को पंजाब के पठानकोट में हर वर्ष होने वाले नाट्य उत्सव में खेला जाए।हम सब तैयार हो गए।  अंततय : नाटक का सफल मंचन हुआ। अमितोष के अभिनय की सभी ने भूरि भूरि प्रशंसा की। यहाँ अमित "सर्वश्रेष्ठ अभिनेता " चुना गया।

गुरु नानक खालसा कॉलेज में "ओम प्रकाश बाल्मीकि" के नॉवेल "झूठन" की एकल प्रस्तुति से भी अमित ने खूब सुर्खियां बटोरीं। कॉलेज के लोगों  को इस बात पर विश्वास नहीं होता था के केवल एक एक्टर से भी नाटक हो सकता है !यूनिवर्सिटी के युवा उत्सव में ये अपनी तरह का पहला प्रयोग था। अमित ने यहाँ भी अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़े। यहाँ पुन :अमित सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया।  बड़ी सादगी से अमित अपने कर्मक्षेत्र से जुड़ा रहा । नाटक और अभिनेता दोनों सर्वश्रेष्ठ घोषित किए गए। अमित को कॉलेज व कुरुक्षेत्रा विशव विद्यालय दोनों के द्वारा सम्मानित किया गया।
यही नहीं "खुशवंत सिंह" के नाटक " गिरगिट " और "मंगलेश डबराल" द्वारा गुजरात के दंगों पर लिखित कविता "एक जले हुए आदमी की आत्मकथा " में अमित द्वारा  किया गया अभिनय आज भी दर्शकों के दिलो -दिमाग पर छपा हुआ है।

बाद में अमितोष ने एन एस ड़ी (नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा )से डिप्लोमा किया और आजकल क्या कर रहा है इससे तो आप सब वाकिफ़ हो ही गए होंगे।

आज ही अमितोष से फ़ोन पर लम्बे अर्से के बाद बातचीत हुई। उसने बताया के वो अभी अभी "कामशेत " से लौटा है। मुम्बई से दूर गांव में कामशेत थिएटर और कला से जुड़े लोगों के लिए एक ऐसी जगह है ,जहाँ कलाकार शान्ती और सकूं से कम कर सकता है। लम्बे अर्से से इस ड्रीम प्रोजेक्ट का उनकी टीम को इंतज़ार था। जो पूरा हुआ। अमितोष बाप बन गया है बेटे का नाम पूछा तो उसने बताया ,"अनेये।" "अमितोष -नेहा और ये। " अमितोष ख़त पढ़ो तो "अ ने ये " को मेरा प्यार देना।                  

अभी अभी मुम्बई में ही मोहिंदर प्रताप सिंह से भी फ़ोन पर बातचीत हुई। मैंने पहले भी एक चिठ्ठी में ज़िक्र किया था के उसके द्वारा निर्देशित फ़िल्म भुजंग को चिल्ड्रेन फ़िल्म सोसाइटी ऑफ़ इंडिया ने अप्रूव कर दिया है। मोहिंदर बोला ,"पैसे मिल जाएँ तो समझो फ़िल्म की यात्रा भी पूरी हो जाएगी। " कर्ण पब्लिक स्कूल के सभी लोगों को इस फ़िल्म का बेसब्री से इंतज़ार है। आखिर सभी ने इस फ़िल्म में अपनी रूह से हिस्सेदारी जो की है। उम्मीद करता हूँ के फ़िल्म जल्द पूरी होगी।


एक बार पुन : अमितोष नेहा को "गुलाब गैंग" के लिए बधाई और सफलता के लिए ढ़ेर सारी शुभ कामनाएँ। अगले ख़त के ज़रिए जल्द मिलते हैं !आप सब फ़िल्म ज़रूर देखिएगा।

फ़िल्म की तरह जीवन भी एक यात्रा ही तो है। जिस में हम सब यात्री की तरह अपने अपने ढंग से सफ़र कर रहे हैं !

-----------------------TO BE CONTINUED




 

Saturday, 1 March 2014

A LETTER......EK CHITHEE PART-6

 चिठ्ठी पहले सेक्रेसी का सूचक हुआ करती थी। चाहे वो पर्सनेल हो या ऑफिसियल। इंटरनेट के इस युग में पर्सनेल तो कुछ रहा ही नहीं। यही नहीं सूचना के अधिकार ( R.I.T.) RIGHT TO INFORMATION ने तो सब को नंगा ही कर के रख दिया है।
चिठ्ठी एक ऐसा माध्यम है जिस के ज़रिए आप अपनी बात दिल खोल कर कह सकते हैं।
दिल तो मेरा भी ये करता है के एक ऐसी ही चिठ्ठी लिख डालूं। जिसमें कोई बंदिश न हो।
जिस में हो मेरी बात ,तेरी बात ,उसकी बात , इसकी बात ,आप की बात ,सब की बात !
बिना बल छल के! बिल्कुल साफगोही से!
लेकिन क्या करें ये दुनिया वाले कहने ही नहीं देते ----बिना बल -छल के, बिल्कुल साफगोही से !
ये चिठ्ठी मैं ख़ास अपने छोटे भाई पन्नु के लिए लिख रहा हूँ।
पिछले हफ्ते की ही तो बात है अखबारों में चन्द्र शेखर आज़ाद और भगत सिंह को लेकर कुछ ख़बरें और तस्वीरें देखीं। मन को अच्छा नहीं लगा तो लिख दिया "अख़बारों में तस्वीरें छपने लगी हैं,ब्लॉग्स पोस्ट किए जा रहे हैं , रिकार्ड्स बनाने की तैयरीयां शुरू हो गई हैं , बुतों को नहलाया जा रहा है , बुतों पर फूल मालाएं डाली जा रही हैं , राजनेता शहीदों को स्मरण करने लगे हैं , पत्रकार ख़बरें लिखने में मशगूल हैं ,प्रेस फोटोग्राफर्स धड़ाधड़ तस्वीरें खींच रहे हैं ,लेखक पुस्तकें छपवा रहे है ………………२३ मार्च को शहीदे आज़म भगत सिंह का शहादत दिवस है। "
"शहीदी दिवस मनाने का ये अंदाज़े बयां भी ख़ूब है !"
मेरे हरदिल अजीज़ प्रितपाल  सिंह पन्नु को मेरा ये कहना कतई अच्छा नहीं लगा। उसने भी तुरंत लिख डाला ,"Bahut asan hai kisi par b ungli utha dena, Bahut mushkil hai kisi ka haath pakar lena..Bahut asan hai har irade pe shak karna...bhaut mushkil hai iradon ko bulandi dena...Record banane ke liye logon ko prerit karna padta hai Guru Ji. smay nikalna padta hai....comment karne mein to kuchh shabd hi type krne hote hain..." 

असल में आजकल सब कुछ इंस्टेंट हो गया है। मैग्गी हो कॉफ़ी हो या हमारे विचार या भावनाएं। सब कुछ फटाफट। पहले चिठ्ठी लिखी जाती थी सोच सोच कर। अगर अच्छी नहीं लगी तो फाड़ कर दोबारा लिखी जाती थी चिठ्ठी। ऐसा नहीं के ब्लॉग या फेस बुक पर ऐसा करने का आप्शन नहीं है। यहाँ भी आप डिलीट या एडिट से कांट - छांट कर सकते हैं। लेकिन जब तक आप अपने मन की बात को बदलने का बटन दबाते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। आप की बात कईं लोगों के अकाउंट में हाई जैक हो चुकी होती है। या फिर आपसी रिश्तों कड़वाहट आ चुकी होती है।  इन चिठ्ठीयों में वो आत्मिकता या आत्मीयता कहाँ !

मैं ये सब लिखना तो नहीं चाहता था परन्तु अब स्वयं को रोक भी नहीं पा रहा हूँ।  सच में प्रितपाल तुम में मैं अपना अक्स देखता हूँ। जो काम सालों पहले मैं करना चाहता था उसे तुम पूरा कर रहे हो। गुरु कहते हो तो एक मशवरा है मेरा ,"जब आप किसी मिशन पर हों और आपके इरादे नेक हों तो कोई क्या कहता है इस की परवाह कतई नहीं करनी चाहिए। " जब आप गाड़ी की सर्विस या सिस्टम की ओवरहॉलिंग करने लगते हैं तो लोग सलाह मशवरा देने लगते हैं। यही नहीं किसी की मय्यत पर भी जाओ तो लोग तो वहाँ भी बाज नहीं आते। "मोटी लकड़ियां नीचे रखो ,अर्रे नहीं ,सिर के नीचे फट्टियां न रखो ,पैरों की तरफ वो रखो ये रखो। लोग तो मृत्यु शैया पर भी अपनी सलाह देने से नहीं चूकते।"
इसलिए जो अच्छा लगे उसे अपना लो और जो मन को न भाए उसे छोड़ दो। ये मत भूलो को दूसरों को भी अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है।
तुम्हें या किसी व्यक्ति विशेष को दुःख पहुंचाने का मेरा कोई ख्याल या इरादा नहीं था। सभी को अपने अपने ढंग से काम करने की स्वतंत्र्ता है और आप को भी। मैं जानता हूँ तुम सच्चाई से इस भ्रष्ट सिस्टम को चुस्त -दुरुस्त करने में लगे हुए हो। मैं तो अक्सर दुष्यंत की ये पंक्तियाँ दोहराता हूँ ,
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।" 

मेरी शुभ कामनाएँ !