Saturday, 1 February 2014

VAH BHAI CHITHEE.....!

दोस्तों……!

चिठ्ठी लिखने लिखाने का रिवाज़ जैसे खत्म हो गया है। इंटरनेट ,फेसबुक ,ट्विटर और मोबाइल फ़ोन के माहौल में चिठ्ठी लिखने का फैशन जैसे आउट डेटेड सा हो गया है।ये नई टेक्नोलॉजी का कमाल ही है के कभी सन्देश भेजने के लिए रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाली टेलीग्राम सेवा को भारत सरकार द्वारा वापिस ले लिया गया है।

बहुत सारे और भी ऐसे रिवाज़ हैं जो खो से गए हैं।जैसे शादियों पर रिश्तेदारों का कईं दिन पहले जमा हो जाना। खूब धमाल मचाना ,नाचना और गाना। दूर दूर से रिश्तेदारों के जवान होते बच्चों के बारे में जानकारी हासिल करना। किस के लड़के के रिश्ते की बात किस की लड़की के साथ चलाई जा सकती है। बुज़ुर्ग इसी उधेड़ बुन में लगे रहते।फिर अपनी जेब से छोटी सी डायरी निकाल कर एक दूसरे का पता लिखना कतई न भूलते। ताकि बाद में चिठ्ठी लिखी जा सके।

  यहीं पर कुछ युवाओं की आँखें लड़ती। और ये आँखों की लड़ाई कब प्रेम में बदल जाती  किसी को पता ही नहीं चलता। एक दूसरे से चिठ्ठी लिखने के वायदे के साथ घर के पतों का आदान प्रदान होता । चिठ्ठी में एक दूसरे से मिलने के लिए एक दूसरे के रिश्तेदारों के घर होने वाले प्रोग्रामों की जानकारी दी जाती। कुछ पता नहीं होता था के दोबारा मिलन होगा भी के नहीं।

इस पूरी कहानी में जब घर के किसी ज़िम्मेदार के हाथ कोई चिठ्ठी लग जाती तो दोनों को शादी के बंधन में बाँध दिया जाता।अगर कोई अड़ियल माँ बाप होते तो वो अपनी लड़की के लिए जल्द से जल्द लड़का ढूंढ कर उसके हाथ पीले कर देते।यही नहीं अपनी इज्जत की दुहाई और कसम देकर पुराने रिश्तों को सदा सदा भुला देने का वायदा भी लेते।

जिन युवाओं की किस्मत अच्छी न होती थी। न तो वो पकड़े जाते न ही मिल पाते थे। कुछ के पते बदल जाते तो कुछ भूल भी जाते। चिठ्ठी लिखना लिखाना भी बंद हो जाता । ऐसे में किस की शादी कहाँ हो जाती किसी को कुछ पता न चलता। चिठ्ठी का आदान प्रदान जो बंद हो जाता था।

मज़ा तो तब आता जब शादी के कईं सालों के बाद वो किसी विवाह समारोह में दोबारा मिल जाते।  कुछ समझदार इस पुनर्र मिलन को इत्तफ़ाक़ समझ कर अपने अपने रास्ते पर निकल जाते। और कुछ शुरू कर देते फिर वही सिलसिला-----सबसे पहले पता ,चिठ्ठी लिखने का वायदा ,पुराने गिले शिकवे ,एक दूसरे को पुरानी यादों और वायदों का हवाला।और फिर दुनिया की नज़रों से बच कर मिलने मिलाने का सिलसिला । ऐसे फंसते इस चक्रव्हू में के इस में से निकलना मुश्किल हो जाता। जब पुरानी चिठ्ठी पकड़ी जाती और मिलने मिलाने के सिलसिले आम हो जाते तो फिर शुरू होता परिवारों के टूटने का सिलसिला।

वाह भई चिठ्ठी !        

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