लो जी कर लो बात .......... !
आखिर जिस बात का डर था वही हुआ। ४९ दिन पुरानी दिल्ली सरकार ने इस्तीफा दे कर दोबारा इलेक्शन की मांग कर डाली है। इलेक्शन न हुए गुड्डे गुड़िया का खेल हो गया। बचपन में गुड्डे - गुड़िया के इस खेल में बच्चे अपनी सुविधा अनुसार गुड्डे - गुड़िया को जगाते ,सुलाते और हिलाते रहते थे ।बिना ये सोचे कि गुड्डे गुड़िया को भी दर्द होता होगा। गुड्डे- गुड़िया की तरह आम आदमी को भी राजनीतिज्ञों ने बेजान समझ लिया है।
दिल्ली विधान सभा में लोकपाल बिल पेश किया जा रहा था। लोग टीवी के सामने चिपके हुए थे। अगर आपने कभी सब्ज़ी मंडी में आढ़तियों द्वारा किसानों से सब्ज़ी खरीदते हुए देखा है तो आप को समझाने की कोई ज़रूरत नहीं के विधान सभा का दृशय भी बिल्कुल सब्ज़ी मंडी जैसा ही लग रहा था। सब्ज़ी मंडी की तरह विधान सभा में भी जनता के सभी प्रतिनिधि ये जताने की कोशिश कर रहे थे के केवल वही जनता के हितों के असली हिमायती हैं।
सब्ज़ी मंडी में आढ़ती वो लोग होते हैं जो किसानों से सब्ज़ी खरीद कर खुदरा व्यापारियों को बेचते हैं। वही सब्ज़ी आप के घरों तक रेहड़ी वाले पहुंचा देते हैं। यहाँ ये बात समझने की है के आढ़ती मिडिल मैन की तरह काम करता है दोनों तरफ से कमीशन लेता है। दोनों को ये विश्वास दिलाता है के वो उनके हितों की रक्षा करेगा। और दोनों तरफ से कमीशन ले जाता है।
बिल्कुल उस कहानी की तरह जिसमे दो बंदरों की लड़ाई में एक बिल्ली धीरे धीरे दोनों बंदरों की लड़ाई का फायदा उठती है और दोनों बंदरों का माल हड़प कर जाती है। जब से देश आज़ाद हुआ है तब से आम आदमी राजनीतिज्ञों के इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाच ही तो रहा है। ये राजनितिक लोग अपनी कला में इतने सक्षम होते हैं के मदारियों की तरह डुगडुगी बजाते हैं और सभी नाचने लगते हैं और ताली बजाने लगते हैं।
देश की सबसे आदरणीय विधान संस्था को हमारे प्रतिनिधियों ने सब्ज़ी मंडी ,मछली बाज़ार और मजमा बना कर रख दिया है। जहाँ वो जनता के हित नहीं बल्कि अपने भविषय के बारे में ज़यादा सोचते है। अच्छा होता अगर केजरीवाल इस्तीफा न देकर कुछ समय और सरकार चलाते। लेकिन उन्हें तो जैसे बहाना चाहिए था। ये सोचे बिना के आम जनता पर इस का क्या असर पड़ेगा ,दोबारा चुनाव होंगे तो उस पर होने वाले खर्च का भार भी आम जनता पर पड़ेगा, केजरीवाल जी तो चल दिए हिंदुस्तान की राजनीती को साफ़ करने।
अरे जनाब !पहले दिल्ली तो सम्भाल लेते !
आखिर जिस बात का डर था वही हुआ। ४९ दिन पुरानी दिल्ली सरकार ने इस्तीफा दे कर दोबारा इलेक्शन की मांग कर डाली है। इलेक्शन न हुए गुड्डे गुड़िया का खेल हो गया। बचपन में गुड्डे - गुड़िया के इस खेल में बच्चे अपनी सुविधा अनुसार गुड्डे - गुड़िया को जगाते ,सुलाते और हिलाते रहते थे ।बिना ये सोचे कि गुड्डे गुड़िया को भी दर्द होता होगा। गुड्डे- गुड़िया की तरह आम आदमी को भी राजनीतिज्ञों ने बेजान समझ लिया है।
दिल्ली विधान सभा में लोकपाल बिल पेश किया जा रहा था। लोग टीवी के सामने चिपके हुए थे। अगर आपने कभी सब्ज़ी मंडी में आढ़तियों द्वारा किसानों से सब्ज़ी खरीदते हुए देखा है तो आप को समझाने की कोई ज़रूरत नहीं के विधान सभा का दृशय भी बिल्कुल सब्ज़ी मंडी जैसा ही लग रहा था। सब्ज़ी मंडी की तरह विधान सभा में भी जनता के सभी प्रतिनिधि ये जताने की कोशिश कर रहे थे के केवल वही जनता के हितों के असली हिमायती हैं।
सब्ज़ी मंडी में आढ़ती वो लोग होते हैं जो किसानों से सब्ज़ी खरीद कर खुदरा व्यापारियों को बेचते हैं। वही सब्ज़ी आप के घरों तक रेहड़ी वाले पहुंचा देते हैं। यहाँ ये बात समझने की है के आढ़ती मिडिल मैन की तरह काम करता है दोनों तरफ से कमीशन लेता है। दोनों को ये विश्वास दिलाता है के वो उनके हितों की रक्षा करेगा। और दोनों तरफ से कमीशन ले जाता है।
बिल्कुल उस कहानी की तरह जिसमे दो बंदरों की लड़ाई में एक बिल्ली धीरे धीरे दोनों बंदरों की लड़ाई का फायदा उठती है और दोनों बंदरों का माल हड़प कर जाती है। जब से देश आज़ाद हुआ है तब से आम आदमी राजनीतिज्ञों के इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाच ही तो रहा है। ये राजनितिक लोग अपनी कला में इतने सक्षम होते हैं के मदारियों की तरह डुगडुगी बजाते हैं और सभी नाचने लगते हैं और ताली बजाने लगते हैं।
देश की सबसे आदरणीय विधान संस्था को हमारे प्रतिनिधियों ने सब्ज़ी मंडी ,मछली बाज़ार और मजमा बना कर रख दिया है। जहाँ वो जनता के हित नहीं बल्कि अपने भविषय के बारे में ज़यादा सोचते है। अच्छा होता अगर केजरीवाल इस्तीफा न देकर कुछ समय और सरकार चलाते। लेकिन उन्हें तो जैसे बहाना चाहिए था। ये सोचे बिना के आम जनता पर इस का क्या असर पड़ेगा ,दोबारा चुनाव होंगे तो उस पर होने वाले खर्च का भार भी आम जनता पर पड़ेगा, केजरीवाल जी तो चल दिए हिंदुस्तान की राजनीती को साफ़ करने।
अरे जनाब !पहले दिल्ली तो सम्भाल लेते !
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