Friday, 28 February 2014

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

अख़बारों में तस्वीरें छपने लगी हैं,ब्लॉग्स पोस्ट किए जा रहे हैं , रिकार्ड्स बनाने की तैयरीयां शुरू हो गई हैं , बुतों को नहलाया जा रहा है , बुतों पर फूल मालाएं डाली जा रही हैं , राजनेता शहीदों को स्मरण करने लगे हैं , पत्रकार ख़बरें लिखने में मशगूल हैं ,प्रेस फोटोग्राफर्स धड़ाधड़ तस्वीरें खींच रहे हैं ,लेखक पुस्तकें छपवा रहे है ………………२३ मार्च को शहीदे आज़म भगत सिंह का शहादत दिवस है।
शहीदी दिवस मनाने का ये अंदाज़े बयां भी ख़ूब है !
 अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे
जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे .………………… दुष्यंत 

Wednesday, 26 February 2014

A LETTER...... EK CHITHEE PART-5

प्रणाम ! मेरा पहला ख़त आप सब को मिल गया होगा। मन में तो बहुत सी बातें हैं लिखने को। परन्तु इतना ही कहूंगा के फरवरी माह खूब अच्छे व व्यस्तता से बीता।

पिछले हफ्ते अम्बाला में एम आर धीमान के श्रद्धांजली समारोह में ढिल्लों साब से मिलना हुआ। १९८७ -८८ में दयाल सिंह कॉलेज की ओर से दिल्ली में आयोजित "अपना उत्सव "में भाग लिया था। देश प्रदेश के अलग अलग हिस्सों से कईं प्रतिभागियों ने इस में शिरकत की थी। अम्बाला एस। डी। कॉलेज से भी टीम ने भाग लिया था। अम्बाला की टीम के इंचार्ज ढिल्लों साब थे। २५ साल के बाद नाटक के ज़रिए ढिल्लों साब से मुलाक़ात हो गई। इंडियन थिएटर चंडीगढ़ में हमारे साथ ट्रैनिंग करने वाले अनिल दत्ता से भी यहाँ एक लम्बे अर्से के बाद मिलना हुआ। दत्ता आजकल पंजाब केसरी अख़बार का पत्रकार है।

पिछले हफ्ते ही बबलू दुबई से वापिस हिंदुस्तान आया। बबलू ने मेरे एक साल बाद  इंडियन थिएटर में चंडीगढ़ से पोस्ट ग्रेजुएशन किया था। आज कल किसी गारमेंट कंपनी में वहाँ का मार्केटिंग का हेड है। बेटा ज़यादा बीमार था इसलिए उसे आना पड़ा।बेटा अब ठीक है। २२ फरवरी को वो वापिस दुबई लौट गया।उस के साथ उसका दोस्त जॉन्टी भी था।जॉन्टी को यहाँ एक इनोवा गाड़ी पसन्द आ गई। डॉ डेंग ने मेरे कहने पर बिना कोई पैसे लिए गाड़ी उसे सौंप दी। पेमेंट अभी आनी है।

समीर हमेशा की तरह मस्त है। हम दोनों ने शाम को एक घंटे की सैर शुरू कर दी है। कब तक चलेगी मालूम नहीं। राहुल भाई ठीक है। अपनी किस्मत से नाखुश रहता है। ख़ूब मेहनत करता है पर रिजल्ट्स उसके पक्ष में नहीं होते। डॉ डेंग की आजकल पोह बारह है। कारों की सेल परचेज़ का काम चल निकला है। दो पार्टनर जीतू और राकेश के साथ मिल कर काम कर रहा है। लाली ईद का चाँद हो गया है। बबलू मित्तल कभी कभी मिल जाता है।

धोनी की विदेशी ज़मीं पर लगातार १४ वीं हार से तो आप वाकिफ़ ही होंगे। केजरीवाल की नौटंकी का तो सब को पता चल ही चुका है। धोनी ब्रिगेड ने पिछले ३२ महीनों से विदेशी धरती पर एक भी टेस्ट मैच नहीं जीता है। लगातार १४ टेस्ट मैच में हार से धोनी ब्रिगेड पर सवाल उठना वाजिब ही है।युवराज १४ करोड़ का खिलाडी होने के बावज़ूद राष्ट्रीय टीम में निरंतरता के लिए जूझ रहा है। ज़हीर ,गौतम गम्भीर ,सहवाग ,युसूफ और इरफ़ान पठान को शायद लोग भूल चुके हैं।धोनी के पांव में चोट के कारण विराट कोहली को एशिया कप के लिए कप्तानी सौंपी गई है।२६ जनवरी को बांग्लादेश के साथ हुए मैच को अपने दम पर जीत कर कोहली ने भावी कप्तान के रूप में अपना दावा ठोक दिया है।

स्कूल में वसंत उत्सव धूमधाम से मनाया गया। बच्चों के साथ पतंगबाज़ी का ख़ूब लुत्फ़ उठाया। हाँ सच फरवरी के शुरूआत में स्कूल में आयोजित मैजिक शो के ज़रिए बच्चों को  बताने की कोशिश की गई के जादू-वादू सब हाथ की सफाई होती है।

२२ फरवरी को स्कूल में दसवीं कक्षा के बच्चों के लिए विदाई समारोह का आयोजन किया गया। बच्चों ने खूब धमाल मचाया। मेरे गुरु डॉ मदन गुलाटी और स्कूल के डायरेक्टर सरनपाल सिंह ने भी शिरकत की। डॉ गुलाटी ने हमेशा की तरह अपने ओजस्वी भाषण से सब का मार्ग दर्शन किया।

२६ फरवरी को स्कूल में वार्षिक उत्सव व् पारितोषिक वितरण समारोह का आयोजन किया गया।बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम ने सब का मन मोह लिया। मोहित शर्मा व स्वीनी को स्कूल के सर्वश्रेष्ठ छात्र छात्रा के रूप में सम्मानित किया गया।

मेरी बहन बेबी व भूषण मदान जी की विवाह सालगिरह व पवन भाई का जन्म दिवस भी इसी माह था। सभी को मेरी शुभकामनायें।रिश्ते में भतीजी मंदीप कौर ने बिटिया को जन्म दिया है। मंदीप को मेरी और परिवार की और से ढेर सारी बधाई।

राजनीति की तरह यहाँ भी मौसम बदल गया है। सर्दी लगभग जा चुकी है। धुंध और ठंडी हवाओं के बाद धूप सेंकना आजकल अच्छा लग रहा है।

मैंने जब बिटिया को बताया के आज कल चिठ्ठी लिखने का काम कर रहा हूँ तो बेटी ने भी आज अपने जीवन की पहली चिठ्ठी अपने भाई को लिख डाली। चिठ्ठी लिखने के अनुभव को साँझा करते हुए वो फूले नहीं समा  रही। आजकल १२ वीं के पेपरों की तैयारी में जुटी हुई है।

अगली चिठ्ठी का इंतज़ार करना !

………………………………………………to be continued.





Tuesday, 25 February 2014

A LETTER......EK CHITHEE PART-4

उम्मीद करता हूँ कि इस से पहले लिखे ख़त आप सब ने पढ़ लिए होंगे। वायदे के अनुसार ये ख़त समय पर ही लिख रहा हूँ। पिछले ख़त में बहुत सारी बातें लिखना भूल गया था। क्षमा करना !

 फरवरी की शुरूआत में ही मनीष ढुल से मुलाकात हुई। मनीष बटेऊ है हमारा। हरयाणा में दामाद को बटेऊ कह कर ही पुकारते हैं।समीर की बिटिया अमानत से मनीष की शादी पिछले वर्ष हुई थी।बेटियां को अगर ससुराल अच्छा मिल जाए तो माँ बाप की उम्र बढ़ जाती है। ऐसा लगता है के समीर और नीरू ने पिछले जन्म में दान पुण्य किया था। बटेऊ बढ़िया ही नहीं संस्कारी भी है।मनीष एक सॉफ्ट वेयर इंजीनियर है। मनीष अगर ख़त पढ़ो तो अपने माता -पिता को मेरा सादर नमस्कार कहना !

 १५ फरवरी को वीरेंदर पंडित के भाई की शादी समारोह में शामिल हुआ। वीरेंदर पंडित हरयाणा पुलिस में इंस्पेक्टर और भाई फ़ौज में कर्नल है। कनाडा से एक और पुराना मित्र श्रीकांत लम्बे अर्से के बाद हिंदुस्तान आया है। श्रीकांत से अभी तक बात नहीं हो पाई है।

पूरे फरवरी में सी।बी। एस। सी। के स्कूलों में सरकार के आदेशों को लेकर असमंजस की स्तिथी बनी रही। सरकार के द्वारा प्रॉपर्टी टैक्स से भी स्कूल मालिक परेशान रहे। उनका भी कोई दोष नहीं ! आख़िर मंदिर अब व्यवसायिक केंद्र जो बन गए हैं ! मंदिर भगवान  का हो या शिक्षा का !

हरयाणा में कुछ दिनों पहले सरकारी अध्यापकों की भर्ती हुई है। कुछ लोगों से मिला ,वो सभी खुश हैं। कृषण लाल की भी नियुक्ति हो गई है। पहले वो एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापक था। पहले परेशान रहता था ,अब खुश है। एक दिन मिला तो बोला ,"अब लगी असल लाटरी ! काम न काज अर फेर भी अपना राज।" "इतने नोट मिलते हैं सर जी , के पूछो न बस।" वो ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा था !

देश में राजनीति का बिगुल तो आप सब सुन ही रहे होंगे। केजरी ने इस्तीफा दे दिया है। मोदी कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। राहुल के लिए झ़ण्डु के चिंकारा की दरकार है। उधर अन्ना और दीदी के सुर एक हो गए हैं। जय ललिता की चुनावी चाल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मोच आ गई है। केजरीवाल का झाड़ू बुहारी नहीं लगा पा रहा। लगाता है तो धुल अपने ऊपर ही आ रही है। मीडिया ने भी तवज्जो देना कम कर दिया है। हवा का रुख बदल जाय तो ऐसा अक्सर होता  है।तीसरा फ्रंट एक बार फिर एकजुट होने की कोशिश में है !

आप को बताना भूल गया के चौधरी साब आज कल बिल्कुल ठीक -ठाक हैं। डॉक्टर्स ने उनका शराब पीना और मांस खाना बंद कर दिया है। पर चौधरी तो ठहरे चौधरी। ………ज़ब भी दिल करता है अमल पूरा कर ही लेते हैं।पिछले हफ्ते तो चौधरी साब ने कमाल ही कर दिया। दोपहर को ही मेरे स्कूल में आ गए। उनके साथ सीमान्त शर्मा था। बोले ,"सिरसी चलना है। "सिरसी मधुबन पुलिस काम्प्लेक्स के बिल्कुल पीछे एक गॉंव है। सुरजीत चिकेन वाला यहाँ लाजवाब चिकेन बनता है। मैं भी मना नहीं कर सका। चिकेन खाने के शौकीन लोगों के लिए ये जगह जन्नत की तरह है। प्रतिस्पर्धा के इस युग में सुरजीत शहर से करीब १० -१२ किलोमीटर दूर गॉंव में अपनी दुकान चला रहा है। वो लगभग २००० -३००० हजार रूपए प्रतिदिन कमा लेता है। लोगों का वहाँ जमावड़ा लगा रहता है वो भी पुलिस की नाक के नीचे !

२० फरवरी को पड़ोस में कृषण राणा के बेटे और बेटी के विवाह के उपलक्ष में साँझा कार्यक्रम आयोजित  किया गया। मैं शामिल नहीं हो पाया। घर के सदस्यों ने उस में शिरकत की।

 २१ फरवरी को एम् आर धीमान को श्रद्धांजलि देने के लिए नाटक के मंचन की सूचना दी दलजिंदर ने।गीता ने भी इंडियन थिएटर चंडीगढ़ से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। गीता के पति एम् आर धीमान का पिछले माह ही देहांत हो गया था।  अम्बाला में जी। एम्। एन। कॉलेज में "सफ़र "का मंचन किया गया। नाटक का निर्देशन मिल्खीराम धीमान के शिषय राहुल शर्मा द्वारा किया गया। नाटक के ज़रिए श्रद्धांजलि का कार्यक्रम एक बढ़िया प्रयोग लगा। धीमान हरयाणा रंगमंच के सशक्त हस्ताक्षर थे। भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !

 इस महीने की और बहुत सी बातें भी मेरे ज़हन में हैं। अगले ख़त में शेयर करूंगा। आप सब अपना ध्यान रखना। बड़ों को मेरा प्रणाम कहना और बच्चों को प्यार देना।

अगली चिठ्ठी जल्द ही पोस्ट करूंगा ! 

-----------------------------------------------TO BE CONTINUED

Wednesday, 19 February 2014

A LETTER.......EK CHITHEE PART-3


पिछले रविवार बहना घर आई। साथ में बेटे द्वारा लिखी चिठियाँ भी ले आई। शाम को जब सब इकठ्ठा एक कमरे में बैठे तो गीता ने बिन्नी की लिखी चिठियाँ मेरे हाथ में थमा दीं। मैने सब को चिठियाँ पढ़ कर सुनाई।चिठ्ठी सादगी से लिखी हुई थी और पढ़ते-पढ़ते आँखें छलक आईं। उसने चिठ्ठी में बहुत सारी भावनात्मक बातें लिखी हुई थीं।इसीलिए तो चिठ्ठी की ख़ासियत कभी खत्म नहीं हो सकती।

असल में ये "चिठ्ठी" या फिर "कहानी" लिखने यानि कि आज की भाषा में "ब्लॉग" या "पोस्ट" लिखने का आईडिया भी भूपेंदर की चिठ्ठी के बाद ही आया। ये आप के लिए मेरी तीसरी चिठ्ठी है। आप को अब हर महीने दो चिट्ठियां लिखता रहूँगा। फरवरी 2014 की ये मेरी पहली और कुल तीसरी चिठ्ठी है। हर चिठ्ठी में मेरा लोगों के साथ मिलने जुलने का लेखा -जोखा ही होगा।

फरवरी -2014 ,उत्साह ,प्रेम ,नवजीवन ,खुशियों ,सफलता और मित्रता का माह रहा।  आज ही मोहिंदर प्रताप सिंह का फ़ोन आया।  फ़िल्म "भुजंग " के बारे में बताया के सी.एफ.एस.आई.(चिल्ड्रन फ़िल्म सोसाइटी ऑफ़ इंडिया) द्वारा फ़िल्म को अप्रूव कर दिया गया है।  बच्चों पर आधारित फ़िल्म भुजंग की अधिकतर शूटिंग पिछले वर्ष कर्ण पब्लिक स्कूल ,करनाल में ही हुई थी।इन्हीं दिनों कर्ण पब्लिक स्कूल फ़िल्म स्टूडियो बना हुआ था। स्कूल के सभी बच्चे ,अध्यापक , बच्चों के माता पिता और दोस्तों के सहयोग से फ़िल्म की शूटिंग सफलता पूर्वक हो सकी।

स्कूल के बच्चों की फ़िल्म में भागेदारी मेरे लिए एक अभूतपूर्व अनुभव है। बच्चों पर आधारित इस फ़िल्म का हीरो व् मुख्य पात्र स्कूल के बच्चे ही हैं।अगर ये फ़िल्म रिलीज़ हो जाती है तो सभी के लिए ये मील का पत्थर साबित होगी। हालांकि हीरो शूटिंग खत्म होते ही स्कूल छोड़ कर किसी दूसरे स्कूल में चला गया है।

मेरे मित्र और फ़िल्म के डायरेक्टर मोहिंदर प्रताप सिंह से अक्सर मेरी बात होती थी। मोहिंदर कहता था, "फ़िल्म एक ऐसा पिटारा है जिसमे काम करने वाले सभी लोगों का भाग्य छिपा होता है। पर्दे पर फ़िल्म आने के बाद किस का भाग्य खुल जाए ये किसी को पता नहीं होता।" जब मोहिंदर का फ़ोन आया तो मैं समीर के साथ करनाल के अटल पार्क में सैर कर रहा था। समीर ने भी फ़िल्म में एक अहम् रोल किया है। मैंने फ़ोन समीर को थमा दिया। समीर ने तुरन्त मोहिंदर को कहा ,"भा जी जल्दी करो फ़िल्म नूं पूरा ,हुंण तां लोग वी पुछण लगे ने कि फ़िल्म कदों रिलीज़ होंणी है। "समीर आगे बोला ,"फ़िल्म रिलीज़ होगी ,तभी तो लोगों को मेरी एक्टिंग के बारे पता चलेगा। " फ़ोन बंद करने के बाद समीर बोला ,"भा जी अप्पां करनाल विच तां फ़िल्म हिट करवा देंगे। " मैने आश्चर्य से पूछा ,"वो कैसे ?" "अपने सारे यार दोस्त टीचर हैं। सब नूं कह देणा है के डंडा चुक लो ते बच्यां नूं स्कूल दी बजाए फ़िल्म देखण भेजो, " मस्ती भरे लहज़े में उसने कहा।

पड़ोस में 14 फरवरी को रजत बराड़ की शादी  में आई बरसात ने पिछले साल मेरे भतीजे  " कीनू " सिकंदर सांगवान की शादी की याद दिला दी। उसकी शादी 8 फरवरी 2013 को थी। पिछले साल भी लगातार तीन दिन बरसात होती रही थी।कल मेरी और दीप चंद की शादी की साल गिरह भी है। मैं अपनी पत्नी को प्यार से दीपचंद ही कह कर बुलाता हूँ।

इस 8 फरवरी को डॉक्टर के भतीजे की शादी में भी जाना हुआ। राहुल मेरे साथ था। राहुल भी समीर के साथ स्कूल में अध्यापक है। डॉ चार -पांच भाई हैं। एक फुटबाल और दूसरा हॉकी का खिलाडी है। बाकियों से मेरा कोई ख़ास परिचय नहीं है। परिवार में कोई डॉ नहीं है लेकिन परिवार में सभी पुरुष सदस्यों को डॉ कह कर ही सम्बोधित किया जाता है। शादी में जाते हुए राहुल बोला ,"भाईसाब ,यो बढ़िया है, बिना डिग्री के सारे डॉक्टर हैं। मैं राहुल की इस बात पर मुस्कुरा दिया।

17 को मेरे स्कूल में कंप्यूटर की अध्यापिका मंजू की शादी थी। इसी महीने गीता और बबले का जन्म दिन,भूषण मदान और पवन मदान की मैरिज एनीवर्सरी भी थी। दोस्तों सम्बन्धियों के ये ख़ास दिन - तारीखें आज की टेक्नोलॉजी के कारण ही याद रह पाई। वर्ना ये तो याद नहीं रहता के कल क्या खाया था। इस मामले में मेरा दोस्त दलजिंदर लाजवाब है। बिल्कुल कंप्यूटर की तरह सभी कुछ याद रहता है। कोई भी ख़ास दिन हो ,उसका मेसेज या फ़ोन ज़रूर आता है।      

...................................................TO BE CONTINUED

Monday, 17 February 2014

gudday gudiya ka khel.....!

लो जी कर लो बात .......... !

आखिर जिस बात का डर था वही हुआ। ४९ दिन पुरानी दिल्ली सरकार ने इस्तीफा दे कर दोबारा इलेक्शन की मांग कर डाली है। इलेक्शन न हुए गुड्डे गुड़िया का खेल हो गया। बचपन में गुड्डे - गुड़िया के इस खेल में बच्चे अपनी सुविधा अनुसार गुड्डे - गुड़िया को जगाते ,सुलाते और हिलाते रहते थे ।बिना ये सोचे कि गुड्डे गुड़िया को भी दर्द होता होगा। गुड्डे- गुड़िया की तरह आम आदमी को भी राजनीतिज्ञों ने बेजान समझ लिया है।

दिल्ली विधान सभा में लोकपाल बिल पेश किया जा रहा था। लोग टीवी के सामने चिपके हुए थे। अगर आपने कभी सब्ज़ी मंडी में आढ़तियों द्वारा किसानों से सब्ज़ी खरीदते हुए देखा है तो आप को समझाने की कोई ज़रूरत नहीं के विधान सभा का दृशय भी बिल्कुल सब्ज़ी मंडी जैसा ही लग रहा था। सब्ज़ी मंडी की तरह विधान सभा में भी जनता के सभी प्रतिनिधि ये जताने की कोशिश कर रहे थे के केवल वही जनता के हितों के असली हिमायती हैं।

 सब्ज़ी मंडी में आढ़ती वो लोग होते हैं जो किसानों से सब्ज़ी खरीद कर खुदरा व्यापारियों को बेचते हैं। वही सब्ज़ी आप के घरों तक रेहड़ी वाले पहुंचा देते हैं। यहाँ ये बात समझने की है के आढ़ती मिडिल मैन की तरह काम करता है दोनों तरफ से कमीशन लेता है। दोनों को ये विश्वास दिलाता है के वो उनके हितों की रक्षा करेगा। और दोनों तरफ से कमीशन ले जाता है।

बिल्कुल उस कहानी की तरह जिसमे दो बंदरों की लड़ाई में एक बिल्ली धीरे धीरे दोनों बंदरों की लड़ाई का फायदा उठती है और दोनों बंदरों का माल हड़प कर जाती है। जब से देश आज़ाद हुआ है तब से आम आदमी राजनीतिज्ञों के इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाच ही तो रहा है। ये राजनितिक लोग अपनी कला में इतने सक्षम होते हैं के मदारियों की तरह डुगडुगी बजाते हैं और सभी नाचने लगते हैं और ताली बजाने लगते हैं।

 देश की सबसे आदरणीय विधान संस्था को हमारे प्रतिनिधियों ने सब्ज़ी मंडी ,मछली बाज़ार और मजमा बना कर रख दिया है। जहाँ वो जनता के हित नहीं बल्कि अपने भविषय के बारे में ज़यादा सोचते है।  अच्छा होता अगर  केजरीवाल इस्तीफा न देकर कुछ समय और सरकार चलाते। लेकिन उन्हें तो जैसे बहाना चाहिए था। ये सोचे बिना के आम जनता पर इस  का क्या असर पड़ेगा ,दोबारा चुनाव होंगे तो उस पर होने वाले खर्च का भार  भी आम जनता पर पड़ेगा, केजरीवाल जी तो चल दिए हिंदुस्तान की राजनीती को साफ़ करने।

अरे जनाब !पहले दिल्ली तो सम्भाल लेते ! 

Sunday, 9 February 2014

Kamaal ho rha hai...!

 कमाल
हो रहा है
ख़ूब धमाल
 हो रहा है !

मेहनतकश
गरीब
तो
भ्रष्टाचारी
मालामाल
हो रहा है !

कमाल
हो रहा है
खूब धमाल
हो रहा है !

जो
कभी खुश था
अपने
जीवन से,
जीना उसका 
बेहाल
हो रहा है !

कमाल
हो रहा है
ख़ूब धमाल
हो रहा है !

मेहनतकश
बीमार
तो
ठेकेदार
ख़ुशहाल
हो रहा है !

कमाल
हो रहा है
ख़ूब धमाल
हो रहा है !




Saturday, 8 February 2014

YAAR ANMULLAY......!









 एक दिन दलजिंदर का जालंधर से फ़ोन आया। सिल्वर जुबली मनाने का न्योता था। मुझे  बताया गया के इंडियन थिएटर चंडीगढ़ १९८६-८८ बैच को डिग्री हासिल किए २५ बरस हो गए हैं। समय कितनी तेज़ी से निकलता है इस बात का एहसास हुआ। वहाँ जाकर पता चला के पूरे प्रोग्राम का सूत्रधार रघवीर था। रघवीर सन १९८८ में ही कनाडा चला गया था और वहीँ सेट्ल हो गया।इस बार कनाडा से आने के बाद उसने सब से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की।  

जालंधर पहुंचते ही सब से पहले दलजिंदर और रघवीर से मुलाकात हुई। दलजिंदर को १९८८ में ऑल इंडिया रेडियो में प्रोग्राम एक्सीक्यूटिव की नौकरी मिल गई थी। पोस्टिंग भी मुम्बई में मिली पर दलजिंदर तो जैसे कुछ और ही करना चाहता था।उस ने नौकरी छोड़ कर सब को हैरान कर दिया।आजकल जालंधर दूरदर्शन पर सीरियल और ऑल इंडिया रेडियो पर जॉकी का काम करता  है। बोले तो फ्री लांसिंग। कुछ दिन पहले ही एक पंजाबी फ़िल्म भी की है।दलजिंदर से मेरा मिलना जुलना लगा रहता था।

दलजिंदर ने कार में बैठने के बाद बताया गया के सभी प्रैस क्लब में इकठ्ठा हो रहे हैं। मैने रघवीर से उस के काम काज के बारे में पूछा। रघबीर ने बताया के वो कनाडा में किसी कंपनी में इन्वेंटरी रख रखाव का काम करता है। रघबीर का बोलचाल का लहज़ा बिल्कुल बदल चुका था।

प्रैस क्लब के रास्ते में ही सुरेंदर बाठ का फ़ोन भी आ गया। गाड़ी वापिस मोड़ ली गई। रघबीर और बाठ पुराने यार थे। कार में बैठते ही रघबीर ने मज़ाक किया तो बाठ  ने भी मज़ाक भरे लहज़े में कहा ,"ओये हुंण ओ गलां नहीं रहियाँ ,तेरे वीर कोल तिन थ्री पीस सूट ने। " रघबीर ने चुटकी लेते हुए कहा ,"आहो ,मंगे होणे किसी दे। " बाठ ने ज़ोर से हंसते हुए कहा ,"अपने ने अपने ! तेरे वीर के पास सूट ही नहीं बल्कि कैश भी है।" रघबीर और बाठ की बातों की चुस्की ले रहे दलजिंदर ने भी ज़ोर से ठहाका लगाया।यूनिवर्सिटी में मुफ्लिसी के दिनों का ज़िक्र करते हुए बाठ ने फिर कहा ,"ओये हुण ओ गलां नहीं रहियाँ ! " 

बातों बातों में कब प्रेस क्लब आ गया पता ही नहीं चला। मुझे समझ आ चुका था के आज धमाल होने वाला है। कमरे में पहुंचते ही ज़ोरदार स्वागत हुआ। रवि कपड़े बदल रहा था। सुनील जोशी ने गर्म जोशी से गले लगा लिया। असल में लगभग 10 वर्ष पूर्व रवि और सुनील से मुलाक़ात हो चुकी थी। पुनीत ने एक सीरियल शुरू किया था वहाँ सभी अपनी किस्मत आजमाने के लिए इकठा हुए थे। लेकिन सभी की किस्मत जैसे सीरियल की तरह डिब्बे में ही बंद हो गई।पुनीत सहगल ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में "चुर्र" करते हुए ज़ोर से हंसते हुए मित्र मिलन कुछ इस अंदाज़ से किया, "आ गए हो ! ड्रामे वाल्यां नू तां बस न्यौता मिलणा चाहिए।"

पुनीत सहगल आजकल जालंधर दूरदर्शन में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव है। इससे पहले वो ऑल इंडिया रेडियो पर भी इसी पोस्ट पर रहा। अपनी नौकरी में रहते हुए पुनीत ने अपने यार दोस्तों की खूब मदद की। मैंने भी ऑल इंडिया रेडियो पर कईं नाटकों के लिए रिकॉर्डिंग की।खर्चा पानी तो मिलता ही साथ में दोस्तों से भी मिलना हो जाता। पुनीत ,दलजिंदर और मैं एक बार बॉम्बे भी गए थे। दलजीत पहले से ही वहाँ अपनी किस्मत आज़मा रहा था।

कमरे में दलजीत भी था। "दलजीत बाई डॉक्टर साब हो गए ने",पुनीत ने मेरा परिचय दलजीत से करवाया। मैने भी उसी अंदाज़ में कहा ,"हाँ -हाँ जानता हूँ ,डॉक्टर साब के साथ ही तो बॉम्बे में स्ट्रगल किया       था।" बस फिर क्या था ,बॉम्बे में बिताए दिनों की कहानियाँ सुनाने लगा पुनीत। लगभग 20 साल पुराने किस्से कहानियों को सुन कर ऐसे लगने लगा जैसे कल की ही बात हो।

बातों का सिलसिला कुछ इस तरह शुरू हुआ के हर कोई अपनी कहानी और बातें पहले सुनाना चाहता था ,मानो कहानी सुनने सुनाने की कोई प्रतिस्पर्धा चल रही हो।हंसी और ठाहकों से जालंधर प्रेस क्लब गूँज रहा था। बातों बातों में ही पता चला के जितेंदर फ़लोरा ने शादी नहीं की है। आजकल होशियार पुर में "आप" पार्टी के साथ जुड़ा हुआ है और "आम आदमी" हो गया है। रवि और सुनील जोशी भी स्कूल में अध्यापन के साथ साथ थिएटर कर रहे हैं। बाठ आज कल पंजाबी फिल्मों में व्यस्त है। भले ज़माने में सरकारी टीचर हो गया था। अब रिटायरमेंट ले ली है।

बातचीत में शीरे और राजेश पवार का ज़िक्र चलता रहा। पता चला के राजेश भी आ रहा है। मैं राजेश से पहले कभी नहीं मिला था। राजेश के आते ही महफिल में जैसे चार चाँद लग गए। आते ही ऐसी रौनक लगाई के हंसते हंसते पेट दुखने लगा। बाठ का कटोरा ,राजेश के घर गड्डी खरीदने पर पार्टी का आँखों  देखा हाल ,जितेंदर फलोरा के साथ आम ख़ास आदमी होने  को लेकर सभी के द्वारा नए नए जुमले बनाने की होड़ ,सुनील जोशी का सब की बातों पर चुटकी लेने का ज़बरदस्त अंदाज़ ,पुनीत का हर बात पर आम आदमी की तरह ज़ोर से ठहाका लगाना ,दलजिंदर द्वारा हॉस्टल के दिनों में ज़रुरत से अधिक खाने के किस्से , दलजीत का डॉक्टर बन जाना और रवि की फ़िल्म बनाने की कसक वाले झूठे सच्चे किस्से लम्बे अर्से तक दिलोदिमाग पर छाए रहेंगे।

रात को १२ बजे चाय पीने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँच गए। रास्ते में जाते जाते भी खूब हंस गोले चलते रहे। सुबह जब उठे तो सभी कोयले की आग की तरह ठंडे लग रहे थे। चाय पीने के बाद नाश्ता किया गया। अमृतसरी नान के साथ लस्सी पीकर आनंद आ गया। और अब शुरू हुआ एक दूसरे से विदा लेने का सिलसिला। वापिस तो जैसे कोई जाना ही नहीं चाहता था। रघवीर को गॉंव जल्दी पहुंचना था। दो दिन बाद ही उसकी कनाडा की फ्लाइट थी। रघवीर का घर से बार बार फ़ोन आ रहा था।

सभी ने चलते चलते चाय पीने की फरमाइश कर डाली। चाय पीते पीते पुनीत ने रघवीर को कहा ,"ओए हथ जोड़ के माफी मांग इन सब से।"  चाय की दुकान पर कुछ और लोग भी चाय पी रहे थे। वो सब हमारी और देखने लगे। रघवीर कुछ समझ नहीं पाया, पुनीत दोबारा बोला ,"ओये ए आम आदमी नहीं हैं ,ये ख़ास आदमी हैं। खास आदमियों को कोई कम नहीं करना होता। ए तां प्यार दे भुखे ने। इन्हां नू  इवें ही खान पीण नू मिलदा रहया तो यहीं जमे रहेंगे। " रघवीर को समझते देर न लगी ,झट से टी स्टॉल पर रखे बेंच पर चढ़ गया और हाथ जोड़ कर सब से माफी मांगने लगा। सब ने ज़ोर से ठहाका लगाया। एक दूसरे के गले मिले और दोबारा मिलने के वायदे के साथ अपने अपने गंतव्य की और हो लिए।

जालंधर में आने की सूचना अपने एक साहित्यकार और आजकल एक अख़बार में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत अपने एक मित्र डॉ अजय शर्मा को दे दी थी। डॉ शर्मा से मिलने की दिली इच्छा थी। वापसी जाते हुए दो तीन बार फ़ोन किया। फ़ोन की घंटी बजती रही। डॉ शर्मा से बातचीत और मुलाक़ात न हो सकी।दलजिंदर के घर जाना हुआ। वहाँ दलजिंदर की माता जी से मिलना हुआ। पहले से अधिक तंदुरुस्त लग रहे थे। उनसे बातचीत करना अच्छा लगा। 

"अणमुल्ले यारों" की कहानी लिखते लिखते टेलेविज़न पर टाटा डोकोमो की एक मशहूरी की आवाज़ मेरे कानों में सुनाई दी। मैं मशहूरी देखने लगा। इस में सलमान खान की एक फ़िल्म के गाने , "ढिंग चिक्का ढिंग चिक्का ढिंग चिक्का ढिंग" पर बच्चों के नाचने की फ़िल्म कुछ लोग देख रहे हैं। इस फ़िल्म को देखते देखते सब नाचने लगते हैं और आवाज़ आती है  ,"लॉफ ,शेयर एंड डू इट.…………… !"


सच ,यदि ज़िन्दगी में आनंद भरना हो तो उम्र के बंधनों को तोड़ कर बच्चा बनना होता है !  

  

Tuesday, 4 February 2014

CHUNAV ........!

1.

झंडे लहराने लगे हैं
वायदे दोहराने लगे हैं !

एक कहता है
विकास हुआ है
आगे भी होगा
दूसरा कहता है
नाश हुआ है
आगे सर्वनाश होगा !

 झंडे लहराने लगे हैं
वायदे दोहराने लगे हैं !

एक कहता है
किया है
हमने
आगे भी कर के
दिखायेंगे
दूसरा कहता है
पहले भी बहकाया
अब फिर बेहकायेंगे !

झंडे लहराने लगे हैं
वायदे दोहराने लगे हैं !

एक तरक्की की
तस्वीरें
दिखा रहा है
दूसरा गली गली
शीशा
दिखा रहा है !

झंडे लहराने लगे हैं
वायदे दोहराने लगे हैं !


2.

सावधान !
चुनाव नज़दीक हैं
  ऐसा लगता है
भीतर ही भीतर
 युद्ध की तैयारी
 चल रही है,

  मुद्दों की बात
 नहीं हो रही
 इस बार तो
 "मोर्चे"
बन रहे हैं !

मोर्चा 1, मोर्चा 2 ,मोर्चा 3 !


3 . 

लो जी कर लो बात .......... !

आखिर जिस बात का डर था वही हुआ। ४९ दिन पुरानी दिल्ली सरकार ने इस्तीफा दे कर दोबारा इलेक्शन की मांग कर डाली है। इलेक्शन न हुए गुड़िया का खेल हो गया। बचपन में गुड़िया गुड़िया खेलते हुए बच्चे अपनी सुविधा अनुसार गुड़िया को जगाते सुलाते रहते हैं।

दिल्ली विधान सभा में लोकपाल बिल पेश किया जा रहा था। लोग टीवी के सामने चिपके हुए थे। अगर आपने कभी सब्ज़ी मंडी में आढ़तियों द्वारा किसानों से सब्ज़ी खरीदते हुए देखा है तो आप को समझाने की कोई ज़रूरत नहीं के विधान सभा का दृशय भी बिल्कुल सब्ज़ी मंडी जैसा ही लग रहा था। सब्ज़ी मंडी की तरह विधान सभा में भी जनता के सभी प्रतिनिधि ये जताने की कोशिश कर रहे थे के केवल वही जनता के हितों के असली हिमायती हैं।

 सब्ज़ी मंडी में आढ़ती वो लोग होते हैं जो किसानों से सब्ज़ी खरीद कर खुदरा व्यापारियों को बेचते हैं। वही सब्ज़ी आप के घरों तक रेहड़ी वाले पहुंचा देते हैं। यहाँ ये बात समझने की है के आढ़ती मिडिल मैन की तरह काम करता है दोनों तरफ से कमीशन लेता है। दोनों को ये विश्वास दिलाता है के वो उनके हितों की रक्षा करेगा। और दोनों तरफ से कमीशन ले जाता है।

बिल्कुल उस कहानी की तरह जिसमे दो बंदरों की लड़ाई में एक बिल्ली धीरे धीरे दोनों बंदरों की लड़ाई का फायदा उठती है और दोनों बंदरों का माल हड़प कर जाती है। जब से देश आज़ाद हुआ है तब से आम आदमी राजनीतिज्ञों के इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाच ही तो रहा है। ये राजनितिक लोग अपनी कला में इतने सक्षम होते हैं के मदारियों की तरह डुगडुगी बजाते हैं और सभी नाचने लगते हैं और ताली बजाने लगते हैं।

 देश की सबसे आदरणीय विधान संस्था को हमारे प्रतिनिधियों ने सब्ज़ी मंडी ,मछली बाज़ार और मजमा बना कर रख दिया है। जहाँ वो जनता के हित नहीं बल्कि अपने भविषय के बारे में ज़यादा सोचते है।  अच्छा होता अगर  केजरीवाल इस्तीफा न देकर कुछ समय और सरकार चलाते। लेकिन उन्हें तो जैसे बहाना चाहिए था। ये सोचे बिना के आम जनता पर इस  का क्या असर पड़ेगा ,दोबारा चुनाव होंगे तो उस पर होने वाले खर्च का भार  भी आम जनता पर पड़ेगा, केजरीवाल जी तो चल दिए हिंदुस्तान की राजनीती को साफ़ करने। 

अरे जनाब  ! पहले दिल्ली तो संभाल लेते  !



 


  

Monday, 3 February 2014

PARIVARTAN...!

1.
परिवर्तन
नज़र आ
रहा है
इसीलिए
नेता
कहीं
जूता
तो कहीं
थप्पड़
खा
रहा है !

2.
परिवर्तन
की
आंधी
चली है ,

रंग
बेशक़
अलग हैं ,

सब के
सर
पर
टोपी
गांधी
टंगी है !


3. .
परिवर्तन
नज़र आ
रहा है
इसीलिए
लोगों
को
टोपी
पहनाने
वाला
नेता
ख़ुद
टोपी
पहने
नज़र

रहा
है !   

KATORA....!

चुनाव नज़दीक हैं
इसलिए उठो
मेरे देश के
मेहनतकश लोगों ,
अपने हक़ों के लिए
अपनी आवाज़
बुलंद करो !

अब वो समय है
जब आप के सामने
सत्ता के ठेकेदार
हाथ में कटोरा ले
वोट की भीख
मांगने निकले हैं !

अगर इस बार भी
ग़लती
कर दी आपने
तो अगले
पांच साल के लिए
ये कटोरा
आप के हाथ
में होगा !

Sunday, 2 February 2014

zahar...!

सफेदपोश भौंक रहे  हैं
लोग चौंक रहे हैं
बार बार पूछा
जा रहा है ,

क्या आप की
बहु बेटियाँ
सुरक्षित हैं  ?

क्या आप
सुरक्षित हैं ?

क्या आपके
बुज़ुर्गों ने
अच्छे दिन
देखे हैं  ?

क्या आप के
सपने
पूरे हुए हैं ?

सब ज़ोर से
बोलते हैं
नहीं ,नहीं ,नहीं !

सब
एक स्वर में
बोलते हैं
नहीं ,नहीं, नहीं !

ये सब
आम लोग हैं
ये इन की चाल
नहीं समझते !

इन को
मुट्ठियां बंद
कर के
बोलने को
कहा जाता है ,

सब मुट्ठियां बंद करके
दोहराते हैं
नहीं ,नहीं, नहीं !

सफेदपोश
मुस्कुराता है
खुश है
जादू चल गया !

बस फिर क्या
वो भी
ज़हर उगलने लगता है !

आम आदमी
तो आम आदमी है
वो सोच रहा है
किस का ज़हर
पिया जाए  !

उनको तो पीना ही
ज़हर है
क्योंकि उनको
तो यही
समझाया गया है
ज़हर को ज़हर ही काटता  है ! 



Saturday, 1 February 2014

VAH BHAI CHITHEE.....!

दोस्तों……!

चिठ्ठी लिखने लिखाने का रिवाज़ जैसे खत्म हो गया है। इंटरनेट ,फेसबुक ,ट्विटर और मोबाइल फ़ोन के माहौल में चिठ्ठी लिखने का फैशन जैसे आउट डेटेड सा हो गया है।ये नई टेक्नोलॉजी का कमाल ही है के कभी सन्देश भेजने के लिए रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाली टेलीग्राम सेवा को भारत सरकार द्वारा वापिस ले लिया गया है।

बहुत सारे और भी ऐसे रिवाज़ हैं जो खो से गए हैं।जैसे शादियों पर रिश्तेदारों का कईं दिन पहले जमा हो जाना। खूब धमाल मचाना ,नाचना और गाना। दूर दूर से रिश्तेदारों के जवान होते बच्चों के बारे में जानकारी हासिल करना। किस के लड़के के रिश्ते की बात किस की लड़की के साथ चलाई जा सकती है। बुज़ुर्ग इसी उधेड़ बुन में लगे रहते।फिर अपनी जेब से छोटी सी डायरी निकाल कर एक दूसरे का पता लिखना कतई न भूलते। ताकि बाद में चिठ्ठी लिखी जा सके।

  यहीं पर कुछ युवाओं की आँखें लड़ती। और ये आँखों की लड़ाई कब प्रेम में बदल जाती  किसी को पता ही नहीं चलता। एक दूसरे से चिठ्ठी लिखने के वायदे के साथ घर के पतों का आदान प्रदान होता । चिठ्ठी में एक दूसरे से मिलने के लिए एक दूसरे के रिश्तेदारों के घर होने वाले प्रोग्रामों की जानकारी दी जाती। कुछ पता नहीं होता था के दोबारा मिलन होगा भी के नहीं।

इस पूरी कहानी में जब घर के किसी ज़िम्मेदार के हाथ कोई चिठ्ठी लग जाती तो दोनों को शादी के बंधन में बाँध दिया जाता।अगर कोई अड़ियल माँ बाप होते तो वो अपनी लड़की के लिए जल्द से जल्द लड़का ढूंढ कर उसके हाथ पीले कर देते।यही नहीं अपनी इज्जत की दुहाई और कसम देकर पुराने रिश्तों को सदा सदा भुला देने का वायदा भी लेते।

जिन युवाओं की किस्मत अच्छी न होती थी। न तो वो पकड़े जाते न ही मिल पाते थे। कुछ के पते बदल जाते तो कुछ भूल भी जाते। चिठ्ठी लिखना लिखाना भी बंद हो जाता । ऐसे में किस की शादी कहाँ हो जाती किसी को कुछ पता न चलता। चिठ्ठी का आदान प्रदान जो बंद हो जाता था।

मज़ा तो तब आता जब शादी के कईं सालों के बाद वो किसी विवाह समारोह में दोबारा मिल जाते।  कुछ समझदार इस पुनर्र मिलन को इत्तफ़ाक़ समझ कर अपने अपने रास्ते पर निकल जाते। और कुछ शुरू कर देते फिर वही सिलसिला-----सबसे पहले पता ,चिठ्ठी लिखने का वायदा ,पुराने गिले शिकवे ,एक दूसरे को पुरानी यादों और वायदों का हवाला।और फिर दुनिया की नज़रों से बच कर मिलने मिलाने का सिलसिला । ऐसे फंसते इस चक्रव्हू में के इस में से निकलना मुश्किल हो जाता। जब पुरानी चिठ्ठी पकड़ी जाती और मिलने मिलाने के सिलसिले आम हो जाते तो फिर शुरू होता परिवारों के टूटने का सिलसिला।

वाह भई चिठ्ठी !