एक दिन दलजिंदर का जालंधर से फ़ोन आया। सिल्वर जुबली मनाने का न्योता था। मुझे बताया गया के इंडियन थिएटर चंडीगढ़ १९८६-८८ बैच को डिग्री हासिल किए २५ बरस हो गए हैं। समय कितनी तेज़ी से निकलता है इस बात का एहसास हुआ। वहाँ जाकर पता चला के पूरे प्रोग्राम का सूत्रधार रघवीर था। रघवीर सन १९८८ में ही कनाडा चला गया था और वहीँ सेट्ल हो गया।इस बार कनाडा से आने के बाद उसने सब से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की।
जालंधर पहुंचते ही सब से पहले दलजिंदर और रघवीर से मुलाकात हुई। दलजिंदर को १९८८ में ऑल इंडिया रेडियो में प्रोग्राम एक्सीक्यूटिव की नौकरी मिल गई थी। पोस्टिंग भी मुम्बई में मिली पर दलजिंदर तो जैसे कुछ और ही करना चाहता था।उस ने नौकरी छोड़ कर सब को हैरान कर दिया।आजकल जालंधर दूरदर्शन पर सीरियल और ऑल इंडिया रेडियो पर जॉकी का काम करता है। बोले तो फ्री लांसिंग। कुछ दिन पहले ही एक पंजाबी फ़िल्म भी की है।दलजिंदर से मेरा मिलना जुलना लगा रहता था।
दलजिंदर ने कार में बैठने के बाद बताया गया के सभी प्रैस क्लब में इकठ्ठा हो रहे हैं। मैने रघवीर से उस के काम काज के बारे में पूछा। रघबीर ने बताया के वो कनाडा में किसी कंपनी में इन्वेंटरी रख रखाव का काम करता है। रघबीर का बोलचाल का लहज़ा बिल्कुल बदल चुका था।
प्रैस क्लब के रास्ते में ही सुरेंदर बाठ का फ़ोन भी आ गया। गाड़ी वापिस मोड़ ली गई। रघबीर और बाठ पुराने यार थे। कार में बैठते ही रघबीर ने मज़ाक किया तो बाठ ने भी मज़ाक भरे लहज़े में कहा ,
"ओये हुंण ओ गलां नहीं रहियाँ ,तेरे वीर कोल तिन थ्री पीस सूट ने। " रघबीर ने चुटकी लेते हुए कहा ,
"आहो ,मंगे होणे किसी दे। " बाठ ने ज़ोर से हंसते हुए कहा ,
"अपने ने अपने ! तेरे वीर के पास सूट ही नहीं बल्कि कैश भी है।" रघबीर और बाठ की बातों की चुस्की ले रहे दलजिंदर ने भी ज़ोर से ठहाका लगाया।यूनिवर्सिटी में मुफ्लिसी के दिनों का ज़िक्र करते हुए बाठ ने फिर कहा ,
"ओये हुण ओ गलां नहीं रहियाँ ! "
बातों बातों में कब प्रेस क्लब आ गया पता ही नहीं चला। मुझे समझ आ चुका था के आज धमाल होने वाला है। कमरे में पहुंचते ही ज़ोरदार स्वागत हुआ। रवि कपड़े बदल रहा था।
सुनील जोशी ने
गर्म जोशी से गले लगा लिया। असल में लगभग 10 वर्ष पूर्व रवि और सुनील से मुलाक़ात हो चुकी थी। पुनीत ने एक सीरियल शुरू किया था वहाँ सभी अपनी किस्मत आजमाने के लिए इकठा हुए थे। लेकिन सभी की किस्मत जैसे सीरियल की तरह डिब्बे में ही बंद हो गई।पुनीत सहगल ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में
"चुर्र" करते हुए ज़ोर से हंसते हुए मित्र मिलन कुछ इस अंदाज़ से किया,
"आ गए हो ! ड्रामे वाल्यां नू तां बस न्यौता मिलणा चाहिए।"
पुनीत सहगल आजकल जालंधर दूरदर्शन में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव है। इससे पहले वो ऑल इंडिया रेडियो पर भी इसी पोस्ट पर रहा। अपनी नौकरी में रहते हुए पुनीत ने अपने यार दोस्तों की खूब मदद की। मैंने भी ऑल इंडिया रेडियो पर कईं नाटकों के लिए रिकॉर्डिंग की।खर्चा पानी तो मिलता ही साथ में दोस्तों से भी मिलना हो जाता। पुनीत ,दलजिंदर और मैं एक बार बॉम्बे भी गए थे। दलजीत पहले से ही वहाँ अपनी किस्मत आज़मा रहा था।
कमरे में दलजीत भी था।
"दलजीत बाई डॉक्टर साब हो गए ने",पुनीत ने मेरा परिचय दलजीत से करवाया। मैने भी उसी अंदाज़ में कहा ,
"हाँ -हाँ जानता हूँ ,डॉक्टर साब के साथ ही तो बॉम्बे में स्ट्रगल किया था।" बस फिर क्या था ,बॉम्बे में बिताए दिनों की कहानियाँ सुनाने लगा पुनीत। लगभग 20 साल पुराने किस्से कहानियों को सुन कर ऐसे लगने लगा जैसे कल की ही बात हो।
बातों का सिलसिला कुछ इस तरह शुरू हुआ के हर कोई अपनी कहानी और बातें पहले सुनाना चाहता था ,मानो कहानी सुनने सुनाने की कोई प्रतिस्पर्धा चल रही हो।हंसी और ठाहकों से जालंधर प्रेस क्लब गूँज रहा था। बातों बातों में ही पता चला के जितेंदर फ़लोरा ने शादी नहीं की है। आजकल होशियार पुर में
"आप" पार्टी के साथ जुड़ा हुआ है और
"आम आदमी" हो गया है। रवि और सुनील जोशी भी स्कूल में अध्यापन के साथ साथ थिएटर कर रहे हैं। बाठ आज कल पंजाबी फिल्मों में व्यस्त है। भले ज़माने में सरकारी टीचर हो गया था। अब रिटायरमेंट ले ली है।
बातचीत में शीरे और राजेश पवार का ज़िक्र चलता रहा। पता चला के राजेश भी आ रहा है। मैं राजेश से पहले कभी नहीं मिला था। राजेश के आते ही महफिल में जैसे चार चाँद लग गए। आते ही ऐसी रौनक लगाई के हंसते हंसते पेट दुखने लगा। बाठ का कटोरा ,राजेश के घर गड्डी खरीदने पर पार्टी का आँखों देखा हाल ,जितेंदर फलोरा के साथ आम ख़ास आदमी होने को लेकर सभी के द्वारा नए नए जुमले बनाने की होड़ ,सुनील जोशी का सब की बातों पर चुटकी लेने का ज़बरदस्त अंदाज़ ,पुनीत का हर बात पर आम आदमी की तरह ज़ोर से ठहाका लगाना ,दलजिंदर द्वारा हॉस्टल के दिनों में ज़रुरत से अधिक खाने के किस्से , दलजीत का डॉक्टर बन जाना और रवि की फ़िल्म बनाने की कसक वाले झूठे सच्चे किस्से लम्बे अर्से तक दिलोदिमाग पर छाए रहेंगे।
रात को १२ बजे चाय पीने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँच गए। रास्ते में जाते जाते भी खूब हंस गोले चलते रहे। सुबह जब उठे तो सभी कोयले की आग की तरह ठंडे लग रहे थे। चाय पीने के बाद नाश्ता किया गया। अमृतसरी नान के साथ लस्सी पीकर आनंद आ गया। और अब शुरू हुआ एक दूसरे से विदा लेने का सिलसिला। वापिस तो जैसे कोई जाना ही नहीं चाहता था। रघवीर को गॉंव जल्दी पहुंचना था। दो दिन बाद ही उसकी कनाडा की फ्लाइट थी। रघवीर का घर से बार बार फ़ोन आ रहा था।
सभी ने चलते चलते चाय पीने की फरमाइश कर डाली। चाय पीते पीते पुनीत ने रघवीर को कहा ,
"ओए हथ जोड़ के माफी मांग इन सब से।" चाय की दुकान पर कुछ और लोग भी चाय पी रहे थे। वो सब हमारी और देखने लगे। रघवीर कुछ समझ नहीं पाया, पुनीत दोबारा बोला ,
"ओये ए आम आदमी नहीं हैं ,ये ख़ास आदमी हैं। खास आदमियों को कोई कम नहीं करना होता। ए तां प्यार दे भुखे ने। इन्हां नू इवें ही खान पीण नू मिलदा रहया तो यहीं जमे रहेंगे। " रघवीर को समझते देर न लगी ,झट से टी स्टॉल पर रखे बेंच पर चढ़ गया और हाथ जोड़ कर सब से माफी मांगने लगा। सब ने ज़ोर से ठहाका लगाया। एक दूसरे के गले मिले और दोबारा मिलने के वायदे के साथ अपने अपने गंतव्य की और हो लिए।
जालंधर में आने की सूचना अपने एक साहित्यकार और आजकल एक अख़बार में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत अपने एक मित्र डॉ अजय शर्मा को दे दी थी। डॉ शर्मा से मिलने की दिली इच्छा थी। वापसी जाते हुए दो तीन बार फ़ोन किया। फ़ोन की घंटी बजती रही। डॉ शर्मा से बातचीत और मुलाक़ात न हो सकी।दलजिंदर के घर जाना हुआ। वहाँ दलजिंदर की माता जी से मिलना हुआ। पहले से अधिक तंदुरुस्त लग रहे थे। उनसे बातचीत करना अच्छा लगा।
"अणमुल्ले यारों" की कहानी लिखते लिखते टेलेविज़न पर टाटा डोकोमो की एक मशहूरी की आवाज़ मेरे कानों में सुनाई दी। मैं मशहूरी देखने लगा। इस में सलमान खान की एक फ़िल्म के गाने ,
"ढिंग चिक्का ढिंग चिक्का ढिंग चिक्का ढिंग" पर बच्चों के नाचने की फ़िल्म कुछ लोग देख रहे हैं। इस फ़िल्म को देखते देखते सब नाचने लगते हैं और आवाज़ आती है ,
"लॉफ ,शेयर एंड डू इट.…………… !"
सच ,यदि ज़िन्दगी में आनंद भरना हो तो उम्र के बंधनों को तोड़ कर बच्चा बनना होता है !