Friday, 5 December 2014

गर्म ख़ून (भाग -4)

                                                                    गर्म ख़ून ( भाग -4 )
पति को  बेहोश देखकर वो बदहवास चौधरी मलखान के कमरे की ओर चल पड़ी। मलखान भी अपने कमरे में बेसुध पड़ा था। मंद रौशनी में भी उसका बदन कुश्ती के लिए तैयार किसी पहलवान की तरह दमक रहा था। एक बारगी तो सुंदरी बाहर की ओर चल पड़ी। दरवाज़े से बाहर अपने पति को बेसुध पड़े देखा तो न जाने सुंदरी के मन में कैसा बदलाव आया। उसने अंदर से दरवाज़ा धीरे से बंद कर लिया। अपने कपडे उतारे और मलखान के बिस्तर पर जा पहुंची। जैसे ही उसने मलखान को स्पर्श किया ,वो नींद में बोला ,"मैं न कहता था सुंदरी के तू ज़रूर आएगी। " इसी के साथ ही मलखान ने सुंदरी को अपने पाश में ऐसे जकड़ा मानो उसके टुकड़े कर देगा। सुंदरी भी जैसे टूट कर चकनाचूर हो जाना चाहती थी। जब सब कुछ निपट गया तो सुंदरी के कानों में मलखान के वो शब्द गूंजने लगे ,"हमारे कुँए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन तुझ से इश्क़ हो गया है सुंदरी। " सुंदरी तो जैसे आज सच में आज़ाद हो गई थी। सुंदरी की आँखें किसी प्रतिशोध लेने वाली नागिन की तरह चमक रहीं थीं। वो मलखान की तरफ पलटी और धीरे से मलखान के कान में गुनगुनाने लगी ," जा तुझे आज़ाद किया , तुझे माफ़ किया चौधरी , लेकिन तेरी जात पर प्यार नहीं घिन आती है चौधरी !"
  पोह फटने लगी थी। चन्द्रमा की चांदनी जैसे आज ही सारा चमकना चाहती थी। सुंदरी पूरी तरह से बिखर चुकी थी। फिर भी उसने अपने आप को सँभाला। मलखान की ओर एक ज़हरीली नज़र से देखते हुए सुंदरी मंद मंद मुस्कुराने लगी। बेसुध पड़े मलखान को वो पूरी तरह निचोड़ चुकी थी। सुंदरी का व्यक्तित्व बिल्कुल दो धारी तलवार की तरह लग  रहा था। मलखान बदहवास और बेसुध अपनी चारपाई पर पड़ा था। बिल्कुल एक नंगी लाश की तरह।  सुंदरी ने धीरे से मलखान का चुम्बन लिया दरवाज़ा खोला और खेत के बीचों बीच मोरनी की तरह नाचते हुए अपनी कोठरी में जा पहुंची। 
 कुछ समय बाद गांव में ये बात आग की तरह फैल गई के सुंदरी पेट से है । गांव ओर  परिवार के लोग खुश थे। नरेश तो फूला नहीं समा रहा था। वो जहाँ से भी गुजरता अपना सीना चौड़ा कर लेता। नरेश की मर्दानगी पर शक करने वाले लौंडे उसे बधाई देते नहीं थकते थे। नरेश जब भी रात को सुंदरी से मिलता वो उसके पेट पर धीरे धीरे अंगुलियां फेरते हुए बस एक ही बात दोहराता ," मैं न कहता था सुंदरी भगवान के घर देर है , अंधेर नहीं ।" नरेश की ये बात सुन कर सुंदरी भी धीरे से उसकी हाँ में हाँ मिलाती और नरेश के बालों में अपने सख्त  हाथों की अंगुलियां फेरने लगती।
एक अर्सा  हो गया था इन बातों को। सुंदरी का बेटा दिलावर जवान हो चुका था। वो गांव में जहाँ से भी गुज़रता ,अगड़ों के छोकरों को रश्क होने लगता। पुरे इलाके में दिलावर जैसा कोई न था। सभी कहते माँ पर गया है। माँ की तरह बिल्कुल गोरा चिट्टा। अगड़ों की जवान छोकरियाँ भी अपनी खिड़कियों की दरारों में से उसे देखती और ठंडी ठंडी आहें भरती। अगड़ों को दिलावर एक आँख न सुहाता। जब भी मौका मिलता वो उसे घेर लेते। दिलावर तो जैसे फौलाद का बना हुआ था। दस -बारह से अकेला भीड़ जाता। हर बार एक दो को फोड़ कर ही उसको शांती मिलती। पिछले एक वर्ष से करीब २० लोगों को अस्पताल पहुंचा चुका था। दिलवार ने पिछले हफ्ते ही मलखान के बेटे का सिर भी फोड़ दिया था। आज उसी सिलसिले में पंचायत रखी गई थी। 
पंचायत में सभी पंच और सरपंच अपना अपना स्थान ग्रहण कर चुके थे। चौपाल खचा खच भरी हुई थी। जगतार ने सब को राम राम कहते हुए बोलना शुरू किया ,"मैं तो बस इतना कहना चाहूँ सूं के सुंदरी के बेटे दिलावर ने जो आतंक फैला राख्या है वो अब सहन नहीं होता। " सुंदरी ने भी अपने घूँघट के पल्लू को मुहँ में से  निकलाते हुए कहा ," अपणी जाण बचाणे का अधिकार भी न है दिलावर नै। सारे अपणे दिल पर हाथ रख कर बताओ के शुरुआत कौन करे है ? आखिर मेरे छोरे का दोष के है जो थम सारे उसकी जान के दुश्मण हो रहे
 हो ?" जगतार इस बार गर्म होते हुए बोला ,"तेरे छोरे ने आतंक फैला राख्या है ,बहुत उबाले मार रह्या है तेरे छोरे का खून। इसी तरह उबाले मारता रहा तो ठंडा होते देर न लगेगी तेरे छोरे का गर्म ख़ून।
सुंदरी रोज़ रोज़ के तानो से तंग आ चुकी थी। पिछले महीने से ये पांचवीं पंचायत थी। जगतार की बात सुन कर रहा न गया उससे । वो अंदर तक टूट गई। सुंदरी तैश में आकर जगतार की तरफ अंगुली उठाते हुए बोली ,"क्यों मेरा मुहं खुलवाओ हो चौधरी !" आज तक गांव में कभी किसी ने इस तरह अगड़ों का विरोध नहीं किया था।  सुंदरी के इस व्यवाहर से सभी सकते में थे। जगतार भी तैश में आ गया और बोला ,"ऐसा क्या ले रही है मुहं में सुंदरी जो उगले नहीं बणदा। " अब की बार सुंदरी चुप थी। पंचायत में खुसरपुसर होने लगी। मलखान जो बहुत देर से चुप बैठा था सहसा खड़ा हो गया।  सुंदरी की तरफ इशारा करते हुए वो बोला ," गर्म ख़ून तो चौधरियां का होता है। ज़्यादा गर्मी दिखावेगा तो ठंडा होते देर न लगेगी। " मलखान के मुहं से ये बात सुन कर सुंदरी के तन -बदन में जैसे आग लग गई। वो चिल्लाते हुए बोली , "उबाले तो मारेगा ही यो खून चौधरी, आखिर यू गर्म ख़ून चौधरी तेरा ही तो है । इब बी ठंडा करणे का जी करे है तो कर लियो ठंडा। ये कहते ही सुंदरी वहां से निकल पड़ी।
 पंचायत में सन्नाटा पसर चुका था ! सभी चौधरी की तरफ देख रहे थे !

Thursday, 4 December 2014

गर्म ख़ून ( भाग -3 )

                              
                                                             गर्म ख़ून  ( भाग -3 ) 
रात को थक हार कर जब भी नरेश और सुंदरी मिलते तो बस एक ही बात करते।आखिर ऐसा कौन सा पाप किया है जो बच्चा नहीं हो रहा हो रहा। नरेश बेशक सुन्दर नहीं था। लेकिन दिल से वो राजा था। उसकी सादगी,शराफत और ईमानदारी का पूरा गांव कायल था। अपनी औकात से ज़्यादा पैसा खर्च कर के नरेश ने दोनों के डॉक्टरी टेस्ट भी करवाए थे। सब कुछ ठीक ठाक था। 
 उस दिन के बाद न जाने क्या हुआ , मलखान ने सुंदरी को कुछ नहीं कहा। सुबह ही खेतों में निकल जाता। दिन भर खेत जोहता। जब थक जाता तो दारू के दो पेग लगा कर प्यार भरे गीत गुनगुनाने लगता। मलखान को  जैसे सच में इश्क़ हो गया था। अब मलखान टुबवेल पर ही सोने लगा था। मलखान की सेवा में लगा नरेश अपने चौधरी में आए इस बदलाव को देख कर हैरान था।  नरेश रात को घर पहुंच कर जैसे ही खाना खाने लगा उसका ध्यान मलखान की ओर चला गया। दुनिया से बेखबर नरेश को भी आज न जाने क्या सूझी। वो सुंदरी के आगे मलखान सिंह का ज़िक्र कर बैठा।  नरेश सुंदरी से बोला ,"आज कल चौधरी को न जाने क्या हो गया है,  हर वक़्त गुनगुनाता रहता है। जब दिल करता है पीने बैठ जाता है। " सुंदरी बिना कोई खास ध्यान दिए नरेश की बातें सुनती रही। आज से पहले नरेश ने बाहर की किसी बात का ज़िक्र घर में नहीं किया था।
 कई दिन इसी तरह बीत गए। एक लम्बे अरसे के बाद आज मलखान सिंह  दुरुस्त नज़र आ रहा था। उसके चाचा के बेटे की शादी थी। दोस्त रिश्तेदार जुड़ने शुरू हो चुके थे। वो आज खुश था के उसके सभी पुराने दोस्त आ रहे हैं। परिवार में जब भी कोई कार्यक्रम होता मलखान के खास दोस्तों की मण्डली टुबवेल पर ही जमती। खेतों के बीचों बीच टयूबवेल के नज़दीक मलखान चारपाई पर बैठा नरेश को हुकुम दिए जा रहा था। गिलास धो लिए न ! सलाद काट लिया ! सोडा फ्रिज में लगा दिया है ! देख बड़ी देर से कुकर की सीटी नहीं बजी ! खेत में से ताज़ी मूली निकाल ला ! बेचारा नरेश अकेली जान फिरकी की तरह कभी इधर तो कभी उधर भाग भाग कर काम किए जा रहा था।
जैसे ही गाड़ी की आवाज़ मलखान सिंह के कान में पड़ी वो  चिल्लाया ,"ओये कुत्ते तुझे कहा था न के यारों के आने से पहले सब कुछ सेट होना चाहिए ! देख जल्दी से पानी का जग टेबल पर रख दे ! " ये कहते-कहते मलखान सिंह ने चारपाई के नीचे रखी जूती में अपने पाँव घुसाए और गाड़ियों की तरफ भाग लिया। खेतों के बीचों बीच धूल उड़ाती गाड़ियां जैसे ही उसके नज़दीक आकर रुकीं मलखान सिंह ने एक मोटी गाली निकाल कर अपने यारों का स्वागत किया। सब ज़ोर का ठाहका लगाते हुए टेबल की और बढ़ गए।
 इससे पहले के शेर सिंह ,जगतार सिंह  ,समर सिंह , किशन सिंह और दलबीर सिंह मलखान के गले मिलते उन्होंने टेबल पर रखे ग्लासों को अपने हाथ में उठाया और चियर्स कहते हुए सब से पहले अपने हलक को तर किया। यही इन के मिलने का स्टाइल भी था। जिस के अड्डे पर मिलते मेजबान पहले से ही ग्लास तैयार रखता।
जब तक नरेश खेत में से मूली तोड़ कर लाता ,सभी के अंदर दो दो पेग जा चुके थे। एक दूसरे से घर परिवार का हालचाल पूछने के बाद जब बच्चों की बातें होने लगी तो मलखान ने सभी के गिलास में एक -एक पेग और डाल दिया। एक ही सांस में पीने के बाद सभी को खाली गिलास दिखाते हुए बोला , "आह !अब थोड़ा सिर घूमा है !" बोतल ख़त्म हो हो चुकी थी। नरेश खाली बोतल उठा कर ले गया और भरी हुई टेबल पर रख गया।
इसी बीच कुकर की सीटी बज गई। मलखान ने नरेश को कुकर टेबल पर रखने को कहा। कुकर में से गैस निकालते हुए मलखान बोला ,"आज ऐसा माल बनाया है के सभी उँगलियाँ चाटते रह जाओगे।" शेर सिंह की तरफ जैसे ही चिकेन की प्लेट आई तो वो मलखान की तारीफ़ करते हुए बोला ,"खुशबू ही इतनी लाजवाब है तो माल तो बढ़िया होगा ही !" शेर सिंह ने माल शब्द पर ज़ोर देकर अपनी बात को कुछ इस तरह कहा के सभी ज़ोर ज़ोर से हंसने लगे। इस बीच दूसरी बोतल का तला भी दिखाई देने लगा था। नरेश ने एक बोतल और लाकर रख दी। दारू पीते पीते शेर सिंह को पता नहीं क्या सूझा उस ने दही की फरमाइश कर डाली। दही की फरमाइश सुनते ही नरेश खेत के बीचों बीच बनी डोल पर भागता  नज़र आया। जाते जाते वो बोल गया ,"बस दहीं लेकर यूं आया चौधरी।
जब तक नरेश वापिस लौटता सभी टुन हो चुके थे। महफ़िल का रंग जमने लगा था।सभी के चेहरे सुलगे हुए कोयले की तरह लाल हो चुके थे। घर परिवार की बातों से अब वो बाहर निकल आए थे। सभी बातों बातों में कच्चे पर उतर आए और लगे अपने अपने पोतड़े उधेड़ने। सभी अपने अपने किस्से कहानियां सुनाने लगे। उन सब को अपनी मर्दानगी पर गर्व था। परन्तु किस्से और कहानियां साफ बयां कर रहे थे के मर्द जात अपना लंगोट जितना भी कस कर रखे वो कभी न कभी फिसल ही जाता है। मलखान सिंह की ज़बान और कदम दोनों डगमगाने लगे थे। अँधेरा हो चुका था। सभी दोस्तों ने विदाई ली। वो सभी भूल गए के नरेश गांव में दही लेने गया है।
जब तक नरेश दही लेकर वापिस लौटता सभी अपनी रवानगी डाल चुके थे। नरेश टुबवेल पर पहुँचते ही हांफते  हांफ़ते बोला ," क्या बात सारे जा लिए ,चौधरी ? राहदारी वाला पी के गए या नहीं ?" असल में गांव में एक प्रथा है के आप बेशक जितनी मर्ज़ी दारू पिएं ,जाते जाते टैक्स के तौर पर या यूं कहें मेज़बान अपने दोस्तों को जाते जाते एक ड्रिंक ज़रूर पिलाता है। । यही ड्रिंक राहदारी वाला पेग से मशहूर भी है। नरेश के इन दोनों प्रश्नों में अपनापन ज़्यादा झलक रहा था।
नरेश की बात को सुन कर मलखान ने दो ग्लासों में दारू की बोतल उलटी कर दी। मोटे मोटे दो पेग बनाये और एक गिलास नरेश को थमा दिया।  इससे पहले के नरेश संभलता या कुछ बोलता मलखान चियर्स करते हुए बोला ,"तो भी क्या बात है नरेश ! आज की राहदारी वाला हम तेरे साथ पी लेते है। " नरेश ने इस से पहले कभी नहीं पी थी। लेकिन चौधरियों को शराब पिलाने का काम वो बचपन से करता आ रहा था। ओंठों के साथ गिलास लगाते ही उसने सारी की सारी एक बार में अपने अंदर उढ़ेल दी।
मलखान अपनी थरथराती आवाज़ में नरेश को सब कुछ समेटने के लिए कह कर  टुबवेल पर बने कमरे में सोने के लिए चल दिया। नरेश सफाई में जुट गया। थोड़ी देर बाद ही नरेश की हालत पतली होने लगी। नरेश तो लगा करने उल्टियाँ। उससे अब खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था।  लड़खड़ा कर टुबवेल के पास ही गिर गया। रात काफी हो चुकी थी। नरेश के घर वाले सभी शादी में काम करवाने गए हुए थे। सुंदरी घर पर अकेली थी। वो नरेश को लेकर परेशान हो गई। नरेश की यह आदत थी के उसे जब भी देरी का कोई अंदेशा होता वो भाग कर घर बतला आता। आज तो खुद नरेश बेसुध था।
रात के दस बज चुके थे। सुंदरी के मन में न जाने क्या आया वो अपने नरेश को देखने खेतो की ओर चल दी। वो कब टुबवेल पर पहुँची उसे खुद भी पता नहीं चला। टुबवेल पर लटके जीरो वॉट के बल्ब से आती मंद मंद रोशनी में कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। बिखरा हुआ सामान किसी उजड़े  हुए चमन की तरह लग रहा था। सुंदरी की नज़र सहसा नरेश पर पड़ी। सुंदरी के तो जैसे होश ही उड़ गए। उसने नरेश को इधर उधर हिलाया लेकिन वो तो धरती पर चित पड़ा था। उसे समझते देर न लगी के नरेश ने शराब पी है। उसका जैसे विश्वास ही टूट गया। उसके मन में उलटे पुलटे विचार आने लगे। उसको एकदम से मलखान का ख्याल आया। वो भगवान से सब ठीक होने की कामना करने लगी।
आगे  ............................ (भाग -4 )

गर्म ख़ून ( भाग- 2 )


                                                                      गर्म ख़ून  ( भाग- 2 )
 बेशक गांव सुंदरी का दीवाना था। लेकिन किसी की क्या मज़ाल के उस पर हाथ डालता। जब कभी भी किसी ने कोशिश की ,सुंदरी बिना बोले इस तरह देखती मानो सामने शेरनी खड़ी हो। अपने आप को कभी ढीला नहीं होने दिया था सुंदरी ने।  मलखान का अपना रुतबा था गांव में। कई हथकंडे अपनाए मलखान ने पर सुंदरी के आगे उसकी दाल न गली।
शराब और शबाब मलखान के खास शौंक थे। जब भी स्वाद बदलने का मन होता ,खेतों में टुबवेल पर अपना अड्डा जमा लेता। खेतों में घास काटने या किसी और काम से आने वाली पिछड़ों की कई औरतों का शिकार कर चुका था मलखान । कोई पैसे के लालच तो कोई लोकलाज के डर से अपना मुहँ न खोलती। कोई बोलने की हिम्मत जुटाती तो मलखान डरा धमका कर उसका मुहँ बंद कर देता । पीड़ित औरतें बकरियों की तरह  थोड़े समय के लिए मिमियाती। लेकिन अगड़ों के ज़ुल्म , लोक लाज , गरीबी और अगड़ों के प्रभाव और दबाव के   कारण कोई अपना मुहँ न खोलती। मजबूरी के कारण वो इसे ही अपना भाग्य समझ लेती। लेकिन सुंदरी दूसरी औरतों की तरह नहीं थी। स्वाभिमान जैसे उसमें कूट कूट कर भरा हुआ था।
 सुंदरी -नरेश की शादी को दो साल बीत चुके थे। लेकिन अभी तक किसी तरह की कोई खबर नहीं थी। गांव में घुसफुस शुरू हो चुकी थी। सब के अपने अपने विचार थे। कोई नरेश को कमज़ोर कहता तो कोई सुंदरी को चैक करवाने की सलाह देता। कभी कभी मलखान भी मौका देख कर सुंदरी को दो अर्थी बात बोल देता। लेकिन सुंदरी पर इन बातों का कोई असर न होता।
एक दिन तो मलखान ने हद ही कर दी। घर के सभी लोग गांव में ही शादी पर गए हुए थे। मलखान घर पर अकेला था। सुंदरी पशुओं को चारा देने के बाद घर की ओर जाने लगी तो मलखान ने सुंदरी का हाथ पकड़ लिया। सुंदरी को अपनी ओर  खींचते हुए मलखान बोला ,"हमारे कुंएं का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। " एक बार तो सुंदरी नागिन की तरह फुँकारी लेकिन मलखान की मज़बूत पकड़ के आगे वो ढीली पड़ गई। अक्सर चुप रहने वाला  मलखान ये सब कुछ कैसे बोल गया उसे भी समझ नहीं आ रहा था। न जाने सुंदरी के अंदर एक अदम्य शक्ति कहाँ से आई। अपनी कलाई छुड़वाते हुए उसने मलखान को ज़ोर से धक्का दिया। मलखान संभल नहीं पाया और नीचे जा गिरा। मलखान कहाँ हार मानने वाला था। उसने सुंदरी को फिर पकड़ लिया। इस बार उसने सुंदरी को ज़ोर से  अपनी छाती से लगा लिया। सुंदरी पर अपनी  पकड़ मज़बूत बनाते हुए मलखान ने अपना पहले वाला डायलॉग दोहराया ,"हमारे कुंए का पानी पिवेगी तो अमर हो जावेगी। " इसी के साथ अपनी पकड़ ढीली करते हुए बोला ,"जा तुझे आज़ाद किया ,लेकिन इश्क़ हो गया है तुझ से सुंदरी । "  सुंदरी किसी छिपकली के जबड़े से छूटी तितली की तरह छटपटाती हुई बाहर की ओर भागी। मलखान बिल्कुल फ़िल्मी हीरो की तरह सुंदरी को दूर तक जाते हुए देखता रहा। आज पहली बार किसी औरत को पकड़ने के  बाद मलखान का दिल धड़क रहा था।
सुंदरी को भी पहली बार लगा के वो कमज़ोर पड़ गई है। काम की थकावट से उसने कभी हार नहीं मानी थी। लेकिन लोगों के तानों से वो तंग आ चुकी थी। मलखान की हवेली से सीधे अपनी कोठरी में जाकर अपनी टूटी हुई चारपाई पर एक लाश की तरह धम से गिर गई। हर हाल में खुश रहने वाली सुंदरी फफक फफक कर रोने लगी। टूटी फूटी और घर में  चुल्हे से काली हुई छत की और देख कर वो अपने भाग्य को कोसने लगी। भाग्य और भगवान दो अस्त्र ही होते हैं गरीब के ,जिसके आगे वो अपने सारे शस्त्र डाल देता है। रोते रोते उसका संपर्क सीधे नीली छतरी वाले से हो गया। गरीब का तो भगवान ही सहारा होता है। सुंदरी पागलों  की तरह ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हुए भगवान से पूछने लगी ,"क्या दोष है मेरा ? कौन सा पाप किया है मैंने ? क्यों मुझे बच्चा नहीं होता ? "
आगे ………………(भाग -3)

गर्म ख़ून ( भाग -1 )


   
                                                                      गर्म ख़ून
 गांव में पंचायत जम चुकी थी। मलखान सिंह हुक्के की गुड़ -गुड़ के साथ इधर उधर नज़र दौड़ा रहा था। शेर सिंह भी बार बार अपनी मूंछों को ताव दे रहा था। जगतार सिंह सभी को राम राम कहते हुए मलखान सिंह के बगल में बैठ गया। मलखान सिंह ने हुक्का जगतार की और बढ़ाते हुए कहा ,"ये तो हद ही हो गई। एक कमीन का लौंडा नहीं संभल रहा पूरे गांव के छोकरों से।
 इस से पहले के जगतार कुछ बोलता पंचायत में हलचल शुरू हो गई। हलचल हो भी क्यों न,सुंदरी जो आ रही थी। बला की ख़ूबसूरत थी सुंदरी। एक बार जहां से निकल जाती -क्या बूढ़ा क्या जवान साँसों पर नियंत्रण न रहता। एक बार जो उसे देख लेता ये ज़रूर कहता ,"भगवान ने बहुत ही फुर्सत में बनाया है सुंदरी को। "
अपने पचास बसंत पूरे कर चुकी थी सुंदरी लेकिन आज भी किसी "हूर" से कम नहीं थी। सुंदरता तो जैसे उसकी दासी हो। चौपाल पर आज भी गांव के मनचले वहां से निकलने की इंतज़ार में घंटों उस की बाट जोहते रहते।
१८ साल की रही होगी सुंदरी जब नरेश उसे अपने गांव टोबा ब्याह कर लाया था। कहते हैं के ख़ुदा जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। सुंदरी पर भी ख़ुदा कुछ ज़्यादा ही मेहरबान था। गठा हुआ शरीर ,उभारदार वक्ष,बल खाती कमर ,कटार जैसी आँखें। उसकी चाल बिल्कुल ऐसी थी मानो कोई नागिन दुनिया से बेफिक्र किसी बीन की धुन पर नृत्य कर रही हो। कईं बार तो मनचले उसके पीछे -पीछे उसकी नक़ल करते हुए दूर तक उसके साथ साथ चलते। कईं कच्चे छोकरों की तो सुंदरी की चाल से ही बीन बज जाती।
गोलमटोल नथुने,जब वो सांस लेती तो  उसके नथूने भटी में गर्म किए जाने वाले मक्की के दानों की तरह फूल जाते। जब कभी नसवार का तड़का लगा लेती तो उसकी खुशबू दूर तक फ़ैल जाती। माथे के बीचों बीच उसकी बिंदिया ऐसे लगती मानो आसमान में चाँद चमक रहा हो।
गांव के दूसरे छोकरों की तरह ही नरेश की शादी पर भी गांव के अगड़ों के डर से कोई शोर शराबा नहीं हुआ था। नरेश की ये दिली इच्छा थी के वो भी घोड़ी चढ़े ,बैंड बाजा हो और उसके यार दोस्त उसकी घोड़ी के सामने नाचते गाते चलें। नरेश के पिता सुखिया ने घर के सभी लोगों को पहले ही आगाह कर दिया था के सभी अगडों के हुकुम और नियमों की पालना करेंगे। नरेश न घोड़ी चढ़ा न ही  बैंड बाजा हुआ और शादी बिना किसी बिघ्न के सम्पन्न हो गई ।
नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत सुखिया पर बिल्कुल सटीक बैठती थी। सुखिया तो बस नाम का सुखिया था । उसके पुरखे कईं सालों से गांव में ज़मीदारों के खेतों की बिजाई ,जुताई और कटाई का काम करते आ रहे थे। पशुओं की नहलाई ,धुलाई ,चारा डालने से लेकर गोबर उठाने तक का काम नरेश के परिवार को करना पड़ता था। क्या बच्चे ,महिलाएं सभी गावं के अगड़ों के घर और खेतों में किसी न किसी काम में व्यस्त रहते। यही नहीं मैला ढोहने का काम भी नरेश का परिवार ही  करता।
 शादी के एक महीने बाद सुंदरी काम के लिए घर से बाहर निकली। उस को मलखान के घर की साफ़ सफाई का जिम्मा सौंपा गया। घर क्या पूरी हवेली थी। सुंदरी बरामदे में झाड़ू लगा रही थी। मलखान अपने कमरे में से निकला और उसकी नज़र सुंदरी पर पड़ी। सुंदरी को देखते ही वो बुत बन गया। उसकी सांसें थम सी गई। मलखान भी गोरा चिट्टा  गबरू जवान था। सुंदरी की नज़र जब मलखान पर पड़ी तो एक बारगी वो भी सकपका गई। उसके हाथ से झाड़ू छिटक कर नीचे गिर गया। बिल्कुल हिंदी फिल्मों की तरह झाड़ू गिरते ही दोनों झाड़ू उठाने के लिए नीचे झुके।  दोनों का हाथ से हाथ टकराया और सुंदरी संकुचाती-शर्माती झाड़ू वहीँ छोड़ कर बाहर  की ओर भाग गई।
 मलखान सिंह तो उसका खास दीवाना हो गया था। खेतों में जाने की बजाए वो हुक्के में आग सुलगा कर सुबह ही अपनी देहरी पर बैठ जाता। आँगन बुहारते हुए सुंदरी को वो ऐसे निहारता मानो वो उसे सारा का सारा पी जाना चाहता हो। इस चक्कर में वो अपना हुक्का ही पीना भूल जाता। सुंदरी कुछ पल के लिए इधर उधर होती तो वो हुक्के को अपनी और खींचता। लेकिन तब तक हुक्के की आग मंद पड़ चुकी होती और मलखान बुझे हुक्के में आग सुलगाने के लिए अपनी धोती को ठीक करते हुए चुल्हे की ओर हो लेता। जब तक मन और हुक्के की आग बुझ न जाती वो उसे निहारता रहता। ऐसा नहीं के सुंदरी कुछ समझती नहीं थी। लेकिन वो कभी भी मलखान को घास न डालती। सुंदरी उसकी परवाह किए बिना अपने काम में लगी रहती।
आगे ............. (भाग 2 )

Friday, 28 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-25

                                                           "HALF CENTURY"
दोस्तों नमस्कार।
 पिछले दिनों घर में रंगाई पुताई का काम चला तो पुरानी डायरियां ,चिठियां और पर्चियां हाथ लग गई।  खोल कर पढ़ना शुरू किया तो अवचेतन में दबी हुई बहुत सारी यादें ज़िंदा हो उठी। यात्रा संस्मरण ,खेलकूद , राजनीति के विविध समाचार , देश विदेश में होने वाली हलचल , कभी घर से भाग कर फिल्म देखने का ज़िक्र , कहीं प्रेमिका के साथ मिलने की बातें , किसी जगह उलटे शब्दों में लिखी किस्से कहानियाँ , टूटी फूटी कवितायेँ, कहीं सिस्टम के विरुद्ध आवाज़ ,नाटक का ज़िक्र , २० साल पुरानी सिनेमा की टिकट , हॉस्टल से भाग कर आवारागर्दी  , घर बताये बिना दोस्तों के साथ कहीं दूर निकल जाना , नौकरी के दौरान अलग अलग लोगों के साथ मिलने वाले अनुभव, और न जाने क्या क्या । सब का ज़िक्र करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है।
 
आज मैं ५० वर्ष का हो गया हूँ। सच कहूँ तो जीवन के ये ५० वर्ष भरपूर जिए। आप हैरान होंगे लेकिन ये सच है के इस आधी सदी के जीवन में छः पीढ़ियों के जीवन को करीब से देख चुका हूँ। जितना कुछ साफ़ या धुँधला याद आता है कहीं कोई गिला शिकवा नहीं है इस ज़िंदगी से। परिवार ,दोस्त ,सहयोगियों और सम्बन्धियों का इतना  सहयोग और प्यार मिलता रहा। समय कब फुर्र कर के उड़ गया पता ही नहीं चला। कभी एहसास ही नहीं हुआ के बूढ़ा हो गया हूँ। आज भी अपने आप को बच्चों की तरह बर्ताव करते हुए पाता हूँ। ये करम जले दोस्त कभी कभी याद दिला देते हैं के दाढ़ी सफ़ेद हो गई है। लेकिन मन को संतुष्टि है के ये बाल धूप में सफ़ेद नहीं हुए हैं।
कल नाई के पास दाढ़ी बनवाने चला गया। नया लड़का था।  दाढ़ी बनाते हुए बोला ,"आप काले बाल नहीं    करते ? "  "क्या हो जाएगा बाल काले करने से ? " , मैंने भी उस से पूछ लिया। वो बोला ,"अच्छे लगेंगे।" "अब अच्छे नहीं लग रहे क्या ?",मैंने फिर उससे पूछा। इस बार वो चुप था। शायद कुछ सोच रहा था। दाढ़ी बनवाते हुए मैंने एक आँख  खोल कर उसकी ओर देखा तो वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था। " बताया नहीं तूने की क्या हो जाएगा बाल काले करने से ।" मैंने दोबारा पूछा। अब की बार वो बोला ,"Personality निकल आएगी आप की , smart लगेंगे आप ! " मैंने फिर धीरे से फिर पूछा ,"क्या अब smart  नहीं लग रहा मैं ?" इस बार उसने कोई जवाब नहीं दिया और वो फिर मंद मंद मुस्कुराने लगा। 
 बेशक दुःख सुख जीवन का हिस्सा हैं लेकिन माया नगरी के जादूगर ने जीवन में कभी कोई कमी नहीं आने दी। जो चाहा वो यदि मिल गया तो ठीक और यदि नहीं भी मिला तो भी ठीक। मुझे याद नहीं के कभी ज़्यादा हासिल करने का लालच किया हो। जो मिल गया उसे मुक़दर समझ लिया।
ऐसा नहीं के जीवन में सब कुछ ठीक ही चलता रहा। लेकिन जब भी विकट दौर आया ,किसी अदृश्य शक्ति ने मेरा हाथ पकड़ कर पार लगा दिया। मैं जैसा भी हूँ खुश हूँ और अपने जीवन में सभी को खुश रखने का प्रयास भी किया है। फिर भी यदि कभी जाने अनजाने मेरी वजह से किसी को दुःख पहुंचा हो या कोई आहत हुआ हो तो मैं उसके लिया क्षमा प्रार्थी हूँ।
आधी सदी जी चुका हूँ। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिस ने भी मेरे इस जीवन में साथ दिया है , उन सब का मैं अपने दिल की गहराइयों से धन्यवाद करता हूँ।सभी दोस्तों को जनम दिवस की  शुभ कामनाओं के लिए धन्यवाद। हाफ सेंचुरी के साथ -साथ आज गोल्डन जुबली भी हो गई। इस का मतलब फिल्म हिट हो गई ।
 ये जीवन इसी तरह उमंग , उत्साह और प्रेम से भरा रहे और किसी के काम आ सके।इस मंगल कामना के साथ आपसे विदा लेता हूँ।  
 जय हो !

Wednesday, 19 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-24

                                               A LETTER...EK CHITHEE PART-22 से आगे  ………………………
                                                                    अपहरण (भाग -2 )
नाटक "अपहरण " को निर्देशित करना मेरे लिए एक बढ़िया अनुभव रहा। पिछले साल भी इसी कॉलेज (K V A D A V, KARNAL) में नाटक करवाया था। बच्चों ने अच्छा प्रदर्शन किया सो इस बार भी नाटक करवाने का जिम्मा मुझे ही सौंप दिया गया।
अगस्त महीने की आखिरी तारीख को जैसे ही भंडारी मैडम का फ़ोन आया मुझे समझते देर ना लगी कि युवा उत्सव नज़दीक आ गया  है। भंडारी मैडम कॉलेज में सांस्कृतिक विभाग को देखती हैं। नाटक करवाने का न्यौता स्वीकार करते हुए मैं अगले दिन कॉलेज पहुँच गया।
विश्व विद्यालयों द्वारा हर साल युवाओं में छिपी प्रतिभा को निखारने और संवारने के उदेश्य से युवा उत्सव के माध्यम से एक मंच प्रदान किया जाता है। जहाँ सभी महाविद्यालयों के छात्र -छात्राएं विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों की प्रतियोगिताओं में बढ़ चढ़  कर भाग लेते हैं। एक अच्छा ख़ासा फण्ड विश्व विद्यालयों द्वारा सभी महाविद्यालयों को दिया जाता है।
ये बात अलग है के ट्रॉफी हासिल करने के चक्कर में host college ऐसा घालमेल करते हैं के कला ,प्रतिभा और संस्कृति को नज़र अंदाज़ कर देते हैं। यूथ फेस्टिवल में इस तरह के घालमेल के कारण ही प्रतिभावान कलाकार पिछड़ जाते हैं। वो इस मंच का सदुपयोग नहीं कर पाते।
खैर इस बार मुझे नाटक की विषय वस्तु को explain करने को कहा गया। मैंने दो कहानियाँ सुनाई -अपहरण और तेज़ाब। " दो कहानियां सुनाने के बाद यह तय हुआ के अपहरण नाटक की तैयारी की जाए। दूसरी कहानी "तेज़ाब " को इस लिए मना कर दिया गया चूँकि ये महिलाओं के मुद्दे की कहानी थी और महिलाओं के मुद्दे से जुडी कहानी पर पिछले साल नाटक खेला जा चुका था। मेरे लाख आग्रह पर के लड़कियां अपने साथ हो रहे शोषण या अत्याचार के विषय को बारीकी से समझ पाएंगी यह निर्णय लिया गया की तेज़ाब नहीं अपितु अपहरण नाटक करवाया जाए।
 लड़कियों पर लड़कों द्वारा तेज़ाब फेंके जाने और उसके बाद उसके जीवन की कहानी है-" तेज़ाब "।
 "अपहरण "- एक गरीब परिवार में जन्मी नन्हीं लड़की "कंचन "की कहानी है जो दूसरे बच्चों की तरह टी /वी बहुत देखती है।माँ से एक अदद साइकिल दिलवाने की ज़िद करती है। गरीबी का वास्ता देकर माँ कुछ दिन इंतज़ार करने को कहती है।बस्ती की ही दो लड़कियों सलोनी और सुहानी के पास साइकिल है। वो दोनों कंचन  को साथ नहीं खेलने देती और ऊपर से उसको चिढ़ाती भी हैं। बस्ती में गणेश उत्सव की तैयारियां चल रही हैं। गणेश स्थापित हो चुके हैं। कंचन घर में उदास बैठी टी /वी देख  रही है। चॅनेल्स बदलते हुए एक सीरियल पर उसकी आँखें जम जाती हैं। उसमे कुछ युवा किसी साहूकार के बच्चे का अपहरण कर लेते हैं और फिरौती की मांग करते हैं। कंचन के मन में एक आईडिया आता है और वो गणेशा का अपहरण कर लेती है। कंचन गणेश के पिता शिव शंकर से गणेशा के बदले साइकिल की मांग करती है।शंकर अपने बच्चे को छुड़वाने के लिए पार्वती के साथ प्रकट होते हैं। कंचन से गणेशा को छोड़ने की अपील करते हैं। लेकिन बाल-मन कंचन साइकिल की ज़िद पर अड़ी रहती है। भोले शंकर तब कंचन के माध्यम से सन्देश देते हैं के बाज़ार आम आदमी के घर में घुस गया है। इसीलिए लोगों की इच्छाएं बढ़ती जा रही हैं। यही कारण है के संसार में अराजकता,अशांति,लूट,भय और अपहरण जैसी वारदातें बढ़ी हैं। बच्ची को भगवन की बात समझ आती है तो वो गणेशा को दोबारा से स्थापित कर देती है।
नाटक करते हुए अजब संयोग हुआ। एक लघु नाटिका (skit) का जिम्मा भी मुझे सौंप दिया गया। तेज़ाब की कहानी को लघु नाटिका के तौर पर प्रस्तुत किया गया। इस के लिए भी अच्छी टीम मिल गई। हालाँकि मुख्य पात्र को अपहरण की काजल (कंचन )ने ही अभिनीत किया। तेज़ाब में अनुराधा नाम की लड़की एक लड़के की बात नहीं मानती और वो उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक देता है। चेहरा जलने के बाद अनुराधा के जीवन की व्यथा और उसकी जीवन के साथ लड़ाई को ये कहानी बखूबी चित्रित करती है। नाटक और नाटिका में सभी लड़कियों ने बखूबी अभिनय किया।
अपहरण और तेज़ाब दोनों नाटक मेरे लेखक मित्र मोहिन्दर प्रताप सिंह ने लिखे हैं। मोहिन्दर पिछले कई बरसों से लेखक ,प्रोडूसर और निर्देशक के रूप में मुंबई में काम कर रहा है। नाटक के दौरान मोहिन्दर ने रिहर्सल भी देखी। मुझे  इस बात की ख़ुशी है के मोहिन्दर अपहरण और तेज़ाब की परफॉरमेंस से संतुष्ट था।
कॉलेज प्रबंधन ,प्रिंसिपल ,मिसेज भंडारी , मिसेज कादयान ,मिसेज ठाकुर ,अमनदीप ,अम्बिका और कॉलेज के कर्मचारियों के सहयोग से ही अपहरण और तेज़ाब की सफल प्रस्तुतियाँ हो सकी।
बेशक मेरे दोनों नाटकों की सभी actresses की प्रतिबद्धत्ता ,सीखने की ललक ,सहयोग और सादगी को मैं कतई नहीं भूल सकता। नाटक में सहयोग के लिए सभी को मेरा सलाम !

A LETTER...EK CHITHEE PART-23

                                                               मौनी बाबा
पिछले एक लम्बे अरसे से पढ़ना लिखना जैसे छूट सा गया था। वो तो भला हो इस नईं टेक्नोलॉजी का जिस के ज़रिए बहुत कुछ देखने ,पढ़ने को मिल रहा है।
 ज़माना बहुत आगे निकल गया है ! आप बहुत पिछड़ गए हैं ! पता नहीं कहाँ जा कर रुकेगी ये दुनिया ! आप ने खुद को इस दौड़ में कभी शामिल ही नहीं किया इसलिए ऐसा तो होना ही था !
एक लम्बे अरसे से कुछ ऐसा ही दोहराया जा रहा था।
आज फेस बुक को खोलने के बाद कुछ नए लोगों की साइट्स में घुसने की कोशिश की तो पता चला के लोग तो दिल खोल कर लिखते हैं।  बेबाकी के साथ।
सादगी का तड़का कुछ इस तरह से लगा होता है मानो वो आप के अंदर की ही बात कह रहे हों।
 वो भी ऐसी बात जिसे आप बरसों से ढोह रहे होते हैं। किसी से उस का ज़िक्र भी नहीं कर पाते।
कोई ऐसी बात जिसे आप एक ऐसे संदूक में बंद कर देते हैं जिसे शायद सदियों खोला ही नहीं जाता।
 ऐसी बात जिसे आप ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर सारी  दुनिया को बतला देना चाहते हैं लेकिन ताउम्र मौनी बाबा बने रहते हैं।
आप ये सोच रहे होते हैं के समय आने पर अपनी पोटली को खोलेंगे। लेकिन आप को पता भी नहीं चलता के आप की पोटली कहीं दूर खुल चुकी होती है।