Thursday, 4 December 2014

गर्म ख़ून ( भाग -1 )


   
                                                                      गर्म ख़ून
 गांव में पंचायत जम चुकी थी। मलखान सिंह हुक्के की गुड़ -गुड़ के साथ इधर उधर नज़र दौड़ा रहा था। शेर सिंह भी बार बार अपनी मूंछों को ताव दे रहा था। जगतार सिंह सभी को राम राम कहते हुए मलखान सिंह के बगल में बैठ गया। मलखान सिंह ने हुक्का जगतार की और बढ़ाते हुए कहा ,"ये तो हद ही हो गई। एक कमीन का लौंडा नहीं संभल रहा पूरे गांव के छोकरों से।
 इस से पहले के जगतार कुछ बोलता पंचायत में हलचल शुरू हो गई। हलचल हो भी क्यों न,सुंदरी जो आ रही थी। बला की ख़ूबसूरत थी सुंदरी। एक बार जहां से निकल जाती -क्या बूढ़ा क्या जवान साँसों पर नियंत्रण न रहता। एक बार जो उसे देख लेता ये ज़रूर कहता ,"भगवान ने बहुत ही फुर्सत में बनाया है सुंदरी को। "
अपने पचास बसंत पूरे कर चुकी थी सुंदरी लेकिन आज भी किसी "हूर" से कम नहीं थी। सुंदरता तो जैसे उसकी दासी हो। चौपाल पर आज भी गांव के मनचले वहां से निकलने की इंतज़ार में घंटों उस की बाट जोहते रहते।
१८ साल की रही होगी सुंदरी जब नरेश उसे अपने गांव टोबा ब्याह कर लाया था। कहते हैं के ख़ुदा जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। सुंदरी पर भी ख़ुदा कुछ ज़्यादा ही मेहरबान था। गठा हुआ शरीर ,उभारदार वक्ष,बल खाती कमर ,कटार जैसी आँखें। उसकी चाल बिल्कुल ऐसी थी मानो कोई नागिन दुनिया से बेफिक्र किसी बीन की धुन पर नृत्य कर रही हो। कईं बार तो मनचले उसके पीछे -पीछे उसकी नक़ल करते हुए दूर तक उसके साथ साथ चलते। कईं कच्चे छोकरों की तो सुंदरी की चाल से ही बीन बज जाती।
गोलमटोल नथुने,जब वो सांस लेती तो  उसके नथूने भटी में गर्म किए जाने वाले मक्की के दानों की तरह फूल जाते। जब कभी नसवार का तड़का लगा लेती तो उसकी खुशबू दूर तक फ़ैल जाती। माथे के बीचों बीच उसकी बिंदिया ऐसे लगती मानो आसमान में चाँद चमक रहा हो।
गांव के दूसरे छोकरों की तरह ही नरेश की शादी पर भी गांव के अगड़ों के डर से कोई शोर शराबा नहीं हुआ था। नरेश की ये दिली इच्छा थी के वो भी घोड़ी चढ़े ,बैंड बाजा हो और उसके यार दोस्त उसकी घोड़ी के सामने नाचते गाते चलें। नरेश के पिता सुखिया ने घर के सभी लोगों को पहले ही आगाह कर दिया था के सभी अगडों के हुकुम और नियमों की पालना करेंगे। नरेश न घोड़ी चढ़ा न ही  बैंड बाजा हुआ और शादी बिना किसी बिघ्न के सम्पन्न हो गई ।
नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत सुखिया पर बिल्कुल सटीक बैठती थी। सुखिया तो बस नाम का सुखिया था । उसके पुरखे कईं सालों से गांव में ज़मीदारों के खेतों की बिजाई ,जुताई और कटाई का काम करते आ रहे थे। पशुओं की नहलाई ,धुलाई ,चारा डालने से लेकर गोबर उठाने तक का काम नरेश के परिवार को करना पड़ता था। क्या बच्चे ,महिलाएं सभी गावं के अगड़ों के घर और खेतों में किसी न किसी काम में व्यस्त रहते। यही नहीं मैला ढोहने का काम भी नरेश का परिवार ही  करता।
 शादी के एक महीने बाद सुंदरी काम के लिए घर से बाहर निकली। उस को मलखान के घर की साफ़ सफाई का जिम्मा सौंपा गया। घर क्या पूरी हवेली थी। सुंदरी बरामदे में झाड़ू लगा रही थी। मलखान अपने कमरे में से निकला और उसकी नज़र सुंदरी पर पड़ी। सुंदरी को देखते ही वो बुत बन गया। उसकी सांसें थम सी गई। मलखान भी गोरा चिट्टा  गबरू जवान था। सुंदरी की नज़र जब मलखान पर पड़ी तो एक बारगी वो भी सकपका गई। उसके हाथ से झाड़ू छिटक कर नीचे गिर गया। बिल्कुल हिंदी फिल्मों की तरह झाड़ू गिरते ही दोनों झाड़ू उठाने के लिए नीचे झुके।  दोनों का हाथ से हाथ टकराया और सुंदरी संकुचाती-शर्माती झाड़ू वहीँ छोड़ कर बाहर  की ओर भाग गई।
 मलखान सिंह तो उसका खास दीवाना हो गया था। खेतों में जाने की बजाए वो हुक्के में आग सुलगा कर सुबह ही अपनी देहरी पर बैठ जाता। आँगन बुहारते हुए सुंदरी को वो ऐसे निहारता मानो वो उसे सारा का सारा पी जाना चाहता हो। इस चक्कर में वो अपना हुक्का ही पीना भूल जाता। सुंदरी कुछ पल के लिए इधर उधर होती तो वो हुक्के को अपनी और खींचता। लेकिन तब तक हुक्के की आग मंद पड़ चुकी होती और मलखान बुझे हुक्के में आग सुलगाने के लिए अपनी धोती को ठीक करते हुए चुल्हे की ओर हो लेता। जब तक मन और हुक्के की आग बुझ न जाती वो उसे निहारता रहता। ऐसा नहीं के सुंदरी कुछ समझती नहीं थी। लेकिन वो कभी भी मलखान को घास न डालती। सुंदरी उसकी परवाह किए बिना अपने काम में लगी रहती।
आगे ............. (भाग 2 )

Friday, 28 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-25

                                                           "HALF CENTURY"
दोस्तों नमस्कार।
 पिछले दिनों घर में रंगाई पुताई का काम चला तो पुरानी डायरियां ,चिठियां और पर्चियां हाथ लग गई।  खोल कर पढ़ना शुरू किया तो अवचेतन में दबी हुई बहुत सारी यादें ज़िंदा हो उठी। यात्रा संस्मरण ,खेलकूद , राजनीति के विविध समाचार , देश विदेश में होने वाली हलचल , कभी घर से भाग कर फिल्म देखने का ज़िक्र , कहीं प्रेमिका के साथ मिलने की बातें , किसी जगह उलटे शब्दों में लिखी किस्से कहानियाँ , टूटी फूटी कवितायेँ, कहीं सिस्टम के विरुद्ध आवाज़ ,नाटक का ज़िक्र , २० साल पुरानी सिनेमा की टिकट , हॉस्टल से भाग कर आवारागर्दी  , घर बताये बिना दोस्तों के साथ कहीं दूर निकल जाना , नौकरी के दौरान अलग अलग लोगों के साथ मिलने वाले अनुभव, और न जाने क्या क्या । सब का ज़िक्र करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है।
 
आज मैं ५० वर्ष का हो गया हूँ। सच कहूँ तो जीवन के ये ५० वर्ष भरपूर जिए। आप हैरान होंगे लेकिन ये सच है के इस आधी सदी के जीवन में छः पीढ़ियों के जीवन को करीब से देख चुका हूँ। जितना कुछ साफ़ या धुँधला याद आता है कहीं कोई गिला शिकवा नहीं है इस ज़िंदगी से। परिवार ,दोस्त ,सहयोगियों और सम्बन्धियों का इतना  सहयोग और प्यार मिलता रहा। समय कब फुर्र कर के उड़ गया पता ही नहीं चला। कभी एहसास ही नहीं हुआ के बूढ़ा हो गया हूँ। आज भी अपने आप को बच्चों की तरह बर्ताव करते हुए पाता हूँ। ये करम जले दोस्त कभी कभी याद दिला देते हैं के दाढ़ी सफ़ेद हो गई है। लेकिन मन को संतुष्टि है के ये बाल धूप में सफ़ेद नहीं हुए हैं।
कल नाई के पास दाढ़ी बनवाने चला गया। नया लड़का था।  दाढ़ी बनाते हुए बोला ,"आप काले बाल नहीं    करते ? "  "क्या हो जाएगा बाल काले करने से ? " , मैंने भी उस से पूछ लिया। वो बोला ,"अच्छे लगेंगे।" "अब अच्छे नहीं लग रहे क्या ?",मैंने फिर उससे पूछा। इस बार वो चुप था। शायद कुछ सोच रहा था। दाढ़ी बनवाते हुए मैंने एक आँख  खोल कर उसकी ओर देखा तो वो मंद मंद मुस्कुरा रहा था। " बताया नहीं तूने की क्या हो जाएगा बाल काले करने से ।" मैंने दोबारा पूछा। अब की बार वो बोला ,"Personality निकल आएगी आप की , smart लगेंगे आप ! " मैंने फिर धीरे से फिर पूछा ,"क्या अब smart  नहीं लग रहा मैं ?" इस बार उसने कोई जवाब नहीं दिया और वो फिर मंद मंद मुस्कुराने लगा। 
 बेशक दुःख सुख जीवन का हिस्सा हैं लेकिन माया नगरी के जादूगर ने जीवन में कभी कोई कमी नहीं आने दी। जो चाहा वो यदि मिल गया तो ठीक और यदि नहीं भी मिला तो भी ठीक। मुझे याद नहीं के कभी ज़्यादा हासिल करने का लालच किया हो। जो मिल गया उसे मुक़दर समझ लिया।
ऐसा नहीं के जीवन में सब कुछ ठीक ही चलता रहा। लेकिन जब भी विकट दौर आया ,किसी अदृश्य शक्ति ने मेरा हाथ पकड़ कर पार लगा दिया। मैं जैसा भी हूँ खुश हूँ और अपने जीवन में सभी को खुश रखने का प्रयास भी किया है। फिर भी यदि कभी जाने अनजाने मेरी वजह से किसी को दुःख पहुंचा हो या कोई आहत हुआ हो तो मैं उसके लिया क्षमा प्रार्थी हूँ।
आधी सदी जी चुका हूँ। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जिस ने भी मेरे इस जीवन में साथ दिया है , उन सब का मैं अपने दिल की गहराइयों से धन्यवाद करता हूँ।सभी दोस्तों को जनम दिवस की  शुभ कामनाओं के लिए धन्यवाद। हाफ सेंचुरी के साथ -साथ आज गोल्डन जुबली भी हो गई। इस का मतलब फिल्म हिट हो गई ।
 ये जीवन इसी तरह उमंग , उत्साह और प्रेम से भरा रहे और किसी के काम आ सके।इस मंगल कामना के साथ आपसे विदा लेता हूँ।  
 जय हो !

Wednesday, 19 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-24

                                               A LETTER...EK CHITHEE PART-22 से आगे  ………………………
                                                                    अपहरण (भाग -2 )
नाटक "अपहरण " को निर्देशित करना मेरे लिए एक बढ़िया अनुभव रहा। पिछले साल भी इसी कॉलेज (K V A D A V, KARNAL) में नाटक करवाया था। बच्चों ने अच्छा प्रदर्शन किया सो इस बार भी नाटक करवाने का जिम्मा मुझे ही सौंप दिया गया।
अगस्त महीने की आखिरी तारीख को जैसे ही भंडारी मैडम का फ़ोन आया मुझे समझते देर ना लगी कि युवा उत्सव नज़दीक आ गया  है। भंडारी मैडम कॉलेज में सांस्कृतिक विभाग को देखती हैं। नाटक करवाने का न्यौता स्वीकार करते हुए मैं अगले दिन कॉलेज पहुँच गया।
विश्व विद्यालयों द्वारा हर साल युवाओं में छिपी प्रतिभा को निखारने और संवारने के उदेश्य से युवा उत्सव के माध्यम से एक मंच प्रदान किया जाता है। जहाँ सभी महाविद्यालयों के छात्र -छात्राएं विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों की प्रतियोगिताओं में बढ़ चढ़  कर भाग लेते हैं। एक अच्छा ख़ासा फण्ड विश्व विद्यालयों द्वारा सभी महाविद्यालयों को दिया जाता है।
ये बात अलग है के ट्रॉफी हासिल करने के चक्कर में host college ऐसा घालमेल करते हैं के कला ,प्रतिभा और संस्कृति को नज़र अंदाज़ कर देते हैं। यूथ फेस्टिवल में इस तरह के घालमेल के कारण ही प्रतिभावान कलाकार पिछड़ जाते हैं। वो इस मंच का सदुपयोग नहीं कर पाते।
खैर इस बार मुझे नाटक की विषय वस्तु को explain करने को कहा गया। मैंने दो कहानियाँ सुनाई -अपहरण और तेज़ाब। " दो कहानियां सुनाने के बाद यह तय हुआ के अपहरण नाटक की तैयारी की जाए। दूसरी कहानी "तेज़ाब " को इस लिए मना कर दिया गया चूँकि ये महिलाओं के मुद्दे की कहानी थी और महिलाओं के मुद्दे से जुडी कहानी पर पिछले साल नाटक खेला जा चुका था। मेरे लाख आग्रह पर के लड़कियां अपने साथ हो रहे शोषण या अत्याचार के विषय को बारीकी से समझ पाएंगी यह निर्णय लिया गया की तेज़ाब नहीं अपितु अपहरण नाटक करवाया जाए।
 लड़कियों पर लड़कों द्वारा तेज़ाब फेंके जाने और उसके बाद उसके जीवन की कहानी है-" तेज़ाब "।
 "अपहरण "- एक गरीब परिवार में जन्मी नन्हीं लड़की "कंचन "की कहानी है जो दूसरे बच्चों की तरह टी /वी बहुत देखती है।माँ से एक अदद साइकिल दिलवाने की ज़िद करती है। गरीबी का वास्ता देकर माँ कुछ दिन इंतज़ार करने को कहती है।बस्ती की ही दो लड़कियों सलोनी और सुहानी के पास साइकिल है। वो दोनों कंचन  को साथ नहीं खेलने देती और ऊपर से उसको चिढ़ाती भी हैं। बस्ती में गणेश उत्सव की तैयारियां चल रही हैं। गणेश स्थापित हो चुके हैं। कंचन घर में उदास बैठी टी /वी देख  रही है। चॅनेल्स बदलते हुए एक सीरियल पर उसकी आँखें जम जाती हैं। उसमे कुछ युवा किसी साहूकार के बच्चे का अपहरण कर लेते हैं और फिरौती की मांग करते हैं। कंचन के मन में एक आईडिया आता है और वो गणेशा का अपहरण कर लेती है। कंचन गणेश के पिता शिव शंकर से गणेशा के बदले साइकिल की मांग करती है।शंकर अपने बच्चे को छुड़वाने के लिए पार्वती के साथ प्रकट होते हैं। कंचन से गणेशा को छोड़ने की अपील करते हैं। लेकिन बाल-मन कंचन साइकिल की ज़िद पर अड़ी रहती है। भोले शंकर तब कंचन के माध्यम से सन्देश देते हैं के बाज़ार आम आदमी के घर में घुस गया है। इसीलिए लोगों की इच्छाएं बढ़ती जा रही हैं। यही कारण है के संसार में अराजकता,अशांति,लूट,भय और अपहरण जैसी वारदातें बढ़ी हैं। बच्ची को भगवन की बात समझ आती है तो वो गणेशा को दोबारा से स्थापित कर देती है।
नाटक करते हुए अजब संयोग हुआ। एक लघु नाटिका (skit) का जिम्मा भी मुझे सौंप दिया गया। तेज़ाब की कहानी को लघु नाटिका के तौर पर प्रस्तुत किया गया। इस के लिए भी अच्छी टीम मिल गई। हालाँकि मुख्य पात्र को अपहरण की काजल (कंचन )ने ही अभिनीत किया। तेज़ाब में अनुराधा नाम की लड़की एक लड़के की बात नहीं मानती और वो उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक देता है। चेहरा जलने के बाद अनुराधा के जीवन की व्यथा और उसकी जीवन के साथ लड़ाई को ये कहानी बखूबी चित्रित करती है। नाटक और नाटिका में सभी लड़कियों ने बखूबी अभिनय किया।
अपहरण और तेज़ाब दोनों नाटक मेरे लेखक मित्र मोहिन्दर प्रताप सिंह ने लिखे हैं। मोहिन्दर पिछले कई बरसों से लेखक ,प्रोडूसर और निर्देशक के रूप में मुंबई में काम कर रहा है। नाटक के दौरान मोहिन्दर ने रिहर्सल भी देखी। मुझे  इस बात की ख़ुशी है के मोहिन्दर अपहरण और तेज़ाब की परफॉरमेंस से संतुष्ट था।
कॉलेज प्रबंधन ,प्रिंसिपल ,मिसेज भंडारी , मिसेज कादयान ,मिसेज ठाकुर ,अमनदीप ,अम्बिका और कॉलेज के कर्मचारियों के सहयोग से ही अपहरण और तेज़ाब की सफल प्रस्तुतियाँ हो सकी।
बेशक मेरे दोनों नाटकों की सभी actresses की प्रतिबद्धत्ता ,सीखने की ललक ,सहयोग और सादगी को मैं कतई नहीं भूल सकता। नाटक में सहयोग के लिए सभी को मेरा सलाम !

A LETTER...EK CHITHEE PART-23

                                                               मौनी बाबा
पिछले एक लम्बे अरसे से पढ़ना लिखना जैसे छूट सा गया था। वो तो भला हो इस नईं टेक्नोलॉजी का जिस के ज़रिए बहुत कुछ देखने ,पढ़ने को मिल रहा है।
 ज़माना बहुत आगे निकल गया है ! आप बहुत पिछड़ गए हैं ! पता नहीं कहाँ जा कर रुकेगी ये दुनिया ! आप ने खुद को इस दौड़ में कभी शामिल ही नहीं किया इसलिए ऐसा तो होना ही था !
एक लम्बे अरसे से कुछ ऐसा ही दोहराया जा रहा था।
आज फेस बुक को खोलने के बाद कुछ नए लोगों की साइट्स में घुसने की कोशिश की तो पता चला के लोग तो दिल खोल कर लिखते हैं।  बेबाकी के साथ।
सादगी का तड़का कुछ इस तरह से लगा होता है मानो वो आप के अंदर की ही बात कह रहे हों।
 वो भी ऐसी बात जिसे आप बरसों से ढोह रहे होते हैं। किसी से उस का ज़िक्र भी नहीं कर पाते।
कोई ऐसी बात जिसे आप एक ऐसे संदूक में बंद कर देते हैं जिसे शायद सदियों खोला ही नहीं जाता।
 ऐसी बात जिसे आप ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर सारी  दुनिया को बतला देना चाहते हैं लेकिन ताउम्र मौनी बाबा बने रहते हैं।
आप ये सोच रहे होते हैं के समय आने पर अपनी पोटली को खोलेंगे। लेकिन आप को पता भी नहीं चलता के आप की पोटली कहीं दूर खुल चुकी होती है। 

Thursday, 13 November 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-22

                                                         "अपहरण " ( भाग -1 )
समय बहुत तेजी से चलता है इस बात का अहसास तब होता है जब आप busy रहते हैं।अगस्त ,सितम्बर और अक्टूबर'14 के महीने कब और कैसे बीते पता ही नहीं चला।
दीपावली का त्यौहार जा चुका है। समझ नहीं आता के इस त्यौहार का सभी बेसब्री से क्यों इंतज़ार करते हैं। खर्चे के सिवाए कुछ भी नहीं। यही नहीं बम और पटाखों से जो प्रदुषण फैलता है वो अलग। क्या सच में पटाखों के प्रदूषण  या महंगे गिफ्ट्स की खरीद से राम और लक्ष्मी पूजा सफल होते  हैं। इस विषय पर मैं कोई तर्क वितर्क नहीं करना चाहता। सोचना व् फैसला करना आपके अपने अधिकार क्षेत्र में है।
सितम्बर -अक्टूबर '१४  में K.V.A.D.A.V.College for girls में नाटक "अपहरण "करवाने में व्यस्त रहा। पिछले 25 सालों में एक बढ़िया ,समझदार और मेहनती टीम के साथ काम करने का मौका मिला।
"काजल" कमाल की actress है। अगर यूं कहें के ,"She is born actress!"...तो कुछ गलत नहीं होगा। 
काम के प्रति उसकी मेहनत ,प्रतिबद्धत्ता, लग्न और Team Spirit हमेशा सारी टीम को प्रोत्साहित करता रहा। लगभग २ महीने बच्चियों के साथ काम किया और नाटक के साथ साथ उनके व्यक्तित्व में होते बदलाव को मैं सहजता से महसूस कर पा रहा था।
बिल्कुल चुपचाप रहने वाली प्रीति के व्यक्तित्व में जो ज़बरदस्त बदलाव देखने को मिला वो सच में काबिले गौर करने वाला था। बिल्कुल एकांत पसंद लड़की ने नाटक में जिस तरह से जीवन की उमंग के मायने को समझा वो कमाल नाटक का ही कर सकता है। पूरी टीम ने उसका नाम छुपा रुस्तम रख दिया।
 दीक्षा क्रिकेट की नेशनल प्लेयर है। इसके साथ -साथ वो साइकिलिंग चैंपियन भी है। बहु प्रतिभा की धनी दीक्षा में सादगी के साथ स्पष्टता का जो मेल  है उसका कोई सानी नहीं हो सकता। हर बात के बाद जीभ निकालना ,धीरे से किसी को भी छेड़ देना और हर वक़्त खाने की बात करना उसकी sense of humour के कुछ बेमिसाल नमूने हैं । एक दिन उसने मुझे बताया के पिछले साल नाटक की रिहर्सल देखते हुए उसने decide कर लिया था के वो जब भी मौका मिलेगा नाटक ज़रूर करेगी। चुलबुली दीक्षा की नटखट शरारतें मुझे हमेशा याद रहेंगी।
स्मृति और भारती खेल खेल में नाटक खेल गई। हालांकि भारती शुरूआत में थोड़ी नर्वस रही लेकिन बाद में उसने नाटक का भरपूर आनंद उठाया। बचपन कितना सरल और पाक-साफ़ होता है वो मुझे स्मृति की बच्चों जैसी बातों ने सिखाया। सोनम रोर ने मस्ती ,रुचि ढिल्लों ने परिपक्वता और सोनाली ने अपने आप को प्रूव करने के लिए नाटक और अपने रोल के लिए खूब मेहनत की।सोनाली ने अपने घर वालों के विरोध और विपरीत परिस्थितिओं के बावजूद हार नहीं मानी। उसने अपने पात्र को दिल से जिया।
इस दौरान खास बात ये रही के नाटक "अपहरण "के लेखक मोहिन्दर प्रताप सिंह खुद रिहर्सल में शामिल हुए   और बच्चियों को नाटक के बारे में खूब सारी जानकारी दी। मोहिन्दर पिछले २० वर्षों से मुंबई में है और नाटक ,फिल्म्स और एडवरटाइजिंग में जानामाना नाम हैं। मोहिन्दर मुंबई में लेखन और निर्देशन का काम करता है। मोहिन्दर द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्म "भुजंग" बन कर तैयार है और सभी उसके रिलीज़ होने का बेसब्री से इंतज़ार भी कर हैं।
 दबंग ,रंगरेज़ ,आरक्षण और बेशर्म जैसी फिल्मों में काम कर चुके अमितोष नागपाल ने तो कई दिन बच्चों के साथ एक्टिंग की वर्कशॉप ही कर डाली। इस वर्कशॉप का पूरी टीम को फायदा हुआ। असल में मोहिन्दर और अमितोष  करनाल अपने घर आये हुए थे और जब उन्हें नाटक की रिहर्सल्स के बारे में पता चला तो दोनों ने अपना ज़्यादा समय नाटक मण्डली के साथ ही बिताया।
यही नहीं नाटक के ज़रिये बलराज रावल से भी मुलाकात हो गई। बलराज ने 2008 में खालसा कॉलेज में मेरे निर्देर्शन में "नाटक नहीं "किया था। वहां उसके अभिनय के लिए उसे "सर्वश्रेष्ठ एक्टर" घोषित किया गया था। वो थिएटर करना चाहता था लेकिन किसी अच्छे इंस्टिट्यूट में दाखिला न मिलने और वक़्त के थपेड़ों ने मार्केटिंग क्षेत्र में धकेल दिया। बलराज आजकल पानीपत में  एक्सपोर्ट कंपनी में अच्छे ओहदे पर काम कर रहा है। उसका दिल्ली आना जाना रहता है। और वो नाटक देखने का कोई भी मौका नहीं चूकता।
अपने दोस्त समीर और राहुल का अगर मैं ज़िक्र नहीं करूंगा तो बेमानी होगी। उनका सहयोग और प्रोत्साहन मुझे सदा आगे की और बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहता है।
हर साल की तरह इस बार भी नाटक को ज़ोनल यूथ फेस्टिवल में कॉम्पिटिशन के लिए खेला गया। इस बार फेस्टिवल का आयोजन आर्य कॉलेज पानीपत में किया गया था। वैसे मेरा तो हमेशा यही मानना है के कला का कोई मापदंड नहीं होता परन्तु बच्चों के लिए तैयारी का ये एक सशक्त माध्यम है। बच्चों की कला को अनदेखा करके आयोजक जिस तरह ट्रॉफी हासिल करने के लिए घालमेल करते हैं वो वाकये निंदनीय है।नाटक ही नहीं बल्कि सभी विधाओं में निर्णायक मंडल के निर्णयों का अधिकतर प्रतिभागीयों ने विरोध किया।
मेरी दिली इच्छा थी के नाटक के कुछ शो हो जाएँ। भला हो जोगेन्दर भोला और भंडारी मैडम का जिन के कारण बच्चों को एक और शो करने का मौका मिला। स्पोर्ट्स एवं यूथ अफेयर्स डिपार्टमेंट विभाग दवारा आयोजित जिला सांस्कृतिक प्रतियोगिता में बच्चों ने भाग लिया। बच्चों ने जिस तरह से मेहनत की थी उसका रिजल्ट यहाँ की परफॉरमेंस में साफ़ नज़र आ रहा था। सभी ने ज़बरदस्त परफॉर्म किया और प्रथम स्थान हासिल किया। हालांकि कॉलेज में सांस्कृतिक विभाग की इंचार्ज भंडारी मैडम को इस की permission लेने के लिए बहुत मशक्क़त करनी पड़ी।
अगली चिठ्ठी के साथ आप से जल्द मिलूंगा तब तक के लिए जय हो !

Thursday, 23 October 2014

shame to you

दीपावली के अवसर पर एक दूसरे को बधाई देने का सिलसिला चल रहा था। कोई फ़ोन से तो कोई उपहार का आदान प्रदान कर के दीवाली का त्यौहार मना रहा था।
 कबीर का दोस्त सोनू भी क्यों पीछे रहता। सोनू कभी स्कूल नहीं गया था। लेकिन  अक्षर ज्ञानी था।
 फ़ोन पर मैसेज भेजना हो या फेस बुक पर कोई comment करना हो, सोनू बखूबी कर लेता।
 अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण कभी कभी अर्थ बदल जाता।
 दीपावली के अवसर पर उसके दोस्तों ने उसके face book पर ढेरों बधाई सन्देश भेजे।
 सोनू खुश था। वो सभी को जवाब देने में मशगूल था।
सोनू को अधिकतर messages थे , " Happy Diwali "
 सोनू सभी को जवाब दे रहा था ................ "shame to you !"

Monday, 13 October 2014

KYAAMAT KI RAAT

कल मतदान का दिन है। मतदान को करीब २४ घंटे बाकी हैं। चुनाव प्रचार समाप्त हो गया है। भोंपू चिल्लाने बंद हो गए हैं। शोरशराबा कम हो गया है। सट्टा बाजार सभी उम्मीदवारों के अलग -अलग भाव लगा रहा है। अफवाहों का बाज़ार गर्म है। अपने अपने अंदाज़ सभी लोग चुनावों के किस्से सुनने सुनाने में मशगूल हैं। कहीं अनाज तो कहीं शराब बांटी जा रही है। कैश बांटने में भी कोई गुरेज़ नहीं किया जा रहा। चुनावों की भाषा में इसे आर पार की लड़ाई का दौर कहा जा रहा है। मोटर गाड़ियों का भरपूर प्रयोग हो रहा है। उम्मीदवार लोगों को लुभाने के नए -नए तरीके अपना रहे हैं।
 चुनाव आयोग ने कमर कस ली है ताकि कोई वोटर को खरीद न सके। छापे  मारे जा रहे हैं। कई ट्रक शराब के पकडे भी जा चुके हैं।  नेताओं ने भी शराब पिलाने के नायाब तरीके निकाल लिए हैं। बैंक से दस दस के नए नोटों की गड्डियां ले ली गई हैं। नोटों के सीरियल नम्बर के हिसाब से नोट बांटे जा रहे हैं। जितने 10 के  नोट उतनी शराब की बोतलें। ठेके पर 10 का नोट दो और बोतल लो। ठेके वालों से हिसाब बाद में होता रहेगा। आज  खबर छपी है के चुनाव आयोग चुस्त दुरुस्त है।
लोग कह रहे हैं के नेता तो नेता हैं ! आज की रात क़यामत की रात होगी !