Saturday, 1 February 2014

VAH BHAI CHITHEE.....!

दोस्तों……!

चिठ्ठी लिखने लिखाने का रिवाज़ जैसे खत्म हो गया है। इंटरनेट ,फेसबुक ,ट्विटर और मोबाइल फ़ोन के माहौल में चिठ्ठी लिखने का फैशन जैसे आउट डेटेड सा हो गया है।ये नई टेक्नोलॉजी का कमाल ही है के कभी सन्देश भेजने के लिए रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाली टेलीग्राम सेवा को भारत सरकार द्वारा वापिस ले लिया गया है।

बहुत सारे और भी ऐसे रिवाज़ हैं जो खो से गए हैं।जैसे शादियों पर रिश्तेदारों का कईं दिन पहले जमा हो जाना। खूब धमाल मचाना ,नाचना और गाना। दूर दूर से रिश्तेदारों के जवान होते बच्चों के बारे में जानकारी हासिल करना। किस के लड़के के रिश्ते की बात किस की लड़की के साथ चलाई जा सकती है। बुज़ुर्ग इसी उधेड़ बुन में लगे रहते।फिर अपनी जेब से छोटी सी डायरी निकाल कर एक दूसरे का पता लिखना कतई न भूलते। ताकि बाद में चिठ्ठी लिखी जा सके।

  यहीं पर कुछ युवाओं की आँखें लड़ती। और ये आँखों की लड़ाई कब प्रेम में बदल जाती  किसी को पता ही नहीं चलता। एक दूसरे से चिठ्ठी लिखने के वायदे के साथ घर के पतों का आदान प्रदान होता । चिठ्ठी में एक दूसरे से मिलने के लिए एक दूसरे के रिश्तेदारों के घर होने वाले प्रोग्रामों की जानकारी दी जाती। कुछ पता नहीं होता था के दोबारा मिलन होगा भी के नहीं।

इस पूरी कहानी में जब घर के किसी ज़िम्मेदार के हाथ कोई चिठ्ठी लग जाती तो दोनों को शादी के बंधन में बाँध दिया जाता।अगर कोई अड़ियल माँ बाप होते तो वो अपनी लड़की के लिए जल्द से जल्द लड़का ढूंढ कर उसके हाथ पीले कर देते।यही नहीं अपनी इज्जत की दुहाई और कसम देकर पुराने रिश्तों को सदा सदा भुला देने का वायदा भी लेते।

जिन युवाओं की किस्मत अच्छी न होती थी। न तो वो पकड़े जाते न ही मिल पाते थे। कुछ के पते बदल जाते तो कुछ भूल भी जाते। चिठ्ठी लिखना लिखाना भी बंद हो जाता । ऐसे में किस की शादी कहाँ हो जाती किसी को कुछ पता न चलता। चिठ्ठी का आदान प्रदान जो बंद हो जाता था।

मज़ा तो तब आता जब शादी के कईं सालों के बाद वो किसी विवाह समारोह में दोबारा मिल जाते।  कुछ समझदार इस पुनर्र मिलन को इत्तफ़ाक़ समझ कर अपने अपने रास्ते पर निकल जाते। और कुछ शुरू कर देते फिर वही सिलसिला-----सबसे पहले पता ,चिठ्ठी लिखने का वायदा ,पुराने गिले शिकवे ,एक दूसरे को पुरानी यादों और वायदों का हवाला।और फिर दुनिया की नज़रों से बच कर मिलने मिलाने का सिलसिला । ऐसे फंसते इस चक्रव्हू में के इस में से निकलना मुश्किल हो जाता। जब पुरानी चिठ्ठी पकड़ी जाती और मिलने मिलाने के सिलसिले आम हो जाते तो फिर शुरू होता परिवारों के टूटने का सिलसिला।

वाह भई चिठ्ठी !        

Thursday, 30 January 2014

A LETTER......EK CHITHEE PART-1

कल बहन से बात हो रही थी। उसका बेटा भूपिंदर सिंह उर्फ़ बिन्नी हैदराबाद में फ्लाइंग ऑफिसर की ट्रेंनिंग कर रहा है। आश्चर्य की कोई सीमा न रही जब उसने बताया के बिन्नी की "चिठ्ठी" आई है। फ़ोन पर उसने बताया के फ़ोर्स की ट्रेनिंग में घर वालों से बातचीत का ज़रिया केवल चिठ्ठी ही है। अभी एक महीना भी तो नहीं हुआ था बिन्नी को ट्रेनिंग पर गए।

 2 जनवरी को ही तो छोड़ कर आए थे बिन्नी को दिल्ली। जहाँ से अगले दिन उसे हैदराबाद की फ्लाइट पकड़नी थी। बहुत सारी बातों का ज़िक्र किया बहन ने। मुझे जो बात सब से अच्छी लगी वो ये के ट्रेनिंग के पहले दिन ही सब को ये बात समझा दी गई के "वो सब देश की सम्पति हैं।अब उनके कन्धों पर अपने साथ साथ देश की जनता की ज़िम्मेदारी भी है" !

नए साल की शुरूआत ऐसी ख़बर से हुई के सीना चौड़ा होना स्वाभाविक ही था। सर्दियों की छुट्टियों का एलान हो चुका था।दिल्ली से लौटने के अगले दिन ही बच्चों के साथ घूमने का कार्यक्रम बन गया। हमेशा की तरह इस बार भी गॉंव की तरफ निकल लिए। गावों में आज भी सादगी और मेहमान नवाज़ी का कोई मुकाबला नहीं।

 इस दौरान मुम्बई से अमितोष नागपाल ने ख़बर दी ,"आशू शर्मा के पिता की मृत्य़ु हो गई है।" अमितोष और आशू दोनों आजकल मुम्बई में फिल्मों में काम कर रहे हैं। दोनों ने अपने कॉलेज के समय करनाल में ख़ूब थिएटर किया। आशू से जब बात हुई तो उसने बताया के उस के पिता को कैंसर था।आशु के पिता हरियाणा पब्लिक रिलेशन में कार्यरत रहते हुए हरयाणवी संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए हमेशा प्रयासरत रहे। भगवान् उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें !

 7 जनवरी को जब घर वापिस लौटा तो एक और मृत्यु सन्देश से मन दुःखी हो गया। बिमला चोपड़ा हालांकि बुज़ुर्ग थी परन्तु उन की कहानी ने अंदर तक दहला दिया। आख़िरी समय में उनकी कोई देखरेख करने वाला कोई नहीं था। उनका बेटा किसी विदेशी कंपनी में लाखों रूपए कमाता है परन्तु व्यस्तता के कारण वो अपनी माँ की देखभाल नहीं कर सका।लोगों की ज़ुबानी सुना के यदि समय रहते उनका इलाज़ हो जाता तो शायद इतनी जल्दी संसार से उनकी विदाई न होती। मैं सोचने लगा के क्या इसी लिए आज भी पुत्र जन्म पर जश्न मनाया जाता है।10 जनवरी को उनकी आत्मिक शान्ति के लिए आयोजित कार्यक्रम में मैं भी शामिल हुआ।   

इस बीच जालंधर से मेरे एक मित्र दलजिंदर ने बताया के पुराने सभी मित्र जालंधर में इकठ्ठा हो रहे हैं। असल में हम सभी चण्डीगढ़ में इंडियन थिएटर में साथ साथ थे। वो सब इंडियन थिएटर से पास होने की सिल्वर जुबली मना रहे थे। 25 बरस के बाद दोस्तों से मिलने की चाहत के कारण मैंने दलजिंदर के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। इसी बीच अमितोष का एक और सन्देश आया ,"सर ,एम आर धीमान नही रहे।"  मैंने दलजिंदर को इत्लाह दी। असल में धीमान साहेब की पत्नी गीता धीमान ने भी दलजिंदर के साथ ही इंडियन थिएटर किया था।

11-12 जनवरी जालंधर में बीते।कुछ नए लोगों के किस्से कहानियां और पुराने साथियों को ख़ूब याद किया।  दुःख हुआ के किसी ने गीता के पति की मृत्यु का ज़िक्र भर भी नहीं किया । एम आर धीमान नॉर्थ इंडिया में थिएटर के मजबूत स्तम्भ थे।उन के द्वारा निर्देशित नाटक बाल भगवान आज भी मील के पत्थर की तरह नाटक प्रेमियों के दिल में बसा हुआ है।वो हमेशा हमारे दिलों में बने रहेंगे  !

 दलजिंदर ,रघवीर,पुनीत सहगल ,दलजीत सिंह ,सुनील जोशी,राजेश पवार ,सुरेंदर बाठ ,जितेंदर फ़लोरा और रवि शर्मा से मुलाकात हुई। ख़ूब धमाल मचाया सब ने मिलकर। बातों का सिलसिला ऐसे शुरू हुआ के रात बीती और कब सुबह हो गई किसी को पता ही नहीं चला।  रात 12 बजे चाय पीने की ललक के कारण सब ठंढ में ही रेलवे स्टेशन पहुँच गए।

राजेश पवार द्वारा घर में स्कूटी खरीदने पर घर के सदस्यों की एक्टिंग ,सुरेंदर बाठ द्वारा जवानी के दिनों में अपनी गरीबी के किस्से ,सुनील जोशी, रवि शर्मा और दलजीत का एक फ़िल्म न बना पाने का दर्द,जितेंदर फ़लोरा का आप पार्टी का बख़ान ,पुनीत का बात बात पर ज़ोर  हँसना ,दलजिंदर का हमेशा की तरह अपने में खोए रहने के बाद पार्टी में बने रहना और रघवीर का हँस हँस कर पागल की हद तक पहुँच जाना देर तक मानस पटल पर छपा रहेगा।



................................................. TO BE CONTINUED

Monday, 27 January 2014

Prime Minister.....!

आम चुनाव नज़दीक हैं। देश की सभी पार्टियों के नेता जैसे अपनी कुम्भकर्णी नींद से जाग उठे हैं। ऐसा लगता है मानो सोए सोए इन सब को स्वपन आया के ,"जनता जाग उठी है ,तुम अभी तक सोए हो। इस तरह तो तुम्हारा भला नहीं होने वाला। नेतागण जनता के बीच जाओ।"  सपने से जागते ही जैसे इन सब के अन्दर जनमोह जाग गया हो।

देश के अलग अलग हिस्सों में राजनीतिक रैलियों के ज़रिए जनता के दुःख दर्द को समझने की जैसे बाढ़ सी आ गई है। सब आम आदमी के बीच जा कर उनकी तकलीफों को समझने की बात करने लगे हैं।समय का फेर देखिए आज आम आदमी ख़ास हो गया है। अपने आप को हमेशा ख़ास  की श्रेणी में रखने वाले राजनेता आम आदमी की तरह भीख माँगते नज़र आ रहे हैं।

भारतीय गणतंत्र की यही तो ख़ासियत है के जो होता है वो दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता वो होता है। पूरे देश में कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी और भारतीय  जनता पार्टी द्वारा घोषित प्रधानमंत्री के उम्मीदवार आदरणीय श्री नरेंदर मोदी जी को लेकर हर नुक्कड़ पर बहस का मुद्दा यही है के देश का प्रधानमंत्री कौन होगा । मोदी ख़ुश हैं के उन के लुभावने भाषणों को सुनने के लिए जनता जुट रही है। हज़ारों वर्ष पुरानी पार्टी की दुहाई देकर राहुल गांधी अपने पार्टी वर्करों को जनता के बीच जाकर संवाद करने पर ज़ोर दे रहे हैं।जिस तरह बी जे पी के नेता मोदी के भाषणों से मंत्र मुग्ध हैं उसी तरह राहुल के तीख़े अंदाज़ से सोनिया व् कांग्रेसी भी खुश नज़र आ रहे हैं।

मीडिया की तो जैसी पौह बारह हो गई हो। दो बिल्लियों की लड़ाई में जैसे इनकी चल निकली है। क्या अखबारें ,छोटे बड़े सभी टीवी चैनल अपनी श्रद्धा अनुसार पार्टियों और नेताओं को कवर करने में जुटे हैं। लाख टके की बात ये के इन सब का धंधा चल निकला है। बहस ,बातचीत ,टॉक शो ,चर्चाओं व अन्य  प्रोग्रामों के ज़रिए लोगों को उन के ही मन की बात बताने की कोशिश की जा रही है। मानों जनता ने अपना फैंसला सुना ही दिया हो।

जैसा मैंने पहले भी कहा के जो होता है वो दिखाई नहीं देता और जो दिखाई नहीं देता वो होता है। मीडिया लाख पब्लिक सर्वेक्षण दिखाए पर स्तिथि अभी भी सपष्ट नहीं है। इस पूरे खेल में असली सूत्रधार इस बार प्रादेशिक पार्टियाँ ही होंगी।मीडिया इन पार्टियों को लाख अनदेखा करे पर आगामी चुनावों में इनकी भूमिका अहम् होगी।

 मुझे ऐसा लगता है के पंजाब में बादल की गर्जन ,हरयाणा में चौटाला की चोट ,यू पी में मुलायम की सख्ती और मायावती की माया,दिल्ली में केजरीवाल का बर्ताव , बिहार से लालू का लाड, पासवान की नज़दीकियां और नीतीश का झुकाव ,तमिलनाडू से जयललिता का प्रेम ,ओड़िसा से बीजू का समर्थन ,पश्चिम बंगाल से दीदी की ममता और वामपंथियों की नीतियां ही तय करेंगे के देश का अगला प्रधान मंत्री कौन होगा। इसलिए ये कहना के चुनावों के परिणाम वही होंगे जो जनता चाहेगी कतई ठीक नहीं है।

जनता को ये समझ लेना होगा के "हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं"।ये पार्टियां चुनाव जनता के लिए नहीं बल्कि सत्ता लोलुपता के लिए लड़ती हैं। चुनावों के बाद भी बहुत सारे समीकरण बनते हैं।हाल ही में दिल्ली के चुनाव परिणामों और सरकार बनाने की प्रक्रिया से तो सभी वाकिफ़ ही हैं।

  चंद दिनों के लिए ख़ास बनी इस जनता को ये भी समझ लेना होगा के इस बार चुनाव प्रधानमंत्री की गद्दी का नहीं बल्कि जनता की ज़रूरतों को पूरा करने की प्रतिबधत्ता का है। रोटी कपडा और मकान जैसी मूलभूत ज़रूरतों के साथ साथ आज तकनीकी व् सस्ती शिक्षा ,बढ़िया स्वास्थय सेवाएँ ,गरीबी उन्मूलन ,रोज़गार व्य्वस्था ,प्रदूषण फ्री वातावरण,बच्चों और महिलाओं को सरंक्षण ,जनसँख्या नियंतरण जैसी योजनाओं को लागू करने वाली सरकार की ज़रुरत है।25 जनवरी को पूरे राष्ट्र में मत दाता दिवस मनाया गया है। इस लिए जनता को बहुत सोच समझ कर मतदान करने की ज़रुरत है। प्रधानमंत्री बेशक़ कोई भी हो !


     

Thursday, 23 January 2014

DHUNDH...!

जैसे जैसे धुंध बढ़ती गई ,परिवार में बैठे सभी लोगों की चिंता भी बढ़ती गई। रीना टीवी के सामने बैठी बार बार चेनल बदल रही थी। लेकिन उसे मौसम की जानकारी कहीं से नहीं मिल रही थी। रिमोट को दूसरे हाथ पर मारते हुए वो बोली ,"ये धुंध को भी आज ही पड़ना था। " बगल में खिड़की के साथ बैठा रीना का छोटा भाई संजय अपने लैपटॉप पर लगातार अपनी अंगुलियां घुमा रहा था। बाहर खिड़की में से झांकते हुए संजय बोला ,"फ्लाइट तीन घंटे लेट है। "

फ्लाइट के लेट होने की खबर सुनते ही संजय के पिता सुंदर लाल अपनी अँगुलियों पर हिसाब करने में व्यस्त हो गए।जब सही हिसाब हो गया तो बोले ,"इस हिसाब से तो शाम के पांच बजे से पहले नहीं पहुंचेगा रवि। " संजय के बड़े भैया रवि पिछले तीन साल से मुम्बई में थे। सभी की चिंता बढ़ती जा रही थी।रसोई में किसी काम में व्यस्त शान्ति भी अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए कमरे  में प्रवेश कर गई और अपने हाथ पोंछते हुए बोलीं ,"अम्मा को भी अभी जाना था , कुछ दिन और रुक जाती तो ये मुसीबत तो न झेलनी पड़ती। ख़ुद तो चली गईं पर इतनी धुंध में सब जो परेशान होंगे उसके बारे में कतई नहीं सोचा !"

ये कहते कहते रीना की माँ दोबारा रसोई में चली गई।रीना ने बड़े भाई रवि को कईं बार फ़ोन पर बताया था के अम्मा की तबियत ठीक नहीं है ,आकर मिल जाता तो अच्छा होता। अम्मा सब से अधिक प्रेम भी रवि से ही करती थी। घर में सब से बड़ा जो ठहरा। अम्बाला में रहते हुए अपनी दादी की ख़ूब सेवा की थी रवि ने।


 रिश्तेदारों और पड़ोसियों का शोक प्रकट करने का सिलसिला शुरू हो चुका था।रीना के दोनों बच्चे पप्पू और बबली दुनिया से बेफ़िकर लुडो पर साँप सीढ़ी खेलने में मस्त थे। बीच बीच में आने जाने वालों को देख भर लेते थे।संजय अपने लैपटॉप पर वयस्त था। अम्मा को मरे अभी कुछ ही घंटे हुए थे। धुंध और कड़ाके की सर्दी के कारण माँ को अपने बेटे और रिश्तेदारों को आने वाली तकलीफ की चिंता थी। पड़ोस में रहने वाले तुली साहब इस बात से सतुंष्ट थे के ढंड के मौसम में लाश को कुछ नहीं होगा।

रीना धुंध के कारण देरी से आए अखबार के पन्ने पलट रही थी। मुख पृष्ठ पर धुंध के कारण एक दिन  पहले एकसिडेंट से चार लोगों की मौत वाली ख़बर से रीना विचलित हो गई थी। लैपटॉप पर व्यस्त संजय को रीना बार बार मौसम की जानकारी लेने को कह रही थी। पड़ोसियों की आवाजाही के कारण टीवी को बंद जो कर दिया गया था।रीना चिंता में थी क्योंकि उसके पति पंजाब से सड़क के रास्ते अकेले गाड़ी ड्राइव कर के आ रहे थे।

 संजय रवि भाई का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहा था। भय्या लम्बे समय के बाद जो घर लौट रहा था। भैया संजय के लिए नया लैपटॉप  लेकर आ रहे थे। संजय ने नेट पर जैसे ही मौसम का हाल देखा उसने अपनी बहन को आवाज़ लगाई। संजय ने बिना ये सोचे के लोग घर में शोक प्रकट करने आए हुए हैं  ज़ोर से चिल्लाया ,"ये धुंध जल्द ही छट जायगी और अगले दो दिन तक मौसम साफ़ रहेगा।"

कमरे में साँप सीढ़ी खेल रहे पप्पू और बबली संजय मामा की बात सुन कर ज़ोर से चिल्लाने लगे ,मानो खेल खेल में उनको ही सांप काट गया हो। जब सब ने पप्पू और बबली से रोने का कारण पूछा तो पप्पू रोते रोते बोला ,"धुंध खत्म हो जायगी तो हमारी छुट्टियां आगे नहीं बढ़ेंगी। "

असल में पिछले तीन सालों से ढंड और धुंध की वजह से सर्दियों की छुट्टियों को बढ़ा दिया जाता था। पप्पू और बबली सर्दियों की छुट्टियां मनाने अपने नाना नानी के घर आए हुए थे !          

Tuesday, 21 January 2014

BANTWARA...!

सर्दियों की छुट्टियों में गॉंव जाने का मौका मिला। आज भी यहाँ की ज़िन्दगी शहरों से बिल्कुल अलग है। सादगी ,शान्ति ,संतुष्टि ,सहजता,साफगोही और सच्चाई तो जैसे यहाँ के गहने हैं।सिहंपुर भी बहुत सारे ऐसे गॉंवों की तरह ही है। शहर के नज़दीक है सिहंपुर। शहर का प्रभाव भी इस गॉंव पर साफ़ नज़र आता है।अधिकतर घरों के बाहर खड़ी कारें ,हीरो होंडा मोटर साइकिल ,छतों के ऊपर सूरज की तरह चमकती गोल गोल डिश और घर के अंदर लम्बी चौड़ी एल सी डी सम्पन्नता की गवाह भी हैं।

पंजाब के इस गॉंव सिंहपुर में दो दिन बिताए।मेरे दोस्त सविंदर सिंह ने ख़ूब आवभगत की। रात को बिस्तर में देर से घुसने के बावजूद भी छिंदे ने अलसुबह उठा दिया। सविंदर को प्यार से सभी छिंदा कह कर बुलाते हैं। उठते ही छिंदा कहने लगा ,"क्यों जी चलां सैर पर।" असल में रात को बातों बातों में छिंदे ने सुबह सैर करने की आदत के बारे में मुझे बता दिया था। मैने खिड़की के बाहर झाँका कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। धुंध इतनी के बाहर कुछ नज़र नहीं आ रहा था। मैंने छिंदे को धुंध का हवाला देते हुए रहम करने की गुहार लगाई। असल में ठण्ड भी बहुत थी और मैं रजाई में ही दुबके रहना चाहता था।

 छिंदा कहाँ मानने वाला था।थोड़ी देर के बाद फिर सैर पर चलने के लिए कहने लगा। मुझे पूरा विश्वास हो चला के अब मेरी दाल नहीं गलने वाली। बिस्तर को जल्द वापिस लौटने का वायदा कर जूते बांधे और चल दिया छिंदे के साथ।खेतों के बीच में से निकलते हुए छिंदा बोला,"ये खेत भी कईं सालों के बाद आबाद हुए।" छिंदे की आधी अधूरी बात सुन कर मैंने भी वैसा ही प्रशन किया ,"क्यों ,क्या हुआ।" 

छिंदे को तो जैसे चाबी भर दी गई हो। लगा बताने आबाद हुए खेतों की कहानी ,"राम दास और गंगा राम के खेत हैं ये। पिछले १० साल से केस चल रहा था इन पर। ज़बरदस्त प्यार था दोनों में।भाइयों के प्यार के किस्से दूर-दूर के गावों में सुने और सुनाए जाते थे। न जाने क्या हुआ ,पता नहीं किस की नज़र लगी दोनों भाइयों को-------दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन बैठे।" "ऐसा क्या हुआ दोनों के बीच ?" मैंने उत्सुकता से पूछा। "यही तो आज तक किसी को भी पता नहीं चला।" आश्चर्य भरी नज़रों से मेरी और देखते हुए छिंदा बोला। इस से पहले के छिंदा आगे कुछ बताता ,मैंने कहा ,"आम तौर पर औरतों के कारण ऐसे झगड़े होते हैं। "

"यही तो बात है-------हर आदमी ऐसा ही सोचता है। दोनों की औरतें भी भाइयों के इस निर्णय से सकते में थीं। दोनों भाइयों की बीवियों ने भी दोनों को बहुत समझाया के मुट्ठी बंद रहे तो लाख की होती है।अलग अलग हो जाऐंगे तो जग हंसाई होगी। गंगा राम पर जैसे बंटवारे का भूत सवार था।गंगा राम ने बंटवारे के लिए कोर्ट में केस ठोक दिया। कोर्ट में दस साल केस चलने के बाद ज़मीन का बंटवारा हो गया। १० सालों के बाद खेतों में लहराती सरसों को देख कर पूरे इलाके के लोग खुश हैं।" ये बात करते करते छिंदा जैसे शून्य में चला गया।

मैंने छिंदे को कहा ,"ये तो अच्छा हुआ ,सब शांति से निपट गया।" छिंदा जैसे नींद से जगा और बोला,"अच्छा क्या ख़ाक हुआ ! जिस ज़मीन के लिए दस साल लड़ते रहे दोनों भाई, उस का सुख तो नहीं भोग पाए दोनों।" इस से पहले के मैं छिंदे से कुछ पूछता ,छिंदा भरे हुए मन से बोला ,"कोर्ट के फैंसले के ६ महीने के अंदर दोनों पूरे हो गए। इसी ज़मीन में दफ़नाया गया दोनों भाइयों को। "

बात को पूरी करते करते छिंदे की आँखें भर आईं। रोते रोते कहने लगा ,"मैंने तो अपने भाई राजे को बहुत समझाया है। उस की अक्ल पर तो जैसे पत्थर पड़ गए हैं। न जाने उस को क्या हो गया है। दिन रात पीने लगा है। जब ज्यादा पी लेता है तो बंटवारे की बात करने लगता है।"

अपनी बात पूरी करने से पहले ही छिंदा फ़फ़क फ़फ़क कर रोने लगा था !

     

RAJNITI KA DENGUE....!

भारत में २०१४ में होने वाले आम चुनाव का बिगुल बज चुका है। देश के अलग अलग हिस्सों में अपनी मांगों को लेकर धरना प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। कहीं कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे अध्यापक अपने आप को पक्का किए जाने की मांग कर रहे हैं तो कहीं रोडवेज वर्कर्स ने चक्का जाम कर दिया है। कहीं हेल्थ वर्कर बीमार हुई वयवस्था से नाराज़ हैं तो कहीं पानी बिजली को ले कर प्रदर्शन जारी है।कहीं धर्म जाति के नाम पर आरक्षण  की मांग हो रही है तो कहीं राजनीतिज्ञों के घपलों की जांच की।  और कमाल तो देखिए दिल्ली में तो मुख्यमंन्त्री ही हड़ताल पर बैठा है।

हाल ही में देश के चार राज्यों में इलेक्शन परिणाम क्या आए ! आम आदमी के वोट और इमोशंस पर राज करने वाली पार्टियों के तथाकथित आकाओं को जैसे जनता सुध का बुखार सा लग गया हो।ऐसे लगने लगा है जैसे डेंगू और जनता सुध बुखार एक जैसे हों। उतर से दक्षिण ,पूर्व से पश्चिम सभी जगह डेंगू और देश की राजनीति का ज़िक्र है। दिल्ली में आम आदमी ने किसी के दबाव में आए बिना अपने वोट का इस्तमाल क्या किया। सभी पार्टियों को आम आदमी का ध्यान रखना ज़रूरी लगने लगा है।

सभी राजनीतिक पार्टियों के आका अब आम आदमी के बीच जा कर इस बात की दुहाई देने लगे हैं के वो आम आदमी के दुःख दर्द को बेहतर समझते हैं। क्या सोनिया की कांग्रेस ,हिंदुओं की भारतीय जनता पार्टी ,माया रचित दलितों की बसपा ,मुसलमानों की हिमायती मुलायम की समाजवादी पार्टी या फिर अलग अलग राज्यों में रंग ,भाषा ,जाति ,धर्म और वाणिजय के आधार पर लोगों को ग़ुमराह कर सही राह दिखाने का चश्मा पहनाने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के तो जैसे सांस फूलने लगे है। आम आदमी की टोपी पहन कर दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने वाले केजरीवाल की सत्ता लोलुपता तो देखिए अब वो लोगों को अराजकता का पाठ पढ़ाने लगे हैं।

केजरीवाल शायद ये भूल गए हैं के आम आदमी की टोपी मान सम्मान का प्रतीक होती है। अगर वो इसी तरह आम आदमी की टोपी सड़कों पर उछालने लगेंगे तो आम आदमी को दुःख होगा। आज आम आदमी अपनी मूलभूत ज़रूरतों रोटी कपडा और मकान के लिए जूझ रहा है।आप के पास सत्ता आई है ,बेहतर होता यदि केजरीवाल एंड कंपनी इस ओर ध्यान देती।मुझे तो ऐसा लगने लगा है कि आप की  सरकार अपने किए वायदों को पूरा करने में असमर्थ महसूस कर रही है।लगता अब ऐसा है के केजरीवाल एंड कंपनी इसी वजह से लोगों का ध्यान इस और से हटाना चाहती है।

ख़बरदार आप पार्टी ,आप लोगों की भावनाओं के साथ कदापि खिलवाड़ नहीं कर सकते। अब आम आदमी ही ये कहने लगा है के आप असल मुद्दों से भटक गए हैं। ऐसा न हो के जिस आम आदमी ने आप को अपना सरताज बनाया है वही आम आदमी आप पर थू -थू न करने लगे। क्योंकि आम आदमी का पेट धरनों ,प्रदर्शनों या फिर कोरे वायदों से नहीं भरता। आम आदमी को तो काम चाहिए ,रोज़गार चाहिए। आम आदमी तो आम आदमी है। आम आदमी को अगर काम के साथ थोड़ा सम्मान मिल जाए तो वो अपने आप को वैसे ही धन्य मानने लगेगा।   

आम आदमी सावधान !   

Tuesday, 14 January 2014

BULBUL KA BACHHA...!

डॉ डेंग की दुकान पर आज एक व्यक्ति अपनी कार बेचने के लिए आया। बातचीत में पता चला के उसने एक बरस पहले ही ठेकेदारी का काम शुरू किया था। काम चल निकला था। काम के सिलसिले में इधर उधर जाने के लिए काफी दिक्कत होती थी। एक महीना पहले ही कार खरीदी थी। मैं ऐसे ही पूछ बैठा ,"ऐसी क्या दिक्कत आन पड़ी कार बेचने की।" बिटटू कुछ नहीं बोला। कार बेचने वाले को सभी बिटटू के नाम से ही बुला रहे थे।

बिटटू से ज्यादा मुझे डॉ डेंग जल्दी में नज़र आ रहा था। डॉ डेंग की जल्दी का कारण भी था। कार सस्ते में जो मिल रही थी। एक महीने पहले खरीदी गई कार बिटटू को ५०००० रूपए सस्ते में बेचनी पड़ रही थी। "बाज़ार का ये दस्तूर है के यदि कोई चीज़ खरीदने जायो तो मिलती नहीं और बेचने जायो तो बिकती नहीं", डॉ डेंग ने अपने पार्टनर को कहा। पार्टनर ने भी डॉ डेंग की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ,"फँसी में है ससुरा वर्ना कहाँ मिलती है ऐसी साफ कार। बिल्कुल बुलबुल का बच्चा है। "

बिटटू बाहर किसी से मोबाइल पर बात कर रहा था। बिटटू अपनी साख़ नहीं खोना चाहता था। उसे अपनी लेबर को तय समय पर पेमेन्ट का भुगतान करना था। पैसे की तंगी के कारण बिटटू घाटे में कार बेच रहा था। लाख यत्न के बाद भी जब बिटटू से लेबर को पेमेन्ट करने के लिए पैसे का इन्तज़ाम नहीं हुआ तो वो कार बेचने पर राज़ी हो गया।

फाइनल डील के बाद डॉ डेंग का पार्टनर बिटटू को अपनापन जताते हुए बोला ,"भाई बिटटू अगर तेरी गाड़ी कहीं महंगी बिकती हो तो तूँ बेच सकता है। मैं तो तेरी हेल्प के वास्ते ये गाड़ी ख़रीद रहा हूँ और वो भी मार्केट रेट पर। अब वो मेरी किस्मत है के ये गाड़ी सस्ती बिको या महंगी। " असल में बिटटू डॉ डेंग के पार्टनर का परिचित था और कुछ समय के लिए पैसे माँगने आया था।

 जब बिटटू पेमेन्ट ले कर डॉ डेंग की दुकान से बाहर निकलने लगा तो भारी मन से बोला ,पिछले दो महीनों में ५०००० हज़ार कमाए थे ,उसी का घाटा हो गया पर शुक्र है के साख़ बच गई। बिटटू के दुकान से बाहर निकलते ही डॉ डेंग और उस के पार्टनर अपनी जीत पर ऐसे खुश हुए मानो उन्होंने कोई क़िला फ़तह कर लिया हो। वो दोनों खुश थे के आज ५०००० हज़ार का फ़ायदा हो गया था।

लगभग २५ साल पहले डिपार्टमेन्ट ऑफ़ इंडियन थिएटर ,चण्डीगढ़ में अलख नंदन जी के निर्देशन में किए एक नाटक "आगरा बाज़ार " में नज़ीर की ये पंक्तियाँ याद आ गई------------

"बैठे हैं सभी दुकाने लगा लगा ,कहता है कोई ले रे ले , कहता है कोई ला रे ला ! "