Saturday, 4 January 2014

MEHAR HAI UPPAR WAALAY KI........!

 हरियाणा ,ज़िला अम्बाला ,गॉंव मण्डौर। ससुराल है मेरा मण्डौर। शहर से करीब २ किलोमीटर की दूरी पर है गॉंव मण्डौर। मॉडल विलेज /आदर्श गॉंव होने के कारण शहरों जैसी सभी सुविधायें हैं इस गॉंव में। पक्की सड़कें ,रात में जलने वाली स्ट्रीट लाइट्स ,व्यवस्थित सिवरेजे सिस्टम ,एक शानदार हर्बल पार्क ,पंचायत घर ,खुले- साफ सुथरे घर और गलियां ,बारात घर ,मिनी स्टेडियम, पशुओं के लिए स्विमिंग पूल की तरह शानदार जोहड़ और सुचारु जल व्यवस्था। क्या क्या नहीं है इस गॉंव में। अगर नहीं है तो शोर शराबा और प्रदूषण।

जनवरी का महीना और कड़ाके की सर्दी का दिन है आज। सर्दी के कारण सूर्य देव के दर्शन सुबह थोड़ी देर से हुए। धूप सेंकने के लिए घर के सामने हर्बल पार्क में चला गया। बिल्कुल शांत वातावरण। पार्क के दूसरे कोने पर जब मेरी नज़र गई। वहाँ दो लोग जोगेंदर और रणधीर पार्क के रखरखाव में मग्न थे। जब मैं उनके नज़दीक पहुंचा तो दोनों काम रोक कर खड़े हो गए। दोनों से दुआ सलाम के बाद मैंने उनके परिवार का हालचाल पूछा तो दोनों एक साथ बोले ,"मेहर है जी ऊपर वाले की ।" दोनों संतुष्ट नज़र आ रहे थे।

गॉंव के लोगों की ये खासियत होती है के एक बार बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ नहीं के उन्होंने सारे परिवार की जानकारी हासिल कर के ही दम लेना है। दौरे बातचीत का सिलसिला चला ही था के गॉंव का ही एक युवा सिम्मी किसी की माँ बहन एक करता हुआ हमारी टीम  में शामिल हो गया। उसने जोगेंदर रणधीर को मुख़ातिब होते हुए अपनी बात जारी रखी ,"चाचा ठेकेदार नू यू चेक दे कै अपने पीसे ले आओ। "सिम्मी की बात सुनते ही जोगेंदर बोला ,"यू ठेकेदार नै मार दिए हम तो। चार चक्कर तो पहले मार लिए। पहलां ई  दे देंदा यो पिसे। "ठेकेदार से किसी पेमेंट के बारे में बातचीत की इन लोगों ने।

दोनों के चेहरे जैसे दमक उठे। जोगेंदर और रणधीर दोनों ठेकेदार को मिलने के लिए अपने साइकिल पर बैठ कर तुरंत रवाना हो लिए। पार्क में अब मैं और सिम्मी रह गए। सिम्मी बोला ,''सरकार ने इन को पार्क के रखरखाव के लिए ठेके पर रखा हुआ है।सिर्फ ४००० हज़ार रूपए महीना मिलते हैं इनको। पिछले तीन महीने से पगार नहीं मिली है। आज अक्टूबर महीने की  तनख्वाह मिलेगी। अब आप ही बताओ कैसे गुज़ारा करते होंगे ये बेचारे !  अपने सवाल का ख़ुद जवाब देते हुए वो फिर बोला ,"ये तो गॉंव में कोई खर्चे नी हैं ,बच्चे सरकारी स्कूल में पड़ते हैं ,बस इसी लिए गुज़ारा चल जाता है। "

इसी बीच सिम्मी के मोबाइल की घण्टी बज गई ,वो फिर से गालियां निकालने लगा। जोगेंदर और रणधीर के पहुंचने से पहले ही ठेकेदार अपने किसी ज़रूरी काम से कहीं चला गया था।

मैं उन दोनों द्वारा मिलने के समय कहे शब्दों को दोहराने लगा ,''मेहर है ऊपर वाले की !"



     

Friday, 3 January 2014

HURRY UP...!

मेरा ख्याल है के हम सब जल्दी नामक बीमारी से ग्रस्त होते जा रहे हैं। जो कुछ भी कर रहे हैं----------सब जल्दी जल्दी। अपने आसपास नज़र दौड़ायें तो लगेगा जैसे सब भागमभाग में फंसे हुए हैं।अब देखिए अगर आप शादी शुदा हैं ,बच्चे स्कूल जाते हैं और अपनी बीवी की तरह आप भी नौकरी करते हैं तो आप के दिन की शुरुआत कुछ इस तरह होगी।

"अर्रे आज ऑफिस जल्दी जाना था और आज ही आँख लेट खुली।" उठते ही सब कुछ जल्दी जल्दी करने लगते हैं हम। "बेटा जल्दी उठो वर्ना स्कूल  बस निकल जायगी। पापा आज आप को स्कूल छोड़ने नहीं जा सकते ,उन्हें भी जल्दी निकलना है। आप भी जल्दी नहा लो ,नाश्ता तैयार है ,कहीं आप भी लेट न हो जाएं।" सुबह से लेकर शाम तक सब कुछ जल्दी।शाम को किसी बस स्टॉप पर फ़ोन बतियाते ये बातचीत आम हो गई है-------मैं कब से इंतज़ार कर रही हूँ ,जल्दी आओ।  रात को बिस्तर में जाने के बाद भी माँ की ये आवाज़ एक बारगी तो बच्चे के कान में ज़रूर गूंजती है-------"बेटा जल्दी सो जाओ ,सुबह स्कूल जल्दी जाना है।"

जीवन में सब कुछ जल्दी होने लगा है। शायद इस वजह से आदमी की बिदाई भी जल्दी होने लगी है।  उम्र कम होने लगी है आदमी की। क्या रिश्ते और क्या राजनीति----------सब कुछ जल्दी। आज कल झट मंगनी पट बयाह का तो जैसे फैशन सा हो गया है। शायद इसी कारण रिश्ते कमज़ोर होते जा रहे हैं।

 अब देश की राजनीति पर नज़र दौड़ायें तो वहाँ भी सब जल्दी जल्दी हो रहा है। अन्ना चाहते थे लोकपाल बिल जल्दी पास हो। केजरीवाल जल्दी समझ गए के राजनीति में घुसे बिना कुछ सम्भव नहीं।  जल्दी  जल्दी  के चक्कर में अन्ना के आंदोलन की हवा निकल गई और रालेगन सिद्धि वापिस जाना पड़ा।

 केजरीवाल ने आप पार्टी बना ली। लोगों ने इलेक्शन में कितनी जल्दी आप पार्टी को सता के नज़दीक पहुंचा दिया। केजरीवाल ने कितनी जल्दी से मुख्य मंत्री की कुर्सी हासिल कर ली।कमाल तो देखिये "आप" की सरकार का-----  कितनी जल्दी दिल्ली में पानी माफ कर दिया और बिजली की दरें भी आधी कर दी।लोगों को इस का फायदा कब मिलेगा ये भी जल्दी ही पता लग जायगा।

  विपक्षी पार्टियॉ को तो जैसे मुद्दा मिल गया है ! भाजपाई जल्दी में हैं के आप की सरकार गिरे और उन्हें दिल्ली में सता हासिल हो।  वहीँ कांग्रेस ने आप से जल्दी जल्दी इस लिए हाथ मिला लिया ताकि आप जल्दी से हर मोर्चे पर फ़ैल हो जाये और लोकसभा चुनावों के बाद राहुल को भी जल्दी जल्दी प्रधानमंत्री की कुर्सी का स्वाद चखाया जा सके।    

अब मुझे ही देखिए ३१ दिसंबर २०१३ को एक ब्लॉग लिखा "IMAGES.....2013" जल्दी में लिखा ताकि जल्दी पूरा करके नववर्ष से पहले ही पोस्ट कर सकूं।दलजिंदर ने जालंधर से फ़ोन कर ब्लॉग में अपना नाम गायब होने पर अपनी नाराज़गी जताई। वहीँ मुम्बई से मोहिंदर ने अपने बारे एक लाइन में समेटने पर  कमेन्ट किया। मुझे भी लगा जैसे जल्दी के चक्कर में बहुत कुछ छूट जाता है।

 सहज पक्के सो मीठा होए वाली कहावत में कितना दम है ये सब आप ख़ुद तय करें ! 

Thursday, 2 January 2014

A COMMON MAN........ EK AAM AADMI

सन १९४७ और २०१४ के केलेंडर को बिल्कुल एक बताया जा रहा है। आज़ादी के ६६ बरस बाद भी स्थितियां जस की तस हैं।देश की आज़ादी के समय लोगों को उम्मीद की एक किरण नज़र आई थी उन्हें लगा था के अब वो खुली हवा में सांस ले पायेंगे।आज जिस तरह आम आदमी पार्टी ने देश की राजधानी में राजनितिक परिवर्तन कर अपना धावा बोला है उससे पुनः आम आदमी को उम्मीद जगी है। अन्यथा  आज़ादी से पूर्व देश की जनता सफ़ेद चमड़ी वालों की ग़ुलाम थी तो अब सफ़ेद पोश नेताओं के चंगुल में फँसी नज़र आ रही है।

 २०१४ की शुरुआत में भी सन १९४७ वाली रौशनी नज़र आई है। देश कि राजधानी दिल्ली में सत्ता परिवर्तन हुआ है और आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है उससे तो ऐसा लगने लगा है के लोकतंत्र लौट आया है और हम असल आज़ादी के नज़दीक हैं। १९४७ का इतिहास दोहराने का समय लौट आया है क्यों कि आम चुनाव इसी बरस २०१४ में होने  हैं।

 जिसे हम  आम आदमी कहते हैं वो असल में किसी भी देश की शक्ति है। ये आम आदमी ही है जो अपनी मेहनत ,लगन ,बहादुरी और शक्ति से हर ड्रीम प्रोजेक्ट की नींव रखने से लेकर पूरा करने का काम करता है। हम क्यों भूल जाते हैं के पहाड़ों से रास्ता बनाने,ज़मी से पानी निकालने ,धरती पर सोना उगाने ,बड़ी से बड़ी बिल्डिंग्स की नींव से छत डालने ,फैक्टिरियों में अपना पसीना बहा कर देश को इकनॉमिकली सुदृढ़ बनाने वाला आम आदमी ही है।

ये विडम्बना ही है के देश की आज़ादी के ६६ साल बाद भी ये मेहनतकश आम आदमी की स्तिथि ज्यों कि त्यों बनी हुई है।स्तिथि  सुधारना तो दूर की बात बल्कि बिगड़ी ही है। देश के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान पैदा करने वाला ये आम आदमी आज भी इन सब से वंचित है।मानव संसाधन को सुदृढ़ करने वाले दो मुख्य कारक शिक्षा और स्वास्थय तो जैसे दूर की कोड़ी हैं।   


गरीबी, भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी ,महंगाई ,लूटेरी कानून व्यवस्था ,अपंग स्वास्थय सेवा ,खड़खड़ाता  ट्रांसपोर्ट क्षेत्र , अनपढ़ शिक्षा प्रणाली ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें सिरे से दुरुस्त करने की  ज़रुरत है। जिधर भी नज़र दौडाओ कहीं कुछ व्यस्थित नज़र नहीं आता।किसी भी तरक्की के लिए ये ज़रूरी है के उसका मानव संसाधन मज़बूत हो। उसकी  मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के साथ साथ स्वास्थय और शिक्षा की और सुधार किए जाऐं।

क़ानून पास करने पर ज़ोर देने की बजाय उस को लागू सही ढंग से किए जाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। तभी शायद आम आदमी अपने को ठगा हुआ महसूस नहीं करेगा। राजनीतिक पार्टियों को भी अब ये समझ लेना होगा के वो जिसे आम आदमी समझते हैं वो शक्तिविहीन नहीं है। उसे यदि सही दिशा ,विचार और मार्गदर्शक मिल जाए तो वो असम्भव को भी सम्भव बना सकता है।

 शिक्षा का अधिकार एक विशेष चैलेंज है।मिड डे मील के ज़रिए फ्री खाना खिलाने ,मुफ़त किताबें बांटने , फ्री लैपटॉप देने या फिर प्राइवेट स्कूलों में आरक्षण से समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता। यही नहीं प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों को आरक्षण की घोषणा मात्र से ही सभी शिक्षित नहीं हो जाएंगे।ज़रुरत तो शिक्षा के ढांचे में बदलाव की है।

प्राइवेट स्कूलों में आरक्षण के ज़रिए  दाखिला दिलवाने की सरकार की हठ से एक नई चुनौती आन खड़ी हुई है। हर माँ बाप अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना चाहता है। फ्री शिक्षा के कारण मेह्नतकश माँ बाप का रुझान इस और बढ़ा है। कौन माँ बाप नहीं चाहता के उनके बच्चे पढ़ लिखकर अपने पाँव पर खड़े हों या फिर कोई बड़ा अफसर बने। वे ख़ुद अनपढ़ता का दंश आखिर  झेल चुके हैं।

हाल ही में शहर के दो नामी गिरामी स्कूलों में पढ़ने वाली पाँचवीं की बच्चियां जब शाम तक घर नहीं पहुँची तो हड़कम्प मच गया।दोनों के पिता किसी फैक्ट्री में मज़दूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे थे। इसी वर्ष जब उन्हें राइट टू एजुकेशन के बारे में पता चला तो दोनों ने अपनी बच्चियों को सरकारी स्कूल से निकाल कर शहर के नामी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में दाखिल करवा दिया।

दोनों अपने बच्चों को हर रोज़ स्कूल छोड़ कर आते और वापिसी दोनों ख़ुद आ जाती। दोनों फूले  नहीं समाते। जो कोई भी मिलता इस बात की चर्चा ज़रूर करते के उन की बच्चियां इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती हैं। बच्चियां जब देर तक घर नहीं लौटी तो इस की सूचना पुलिस को दी गयी। लड़कियों का मामला था। पुलिस भी तुरंत हरकत में आ गयी। घर पर माँ का रो रो कर बुरा हाल था। मन में बुरे बुरे विचार आने लगे। ना जाने बच्चियां कहाँ होंगी।

आखिर बच्चियों को खोज निकाला गया। दोनों शहर से दूर किसी गाँव में स्टापू खेलते हुए मिली। दोनों बच्चियां दुनिया से बेफ़िक़र् पूरी मस्ती से वहाँ खेल रही थी। जब उन से भागने का कारण पूछा गया तो दिल दहला देने वाले तथ्य सामने आए। वो अब कभी इंग्लिश मीडियम स्कूल में नहीं जाना चाहतीं  थीं। क्यों कि बड़े घर के बच्चे उन्हें हीन भावना से देखते और प्रताड़ित करते थे।वहाँ उनसे कोई बात नहीं करता था। यही नहीं स्कूल के टीचर भी उनसे भेदभाव करते थे। घर पर उन्हें कोई पढ़ाने वाला नहीं था और प्राइवेट ट्यूशन के लिए माँ बाप के पास पैसे नहीं थे।

ये कहानी इन दो बच्चियों की नहीं बल्कि सड़े और अव्यवस्थित सिस्टम की है।यहाँ ज़रुरत है ज़मीनी स्तर पर समस्या को समझने और ढांचागत वयवस्था में सुधार की । ताकि एक विचार से समाज में सम्भाव  लाया जा सके ! 

Tuesday, 31 December 2013

Baavan Budhi......!

डॉ डेंग पशुओं के मशहूर डॉक्टर। सरकारी नौकरी मतलब बेफिकरी। अफसरों के  साथ पक्का गठजोड़। ड्यूटी पर गए तो गए।  न गए तो भी कोई डर नहीं। बनिया जात खाली बैठना तो जैसे सीखा ही न हो। हर वक़्त दिमाग घूमता के दो के चार कैसे किए जायें।एक बार परिवार के दबाव में डॉ डेंग कार खरीद लाए। ख़ूब रिसर्च की कार खरीदने के लिए। रिसर्च का फायदा ये हुआ के कार मार्केट रेट से सस्ती मिल गई।

अच्छी चीज़ का तो हर कोई ग्राहक होता है। डॉ डेंग कार क्या लाए बार बार डोर बेल्ल बजने लगी। कार बेचने के लिए तो लाए नहीं थे। एक कहावत है के बनिया बावन बुद्धि होता है। कार की डिमांड देख डॉ के दिमाग की तो जैसे घंटी बजने लगी।  डॉ की कार घर के लिए नहीं जैसे बिकने के लिए आई हो। हुआ भी वही डॉ की कार बिक गई। डॉ को भले ज़माने में प्रॉफिट हुआ २०००० हजार। बोले तो शुद्ध लाभ।

डॉ को तो जैसे ख़ून मुहँ लग गया। अब डॉ का मन नौकरी में कम कारों की रिसर्च में ज्यादा लगने लगा। कभी दिल्ली तो कभी चंडीगढ़ डॉ को जहाँ से भी कार सस्ती मिलती खरीद लाता। इस काम में डॉ को ख़ूब मज़ा आने लगा।डॉ की तो जैसे पोह बारह हो गई। हररोज़ चलाने को नई गाड़ी और बिकने पर प्रोफिट अलग।   आम के आम गुठलिओं के दाम। 

डॉ डेंग दोस्तों में बेशक़ कंजूस के नाम से मशहूर थे। लेकिन अपने और घर के लोगों पर कभी कंजूसी नहीं करते थे। शाही अंदाज़ से रहते डॉ डेंग। ब्रांडेड कपड़े ,बढ़िया खानपान ,क्लासिक की सिगरेट ,रीबॉक के जूते और कार में घूमना उनके अंदाज़ में शामिल था।शाही शौंक हो भी क्यों न एक तो सरकारी नौकरी दूसरे कारों की सेल परचेज़ का बिज़नस भी जमने लगा था।

कमाई होने लगी तो डॉ डेंग ने अपने बेटे को ऑस्ट्रेलिया भेजने का मन बना लिया। बेटे को विदेश भेजने के चक्कर में डॉ ने सारे घोड़े खोल दिए। डॉ को समझ आ गई थी के अगर बेटा विदेश सेट्ल हो गया तो लक्ष्मी बरसने लगेगी।बस फिर बेटे को विदेश भेज कर ही साँस लिया।

अब सरकारी नौकरी के साथ डॉ ने कारों की सेल परचेज़ की दुकान भी खोल ली। डॉ का भुरभुरा स्वभाव और मिलन शैली के कारण दुकान पर अखाड़ा बंधने लगा। धंधा जम ही चुका था।आने जाने वालों के लिए डॉ की दुकान आरामगाह बन गई थी।गर्मियों के दिनों में दुकान खुलते ही ए सी ऑन हो जाता। जो एक बार वहाँ आ जाता वहीँ जम जाता। किसी की मत मारी थी के चिलचिलाती गर्मी में कोई बाहर जाता। किसी का अगर घर से फ़ोन भी खड़कता तो कोई न कोई बहाना लगा दिया जाता। और अगर कोई घर चला भी जाता तो फटाफट ए सी में पहुँचने की कोशिश करता।

आमतौर पर डॉक्टरों को सम्मान से बुलाया जाता है। पर डॉ डेंग ऐसे जैसे मान सम्मान की कोई परवाह ही न हो। डॉक्टर को तो बस माया से प्रेम। जो कोई भी बुलाता ओ डॉक्टर कह के बुलाता।स्वभाव ऐसा के डॉ डेंग किसी की बात का बुरा न मानते।डॉ के स्वभाव के कारण ही सब वहाँ जमा हो जाते।

डॉ डेंग किसी से कोई छुपाव नहीं रखते। क्या कितने में बेचा या ख़रीदा सब को मालूम होता। कार बेचने पर कमीशन मिले या कोई प्रॉफिट हो ,सब डॉ को इस तरह से बधाई देते मानो उनके घर में लड़का पैदा हुआ हो। पर डॉ डेंग भी ऐसे पक्के के किसी की बात पर कोई ध्यान न देते। गाँठ के इतने पक्के के एक पैसा न खर्च करते। डॉ डेंग का ये रोज़ का काम जो ठहरा। बात भी सही है के वो हर ख़रीद फ़रोख़त पर पार्टी देने लगे तो कर ली कमाई।

दोस्तों का जमावड़ा खूब जमने लगा था। खाने पीने का दौर भी चलता। माहौल ऐसा बन गया के सभी बारी बारी से खर्च करने लगे ताकि एक पर बोझ न पड़े। "बिल्कुल इंग्लिश सिस्टम।" पैसे देते देते कोई न कोई ये ज़रूर बोल देता ,"दोस्ती पक्की खर्च अपना अपना।" खर्च करने में डॉ कँजूस तो था ही इस लिए आमतौर पर डॉ डेंग की कोशिश होती के बिना खर्च काम चल जाए तो समझो सोने पे सुहागा।

लेकिन आज तो जैसे तस्वीर बदली हुई थी।हर वक़त खुश रहने वाला डॉ उदास नज़र आ रहा था।सिगरेट का धुआं इतना फैल गया था मानो दुकान में ईंटों का भट्ठा चल रहा हो। बातों बातों में पता चला के आज डॉ लगभग ४० सिगरेट पी गया है। कोई न कोई फ़िक़र तो थी जो इतना धुआँ उड़ाया जा रहा था।

बात खुली तो पता चला के डॉ के बेटे ने ऑस्ट्रेलिया में ही किसी गौरी मेम से शादी कर ली है। शादी को पाँच महीने हो गए हैं और डॉ डेंग दादा बनने वाला है। मैने पूरे जोश खरोश से डॉ को बधाई दी। लेकिन डॉ ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। सब डॉ को समझाने लगे के आज कल ज़माना बदल गया है।

लेकिन डॉ को तो जैसे चुप्पी लग गई थी। सपने जैसे चूर -चूर हो गए थे। जब डॉ पर किसी का कोई असर नहीं हुआ तो एक साथी मज़ाक भरे लहज़े से बोला ,"भाई यू डॉ क्योंकर खुश होवेगा,छोरा उरै ब्याह करदा तो ४० -५० लाख मिलदे। यू नुक्सान के थोड़ा है। " इस बात पर सभी ने ज़ोर का ठहाका लगाया और डॉ के चेहरे पर भी एक कटु सी हँसी फैल गई।

बावन बुद्धि को जैसे सच में शॉक लगा और शॉर्ट सर्कट को ठीक होने में कुछ समय तो लगना ही था !  

   






      

IMAGES.......2013

अलविदा २०१३----------------------------
ख़ूब अदभुत रहा वर्ष २०१३।

हमेशा की तरह कईं खट्टी मीठी यादें जुड़ी इस बरस भी ।

घर में माँ बाप ,पत्नी और बच्चों का भरपूर प्रेम और सहयोग मिला।परिवार व रिश्तेदारों से बढ़िया सामजस्य बना रहा।

दोस्तों की चंडाल चौंकड़ी का भी भरपूर सहयोग बना रहा।

 शंटी पहले ही साथ छोड़ गया था और बिंदा इसी वर्ष दलबदल कर शंटी की टीम  में शामिल हो गया।

 महफिलें साल भर जमती रहीं।

 समीर बड़ी बेटी की शादी कर गंगा नहा लिया।

 राहुल की ज़िन्दगी में काफी उतार चढाव रहे। कभी ट्रांसपोर्ट की चिंता तो कभी नौकरी की परेशानियां। फिर भी पार लगता रहा।

 भाटिया साब उर्फ़ प्रकाश वीर उर्फ़ वीर प्रकाश अपनी स्पेयर पार्ट्स की दूकान में अपने छोटे भाई संजू और नए पार्टनर सिंधी के साथ मस्त और वयस्त रहे। डेंगू की  पकड़ में भी आए पर जैसे उन की तो लॉटरी लग गई हो। दुकान से छुट्टी कर के लगभग १ महीना आराम किया।

चौधरी साब के बेटे का आई आई टी इलाहबाद दाखिला हो गया। बेटे के चककर में दो बार इलाहबाद घूम आए। सब दोस्तों ने ख़ूब दावतें उड़ाई। तबियत नासाज़ रहने लगी है चौधरी साब की आजकल।

 बबलू का इस्  साल चावलों का बिसनेस चल निकला। नया हीरो मोटर साइकिल खरीद लिया।

 लाली कभी कभी मिलता रहा। इस बात की चर्चा पूरे वर्ष रही के "मोटी मुर्गी आण्डा छोटा देती है। "असल में जब से लाली उर्फ़ मनमोहन सिंह की लाखों रूपए की ज़मीन बिकी वो पैसे खर्च करने में कंजूसी बरतने लगा था।

मोहिंदर इस बार दीपावली पर मुम्बई से करनाल  नहीं आया।

फेस बुक के ज़रिए कुछ नए पुराने दोस्तों से मुलाकात हुई। जे पी ,मल्होत्रा संजय ,उपिंदर कौशल उर्फ़ बबलू फेस बुक के ज़रिए ही मिले।

पम्मी अपने बाप की मौत के बाद बिल्कुल बदल गया। बाप लाखों रूपए, जायदाद ,शेयर और बैंक बैलेंस छोड़ गया। बाप ताउम्र पम्मी को समझाता रहा के कोई अच्छी नौकरी कर ले। पम्मी ठहरा पम्मी -----बाप की एक ना मानी। कईं बिज़नेस किए लाखों का घाटा खाया पर नौकरी नहीं की। बाप क्या गया पम्मी किसी डॉक्टर के पास नौकर हो गया।

काम्बोज ने अपनी गॉंव की ज़मीन बेच कर शहर में थोड़ी सी जगह खरीद ली। आजकल उस पर कंस्ट्रक्शन करवाने में व्यस्त  है। दाड़ी ख़ूब बढ़ा रखी है जो कतई अच्छी नहीं लगती।

नवीन की प्रॉपर्टी की दुकान पर काम करने वाला रवि अपनी मेहनत और लग्न से ख़ुद प्रॉपर्टी डीलर हो गया है। नवीन माया के चक्कर में न जाने कहाँ खो गया है।

एडवोकेट भारद्वाज शराब छोड़ गया है। एक दिन दारू के नशे में गाड़ी ठोक दी और एक रात हवालात में काटनी  पड़ी। वो दिन और आज का दिन पंडित जी ने दारु को छुआ तक नहीं।

टिड्डा उर्फ़ सहगल फिर यार हो गया है। दारु के नशे में एक दिन वैसे ही उलझ गया और मूँछ का सवाल बना बैठा।

पण्डत उर्फ़ सीमान्त शर्मा इक नई दुनिया में ८० गुणा १०० के चक्कर में रहता है।

डॉ डेंग ने कईं सालों से सपने संजो कर रखे थे के बेटा जब भी ऑस्ट्रेलिया से लौट कर आए गा तो धूमधाम से उस की शादी करेंगे। आज ही ख़बर आई है के आशु ने वहीँ किसी गोरी मेम से शादी कर ली है।  वो बाप बनने वाला है और डॉ डेंग दादा। डॉ डेंग ख़ुशी मनाने की बजाय उदास है। नामालूम पार्टी कब होगी। सब उसकी पार्टी का इंतज़ार कर रहे हैं।

इन खट्टे मीठे संस्मरणों के बीच समीर के फ़ोन की घंटी बजने लगी है। डॉ डेंग पार्टी दे न दे नए बरस २०१४ के आगमन व स्वागत के लिए पार्टी की तैयारी है।

आप सब के लिए भी नववर्ष मंगलमय हो !

Sunday, 29 December 2013

THUMBS UP.............!

"पल पल जीती हर पल मरती",लड़किओं कि एक ऐसी कहानी जिस में लेखक ने उन की  रोज़मर्रा ज़िन्दगी में होने वाली मुश्किलात का बाखूबी  वर्णन किया है। बात लगभग दो माह पूर्व की है जब मुझे लड़कियों  के एक स्थानीय कॉलेज में नाटक करवाने का मौका मिला। जब लड़कियों  के मुद्दे पर नाटक करने की बात आई तो कोई अच्छी स्क्रिप्ट उपल्बध  नहीं हुई।  ऐसे में स्क्रिप्ट फाइनल होने से पहले कुछ इम्प्रोविज़ेशन्स पर काम चलता रहा। सहसा मुझे अपने लेखक  दोस्त का ध्यान आया।









 मैंने  मोहिंदर को फ़ोन लगाया उस ने तुरन्त  मेरी समस्या का हल ये कहते हुए कर दिया ,"तू चिंता न कर मैं शाम तक तुझे कुछ लिख कर भेजता हूँ। " ये डायलॉग सुन कर मैं ज़ोर से हँसा और दूसरी तरफ से मोहिंदर का ठहाका सुन कर मैं भी और ज़ोर से हँसने लगा।  हम दोनों को ये समझने में देर न लगी के हम क्यों हँस  रहे  हैं।
हँसते  हँसते  मोहिंदर बोला,"अरे ,मुझे भी अरोड़ा  साब  या सुधीर समझ लिया क्या ?'असल में मैं मोहिंदर को पहले -"चिन्ता  न करो "के बारे में एक किस्सा सुना चुका था।किस्सा असल में यूं था की मेरे कई नाटकों में  अरोड़ा जी ने music दिया और मैं जब भी उन्हें रिहर्सल के लिए बोलता तो वो हर बार मुझे यही कहते , " चिंता न करो मैं संभाल लूँगा " मोहिंदर आजकल मुम्बई में फ़िल्म निर्माण और लेखन के साथ साथ अपनी एक एडवर्टीज़िंग कम्पनी चला रहा है।

ख़ैर , स्क्रिप्ट आ गई और रिहर्सल शुरू गई। नाटक की  शुरूआत से ही कई किस्से जुड़ने लगे  थे। नाटक की  कहानी चूँकि  लड़कियों  की आम ज़िन्दगी और समस्याओं से जुड़ी हुई थी इसलिए डायलॉग भी थोड़े बोल्ड थे।
रिहर्सल शुरू हुई , दो -तीन दिन रिहर्सल के साथ साथ लड़कियों  से बातचीत भी करता रहा। बातचीत से ये बात तो स्पष्ट हो गई के लड़कियां अपनी समस्याओं के प्रति जागरूक हैं लेकिन आवाज़ उठाने के नाम पर कुछ डर  महसूस करती हैं और खुल कर बोलने से कतराती हैं। ज्यों ज्यों रिहर्सल आगे बढ़ती गई नये किस्से कहानियाँ  भी बनते गए।

रिहर्सल के दूसरे  दिन ही नाटक में लीड रोल  करने वाली एक लड़की गायब थी। हालाँकि वो होस्टल  में रहती थी। जब इस बारे प्रियंका और काजल से पूछा  गया तो दोनों ने एक दूसरे की तरफ़  देखा और बिना कोई जवाब दिए मुस्करा दीं। ये दोनों भी हॉस्टल में रहती थी इस् लिए मैने दोबारा पूछा ,"आख़िर  बात क्या  हुई पता तो चले कि ज्योति के न आने का कारण क्या है।" लड़की के न आने का कारण सुन कर मैं हैरान हो गया। ज्योति ने अपनी बात कुछ इस तरह से रखी ,"सर ,असल में  बात ये है के ज्योति पानीपत की रहने वाली है और पानीपत के  जिस कॉलेज में इस बार यूथ फेस्टिवल होने जा रहा है वहाँ  उसका भाई पढ़ता  है।अगर उस के घर वालों को को ये पता चल गया कि ज्योति नाटक में भाग ले रही है तो हँगामा हो जाएगा। " मुझे समझते देर न लगी के आख़िर क्यों ज्योति रिहर्सल पर नहीं आई।


मुझे  नाटक का डायलॉग याद आ गया  ,"क्या आप जानना चाहते हैं के रेप  कब शुरू हुआ था----------रेप शुरू हुआ था उस दिन ,जिस दिन आप ने अपनी बेटी को नज़रें झुका कर चलने के लिए बोला था। "

रिहर्सल के दौरान चाय देने के लिए एक महिला हर रोज़ आती थी। लड़कियां उसे विमला ऑंटी  कह कर सम्बोधित करती थीं। चाय देने के बाद विमला कुछ देर के लिए नाटक देखती और अपने काम पर लौट जाती। इसी तरह कॉलेज की  छात्राएँ  भी हॉल में आतीं ,नाटक की  रिहर्सल देखती और बिना कोई कमेंट दिए  वापिस लौट जाती। रिहर्सल कॉलेज के हॉल में हो रही थी ,इस लिए जब भी कोई पीरियड फ्री होता वो घूमते फिरते नाटक की रिहर्सल देखने हॉल का चक्कर लगा लेती। रिहर्सल करते १० दिन हो चुके थे। लड़कियों  ने नाटक को समझना शुरू कर दिया था। रिहर्सल के वो पूरी लय में होती। अब विमला ने चाय देने के बाद ज्यादा  देर नाटक देखना शुरू कर दिया था , इधर उधर खड़े हो कर नाटक देखने वाली इक्का दुक्का , लड़कियां अब ग्रुप में------मैं इसे झुण्ड में कहूँ तो बेमानी न होगी,आ कर नाटक देखने लगी थी।


 आज नाटक की  फुल रिहर्सल थी। जब मैं हॉल में पहुंचा तो लगभग २०० लड़कियाँ  इधर उधर घूम रहीं थीं। शायद कॉलेज में कोई फंक्शन था और वो सब उस का फायदा उठा कर अपने फ़ोन पर बातें करने में मशगूल थीं।ऑडिटोरियम फुल प्रूफ पी.सी.ओ.बना हुआ था। मैंने लड़कियों को धीरे से नाटक शुरू करने के लिए कहा। उन्होंने भी बिना किसी  देरी के नाटक शुरू कर दिया। इतने दिनों साथ काम करते करते वो मेरे इशारे को भी समझने लगी थीं। मैं आज की  रिहर्सल से ये जानना चाहता था के नाटक लड़कियों के  दिल के कितने करीब है।

रिहर्सल स्टार्ट होते ही लड़कियाँ स्टेज के आसपास इकठ्ठा होने लगी। जैसे जैसे नाटक आगे बढ़ा हॉल में सन्नाटा छा  गया। फिर क्या था नाटक के हर डायलॉग  पर दर्शक बनी लड़कियों के चेहरे के भाव मैं अच्छी तरह पढ़ पा  रहा था।  मॉडर्न बनी कोमल के एक डायलॉग ,"अब क्या है दादी ,मेरी टाँगें दिख रही हैं तो क्या हुआ ,कोई *लेग पीस *समझ कर खा थोड़े ही जाएगा। " लड़कियों ने ज़ोर  से ठहाका लगाया।

  प्रियंका और काजल के एक दूसरे डायलॉग ,"अरे क्या हुआ तुझे ,क्या सोच रही है ?मैं सोच रही हूँ के हर बार लड़की या औरत को ही दोषी क्यों ठहराया जाता है। क्या समाज के ठेकेदारों पर कोई अंकुश नहीं लगाया जा सकता। कोई कहता है के लड़कियों का पहरावा ही दुष्कर्म को बढ़ावा देता है। या फिर कोई ख़ाप का चौधरी एक तुग़लकी फरमान जारी करता है और किसी प्रेमी जोड़े को भाई बहन के रिश्ते में बाँध दिया जाता है। कभी कोई वकील कहता है ,मेरी बेटी होती तो मैं उसे ज़िंदा जला देता।कभी कोई धर्म गुरु कहता है के अगर भईआ बोलती तो छोड़ देता। "ने ऑडिटोरियम में जैसे खामोशी भर दी।

दोनों कि बातें सुन रही खुशबू के डायलॉग ,"जिसने रॉड अन्दर तक घुमा दी वो भला किसी पे कैसे रहम करता।"ने जैसे सब को सोचने पर विवश कर दिया। दर्शक दीर्घा में खड़ी लड़कियाँ जैसे बुत हो गई।चाय पिलाने वाली विमला रोने लगी।लड़ीवार डायलॉग का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ था। अगले डायलॉग ने तो जैसे पूरे समाज की कलई ही खोल कर रख दी।

 प्रियंका भरे मन से दर्शकों से रूबरू होते हुए बोली,"मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूँ के अगर लड़कियों का पहरावा ही दुष्कर्म को बढ़ावा देता है तो हर रोज़ छोटी बच्चियों और बुज़ुर्ग औरतों के साथ दुष्कर्म की ख़बरें टीवी और समाचार पत्रों की सुर्खियाँ क्यों बनती हैं। काजल के अगले डायलॉग,"हम आपको बताना चाहते हैं के सेक्स कोई फिजिकल एक्ट नहीं बल्कि एक मनोवृति है ,जिसे समझना बहुत ज़रूरी है। " ने तो जैसे सब को चिंतन के लिए मजबूर कर दिया।

कईं दिनों से लड़कियों की हिफाज़त के नाम पर ड्यूटी पर तैनात कॉलेज की अध्यापिका अम्बिका को तो जैसे नाटक अन्दर तक छू गया। वो अपनी कुर्सी से उठी और मेरी तरफ थम्स अप करते हुए बोली," सर कमाल  कर दिया।मैंने भी नम्रता पूर्वक अम्बिका मैडम का धन्यवाद करते हुए कहा ,"मैडम ये सब कमाल तो बच्चों की मेहनत और जानदार स्क्रिप्ट का है। "

धन्यवाद मोहिंदर प्रताप सिंह और कॉलेज प्रशासन व विशेषकर भण्डारी ,संगीता ,काद्यान ,अम्बिका और वो सभी अध्यापिकायें जो समय समय पर लड़कियों को नाटक के लिए प्रोत्साहित करती रहीं। कॉलेज के वो सभी        
कर्मचारी जिन्होंने सेट और अन्य कामों में नाटक मण्डली की मदद की। नाटक मण्डली की सभी नायिकाओं को भी मेरा सलाम। क्यों कि आप के दृढ़ निश्चय और लग्न से ही ये सब सम्भव हो सका। 

सच में मोहिंदर आप ने क़माल का नाटक लिखा है !

दुष्यंत की ये पंक्तियाँ मैं अक्सर दोहराता हूँ।
"हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
कोशिश है के तस्वीर बदलनी चाहिए।"


Saturday, 28 December 2013

Waqt...........!

कोई बात चले और महंगाई का ज़िक्र न हो ये आज के ज़माने में सम्भव ही नहीं। आज घर जाते हुए चाँद बाऊ जी से मुलाक़ात हो गई। पिछले २ वर्षों से चाँद बाऊ परेशान चल रहे हैं। कानूनी लड़ाई लड़ते लड़ते थक से गए हैं बाऊ जी। कुछ उम्र का तकाज़ा और दूसरे भाईयों से जायदाद का झगड़ा और ऊपर से महंगाई की मार।

ऑफिस में टी वी चल रहा था।मोदी के जादू के बाद दिल्ली में केजरीवाल की ताजपोशी की  ख़बरों का सिलसिला बदस्तूर जारी था। टी वी देखते हुए चाँद बाऊ जी बोले ,"हुंण  दस्सो केजरीवाल ने कदी सोच्या सी के ओ दिल्ली दा मुखमंत्री बनेगा। " मैंने उनकी इस बात में हामी  भरते हुए कहा ,"हाँ जी कमाल कर दिया केजरी ने। "

बात का सिलसिला आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा ,"असल में लोग मौजूदा सिस्टम से तंग आ चुके हैं। भ्रष्टाचार ,गरीबी ,बेरोज़गारी और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। आज कल तो परिवार पालना  मुश्किल हो गया है चाँद बाऊ  जी। "

चाँद बाऊ जी की यादास्त कमाल की है। जब भी किसी बात का ज़िक्र करते हैं, दिन,महीना ,साल और समय का ज़िक्र न हो तो ऐसा लगता है मानो बाऊ जी कुछ भूल रहे हैं। मैंने महंगाई का ज़िक्र क्या किया-----------बाऊ  जी तो बस शुरू हो गए। बाऊ  जी बोले ,"बस पूछो ही न जी। सन १९७५ की बात है ,मैं ट्रक चलाता था। 80 पैसे प्रति लीटर डीज़ल और 1 रूपए 75 पैसे प्रति लीटर पेट्रोल का रेट था उन दिनों।"

आदतानुसार दिन,महीने और साल का ज़िक्र करते हुए बाऊ जी आगे बोले ,"लगातार 6 महीने तक नागपुर से संगतरे लोड कर के दिल्ली लाते थे हम। उस टाइम संगतरे का क्या रेट होगा?"उन्होंने ये प्रश्न मेरे ऊपर दाग़ा। इस से पहले मैं उन के इस प्रश्न का जवाब देता बाऊ जी ने अपनी बात का सिलसिला जारी रखते हुए कहा ,"5 रूपए सैंकड़ा का रेट था संगतरों का उन दिनों। " उन्होंने आगे बताया कि वो नागपुर से 10 रूपए के 200 संगतरे ख़रीद  कर अपना सफ़र शुरू करते थे। क्लींडर संगतरे छील कर देता रहता था और यारां  दी ग ड्डी दिल्ली कब पहुँच जाती पता ही नहीं चलता था। "

किस्से और कहानियों का तो जैसे ख़ज़ाना हो बाऊ जी के पास।वो आगे बोले ,"2 रूपए में भरपेट खा लिया करते थे उनदिनों। 50 पैसे की दाल और 10 पैसे की रोटी। साथ में दही और बाद में चाय भी।" जब खाने पीने की बात चली तो मैने चाँद बाऊ से पूछा ,"क्या मूरथल  के ढ़ाबे भी होते थे उन दिनों। "उन्होंने आहूजा नम्बर 1 ढ़ाबे  का ज़िक्र करते हुए कहा ,"ये पहले प्यारे का ढ़ाबा  के नाम से मशहूर था। आहूजा उसके पास काम करता था। "करनाल से दिल्ली जाते हुए सोनीपत के नज़दीक मूरथल के ढ़ाबे आज भी मशहूर हैं।

चाँद बाऊ ने बहुत मेहनत की है अपने जीवन में। मैंने उन से पूछा ,"कब से शुरू किया था आप ने ट्रक चलाना ?"वो झट से बोले ,"सन 1968 में ड्रिवेरी शुरू कर दी थी मैंने,1970 में लाइसेंस बनवाया और 1977 में ट्रक चलाना छोड़ मैं पंजाब चला गया था।

 "कहानी को आगे बढ़ाते हुए बाऊ जी बोले,"बस यहाँ से मेरी ज़िन्दगी का यू टर्न शुरू हुआ समझो।यहाँ मैंने हवाई चप्पलों का काम शुरू किया। 1 रूपए दर्जन कमीशन मिलती थी उन दिनों। इस काम में मज़ा आने लगा और दो साल के बाद अपनी फैक्ट्री खोल ली। "

फैक्ट्री के लिए खरीददारी से लेकर बेचने का काम ख़ुद बाऊ जी करते थे। धीरे धीरे मार्किट की समझ आने लगी तो हैंडलूम का काम शुरू कर दिया। एक बाऊ जी की मेहनत और दूसरे किस्मत का जोर। मिट्टी को भी हाथ लगाते तो सोना हो जाती।

 ख़ूब कमाई होने लगी चाँद बाऊ की।दो छोटे भाई थे उनके। बच्चों की तरह पाला बाऊ जी ने उनको।काम के बढ़ने के साथ साथ दोनों भाई भी बड़े हो चुके थे।काम की ज़िम्मेदारी भी सम्भालने लगे थे दोनों।अपने बड़े भाई को राम की तरह पूजते थे दोनों छोटे भाई। चाँद बाऊ भी अपने भाइयों की तारीफ करते नहीं थकते थे।  भाइयों का साथ मिलते ही चाँद बाऊ को तो जैसे पँख लग गए। पूरे हिंदुस्तान में चाँद बाऊ जी के कम्बल सप्लाई होने लगे। पैसा तो जैसे बरसने लगा था.

जैसे जैसे पैसा आने लगा बाऊ जी ने प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करना शुरू कर दिया।काम के साथ साथ प्रोपर्टी के दाम भी बढ़ते गए।बाऊ जी ने जो कुछ भी खरीदा सांझे में खरीदा यानि के तीनों भाईओं की के नाम। आज बाऊ जी के पास तीन मंज़िला मकान ,एक आलिशान फार्म हाउस ,शहर के बीचों बीच कईं कमर्शियल दुकानें ,दो हैंडलूम मिल और न जाने क्या क्या। आज की मार्केट के हिसाब से वैल्यू लगाई जाय तो 100 करोड़ का माल तो होगा चाँद जी के पास।

महँगाई की बात चल ही रही थी ,मैने वैसे ही पूछ लिया ,"ये फार्म हाउस कितने में ख़रीदा था आपने ?"

बाऊ जी तुरन्त बोले ,"तुस्सी विश्वाश नहीं करोगे ,मेन जी टी रोड ते है फॉर्म हाउस ,सन 1983 में 22 रूपए प्रति गज का रेट था ,कोई जाता नहीं था उस साइड ,उस भले ज़माने में डबल रेट में खरीदी थी वो जगह। " "आजकल क्या रेट है वहाँ ?" ,मैंने अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाने के लिए उनसे पूछा।

चाँद बाऊ का तो जैसे सीना चौड़ा हो गया।" होगा यही कोई 10 -12 करोड़ रूपए।यही कोई 30 -40 हजार प्रति गज।  8 लाख रूपए की खरीदी थी ये जगह।" ये कहते ही जैसे बाऊ जी अपने भूत काल में खो गए।

 मैंने उन्हें हिलाया ,बाऊ जी रुआंसे से हो गए। अपने को सम्भालते हुए बोले ,"सत्यानाश कर दिया इन भाइयों ने। ये दिन देखने थे बुढ़ापे में।

वक़्त ने ऐसा पलटा खाया के चाँद बाऊ  जी की तो जैसे दुनिया ही बदल गई। दोनों भाई बाग़ी हो गए। क्या फार्म हाउस और कम्बल बनाने की दोनों मिलें---- सब पर कब्ज़ा कर लिया छोटे भाइयों ने।राम के लक्ष्मण और भरत ने राक्षशी चोला डाल लिया था।जहाँ भी मिलते अपने बड़े भाई को माँ -बहन की गालियां ऐसे निकालते मानो एक माँ के पेट से जन्म न लिया हो।

कईं बार पंचायत हुई बंटवारे के लिए। चाँद बाऊ ने भरी पंचायत में कईं बार हाथ जोड़ कर कहा ,"मुझे और कुछ नहीं बस मेरा हिस्सा दे दो। "छोटे भाइयों का तो जैसे ख़ून पानी हो चुका था।वो पंचायत की किसी भी बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे। न जाने किस जन्म का बदला ले  रहे थे।        

असल में चाँद बाऊ जी पुलिस स्टेशन से हो कर आ रहे थे।भाई अक्सर गाली गलौच और मारपीट करने लगे थे। बातों बातों में कहने लगे ,"बिना पैसे लिए तो काम ही नहीं करते पुलिस वाले। कोर्ट में रिपोर्ट देने के 2000 हजार रूपए दे कर आया हूँ। एक ज़माना था ,जब हम ट्रक चलाते थे ,अगर कोई पुलिस वाला रोक लेता तो 2 -5 रूपए में पुलिस वाले खुश हो जाते थे।

 प्रॉपर्टी बँटवारे का केस भी कोर्ट में डाल दिया था।कोर्ट तो कोर्ट हैं--------न जाने कितना समय लगे। मेरे घर जाने का समय हो चुका था। बाऊ जी की कहानी सुनते सुनते मेरा भी मन भर आया। मेरा ध्यान उन के बेटे की तरफ चला गया। मैंने  उनसे पूछा ,"बेटे का क्या हाल है। " बाऊ जी तो जैसे अन्दर  तक टूट गए आँखें भर आई और बोले ,"राज करने के दिन थे उस के ,पर वक़्त को पता नहीं क्या मंज़ूर है। आज कल नौकरी कर रहा है बेटा। "

इतने में चाँद बाऊ जी के फ़ोन की घण्टी बजी ,उन्होंने टेबल से अपनी टोपी उठा कर सिर पर डाली। कहने लगे, "पुलिस स्टेशन से फ़ोन है। मैं उन्हें देखता रहा और वो पुलिस स्टेशन की ओर रवाना हो गए। चाँद बाऊ कब मेरी आँखों से ओझल हो गए  मुझे पता ही नहीं चला।