Thursday, 26 December 2013

THE DEMOCRACY.........."LOKTANTAR"

एक छोटे से आंदोलन से जनलोकपाल के लिए संघर्ष करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने भी कभी सोचा  नहीं होगा के वो दिल्ली के मुख्यमंत्री बन जायेंगे। केजरीवाल टीम ने जिस सादगी और साफगोही से जनता के बीच अपनी पैठ बनाई उस के नतीज़े सब के सामने हैं। दिल्ली के नतीज़ों ने ये सिद्ध कर  दिया के राजनीति किसी की बपौती नहीं है।

दिल्ली की जनता ने जिस तरह कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को अंगूठा दिखाया है--------ये साफ़ और स्वस्थ राजनीति के लिए खूब बढ़िया संकेत हैं। "युद्ध और प्यार में सब कुछ सम्भव है " के जुमले को प्रयोग कर आम लोगों की भावनाओं के साथ बलात्कार करने वाली पार्टिओं को जनता ने जिस तरह से सज़ा दी है वो भविष्य़ के लिए शुभ संकेत हैं। कांग्रेस की नीतिओं का विरोध करने वाली आप पार्टी ने कांग्रेस के साथ से सरकार बनाने का जो निर्णय लिया,मेरी नज़र में तो  ये भी एक सरहानीय कदम है। ये बिलकुल अपने दुश्मन के घर में घुस कर उसी के गाल पर करारा थप्पड़ जड़ने की तरह है।

बेशक़ कांग्रेस ,भारतीय जनता पार्टी, लेफ्ट , राईट के बड़े बड़े धुरंदरों और लालू,नीतीश ,मुलायम जैसे राजनीति के पंडितों ने केजरीवाल टीम को चुनाव लड़ने का न्यौता दे कर उन का मज़ाक उड़ाने और जाल में फंसाने का प्रयास किया था।लेकिन चुनावी परिणामों ने तथाकथित राजनीतिक धुरंदरों को उनके जाल में फंसा कर उन्हें ही कहीं मुहं  दिखाने लायक नहीं रखा।

वायदे हर पार्टी करती है और आम पार्टी ने भी किए हैं। अब देखना ये है के आम पार्टी अपने वायदों को किस   तरह पूरा करती है। वैसे असंभव शब्द  मूर्खों की डिक्शनरी में होता है। मेरा ये मानना  है के अगर नियत साफ़ हो तो असम्भव को भी सम्भव में तब्दील किया जा सकता है। ख़ास बात ये है के आम पार्टी ने जिस तरह  अपने झाड़ू से विरोधियों का सफाया किया है वो जनतंत्र /लोकतंत्र को मजबूत ही करेगा। अब तक पार्टी ने जिस तरह से  निर्णयं लिए हैं उस से केजरीवाल टीम की नियत में भी कोई खोट नज़र  नहीं आता।

राजनितिक विवशता का कमाल देखिए के कांग्रेस को अपने हाथ से ही आम आदमी के लिए झाड़ू लगाना पड़ रहा है। खैर सरकार जितने भी दिन चले ,केजरीवाल को ये नहीं भूलना होगा के उन के सिर पर काँटों का ताज रखा गया है और ये कांटे भी आम जनता के हैं। उन्हें ये कांटे बड़ी संजीदगी से निकालने होंगे ,क्योंकि कांटे निकालते हुए भी कभी कभी कांटे निकलवाने वाला दर्द सहन  नहीं कर पाता और गालियां निकालने लगता है।

आने वाले दिनों में क्या होगा ये तो भविष्य़ के गर्भ में छिपा है। लेकिन दिल्ली के परिणामों ने लोकतंत्र को एक नई दिशा दी है और आम जनता को लोकतंत्र के मायने समझ आने लगे हैं। आम जनता को  इसे समझना होगा की जो ताक़त उनके हाथों में है वो भ्रष्ट और धोखेबाज़ों पर समय आने पर झाड़ू फेर कर उन का सफाया कर सकती है।

 "शुभकामनायें आम आदमी !"  
"शुभकामनायें लोकतंत्र !"


  

Thursday, 19 December 2013

PARTY

दौरे जाम चल रहे थे ,महफ़िल में वही गिनेचुने साथी -------राहुल, डॉ डेंग ,भाटिया ,चौधरी साब,रणबीर,बबलू  और समीर। समय के साथ साथ दोस्त और अड्डा भी बदल चुका था। ऐसा नहीं के पुराने दोस्तों के साथ किनारा कर लिया गया था। दो जाम अंदर जाते ही सब का ज़िक्र शुरू हो जाता था। हर महफ़िल में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सब को जोड़ने और ज़िंदा रखने का काम करते हैं। इस महफ़िल में ये काम चौधरी साब और समीर कर रहे थे। 

इस महफ़िल में तो जैसे जमावड़े का बहाना ढूंढ़ते ते सब लोग। किसी की चोरी हुई एक्टिवा मिली हो या फिर किसी का कोई घर बिक गया हो,बस हो गई पार्टी ----------सब लोग जैसे पार्टी का बहाना ढूंढते थे।एक दिन तो चौधरी सब ने कमाल ही कर दिया। पम्मी लगभग २० दिन के बाद महफ़िल में लौटा था।उस के पिता की मृत्यु के बाद वो पहली बार आया था। थोड़ी देर की बातचीत के बाद कहा  था ,"पम्मी  जी इस बार तो grand party होगी।" पम्मी के मुख पर एक ख़ास मुस्कान थी। असल में पम्मी के पिता करोड़ों की सम्पति छोड़ गए थे। पम्मी उस का अकेला वारिस था।

 कल  पम्मी ने बातों ही बातों में बताया के नीलोखेड़ी से करनाल  आते हुए उस का एक्सीडेंट होते होते बच गया। सब ने उसका  हालचाल या कारण पूछने के बजाये एक स्वर में  कहा ,"पम्मी जी फिर तो पार्टी हो जाए।" पम्मी सकपका कर बोला ,"कमाल है आप लोगों की ,मैं मरते मरते बचा हूँ और तुम लोगों को पार्टी की सूझ रही है। 

समीर कि हाज़िर जवाबी के सब कायल थे। उस के बिना महफ़िल अधूरी लगती थी। क्या ग़म क्या ख़ुशी ------वो एक ऐसी फुलझड़ी छोड़ता ,सब हँस  हँस  कर लोटपोट हो जाते। पम्मी की बात सुन कर भी समीर से रहा न गया वो तपाक से बोला ,"पम्मी जी जान बची सो लाखों पाए ,लाखों रूपए की जान बच गई है तेरी----------- ४ -५ सौ खर्च कर भी  देगा तो भी लाखों का प्रॉफिट है तुझे। "असल में पार्टी का दबाव उसी पर बनाया जाता था जो पार्टी देने में ज़यादा आनाकानी करता था। समीर की बात सुन कर सब ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। पम्मी ने अपनी आदत के अनुसार समीर को एक मोटी सी गाली निकाली। अपनी झेंप मिटाते हुए वो बाहर  का रुख करने लगा। समीर ने पम्मी की बाहँ  पकड़ते हुए हँसते हुए  एक जुमला और छोड़ा " जान के साथ साथ पम्मी  पार्टी के पैसे भी बचा गया है.----- भाइयो। " पम्मी अपना हाथ छुड़वा कर बाहर  निकल गया।''


सब का हँसते हँसते  बुरा हाल हो चुका था। पेट में बल पड़ने के साथ साथ सब की  आँखों में आँसूं निकल आए  थे। हँसी हो या ग़मी समीर का तो जैसे जीने का अंदाज़ ही अलग था। समीर ने अपनी आँखें पोंछते हुए कहा, ,"हँस लो ,हँस लो ,अगली बारी तुम्हारी ही है।अगला विकेट तुम में से किसी का गिरने वाला है। " सब ने समझा मानो समीर पार्टी के बारे में कह रहा है। चौधरी साब तुरन्त  बोले ," मुझे  तो जब कहोगे पार्टी दे दूंगा। डॉ डेंग भी बोला ,"मैं भी कभी पीछे नहीं हटता ,क्यों चौधरी साब। " डॉ डेंग ने चौधरी साब की हामी भरवा कर जैसे अपनी बात पर मोहर  लगवा ली थी। "

असल में पम्मी और डॉ डेंग का स्वभाव बिल्कुल एक जैसा था। पैसा खर्च करने के नाम पर दोनों को जैसे साँप सूंघ जाता हो । हालांकि डॉ डेंग का स्वभाव पिछले कुछ दिनों से बदल चुका था। समीर ने माहौल का मिजाज़ बदलते हुआ कहा ,"भई मेरा मतलब पार्टी से नहीं बल्कि विकेट गिरने से है।" क्रिकेट का प्लेयर होने के वजह से समीर अपनी बातों में क्रिकेट को ज़रूर जोड़ देता था। सब टेलिविज़न की और देखने लगे। असल में टेलिविज़न पर भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच क्रिकेट मैच चल रहा था ।

समीर हँसते हँसते  फिर बोला ,"तीन विकेट गिर चुकी हैं आप की टीम की। बिन्दा ,शंटी और कक्कड़।" अभी पाँच  दिन ही तो हुए थे बिन्दे  की मौत को। शंटी लगभग डेढ साल पहले ही टीम को छोड़ कर जा चुका था। कक्कड़ के बारे में मुझे कोई ख़बर  न थी। मैंने हैरानी से समीर की और देखा। समीर ने भी मेरी तरफ हैरानगी से देखते हुए कहा ,"परसों ही तो कक्कड़ की क्रिया थी।मैं भी नहीं जा सका वहाँ। "

शंटी ,बिन्दा और कक्कड़ समीर के पुराने साथी थे। अड्डा और समय  बदलने के कारण महफ़िल के पुराने साथियों से मिलना कम ज़रूर हो गया था लेकिन उन्हें भूला  कोई नहीं था। बेशक़ शंटी की विकेट गिरे और टीम का साथ छोड़े डेढ बरस हो गया था ,पर कोई ही ऐसा दिन होता होगा के जब चार यार इकठा हों और शंटी को याद न किया जाता हो। क्योंकि शंटी बंदा ही  ऐसा था------यारों का यार।

समीर की  बात समझ आते ही सब दोबारा ज़ोर ज़ोर से हँसने  लगे। समीर का अंदाज़े बयाँ ही कुछ ऐसा था के चाहते हुए भी कोई अपनी हँसी नहीं रोक सकता था। जैसे ही चौधरी साब को समीर की बात समझ आई वो कमरे का गेट खोल  कर बाहर  निकल गए। ऐसे क्रिकेट मैच में चौधरी साब का कोई इंटरेस्ट नहीं था। क्यों के चौधरी साब को तो ये विश्वास हो चुका था के आदमी के मुख में लक्ष्मी का वास होता है। इस लिए वो कोई ऐसा मैच नहीं खेलना चाहते थे ,जिससे उन का विकेट गिर जाए और वो आउट हो जाएँ।असल में चौधरी साब कईं दिनों से बीमार चल रहे थे और वो फील्ड  में रह कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे।

हँसते हँसते एकदम से महफ़िल में सन्नाटा छा गया था। चौधरी साब मैच छोड़ कर जा चुके थे। महफ़िल में जमा सभी खिलाड़ी फिर ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे। वो ऐसे हँस  रहे थे मानो उनकी विकेट कभी नहीं गिरने वाली थी।  सभी ने टेबल पर रखा अपना अपना अपना आखिरी जाम उठाया और "चीयर्स " बोलकर अपने अपने घर रवाना हो गए।

मैंने भी अपनी एक्टिवा स्टार्ट की ,ये वही एक्टिवा थी जो चोरी होने के २ साल बाद मुझे मिली थी बिलकुल कंडम हालत में।मुझे लगभग १० हज़ार का नुक्सान हुआ था। पर यारों को तो इस बात की ख़ुशी थी की एक्टिवा घर वापिस आ गई थी और पार्टी  लिए बिना मुझे बख्शा नहीं गया था । धुंध बहुत हो गई थी। मेरी एक्टिवा धुंध को चीरती हुई आगे की और बढ़ चुकी थी।"पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए" गुनगुनाते मैं कब घर पहुँच गया मुझे पता ही न चला।

Wednesday, 18 December 2013

MASTER MIND.........

आज सुबह जैसे ही  मुझे " बिन्दे " के बारे में पता चला तो मैने समीर को इत्लाह  करना ठीक समझा। समीर को फ़ोन करते करते मुझे ध्यान आया के वो कुछ देर पहले ही तो चण्डीगढ़ के लिए निकला है। इस से पहले के मैं फ़ोन काटता समीर की उधर से आवाज़ आई ,"बस टोल प्लाजा पहुँच गए हैं ,लेकिन  धुंध बहुत है रास्ते में। " मैंने समीर को कहा ,"भाई ध्यान से जाइओ। " समीर  बोला ,"चिन्ता  न कर। " समीर की  फ़ितरत  ही ऐसी है,  जब भी कोई बात करो ,उस ने मज़ाक करना ही है।लेकिन आज वो सीरियस ही था।
 मैंने उसे पूछा ,"बिन्दे का पता चला ?"समीर धीरे से बोला," हाँ ,सवेरे ही फ़ोन आ गया था। " आज जब मैं सुबह स्कूल जा रहा था तो रास्ते में चोपड़ा ने आवाज़ लगा कर रोका। चोपड़ा बोला ,"बिन्दा पूरा हो गया है। "मेरे पाँव के नीचे से जैसे ज़मीं ख़िसक  गई हो। मैंने संभलते हुए पूछा ,"कैसे हुआ। " चोपड़ा बोला, "बस कईं दिन से बीमार चल रहा था ,रात बुखार में ही शराब पी ली। "मैंने संस्कार का टाइम पूछा और अपनी एक्टिवा स्टार्ट कर स्कूल की  और चल दिया।बिन्दा और चोपड़ा दोनों हमप्याला थे। 
आज ठण्ड बहुत थी। जैसे ही मैने अपनी एक्टिवा को रेस दी ,मेरी आँखों से पानी निकलने लगा। मैने जैसे ही अपनी आँखों को पोंछा मेरे सामने शंटी ,बिन्दे ,पण्डत ,टिड्डे ,समीर और उनकी मित्र मण्डली के साथ बिताए दिन याद  आने लगे। असल में ये सभी समीर के बचपन के दोस्त थे। मैं इनकी मण्डली में थोड़ा  लेट शामिल हुआ था। हम सभी कुछ इस तरह से घुलमिल गये थे के पता ही नहीं चलता था कौन किस की वजह से इस मित्र  मण्डली का हिस्सा है। वैसे सच कहूँ तो समीर ही  इस ' चंडाल चौकड़ी 'का मुखिया था।
हालांकि पिछले तीन सालों से ये चंडाल चौकड़ी जम  नहीं रही थी। लेकिन मुझे याद आने लगे इन के साथ बिताय वो पल।शहर के बीचों बीच समीर की दुकान पर सुबह से ही जमावड़ा शुरू हो जाता था। मण्डली का एक भी मेम्बर वहाँ पहुँचा समझो चींटिओं की  तरह वहाँ सभी जमा हो गए। और जो नहीं पहुँचता था उसे फ़ोन कर के जल्द से जल्द पहुंचने  का अल्टीमेटम दे दिया जाता था। किसी की क्या मज़ाल  के वो वहाँ समय पर न पहुँचे।
समीर के अड्डे पर पहुँचने वालों को चण्डाल चौकड़ी का नाम इस लिये दिया गया क्यों के वहाँ कोई नियम या क़ायदा नहीं था। जब जिस का दिल करता दारु की बोतल खोल कर बैठ जाता और महफ़िल ऐसी जमती के समीर की दुकान कब मधुशाला  में बदल जाती पता ही नहीं चलता था। सुबह  पीने बैठते और शाम कब हो जाती पता ही नहीं चलता था।पुराने किस्से कहानियों ,गालियों  ,गिले शिकवों ,शरारतों, छेड़खानियों ,पुरानी यादों का ऐसा सिलसिला शुरू होता के शाम  का तभी पता चलता जब घर से बीवियों के फ़ोन की घण्टी  बजने लगती।
 कईं बार तो सभा इस लिए भी  बर्खास्त करनी पड़ती क्यों की कभी बिन्दा या शंटी उलझ जाते या पण्डित इस लिए गालियां निकालने लगता के शंटी ने उस की बीवी के सामने भारद्वाज साहेब कहने कि बजाय ' पण्डत 'कह दिया। असल में शाखा ग्राउंड में साथ साथ खेलने वाले शंटी का काम आज कल मंदा चल रहा था और पण्डत की वकालत चल निकली थी। मैं तो कईं बार कह भी देता था ,"पण्डत यार तू दारु पी के एडवोकेट जनरल क्यों बन जाता है। मेरी साफगोही का बिन्दा  कायल था। वो झट से मेरा हाथ चूम लेता और कहने लगता ,"तुसी ग्रेट हो सर  जी ,सच्ची तुसी मास्टर माइंड हो सर जी। " ये बात वो कईं बार दोहराता और फिर फ़फ़क फ़फ़क कर रोने लगता। सब तितर बितर हो जाते बचते अब समीर और मैं ------बिंदे को समझाते  और चुप करवाने की कोशिश  करते।
बिन्दा कहाँ चुप होता वो तो और ज़ोर ज़ोर से रोने लगता। समीर का हाथ पकड़ कर वो अपना डायलॉग दोहराता " तुस्सी मास्टर माइंड हो सर जी ,मेरे बच्चे अब आप के हवाले हैं। " असल में समीर के स्कूल में बिन्दे  के दोनों बच्चे पढ़ते थे। पढ़ने में बिल्कुल नालायक़ ,ऊपर से बदमाशी में भी पाँव जमाने लगे  थे। बच्चों की शिकायतों से बिन्दा बहुत परेशान था। उन की  फरमाइशें पूरी करते करते बिन्दा  जैसे थक टूट चुका  था।

बिन्दा उर्फ़ बलविंदर सिंह मठारू कोई छोटी मोटी चीज़ नहीं था। ऐसा ' लोहा कुट ' कारीगर था बिन्दा के एक बार कोई डिज़ाइन देख लेता उसे हूबहू बना देता। शहर में कारीगिरी के लिए लोग उस की मिसाल देते थे। लोग अपनी बिल्डिंगस या कोठियों की ग्रिल बनवाने के लिए एडवांस भी दे जाते थे। सब ठीकठाक चल रहा था। पता नहीं बिन्दे को क्या हुआ के बिन्दे ने सुबह से ही पीनी शुरू कर दी। ये शराब बिन्दे को ऐसी लगी के बिन्दे का  काम लगभग खत्म सा ही  हो गया। मण्डली के लोगों ने उसे ख़ूब समझाया पर अब तो जैसे उस का काम में मन ही नहीं लगता था।
नौबत यहाँ तक आ गई के बिन्दा आगे आगे पैसे लेने वाले पीछे पीछे। कोई ऐसा दोस्त नहीं था जिस से बिन्दे ने पैसा न लिया हो। एक मोटरसाइकिल फाइनेंस करवाया था ,किशतें न देने की वजह से फाइनेंस वालों के गुर्गे वो भी उठा कर ले गए। बिन्दा अब सड़क पर आ चुका था।काम  मिलना भी बंद हो चुका था। क़र्ज़ लेने वालों की फहरिस्त लम्बी होती जा रही थी। बच्चों ने पढ़ाई छोड़ दी थी। सुबह सजधज कर बिल्कुल 'नवज्योत सिद्धू 'स्टाइल ड्रेस अप हो कर निकलने वाला बिन्दा अब गायब रहने लगा था। 
अड्डा बंद हो चुका था। चण्डाल चौकड़ी के लोग इधर उधर शिफ्ट हो गए थे ,कभी कभी मिलना होता था। असल में समीर की दुकान पर *ए*टी*एम *लग गया था। बिन्दे ने एक नौकरी ज्वाइन कर ली थी। कभी आते जाते बिन्दे से दुआ सलाम हो जाती थी। मास्टर माइंड  बिन्दा जैसे फेल हो गया था। सदाबहार बिन्दे को जैसे चुप्पी लग गई थी।
३ -४ महीने पहले समीर की बिटिया की शादी पर बिन्दे से फिर मुलाक़ात हुई। बहुत ही जोश से मिला बिन्दा। मिलते ही बोला, चमचम भी आई हुई है। असल में बिन्दे की पत्नी जब भी मायके जाती तो अपने घर से रसगुल्ले की तरह की एक मिठाई चमचम   ज़रूर ले कर आती। बस इसी वजह से भाभी को सभी चमचम के नाम से पुकारने लगे थे।
भाभी को मिलने के बाद मैं और बिन्दा  पण्डाल  से बाहर  आ गए। लगभग तीन साल के बाद मिलना हुआ था। मैने बच्चों का हालचाल पूछा। बिन्दा रो पड़ा। उसका एक बेटा किसी जुर्म में जेल में था। दूसरा बेटा  भी अभी कोई काम नहीं कर रहा था। बिन्दा बोला ,"सर जी तुस्सी ते  मास्टर माइंड  हो ,ये बच्चों ने सारा काम ख़राब कर दिया है जी। "आँसूं पोंछते ही बिन्दे ने साथ ही रखी दारु की  बोतल में से एक जाम बनाया और अपने अंदर उड़ेलते ही बोला ,"सर जी चियर्स ,सर जी तुस्सी मास्टरमाइंड हो। ये बोलते बोलते बिन्दा वापिस पण्डाल में चला गया।
मैं मास्टर माइंड को पण्डाल में जाते हुए देखता रहा-----भीड़ में वो कहीं खो गया।
ना मुफलिसी हो तो ,कितनी हसीन है दुनिया ----------मैं फ़िराक की ये पंक्तियाँ गुनगुनाने लगा।                            
मास्टर माइंड के साथ ये मेरी आखिरी मुलाक़ात थी।      




Sunday, 15 December 2013

A HOPE........ EK UMMEED

मेरे एक दोस्त हैं.…………मस्त ,मिलनसार और सीधी स्पाट  बात कहने वाले।उम्र करीब ४० वर्ष। सब उन्हें चौधरी साब  कह  कर बुलाते हैं।ख़ाने पीने के शौक़ीन हैं हमारे चौधरी साब।  जैसा नाम---- वैसा ही काम करने और जीने का अन्दाज़ भी। बीवी डॉक्टर हैं और बेटा इसी साल आई आई टी में सेलेक्ट हुआ है।चौधरी साब अपने बेटे और बीवी से बहुत प्यार करते हैं। ऐसा नहीं के चौधरी साब कोई काम नहीं करते। दो तीन व्यवसायिक केन्द्र हैं। लाखों किराया आता है। यानि के फुल मस्त लाइफ।

एक दिन उदासी  में थे चौधरी साब। कहने लगे बड़े  कठिन दौर देखे हैं। इस के बाद उन्होंने अरोड़ा  का किस्सा सुनाना  शुरू कर दिया। असल में बात लगभग १० बरस पुरानी  है। चौधरी साब ने शहर के नामीगिरामी व्यापारी अरोड़ा  जी  को करीब १२ - १५ लाख रूपए ब्याज पर दे रखे थे।  अरोड़ा  जी मोटा ब्याज देते थे -------शहर की कईं  पार्टीओं ने भी अपना पैसा अरोड़ा  जी को दे रखा था। उन दिनों चौधरी साब का अधिकतर समय अरोरा जी के ऑफिस में ही बीतता था। एक दिन ये ख़बर शहर में आग कि तरह फैल गई के अरोड़ा  शहर छोड़ कर भाग गया। अरोड़ा जी से वो व्यापारी, चोर और डाकू अरोड़ा हो गया। शहर के कईं लोगों के करोड़ों रूपए लेकर जो भाग गया था अरोड़ा।

अरोड़ा की ख़ोज  शुरू हुई लेकिन उसका  कुछ पता न चला। अरोड़ा  के चक्कर में कईं  लोगों की लुटिया डूब गई।चौधरी साब का तो जैसे जहाज़ ही डूब गया था।चाँद बाऊ जी और लाली भी मोटे ब्याज के चक्कर में अरोड़ा का शिकार हो गए थे।जब भी मिलते अरोड़ा  को भारी भारी गालियाँ  निकालते। जबकि उन दोनों को एक दो लाख से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता था।

 सब से ज्यादा झटका चौधरी साब को लगा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इधर उधर के कुछ प्लॉट बेचकर चौधरी साब ने मार्केट  की  देनदारी उतारी और बन गए असल चौधरी। मार्केट का हिसाब बराबर करने के बाद वो एक बात अक्सर गुनगुनाया करते ,"शुक्र  है दाते दा ,जो उस ने लाज रख लई। कोई और होता तो आत्म  हत्या ही कर लेता। "असल में उन्होंने अपने दूसरे कामों के लिए मार्केट से पैसा उधार  उठा रखा था।

कईं काम किए हैं चौधरी साब  ने अपने जीवन में। कईं नामी कम्पनियों की  दवाइयों के  होल सेल का काम था भले ज़माने में। मेडिकल स्टोर ,प्रॉपर्टी डीलिंग ,होटल ,फाइनेंस और न  जाने कितने काम किए थे चौधरी साब ने। काम  सभी चल निकले थे। इसे भाग्य कहें या फिर प्लॉनिंग में कोई कमी और या फिर चौधरी साब का काम करने का अन्दाज़------किसी भी काम में चौधरी साब जम  नहीं पाए। काम करने की इतनी ललक थी के पूना ,बंगलौर,दिल्ली ,नॉएडा और देश के कईं  हिस्सों में चक्कर लगा आए। देहरादून मंसूरी में तो उन्होने एक शानदार होटल भी खोल दिया था। अपने पार्टनर दोस्त के साथ जमी नहीं तो वो भी छोड़ घर लौट आए। जो तीन चार साल का समय ख़राब हुआ वो तो हुआ सो हुआ ,जो पैसे का नुक्सान हुआ वो अलग। चौधरी साब फिर भी मस्त।


मुझे अपने मन की  बातें बता दिया करते थे चौधरी साब। काम करने के साथ पैसा कमाने की ललक ही  थी के एक बार चौधरी साब  ने विदेश जाने का मन बना लिया। आनन फ़ानन में पासपोर्ट बनवाया गया और दिल्ली के एक एजेन्ट को ४ लाख़ रूपए और पासपोर्ट थमा दिए गए।चौधरी साब  खाने पीने के शौकीन थे। जब भी कोई महफ़िल जमती, विदेश के किस्से कहानियों का ज़िक्र  चलता। कईं  साल पहले अपने एक ख़ास  दोस्त राजेश भाटिया की मदद कर विदेश भेजा था चौधरी साब  ने।वो जब भी इंडिया आता वहाँ की ज़िन्दगी के बारे में बताता। बस अब तो जैसे चौधरी साब पँख  लगा कर उड़ जाना चाहते थे।

इस के बाद दिल्ली आने जाने का जो सिलसिला शुरू हुआ बस पूछो ही मत।पहले वीज़ा के लिए और बाद में पासपोर्ट वापिस लेने के लिए। असल में जिस एजेंट को पैसे और पासपोर्ट दिया गया था वो गायब हो गया। यहाँ भी चौधरी साब की दाल नहीं गली।एजेंट को खोजने में कई चक्कर दिल्ली के लग गए। खैर चौधरी  साब ने हार नहीं मानी। एजेंट को ख़ोज  ही  निकाला। लेकिन वो पैसे वापिस करने में आनाकानी करने लगा।  वो तो भला हो कम्पल भाई का जिस ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर के पैसे और पासपोर्ट वापिस दिलवा दिए। कम्पल भाई दिल्ली पुलिस में इंस्पेक्टर तैनात है।

ये सिलसिला यहीं खत्म  नहीं हुआ। एक दिन चौधरी साब अपने साथ किसी नई शख्सियत को लेकर आए। नये आदमी को देख कर महफ़िल के सभी लोगों ने एक दूसरे से आँखें मिलाई। समझते देर ना लगी के चौधरी साब कोई नई कहानी की नींव रखने जा रहे हैं। " ये अपने मित्र हैं ,कम्बोज जी ",बातों और परिचय का सिलसिला शुरू हुआ। समीर ने कम्बोज की पहचान के लोगों के नाम गिनवाने शुरू किए तो कुछ देर ही कम्बोज चिर परिचित लगने लगा। कम्बोज भी सभी में जल्दी ही घुलमिल गया।

गोल मटोल चेहरा ,कद लगभग ५ फुट २ इंच ,भारी भरकम पेट. ............. क़द काठी जैसी भी थी कम्बोज साब रहते बनठन कर थे।ब्रांडेड कपड़े ,माथे पर तिलक लगा कर रहना उन की  फितरत में था। पहली मुलाक़ात के बाद उन का आनाजाना आम हो गया था। चौधरी साब की  यारी कम्बोज से ऐसी लगी के महफ़िल के लोग उन पर ताने कसने लगे। दोनों की लम्बी - लम्बी मुलाकातें होने लगी,चौधरी साब ने महफ़िल में भी बैठना कम कर दिया।

मैं और समीर एक दिन  बैठे बातें कर रहे थे।दूसरी तरफ़ से कम्बोज और चौधरी साब आते दिखाई दिए।  तभी पता नहीं समीर के मन में क्या सूझा ,"ए चौधरी  दी अजकल कम्बोज नाल बड़ी गुटरगूँ चल रही है।चौधरी दी ऐसी तैसी फेरेगा ए कम्बोज। " दोनों ने ज़ोर का ठहाका लगाया और इधेर उधर की  बातें करने लगे । वैसे अब तक सब को पता चल चुका था के चौधरी कम्बोज के जाल में फँस चुका है।

असल में चौधरी साब  अपनी डॉक्टर  बीवी  को सरकारी नौकरी लगवाना चाहते थे। इसी चक्कर में वो ४ -५ लाख कम्बोज को भी फँसा  बैठे थे।ऐसा नहीं के मिसेज चौधरी में काबलियत नहीं थी। गोल्ड मेडलिस्ट थीं वो। स्कूल से लेकर डिग्री हासिल करने तक हर क्लास में फर्स्ट आती थीं मिसेज चौधरी।नौकरी के लिए पैसे देने की नौबत इस लिए आई  क्यों के इससे  पहले भी वो तीन बार टेस्ट पास कर चुकी थी परन्तु इंटरव्यू में रह  जाती थी। सरकार में कोई सिफारिश जो  न थी।

 यहाँ भी चौधरी का फंडा  बिलकुल साफ़ था के बीवी की  सरकारी नौकरी लग जायगी तो एक फिक्स इनकम घर में आने लगेगी और वो ख़ुद  कोई भी काम कर लेंगे।आजकल उनकी हर बात में मैडम का ज़िक्र ज़रूर होता। मोहिंदर भी जब कभी करनाल  आता तो चुटकी लेकर वो चौधरी साब से ये ज़रूर पूछता ,"भाभी जी दा की हाल है चौधरी साब। "फिर बाद में मुझे स्माइल देते हुए  ये ज़रूर कहता ,"बहुत प्यार करते हैं चौधरी साब अपनी बीवी से। अपनी बीवी का ज़िक्र  ज़रूर करते हैं हर बात में। "

 ये सिलसिला करीब  ३ -४ साल तक चलता रहा। नौकरी की लिस्ट फाइनल होने की तारीख़ ज्यों ज्यों नज़दीक आने लगी,कम्बोज का फ़ोन बंद रहने लगा। आपस में मिलने का सिलसिला भी कम हो गया था।जिस का डर था वही हुआ।लिस्ट जारी  हो चुकी थी लेकिन मिसेज चौधरी का नाम कहीं न था। चौधरी साब हताश हो गए। कम्बोज को उन्होंने बहुत गालियाँ निकाली। एक उम्मीद थी वो भी धाराशाई हो कर बिखर गई।
 पिछले १२ साल से कोशिश  कर रहे थे नौकरी के लिए और इस बार ये आखरी चान्स  भी था। कम्बोज अंडर ग्राउंड हो चुका  था। अब  कम्बोज को ढूंढ़ने और पैसे वापिस लेने की  क़वायद शुरू हो चुकी थी । वैसे अंदर की बात ये है के पैसे अभी तक वापिस नहीं आए  हैं और चौधरी साब इस उम्मीद पर ज़िन्दा  हैं ,"उन की हक़ हलाल की कमाई है पैसे वापिस ज़रूर आयेंगे। "

 चौधरी साब तो जैसे टूट से गए थे । थोड़ा  ब्लड प्रेशर भी बढ़ने लगा था। बात -बात पर  गुस्सा करना उन की आदत में शामिल हो चुका था।पिछले दिनों बीमार भी रहे।बातें भी कुछ उटपटांग सी करने लगे थे। उनके व्यवहार से ऐसा लगने लगा था मानो  डिप्रेशन का शिकार हो गए हों। लगभग एक डेढ साल तक इलाज चला, खूब पैसा भी लगा पर मर्ज़ ऐसी के जाने का नाम नहीं ले रही थी। चौधरी साब सब से अलग चुपचाप रहने लगे।जैसे जीने का कोई मक़सद ही न हो। 

 पिछले पाँच महीनों से चौधरी साब में ज़बरदस्त बदलाव आ गया था। बेटा  आई आई टी में सेलेक्ट हो  गया था।जैसे  बिमारी वीमारी कोई थी ही नहीं। चेहरा भी पहले कि तरह टमाटर की  तरह लाल हो गया था। महफ़िलों का दौर फिर से शुरू हो गया था। रिजल्ट से पहले ही आई आई टी से पास हो कर निकलने वाले बच्चों के पैकेज की बात अब अक्सर होने लगी थी। कोई भी बात होती घूम फिर कर उस का अन्त आई आई टी के बच्चों को मिलने वाले पैकेज से ही होता। उस दिन जब मैंने चौधरी साब को अख़बार में छपी एक ख़बर  का ज़िक्र  किया तो वो बोले ,"५० -६० लाख का पैकेज तो कुछ भी नहीं आजकल तो डेढ़ से दो करोड़ तक का पैकेज मिलने लगा है बच्चों को। ये बात कहते ही  उन के चेहरे पर संतुष्टी के जो भाव आए वो सचमुच ऐसे थे मानो उन्हें  उनकी  लम्बी तपस्या का फल मिल गया हो।

जिस दिन आई आई टी का रिजल्ट आया चौधरी साब की ख़ुशी का कोई ठिकाना  न रहा। कईं  दिन तक रिश्तेदारों और दोस्तों में मिठाई  बाँटने का सिलसिला चलता रहा। चौधरी साब के तो पाँव जैसे ज़मीन पर ही नहीं पड़ रहे थे। २० -२५ हज़ार की मिठाई बाँट दी गई थी और दोस्तों को पार्टी देने में जो खर्च हुआ उस का तो हिसाब किताब ही नहीं। महफ़िल के दौर चल  रहे थे बधाई देने के लिए आने वालों का सिलसिला बदस्तूर जारी था।

एक दिन महफ़िल जमी हुई थी। रणबीर भी पार्टी में था। रणबीर ,चौधरी साब के देहरादून वाले होटल में पार्टनर था। पार्टनरशिप टूटने के बावजूद भी  रणबीर और चौधरी अक्सर मिलते रहते थे। रणबीर चौधरी साब के शाही अंदाज़ पर अक्सर चुटकी लेता रहता था। आज भी रणबीर ने चुटकी लेते  हुए कहा ,"यू चौधरी सब ते पहलां मरेगा। कामकाज तो यो कुछ करदा नी। अर इस की  मौज मस्ती तो देखो। " इस से पहले के रणबीर की बात पर कोई रियेक्ट करता चौधरी साब फुँफकारते हुए चिल्लाए ,"तेरे बाप की  नहीं ख़ाता हूँ। जब देखो उल्टा ही  बोलेगा। " महफ़िल में सन्नाटा छा  गया था। रणबीर को तो जैसे साँप  ही  सूँघ  गया था।

धीरे धीरे सब सरकने लगे थे। मैने धीरे से चौधरी साब के कंधे पर हाथ रखते हुए  शांत होने का इशारा किया तो चौधरी साब फूट फूट कर रोने लगे। सिसकियाँ लेते हुए वो बोले ,"अभी तो एक उम्मीद जगी थी और जीने का मज़ा आने लगा था पता नहीं कैसी कैसी उल्टी बातें करता है।जब देखो मरने की ही बातें करता रहता है। " मैंने उन को समझाते हुए जब ये कहा " रणबीर का आपको दुःख पहुँचाने का कोई उदेशय नहीं था।"चौधरी साब झट से बोले ,"मलिक साब आप को नहीं पता, कईं  बार आदमी के मुहँ में सरस्वती बैठी होती है। "

मन तो बहुत हुआ के उसी वक्त ज़ोर से ठहाका  लगाऊँ। परन्तु स्तिथि ऐसी थी के मैं उस समय हँस  नहीं पाया।
 
 

Saturday, 7 December 2013

THIRD CLASS...!

बच्चों कि दुनिया भी कमाल की  दुनिया होती है। यदि उनकी बातों  को ध्यान से सुना जाए तो उनकी चुलबुली बातें ख़ुद  को बचपन में ले  जाती हैं। सब से बेख़बर------बस जो कह दिया, सो कह दिया। उनकी बात को सुन कर कोई क्या कहेगा या सोचेगा इस से बेफ़िक़र् वो अपनी बात को बड़ी सादगी से कह जाते हैं।

कल ही की तो बात है ,मैंने स्टाफ को बुला कर कहा था ,"टीचर्स ,क्या आप को नहीं लगता के स्कूल में बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं। "मेरी बात पूरी होने से पहले ही एक अध्यापिका बोली ,"हाँ सर,थर्ड क्लास के बच्चे तो किसी की सुनते ही नहीं हैं। इस क्लास में अधिकतर बच्चे  ऐसे हैं जिन्हें कंट्रोल करना बहुत मुश्किल हो गया है। "एक और मैडम ने सुषमा की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ,"सच में सर ,थर्ड क्लास ने तो हद कर दी है , ऐसी  गालियां निकालते  हैं... ……  बस मैं आप को बता नहीं सकती। "

टीचर्स की बात सुनकर एक बारगी तो मुझे लगा मानो तीसरी कक्षा के बच्चे  सच में "थर्ड क्लास" का व्यवहार करने लगे  हैं। इस से पहले भी बच्चों की ऐसी शिकायतें मेरे पास आ चुकी थीं। असेंबली में समझाने और दूसरे कईं तरीके अपनाने के बावजूद भी "थर्ड क्लास" के बच्चों पर कोई असर नहीं हो रहा था।

असल में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों में अधिकतर मेहनतकश परिवारों से हैं। परिवार में अधिकतर लोग कम पढ़े लिखे होने के कारण, अक्सर अपनी आम भाषा में कुछ ख़ास गालिओं का प्रयोग करते हैं.…………… ये मैं अच्छी तरह से जानता था। कईं बार तो गालिओं का तड़का इस कद्र लगा होता है मानो वो बात न करके गालियां सुनाने का कोई कम्पटीशन लड़ रहे हों।

 यहीं से शुरू होता है बच्चों के गाली  सीखने और उन्हें अपनी आम भाषा में प्रयोग करने का सिलसिला। कईं बार गाली देते हुए बच्चे ऐसे एक्शन करते हैं मानो सृजन की प्रतिमूर्ति ये बालक ही हों। बेशक़ इनको किसी भी चीज़ के मायने पता नहीं होते हैं।

एक तरफ़  मेरी ये ज़िम्मेदारी थी के बच्चों को इस लत से छुटकारा दिलवाया जाये और दूसरी तरफ़ बच्चों के सृजन कार्यों का मैं कायल भी था। गाली निकालने का अंदाज़,अपने टीचर्स की  हूबहू नक़ल उतारना ,किसी कमज़ोर बच्चे  को तंग करने के नए -नए  तरीक़े अपनाना ,शरारत करने के बाद अपने साथी को फँसवा देना ,टीचर विशेष के मुँह मोड़ते ही उस के पीछे डांस की मुद्रा बनाना मुझे बहुत अच्छा लगता था।

बच्चे क्या हम भी तो जाने अनजाने अपने आसपास के लोगों की  नक़ल करते हैं। इसलिए  बच्चों की  इन चुलबुली बातों पर मुझे  गुस्सा कम ही आता था। आज  जब मैं अपने रूम में बैठा था तो एक आवाज़ मेरे कानों में गूंजी ,"चुप ,ख़बरदार अगर अब आवाज़ आई तो। "असल में ये भंडारी मैडम की आवाज़ थी। मेरे लिए ये आवाज़ चिरपरिचित थी।

पिछले एक दो दिन से चल रही प्रक्रिया से मैं दुःखी तो था लेकिन भंडारी मैडम की गर्जन ने मेरे अंदर का आर्टिस्ट जगा दिया। मैं भी बच्चा बन गया। सोचने लगा ,"  अगर भंडारी मैडम पुलिस में होती तो बड़े से बड़े खूंखार  मुज़रिम थर थर काँपते। " मैं ये सोच  ही रहा था के मेरे चेहरे पर मैंने एक अजीब सी मुस्कान  को महसूस किया। मैं अकेला हँसने  लगा। मैं चूंकि अपने कमरे में अकेला बैठा था , मैं भंडारी मैडम के डायलाग दोहराने लगा ," चुप ,ख़बरदार अगर अब आवाज़ आई तो। "  मेरे दिमाग में उनका ख़तरनाक़  सा चेहरा घूमने लगा।  उन की इस गर्जन से बच्चे डरते भी होंगे--------------- ये सोच कर  मैं फिर हँसने  लगा।

 नवज्योत  मैडम ने कमरे में प्रवेश करते हुए  कहा ," क्या बात हुई सर ,अकेले अकेले क्यों हँसे  जा रहे हो। " मैंने  कहा ," कुछ नहीं, बस यूँ  ही।" नवज्योत तुरन्त बोली ," कुछ तो बात है  सर। "मैंने भंडारी मैडम का डायलॉग सुनाते हुए पूछा ," क्या सच में भंडारी मैडम की गर्जन से बच्चे डरते हैं ?" मेरा कमरा नवज्योत के ठहाके से गूंजने लगा। वो कुछ इस तरह से हँसी के मैं भी अपनी हँसी को रोक न सका। मैने हँसते हुए पूछा , "ऐसा क्या हुआ भई ,मैंने  कोई ग़लत सवाल पूछा  क्या ?"

नवज्योत अपनी हँसी पर नियंत्रण करते हुए बोली ,"डरना तो दूर ,बच्चे जो मैडम के बारे में बोलते हैं उसे सुनोगे तो आप भी दंग रह  जाओगे। "मैडम कि इस  बात ने मेरे अंदर उत्सुकता का भाव जगा दिया। मैंने तुरन्त अपना सवाल दोहराया, "  ऐसा क्या हुआ ?

 नवज्योत ने कहा , "दो बच्चियाँ आपस में बात कर रही थीं। वो अपनी बात में पूरी तरह मग्न थीं। मैं उनकी बात को सुनने के लिए रुक गई। " एक ने ग्राउंड में खड़ी भंडारी मैडम की  और इशारा करते हुए कहा , "वो देख मोटी मैडम ,  कैसे डांटती रहती है सब को। " असल में भंडारी मैडम ग्राउंड में खेल रहे बच्चों को डांट  रही थी। दूसरी बच्ची बोली ,"मेरा मन तो करता है के इस पर तेल छिड़क कर आग लगा दूँ।" 

मैं अपनी हँसी को रोक न पाया। मैंने पूछा ," कौन सी  क्लास की  बच्चियाँ थी। "

मैडम ने कहा ,"  थर्ड क्लास !"  इतने में स्कूल की घण्टी बज गई ,नवज्योत ने अपना पर्स उठा कर जाने की इच्छा ज़ाहिर की। मैं सोचने लगा के आखिर  इस *थर्ड क्लास* के लिए ज़िम्मेदार कौन है ?

Sunday, 17 November 2013

CHINTA NA KARO,KOI PROBLEM NAHIN HOGI....."Don't worry there will be no problem"

एक बार बच्चों के साथ थिएटर वर्कशॉप  कर रहा था। बच्चों कि उम्र कोई ७ साल से १५ साल की  रही होगी।मेरी आशा के अनुरूप  सभी बच्चे  काफ़ी होशियार और तेज़ थे।मैंने  उनको बताया के नाटक  करना अपने आप में  एक  जूनून होता है। हर व्यक्ति  के बस की बात भी नहीं है नाटक करना।आप यहाँ आये हैं तो इस लिए आप ख़ुद  को स्पेशल समझें। मैंने  अपनी बात दोहराई -"हर व्यक्ति  के बस कि बात नहीं है नाटक करना।"वर्कशॉप के शुरुआत में  कही गई ये बात शायद उन्हें समझ आ गई  थी।बच्चों ने ख़ूब  मेहनत की और वर्कशॉप के दौरान बताए गये टिप्स ,  अपनी एक्टिंग ,इमेजिनेशन ,ऑब्जरवेशन और लगन से ये सिद्ध कर दिया के बच्चे सोच समझ में किसी से कम नहीं होते।

बच्चों की  इस परफॉरमेंस की सभी ने सराहना की। थिएटर वर्कशॉप का प्रबंधन स्थानीय सामाजिक संस्था द्वारा किया गया था। भाग्यवश संस्था के डायरेक्टर गीतकार होने के साथ साथ संगीतकार भी थे। मैने उन को नाटक के बारे में बताया और गुज़ारिश की ,"नाटक में यदि गीत संगीत में आप हमारी मदद कर देंगे तो नाटक में चार चाँद लग जाऐंगे। उन्होनें हमेशा की  तरह अपने एक ख़ास  अंदाज़ में कहा ,"चिंता ना  करो ,कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। क्या पहले आप को कभी प्रॉब्लम आई है? " उन के इस प्रशन का मैं कोई  जवाब देता,वो  अपने शिषयों को किसी राग के बारे में बतलाने लगे।

 इस बार मैं अरोरा जी,(गीतकार व  संगीतकार) को साफ़ साफ़ कह  देना चाहता था के हमेशा आप ही की वज़ह से नाटक के साँस फूल जाते हैं। असल में मैं अरोरा जी  के साथ कईं  सालों से काम कर रहा था। ऐसा नहीं के मैंने पहले उन को  कभी ऐसा नहीं कहा था ,लेकिन इस बार मैं सीरियस था। लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी वही हुआ जिस का मुझे डर था।रिहर्सल्स शुरू हो चुकी थी , २०-२५ दिन से बच्चे कड़ी मशक़त कर रहे थे। इस दौरान  अरोड़ा जी से कईं  बार मुलाक़ात हुई पर उन्होने नाटक के म्यूजिक बारे कभी कोई बात नहीं की। मेरे द्वारा म्यूजिक की  बात किए जाने पर उन्होंने हमेशा की तरह बस यही कहा ,"चिंता ना  करो कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। "

जिस का डर  था वही हुआ -नाटक बढ़िया हुआ ,बच्चों की  एक्टिंग को भी सराहा गया लेकिन सभी ने ये ज़रूर कहा ,"म्यूजिक ठीक से होता तो परफॉरमेंस में चार चाँद लग जाते। "मुझे कोई ज्यादा  दुःख नहीं हुआ, मैं म्यूजिक वालों के इस फैशन से वाक़िफ था। परफॉरमेंस वाले दिन शो से कुछ देर पहले केसिओ पर उँगलिआ  घुमाई और पूरे कॉन्फिडेंस से बोला ,"चिंता ना  करो कोई प्रॉब्लम नहीं होगी। या फिर कभी कभी कोई ये भी कह देता है ,"चिंता न करो ,मैं संभाल  लूँगा। "

 वैसे हम ज़िन्दगी में भी  हर रोज़ नए क़िरदार  निभाते हैं पर असल ज़िन्दगी और स्टेज पर दिखने वाले करक्टेरस में  काफ़ी  अंतर होता है। दोनों में फ़र्क़ ये  है के असल ज़िन्दगी का  करक्टेर थोड़ा  पेचीदा और  मुश्किल होता है।   असल ज़िन्दगी का करक्टेर जो दिखाई देता है वो होता नहीं और जो वो होता है वो दिखाई नहीं देता।  इस के बिल्कुल  विपरीत स्टेज पर एक्टर के द्वारा  जो करक्टेर निभाया जा रहा होता है  वो अपने अंदर और बाहर पूरी सच्चाई  लिए होता है। यही फर्क सिनेमा और स्टेज में  भी है। सिनेमा में  मीटर को  सुविधानुसार ऊपर नीचे किया जा सकता है लेकिन स्टेज पर जो दिखाई देता है वही  वास्तविकता होती है।

नाटक करने वाले जानते हैं के इस दौरान एक्टर्स और डायरेक्टर स्वयं को न जी  कर उन पात्रों  को जी  रहे होते हैं जिन्हें उन्हें स्टेज पर जीवान्त  करना होता है। नाटक एक ऐसी विधा है जिस में संगीत ,गीत,अभिनय,श्रृंगार ,सेट और मेकअप का अपना अपना महत्व होता है। यदि ये सभी सलीके से नाटक में प्रयोग हो जाएं तो  नाटक में  सात्विकता आ जाती है। और फिर नाटक -नाटक न रह  कर असल ज़िन्दगी बन जाता है।नाट्य शास्त्र में भी इस बात का वर्णन है के कोई भी नाटक सात्विक तभी कहलाता है जब उस में सभी विधाएँ पूरी तरह से एक -दूसरे के साथ सामजस्य बना लेती हैं। 

पिछले कईं सालों  के अनुभव पर जब नज़र दौड़ाता हूँ तो लगता है जैसे बहुत कुछ और किया जा सकता था।   लेकिन फिर ये एहसास मन में  सुकून पहुँचाता  है के जितना किया "भरपूर" किया। इस बात का हमेशा अफ़सोस रहा के जब भी नाटक किया म्यूजिक वालों ने हमेशा दग़ा  दिया।

हाल ही में  बच्चों के साथ नाटक किया ,"पल पल जीती हर पल मरती। "

 इस बार स्तिथि कुछ अलग थी। यहाँ अरोड़ा  जी  नहीं बल्कि सुधीर जी  थे। सुधीर जी  को भी मैंने वही  बात दोहराई। मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना ना रहा जब सुधीर जी  ने कहा ,"एक बार रिहर्सल देख लेते हैं तभी पता चल पायेगा कि आप कि क्या रेकुइरेमेंट है। रिहर्सल शुरू हुई ,सुधीर जी   ने बड़े ध्यान से नाटक देखा। नाटक को देखने के  बाद कुछ सीरियस होते हुए सुधीर जी  बोले ,"नाटक तो अच्छा है ,लेकिन मेरे पास वयस्तता कुछ ज्यादा  है। मैं आप को सिर्फ ३-४ दिन ही दे पाऊँगा।"मैं ख़ुश था , सुधीर जी को ये  समझ तो है के नाटक में म्यूज़िक के लिए रिहर्सल  ज़रुरत होती है। मैने दोबारा अपने एक्सपीरियंस का ज़िक्र करते हुए कहा ,"कईं  सालों से नाटक करवा रहा हूँ लेकिन  म्यूजिक के कारण हमेशा नाटक ढीला रह  जाता है।आप से ही उम्मीद है इस बार। " मेरे इन शब्दों में गुज़ारिश के साथ साथ थोड़ी  माखनबाज़ी  भी थी।

तय दिन पर ,शो से तीन दिन पहले मैंने  सुधीर जी  को फ़ोन लगाया। उधर से आवाज़ आई ,"बस १० मिनट में  पहुँच रहा हूँ। " मेरी ख़ुशी का कोई  ठिकाना न रहा। रिहर्सल शुरू हो गई। कुछ देर में  सुधीर जी  भी पहुँच गये। सुधीर जी  के साथ एक ऍकम्पनिस्ट भी था। "जल्द से आप मुझे गाने लिख कर दो ,नाटक तो मैंने  देख ही लिया था। मैं आप को कल रिहर्सल करवा दूंगा। " बच्चों से बातचीत करते हुए  उन्होंने धीरे से कहा। मैंने  उस की तरफ आश्चर्य से देखा तो मुझे अपने पक्ष में  लेते  हुए  कहा ,"आप भी प्रोफेशनल हैं ,क्या है कि आजकल सीजन है। एक्चुअल  में  बात ये है कि अम्बाला और यमुनानगर में  भी करनाल  की  तरह यूथ  फ़ेस्टिवल  चल रहे हैं। वहाँ भी काम पकड़ा हुआ हैं ,आप थोड़ा  एडजस्ट कर लेंगे तो हमारा काम चल जायगा। "मुझे एक बार तो ऐसा लगा मानो  मेरे और सुधीर के बीच कोर्ट में  कोई केस चल रहा है ,ऐसे में  सुधीर मेरे से कोई समझोता करना चाहता है और वो भी कोर्ट के बाहर ही।  "

इस से पहले के मैं उस की  इस बात का कोई जवाब देता ,मैंने  देखा सुधीर अपना केसिओ  अपने काले झोले में  पैक कर चुका  था,ऍकम्पनिस्ट भी ग़ायब  हो चुका  था। मुझे ऐसा लगा मानो किसी मदारी ने अपना खेल दिखा दिया है और अब कह  रहा है ,"बच्चा लोग बजाओ ताली ,ज़िंदगी  रही तो फिर मिलेंगे। "ग़ुस्सा  तो बहुत आ रहा था ,मैंने चेहरे  पर नक़ली मुस्कान बिखेरते हुए  कहा ,"सुधीर जी। "इस से आगे मैं कुछ बोल पाता सुधीर बोला ,"सर आप चिंता न करो ,कोई प्रॉब्लम नहीं होगी मैं सब संभाल  लूँगा। "ये कहते कहते सुधीर बाहर  खड़ी अपनी मोटरसाइकिल तक पहुँच चुका  था। उस ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की  और बोला,"ठीक है सर कल मिलते हैं। "

Sunday, 3 November 2013

POSITION.......!

कई दिनों के बाद नाटक करने का एक प्रोजेक्ट हाथ लगा था । वो भी लड़कियों के कॉलेज में। कईं दिनों की माथापच्ची के बाद ये तय हुआ के कोई करंट टॉपिक पर प्ले करवाया जाए। आर्टिस्ट  सेलेक्ट  करने  का  दौर चला। दो टीचर्स की ड्यूटी लगा दी गई।
आनन  फानन  में  लड़किओं  को नोटिस भेजा गया।एक कमरे में करीब पचास लड़कियां इकठ्ठा हो गई।लड़कियों को बताया गया था के यूथ फेस्टिवल में होने वाले प्ले के लिए सिलेक्शन की जाएगी।
   .  
खूबसारी लड़कियों को देख कर मेरा भी मन गदगद हो गया था।आखिर कई दिनों के बाद  नाटक  करवाने का मौका जो  मिला था।लड़कियों में भी जोश नज़र आ रहा था।आखिर हो भी क्यों ना -----यूथ फेस्टिवल में पार्टिसिपेशन  जो बात थी।

 लड़कियों  के  कमरे में प्रवेश के समय सब से पीछे बैठने की हौड़ से मैंने अन्दाज़ा लगा लिया के कुछ घालमेल है। वही हुआ ।बच्चों के साथ बातचीत का सिलसिला अभी शुरू ही हुआ था के पीरियड चेंज  होने की घंटी के साथ ही क्लास में हलचल शुरू हो गई ।मैं कुछ समझ पता इस से पहले ही ड्यूटी इंचार्ज एक अध्यापिका ने मुझे समझाने  कि कोशिश करते हुए कहा "बच्चों कि क्लास है ज़बरदस्ती से इन को यहाँ ले कर आए थे। "इस से पहले वो अपनी बात पूरी कर पाती क्लास लगभग खाली हो चुकी थी।

अब यूथ  फेस्टिवल में पार्टिसिपेशन के नाम पर बची थी केवल ५-६ लड़कियां।मै समझ चुका था के स्तिथी अभी भी बदली नही है।मैंने जैसे ही इंचार्ज की  और देखा तो वो झुंजला कर बोली "पता नहीं आज कल बच्चों को क्या हो गया है ,ये आगे ही नहीं आती हैं।कल्चरल एक्टिविटीज में जैसे इन का इंटरेस्ट ही नहीं है।"

ख़ैर ! मैंने  बची हुई लड़कियों से बातचीत का सिलसिला जारी रखा और थिएटर में उन के इंटरेस्ट को टटोलने का काम करने लगा।जैसे जैसे दिन बीतने लगे लड़कियों की सँख्या घट कर ३ रह  गई थी।काजल और प्रियंका को छोड़ हर रोज़ लड़कियां बदल जातीं। किसी ने डेंगू का बहाना किया तो किसी ने टर्म टेस्ट की दुहाई दी। और तो और एक बच्ची ने तो नाटक करने को इसलिए मना कर दिया के उस के घर वालों को पता चल गया तो वो बुरा मानेंगे। रिहर्सल ज्यों ज्यों आगे बढ़ी ,बच्चे तो बच्चे ऑडिशन के समय वाली इंचार्ज टीचर्स भी ग़ायब थी।

फ़ोन पर जब मैंने उन से बात की और बताया के रिहर्सल पर लड़कियां नहीं हैं तो उन्होंने आश्चर्य से पूछा "क्या बात हो गई ,उस समय तो ये लड़कियां पूरा इंटरेस्ट दिखा रही थी। चलो कोई बात नहीं आज तो मैं छुट्टी पर हूँ कल आ कर लड़कियों से बात करती हूँ। "  मैने उन्हें कहा इंटरेस्ट दिखाने और अन्दर  के इंटरेस्ट में बहुत फर्क है।" मुझे थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था। मैं उन्हें साफ़ साफ़ कह देना चाहता था के आप लोगों में इंटरेस्ट दिखाई नहीं देता है इस लिए ही कॉलेजों में पार्टिसिपेशन के नाम पर खानापूर्ति की जाती है।
   .
मुझे याद आ गया कॉलेज का वो पहला दिन जब मिसेज भंडारी मुझे कॉलेज की  प्रिंसिपल से मिलवाने के लिए ले उस के कमरे में ले  गई थी। जैसे ही हम ने उस के रूम में प्रवेश किया प्रिंसिपल ने मेरी तरफ़  कुछ इस तरह से देखा मानो  मुझे नाटक करवाने के लिए नहीं बल्कि किसी परमानेंट जॉब का इंटरव्यू देने के लिए बुलवाया गया हो। मुझे प्रिंसिपल का स्टाइल एक खड़ूस अफ़सर  कि तरह लगा और मैने बिना समय गंवाए कुर्सी पर बैठना मुनासिफ समझा।  मेरे बैठते ही उस ने  अपने चश्मे के ऊपरी हिस्से में से मुझे झाँका और टेबल पर रखे अपने बैग में से कुछ निकालने लगी।बैग में से एक नैपकिन निकल कर उस ने अपने नाक  को अंदर तक साफ़ कर डाला।नाक को अच्छी तरह साफ़ करने और एक टिपिकल आवाज़ के बाद उस ने नैपकिन को डस्टबिन में डालते हुए  कुछ कहना चाहा।शायद तबियत ख़राब थी प्रिंसिपल की।

 इस से पहले के वो मुझ से कुछ कहती मेरे बगल में बैठी संगीता मैडम ने कहा ,"आप किस डॉक्टर से ट्रीटमेंट करवा रही हैं। आज तो कुछ आराम नज़र आ रहा है। "  "कोई डॉक्टर नहीं मैं तो सेल्फ़ ट्रीटमेंट में विश्वास रखती हूँ।" प्रिंसिपल ने यह बात कुछ इस अंदाज़ में कही के संगीता मैडम ने झट से उन कि हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, "ये बात तो आप कि बिल्कुल ठीक कह रही हैं ।" भंडारी मैडम ने भी  अपनी गर्दन हिला कर अपनी स्वकृति दे दी। इधर उधर की  एक दो और  बातों के बाद भंडारी मैडम ने मेरा परिचय प्रिंसिपल से करवाया।

और फिर शुरू हुआ इंटरव्यू का दौर.............. !
"आप ने इस से पहले कहाँ नाटक करवाया है?" प्रिंसिपल ने पहला प्रशन कुछ इस तरह से दागा। मैंने धीरे से उतर दिया ,"जी मैं शहर के लगभग सभी कॉलेज में नाटक करवा चुका  हूँ।" प्रिंसिपल महोदया ने दूसरा प्रशन दागा, "कौन सा नाटक करवाएंगे आप ? " मैंने कहा ,"अभी बच्चों से मेरी मुलाक़ात  नहीं हुई है ,एक बार बच्चों से मिल लिया जाए। उन के स्टफ का पता चल जाए तभी decide कर लेंगे। "

"कोई स्क्रिप्ट है आप के पास ? हम चाह्ते  हैं के कोई करंट इशू पर नाटक हो।" प्रिंसिपल ने फिर अपना सवाल दागा।मैंने अपना जवाब दोहराया ,"जब तक बच्चों से बात नहीं हो जाती तय करना मुश्किल होगा के कौन सा नाटक करवाया जाए। मैंने  बात को आगे बढ़ाते हुए  कहा, " एक बार बच्चों के साथ इंटरेक्शन ज़रूरी है ,एक वर्कशॉप के ज़रिए एक्टर्स चुनने में भी आसानी होगी। "मेरी बात शायद उन्हें समझ आ गई थी।

 इंटरव्यू के इस दौर में जिन दो असल प्रश्नों का मैं  इंतज़ार कर रहा था वो अभी तक प्रिंसिपल महोदया ने दागे ही नहीं थे । मैं जानता था कि असल तोलमोल तो मेहनताने पर होता है और इस पर अभी तक कोई चर्चा नहीं हुई थी। ख़ैर मेरी इस समस्या का हल मिसेज भंडारी ने कर दिया। असल में इस से पहले भी मैं इंटरव्यू के एक दौर से निकल चुका था। पहले दौर में इस कि चर्चा मिसेज भंडारी से हो चुकी थी। भंडारी मैडम ने प्रिंसिपल से मेरे साथ हुई बातचीत का ब्यौरा देते हुए पेमेंट का ज़िक्र  किया। वो सब कुछ प्रिंसिपल से ही फाइनल करवाना चाहती थी ताकि पेमेंट देने के समय कोई झमेला ना हो।

लाला की  दुकान पर परचून का सामान खरीदते समय भाव मोल करने वाली एक औरत की तरह  प्रिंसिपल ने एक दम से रियेक्ट करते हुए कहा ," ये तो बहुत ज़यादा  हैं। " मैं जवाब के लिए पहले से ही तैयार था। मैं ऐसे तोलमोल से वाक़िफ  था। एक ब्रांडेड शोरूम की  तरह मैं भी अपने टैग रेट पर अडिग रहा। हालाँकि  मैंने पहले ही अपना मेहनताना कम बताया था। क्योंकि मैं  पैसे के लिए नहीं अपितु नाटक करने के उदेशय से ही वहाँ गया था। इस के साथ साथ मुझे इस बात का भी इल्म था के कॉलेज वाले ऐसी एक्टिविटीज पर ज़यादा पैसा खर्च नहीं करते और कईं बार पैसे कि वजह से वो पर्टिकुलर आइटम को मिस भी कर देते हैं।

अभी मैं  सोच ही रहा था के प्रिंसिपल ने दूसरे असल प्रशन को दागते हुए  कहा ,"पैसे कि कोई बात नहीं ,हम तो बस यही चाहेंगे कि फेस्टिवल में हमारी पोजीशन आनी चाहिए।  लास्ट इयर भी हमारे नाटक की  लड़की बेस्ट एक्ट्रेस सिलेक्ट हुई थी। "

प्रिंसिपल  की इस बात से  एकबार तो मुझे ये लगा जैसे मैं नाटक डायरेक्ट करवाने के लिए नहीं बल्कि एक सेल्समेन की तरह कोई शर्ट या सूट का कपड़ा बेचने आया हूँ। जहाँ मुझे कपड़े के साथ उस के पक्के रंग कि भी गॉरंटी देनी पड़ रही थी।




लेकिन इस पूरी जद्दो जहद में मुझे एक बात अच्छी तरह समझ आ चुकी थी के यूथफेस्टिवल के इस  कम्पटीशन में भागेदारी केवल पोजीशन का खेल है। यूथफेस्टिवल में कल्चर या यूथ के डेवलपमेंट कॉलेज वालों को कुछ लेना देना नहीं है।बच्चों को यूथफेस्टिवल में पोजीशन हासिल करवाने और अपनी पोजीशन भी बनी रहे --इस बात का ध्यान रखते हुए बच्चॊं के साथ नाटक करने में  जुट गया था।                                                                                                                                                                            थ