Tuesday, 7 October 2014

A Letter....Ek Chithee Part-21

                                                         समय चक्र 
 आज सुबह नींद जल्दी खुल गई। उठा तो सोचा सैर पर निकल लेता हूँ ,लेकिन अभी तीन ही बजे थे। मन किया क्यों न कुछ लिख लिया जाए। लिखना तो क्या था। बैठ गया पढ़ने पुरानी चिठियों को। पेन कागज़ की जगह आज कल लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन्स ने ले ली है। जैसे ही लिखने बैठा ,सोचा कुछ पुराना लिखा हुआ पढ़ लिया जाए। मैं आप को अब तक 20 चिठियां लिख चुका हूँ। ये आप को मेरी 21 वीं चिठ्ठी है। पहली चिठ्ठी 30 जनवरी 2014 और पहला ब्लॉग 15 सितम्बर 2013 को लिखा था । लगभग एक साल से चिठियों , कहानियों और ब्लॉग्स के ज़रिए आप से अपने मन की बात करता आ रहा हूँ ।
भला हो धीरेश सैनी का जो सन 2011 में मेरे घर आया और मेरा फेस बुक अकाउंट खोल गया। धीरेश सैनी  लम्बे समय तक करनाल अमर उजाला में पत्रकार के रूप में काम करता रहा। मेरी उससे मुलाक़ात बस यूं ही हो गई थी। कलम पर उस की पकड़ कमाल की है।आज कल फेस बुक के ज़रिये कभी कभी फॉर्मल बातचीत हो जाती है। हर आदमी अपनी अपनी दुनिया में व्यस्त है। समय के साथ -साथ शायद धीरेश की दुनिया भी बदली है।  ये समय चक्र का ही कमाल है।

पिछले साल सितम्बर-ऑक्टूबर 2013 में एक कॉलेज में नाटक करवाया था। इस बार फिर ठेका मिला है। लेखक और निर्देशक कुछ नया और प्रासंगिक करने के लिए जूझ रहे हैं। इस सोच के साथ के शायद कुछ सृजन हो जाए।  नाटक नया है , कॉलेज वही है , कुछ पात्र बदल गए हैं लेकिन परिस्थितियां और सोच वही है। कॉलेज में नाटक करना भी नाटक हो गया है। यहाँ समय चक्र अपना कमाल कब दिखाएगा कुछ मालूम नहीं।
काजल को छोड़ कर नाटक में एक्टिंग कर रही सभी लड़कियां नई हैं। किसी ने भी इस से पहले कभी नाटक नहीं किया है। काजल ,स्मृति ,प्रीति ,सोनम ,सोनाली ,दीक्षा  रूचि और भारती सभी बढ़िया काम कर रही हैं। नाटक के प्रति सब की लग्न देखते ही बनती है।
ये समय चक्र का ही कमाल है के फेस बुक के ज़रिए लगभग 27 बरस बाद कॉलेज के कुछ साथियों गगन अत्रेजा , रणवीर कुंडू और अतुल शर्मा से मुलाकात हो गई। कॉलेज के दिनों में गगन ग़ज़ल गायिकी का जानामाना नाम था। गगन आजकल किसी दवाइयों की कंपनी में अच्छी पोस्ट पर है। रणवीर कुंडू दिल्ली high court में वकील हो गया है। इन दोनों से फेसबुक पर मिलना तो हुआ लेकिन कोई खास बात नहीं हुई। कितना अजब है के हम जान कर भी अनजान हैं !! अतुल शर्मा करनाल में ही है। अतुल से अक्सर बढ़िया बातचीत हो जाती है।
चलते -चलते आप को बता दूँ आज मेरी जीवन संगिनी हरदीप का जन्म दिवस है। पिछले 32 सालों से हम एक दूसरे के साथ हैं। जीवन में बहुत कुछ बदला है। अगर कुछ नहीं बदला है तो वो है हरदीप का स्वभाव ,विश्वास प्यार , समर्पण और खुद हरदीप। पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो सच में ऐसा लगता है के अगर हरदीप मेरे जीवन में नहीं होती तो ये जीवन अधूरा सा होता।
जन्म दिन मुबारक दीपे !

Tuesday, 30 September 2014

SAFAI ABHIYAN

    पूरे देश में इस बात की चर्चा है के गांधी जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री इस बार स्वयं झाड़ू लगा कर "सफाई अभियान " की शुरूआत करने जा रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री अगर झाड़ू लगाएं तो जन जन का भी ये दायित्व बनता है के वो भी देश को साफ़ सुथरा रखने के लिए इस अभियान में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें। ऐसा नहीं के ये पहली बार हो रहा है। जब जब बापू का जन्म दिवस आता है इस तरह के आयोजन सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा किए जाते हैं।
लेकिन इस बार बात कुछ अलग है। क्योंकि ख़ुद प्रधानमंत्री झाड़ू लगाने जा रहे हैं। सभी वर्ग के लोगों में इस बात को लेकर चर्चाओं का सिलसिला शुरू हो चुका है। सभी अपने अपने ढंग से इस पर अपने विचार रख रहे हैं। लेकिन सरकारी तबके के लोगों में इस विषय को लेकर कुछ चिंता का माहौल है। सरकारी महकमों में इस बात की सुगबुगाहट है के यदि प्रधानमंत्री झाड़ू लगा रहे हैं तो उन्हें भी झाड़ू लगाने के आदेश आ सकते हैं।
नमालूम इस को लेकर सरकारी फरमान जारी हुआ या नहीं लेकिन सरकारी अवकाश रद्द किए जाने की ख़बर आग की तरह फ़ैल चुकी है। "सरकारी अवकाश" की कुर्बानी पर इस "सफाई अभियान" के मायने उन्हें समझ नहीं आ रहे हैं।
सरकारी तबका मायूस है !

STATUE OF MAHATMA

       कल  2 अक्टूबर  को महात्मा गांधी का जन्म दिवस है।
                    झाड़ू लगने शुरू हो गए हैं। फोटोज़ अपलोड होने लगी हैं।
                  एक अरसे के बाद बुतों को साफ़ किया जा रहा है । साफ पानी से नहलाया जा रहा है।     
                  कल महात्मा के बुतों पर मालार्पण के लिए होड़ लगी रहेगी।
                   सड़कों ,बाज़ारो ,मोहल्लों और गलियों में झाड़ू लगाए जाने की प्रतिस्पर्धा सा माहौल होगा । 
                   फोटो खिंचवाए जाएंगे। देश को साफ सुथरा बनाए रखने की कसमें खाई जांएगी। 
                  अख़बारों की सुर्खियां भी यही होंगी। 
                   इस बार लोगों में जोश कुछ ज़्यादा है। देश के प्रधानमंत्री ने स्वच्छ भारत का नारा जो दिया है।
                  लोगों को लग रहा है के महात्मा आज खुश होंगे। 
                  "महा आत्मा" आज भी दुःखी और आहत है !
                 क्योंकि सड़कों -गलियों को साफ़ करने के साथ बहुत सारे ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ सच में
                 सफाई की ज़रुरत है।  असल में ज़रुरत है मनोवृती बदलने की। 
                 अगर मनोवृती शुद्धिकरण लोगों के " बूते" की बात नहीं है तो देश को हर रोज़ साफ़ करने के 
                कस्मे वायदे तो बरसों से सुनते आ रहे हैं !
              
             

Sunday, 28 September 2014

NAQAAB

कबीर का बाप राम सिंह पिछले 35 वर्षों से इसी शहर की पटरी पार बस्ती में रह रहा था। हर तबके के लोगों में उठना बैठना था उसका। चुनाव के दिन चल रहे थे। सभी राजनीतिक पार्टी के लोग जानते थे के अगर रामसिंह हामी भर दे तो अच्छी खासी वोटों पर कब्ज़ा किया जा सकता है।
हालांकि राम सिंह ने कभी किसी व्यक्ति विशेष या पार्टी विशेष को तवज्जो नहीं दी थी। फिर भी सभी पार्टीयों  के लोग उसकी चोखट पर माथा ज़रूर टेकते। सभी जानते थे के वो अपने मताधिकार का प्रयोग करने के साथ अपने सभी साथियों को वोट डलवाने के लिए ज़रूर ले जाता था। जहाँ और जिस पार्टी को वोट डालने के लिए राम सिंह बोल देता वो पत्थर पर लकीर की तरह होता। बस्ती के सभी लोग वहीं वोट डालते जहाँ राम सिंह बोल देता। किसी की क्या मज़ाल के कोई भी बस्ती के लोगों की वोट खरीदने की कोशिश करे।
राम सिंह सच बोलने से कभी डरता नहीं था। नेताओं को वो मौका परस्त ,गिरगिट ,लूटेरे ,डाकू , मतलबी , नकाबपोश और न जाने किस -किस नाम से सम्बोधित करता। जब भी कोई राजनीति पर बात करता तो वो शहर की दुर्दशा की दुहाई देते हुए उन्हें ज़रूर लताड़ता।लेकिन कोई भी उसकी बात का बुरा न मानता।
इस बार फिर सभी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने रामसिंह के द्वार पर दस्तक देनी शुरू कर दी थी। लेकिन इस बार राम सिंह कुछ बदला बदला नज़र आ रहा था। जब भी कोई वोट मांगने के लिए उसके द्वार पर आता ,वो हंस कर उसका स्वागत करता। जो भी आता उसी को वोट डालने की हामी भर देता। शायद इस बार राम सिंह ने भी नेताओं की तरह अपने चेहरे पर नक़ाब डाल लिया था। यही कारण था किसी को भी अब तक अंदाज़ नहीं हुआ था के ऊंट किस करवट बैठने वाला है। राम सिंह ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले थे।
35 साल के तज़ुर्बे से राम सिंह को इतना तो समझ आ ही गया था के सत्ता हाथ आने के बाद सभी नेता नपुंसक की तरह हो जाते हैं। जो चाहते हुए भी कुछ नहीं कर सकते। उनके पास कुछ रह जाता है तो बस वायदे और केवल वायदे। मतदान को एक दिन बाकी था। राम सिंह ने सब साथियों को बुलाया और लोकतंत्र की रक्षा के लिए वोटिंग मशीन पर छपे नए बटन "NOTA"(not other than above) के बारे में बताया।  सभी राम सिंह की बात सुन कर अपने अपने घरों की ओर चल दिए।
रात को सहसा शोर सुन कर राम सिंह ने खिड़की से बाहर झाँका तो दंग रह गया। बस्ती के लोग वहां खड़े एक ट्रक से चावल ,दाल ,गेहूँ ,शराब और रोज़मर्रा काम आने वाले सामान को उतार कर अपने -अपने घरों में रखने में मशगूल थे। राम सिंह सभी को रोकने की कोशिश करने लगा। लेकिन किसी पर भी राम सिंह की बातों का कोई असर नहीं हो रहा था।
राम सिंह को समझ आ चुका  था के बस्ती वालों ने भी अपने चेहरों पर नक़ाब पहन लिया है। 

Thursday, 25 September 2014

A LETTER... EK CHITHEE PART-20


                                                                      "पुस्तक मेला "
दोस्तों नमस्कार !
ये आप को मेरी 20 वीं चिठ्ठी है। उम्मीद करता हूँ के आप मेरी चिठियां ज़रूर पढ़ रहे होंगे। वैसे आज कल लोगों का ये मानना है के चिठियों के दिन लद चुके हैं। इंटरनेट ,व्हाट्स एप्प और फेस बुक के इस युग में चिठ्ठी outdated हो गई है। लेकिन मेरा मानना है के चिठ्ठी में जो अपनापन ,संवेदना और संजीदगी है वो फेस बुक या व्हाट्स एप्प में नहीं है। मैंने तो आज भी अपने दोस्तों, रिश्तेदारों की बहुत सारी चिठियों को सहेज कर रखा हुआ है और जब भी समय मिलता है मैं उन्हें बांचने बैठ जाता हूँ। फुर्सत के पलों में चिठियां बांचते हुए बीते हुए दिनों का जो चलचित्र उभर कर आता है उस एहसास को बयां करना शायद बहुत कठिन है।
चिठियों की तरह पुस्तकों के बारे में भी बहुतेरे लोगों का ये मानना है के इस ओर रुझान कम हुआ है। लोगों का मानना है के इलेक्ट्रॉनिक और इंटरनेट के इस युग में किताबें लोगों की मित्र नहीं रहीं खासतोर पर बच्चे किताबों से दूर भागते हैं। मैं तो इस बात से भी इत्तफ़ाक़ नहीं रखता। मेरा तो ये मानना है के पुस्तकों की importance कभी भी कम नहीं हो सकती। बेशक़ सरिता ,धर्मयुग ,चंपक ,फेंटम ,लोटपोट या चाचा चौधरी सरीखी किताबें बाज़ार से गायब हो गई हों।
पिछले दिनों स्कूल में एक पुस्तक मेले का आयोजन किया था। बच्चों का किताबों के प्रति रुझान देखते ही बनता था। उनके चेहरे ये साफ़ बयां कर रहे थे के वो सब किताबें खरीद लें। दरअसल competition के इस युग में  हम ने बच्चों को स्वयं उस तोते की तरह बना दिया है जिसे बंद पिंजरे में रहने की आदत सी हो गई है और वो चाहते हुए भी बाहर की दुनिया से कोई वास्ता नहीं रख पाता। हम ने खुद उनके सपनों को पिंजरे में बंद कर दिया है।
निःसंदेह आज समय और संस्कृति दोनों बदल रहे हैं। हमें ये कतई नहीं भूलना है के सृजन सपनों से ही होता है। इसलिए आज समय की मांग है कि हम बच्चों को सपने बुनने दें ताकि वो दुनिया को अपने  नज़रिये से देखें ,सोचें ,समझें और बुनें।
चलते -चलते बता दूँ के बीते साल की तरह इस बार भी एक कॉलेज में नाटक करवा रहा हूँ। रिहर्सल शुरू हो चुकी है। अगस्त महीना बहुत  busy रहा। अगली चिठ्ठी में पिछले महीने के कुछ खट्टे मीठे संस्मरणों के साथ जल्द ही आप से फिर भेंट करने के साथ आप से विदा लेता हूँ।
"बाकी रब्ब राखा !" 

Monday, 22 September 2014

 टू टूज़ा फोर और ए फॉर एप्पल वाली पद्धति शायद अब पुरानी हो गई है।शिक्षा प्रणाली में बदलाव की ज़रुरत है। 

Saturday, 20 September 2014

"Ek Sawaal"

                                                                "पुतले"
दियों से हम बुराई के प्रतीक "रावण "का पुतला फूंकते आ रहे हैं !
 इस बार फिर तैयारी चल रही है, पुतले बनाए जा रहे हैं।
 हम पुतले बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते।
लेकिन हम इन पुतलों को फूंकने की औपचारिकता भर करते हैं।
 क्या ऐसा नहीं हो सकता के हम पुतले बनाएं ही न ताकि हमें इन्हें फूंकने की औपचारिकता न करनी पड़े ?