Thursday, 25 September 2014

A LETTER... EK CHITHEE PART-20


                                                                      "पुस्तक मेला "
दोस्तों नमस्कार !
ये आप को मेरी 20 वीं चिठ्ठी है। उम्मीद करता हूँ के आप मेरी चिठियां ज़रूर पढ़ रहे होंगे। वैसे आज कल लोगों का ये मानना है के चिठियों के दिन लद चुके हैं। इंटरनेट ,व्हाट्स एप्प और फेस बुक के इस युग में चिठ्ठी outdated हो गई है। लेकिन मेरा मानना है के चिठ्ठी में जो अपनापन ,संवेदना और संजीदगी है वो फेस बुक या व्हाट्स एप्प में नहीं है। मैंने तो आज भी अपने दोस्तों, रिश्तेदारों की बहुत सारी चिठियों को सहेज कर रखा हुआ है और जब भी समय मिलता है मैं उन्हें बांचने बैठ जाता हूँ। फुर्सत के पलों में चिठियां बांचते हुए बीते हुए दिनों का जो चलचित्र उभर कर आता है उस एहसास को बयां करना शायद बहुत कठिन है।
चिठियों की तरह पुस्तकों के बारे में भी बहुतेरे लोगों का ये मानना है के इस ओर रुझान कम हुआ है। लोगों का मानना है के इलेक्ट्रॉनिक और इंटरनेट के इस युग में किताबें लोगों की मित्र नहीं रहीं खासतोर पर बच्चे किताबों से दूर भागते हैं। मैं तो इस बात से भी इत्तफ़ाक़ नहीं रखता। मेरा तो ये मानना है के पुस्तकों की importance कभी भी कम नहीं हो सकती। बेशक़ सरिता ,धर्मयुग ,चंपक ,फेंटम ,लोटपोट या चाचा चौधरी सरीखी किताबें बाज़ार से गायब हो गई हों।
पिछले दिनों स्कूल में एक पुस्तक मेले का आयोजन किया था। बच्चों का किताबों के प्रति रुझान देखते ही बनता था। उनके चेहरे ये साफ़ बयां कर रहे थे के वो सब किताबें खरीद लें। दरअसल competition के इस युग में  हम ने बच्चों को स्वयं उस तोते की तरह बना दिया है जिसे बंद पिंजरे में रहने की आदत सी हो गई है और वो चाहते हुए भी बाहर की दुनिया से कोई वास्ता नहीं रख पाता। हम ने खुद उनके सपनों को पिंजरे में बंद कर दिया है।
निःसंदेह आज समय और संस्कृति दोनों बदल रहे हैं। हमें ये कतई नहीं भूलना है के सृजन सपनों से ही होता है। इसलिए आज समय की मांग है कि हम बच्चों को सपने बुनने दें ताकि वो दुनिया को अपने  नज़रिये से देखें ,सोचें ,समझें और बुनें।
चलते -चलते बता दूँ के बीते साल की तरह इस बार भी एक कॉलेज में नाटक करवा रहा हूँ। रिहर्सल शुरू हो चुकी है। अगस्त महीना बहुत  busy रहा। अगली चिठ्ठी में पिछले महीने के कुछ खट्टे मीठे संस्मरणों के साथ जल्द ही आप से फिर भेंट करने के साथ आप से विदा लेता हूँ।
"बाकी रब्ब राखा !" 

Monday, 22 September 2014

 टू टूज़ा फोर और ए फॉर एप्पल वाली पद्धति शायद अब पुरानी हो गई है।शिक्षा प्रणाली में बदलाव की ज़रुरत है। 

Saturday, 20 September 2014

"Ek Sawaal"

                                                                "पुतले"
दियों से हम बुराई के प्रतीक "रावण "का पुतला फूंकते आ रहे हैं !
 इस बार फिर तैयारी चल रही है, पुतले बनाए जा रहे हैं।
 हम पुतले बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते।
लेकिन हम इन पुतलों को फूंकने की औपचारिकता भर करते हैं।
 क्या ऐसा नहीं हो सकता के हम पुतले बनाएं ही न ताकि हमें इन्हें फूंकने की औपचारिकता न करनी पड़े ?

Friday, 19 September 2014

Aazaadi

देश को आज़ाद हुए लगभग 67 वर्ष बीत चुके हैं। पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो बहुत कुछ बदल गया है।हालाँकि देश ने पिछले सालों में खूब तरक्की की है।मेरा भारत महान के नारे भी लगते रहे हैं। लेकिन अभी भी बहुत सारी ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें चुस्त दुरुस्त करने की ज़रुरत है। 15 अगस्त 2014 आज़ादी की पूर्व संध्या पर ये ब्लॉग लिख दिया था। लेकिन पोस्ट नहीं कर पाया। आज इसे पोस्ट कर रहा हूँ  ……………………… 
रोज़गार के लिए गांव से लोग शहरों में बसने लगे हैं। शहरों के लोग गांवों में बसना चाहते हैं।
जनसँख्या लगातार बढ़ती जा रही है। विश्व में दूसरा स्थान है हमारा। जानकारों का कहना है अगर इसी तरह जनसँख्या बढ़ती रही तो हम जल्द ही चीन को पछाड़ कर नम्बर एक हो जाएंगे।
कुछ साल पहले तक भी माहौल शांत था। आजकल इतनी गाड़ियां हो गई हैं आम आदमी का सड़कों पर चलना ही मुश्किल हो गया है। शोरशराबे और वायु प्रदुषण के कारण लोगों में हाइपर टेंशन ,माइग्रेन  जैसी बीमारियां आम हो गई हैं। यही नहीं कैंसर और हार्ट अटैक के लिए भी प्रदुषण मुख्य कारक है।
भ्रष्टाचार का तो पूछो ही मत। यह पूरी तरह से हमारी संस्कृति में रच -बस गया है । अफसरों से लेकर राजनेता तक सब इस का रसपान करना अपना धर्म समझते हैं। एक राशन कार्ड ,ड्राइविंग लाईसेंस ,या कोई भी सरकारी काम हो आपको बाबू लोगों की मुट्ठी बंद करनी ही पड़ती है। घूसखोरों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।
दलालों की कोई कमी नहीं है हमारे देश में। कोई काम हो ,सरकारी ठेका हो या फिर कोई खरीद -फरोख्त आप को दलाल की ज़रुरत पड़ती ही है। वर्ना आप की फ़ाइल दबी रहेगी और धूल फांकती रहेगी।
गरीबी और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दी है। रोज़गार के लिए कोई ठोस नीति सरकार के पास नहीं है। गरीब और अमीर के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है।
राजनेता और धर्म के ठेकेदार विभाजन को अपने अस्त्र की तरह प्रयोग करते हैं। ये लोग आज भी धर्म /जाति के नाम पर समाज को दो फाड़ करने में कतई नहीं चूकते हैं।
कानून अँधा होता है इस के मायने देश की कानून व्यवस्था को देख कर कोई भी लगा सकता है। हर रोज़ लूट , हत्या ,बलात्कार के समाचार देश के लोगों के लिए आम हो गए हैं। पुलिस को आम आदमी "वर्दी वाला गुंडा" कह कर पुकारता है।  
शिक्षा समय के साथ साथ महंगी और निरर्थक हो गई है। युवा डिग्री हासिल तो कर लेता है परन्तु कर्म क्षेत्र में पहुँचते ही डिग्री युक्तिहीन हो जाती है।
सरकारी तंत्र को तो जैसे दीमक ने खोखला कर दिया है। मानव संसाधन को चुस्त दुरुस्त करने के लिए सरकार कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती है ये कोई समझ नहीं पाया है। शिक्षा ,स्वास्थ्य ,दूरसंचार ,दूरदर्शन ,ट्रांसपोर्ट ,सीवरेज ,सड़कें आदि क्षेत्र चरमराये हुए हैं।
क्या आप को भी देश की व्यवस्था और कार्य प्रणाली " नाम बड़े और दर्शन छोटे " की तरह नहीं लगती हैं ?
 क्या इसी का नाम आज़ादी है ?
   क्या सब कुछ इसी तरह से चलता रहेगा ?
  

Monday, 15 September 2014

HANUMAAN KI SENA


घर के सभी लोग टी वी पर रामायण देखने में व्यस्त थे। 7 - 8 साल का नन्हां कबीर अपनी दादी की गोद में बैठा था। वो बार बार अपनी दादी माँ का पल्लू खींच कर कोई सवाल पूछना चाह रहा था। लेकिन दादी माँ चुप करवा देती। कमर्शियल ब्रेक में दादी माँ ने कबीर की और मुखातिब होते हुए पूछा ,"हाँ अब बता क्या पूछना है तुझे ?" कबीर बोला ,"दादी माँ , वो बन्दर कौन था जो अपनी पूँछ पर आग लगा कर सब कुछ जला रहा था ?" दादी माँ झल्ला कर बोली ,"बेटा ऐसा नहीं बोलते। ये वानर राज भगवान हनुमान हैं और बाकी सभी वानर हनुमान की सेना ! इन्होंने ही मैय्या सीता को बचाने में भगवान राम की सहायता की थी।"
 दादी ने आगे बताया के कल घर में हनुमान चालीसा का आयोजन किया जाएगा। अगले दिन घर में हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। सभी पूजा पाठ  में व्यस्त थे। अचानक बाहर शोर हुआ और सभी बाहर की ओर भागे। रसोई में बन रहे प्रसाद पर बंदरों के एक झुण्ड ने धावा बोल दिया था। कोई लाठी तो कोई बम बजा कर बंदरो को डराने लगा। सभी शोर मचाकर बंदरों को भगाने लगे।
कबीर दादी माँ के पल्लू को पकड़ कर ये सब नज़ारा देख रहा था। उसने दादी माँ का पल्लू खींचा । दादी ने कबीर की ओर देखा तो कबीर तुरंत बोला ," दादी माँ ,ये तो प्रभु राम भक्त हनुमान की सेना  है न ! फिर सभी इस को भगा क्यों रहे हैं ?"
दादी माँ के पास कबीर के प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। 

Sunday, 14 September 2014

PATENT

धर्म संसद में युद्ध छिड़ गया है.………… !
अपने -२ भगवान को बचाने का संकट आन पड़ा है। 
अब तो भगवान को पूजने के लिए भी मंज़ूरी लेनी पड़ सकती है। 
 अब समय आ गया है के अपने अपने भगवान का "पेटेंट " करवा लिया जाए ताकि भविष्य में किसी तरह की कोई दिक्कत न झेलनी पड़े

Friday, 12 September 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-19

दोस्तों नमस्कार।
मैं आप से खूब बातें करता रहता हूँ।  इस बार सोचा के क्यों न ये जाना जाए के आप के मन में क्या चल रहा है।
क्या आप ने कहीं पढ़ा या सुना है के स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में सार्वजानिक जगहों पर धुम्रपान करने पर लगाए जाने वाले जुर्माने को २०० से बढ़ा कर २०००० रूपए का प्रस्ताव दिया है। ये एक अच्छा निर्णय है या आप को प्रजातंत्र में तुग़लकी फरमान जैसा लगता है ? ये आप खुद तय करें !
 हरयाणा के विधान सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। हरयाणा हमेशा दल बदलूओं के लिए मशहूर रहा है। लोकसभा में भाजपा की सुनामी क्या चली दूसरे दलों के नेताओं को जैसे अपनी पार्टी से एलर्जी होने लगी। हरयाणा के नेताओं ने तो कमाल ही कर दिया है इधर से उधर पाला इस तरह बदल रहे हैं मानो उनके लिए राजनीति का मतलब केवल सत्ता हासिल करना हो। जनता की उन्हें कोई चिंता नहीं। ऐसे में इन जैसे लोगों को वोट देना चाहिए या नहीं ? ये आप खुद तय करें !
पांच वर्ष पूर्व  ( सी। बी। एस। ई। ) सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ स्कूल एजुकेशन द्वारा सी। सी। ई। प्रणाली को शुरू किया गया था। मकसद केवल एक था के बच्चों को बस पास होना चाहिए। बेशक़ वो जीवन की परीक्षा में फेल हो जाए। उस समय खूब हो हल्ला मचा के इस से शिक्षा का स्तर गिर जाएगा।  अब समाचार ये है के पहले की तरह दोबारा वार्षिक परीक्षा होंगी। अब पास वही होगा जो किताबों को पढ़ कर लिखने में सक्षम होगा। हमारी शिक्ष प्रणाली ठीक है या गलत ? ये आप खुद तय करें !
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में तापी नदी ने जिस तरह से प्रकोप बरपाया है उससे तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति को अपने साथ अब और छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं है। ये तो हम सब जानते हैं के आपदा कभी दस्तक दे कर नहीं आती परन्तु देश के अलग अलग भागों में जिस तरह प्राकृतिक विसंगतियां होने लगी हैं ये  बिल्कुल दस्तक  देने जैसा ही है। इस सब के लिए दोषी कौन है ? ये आप खुद तय करें !
एक जर्मन कवि फ्रेडरिक होल्डरलिन ने लिखा है ," धरती इस लिए नरक बन रही है ,क्योंकि मनुष्य इसे अपना स्वर्ग बनाने  कोशीश कर रहा है।" हम इस धरती को स्वर्ग बना रहे हैं या नरक ? ये आप खुद तय करें !
अच्छा दोस्तों फिर मिलते हैं। कुछ तय कर लें तो मुझे ज़रूर बताइएगा !