Monday, 15 September 2014

HANUMAAN KI SENA


घर के सभी लोग टी वी पर रामायण देखने में व्यस्त थे। 7 - 8 साल का नन्हां कबीर अपनी दादी की गोद में बैठा था। वो बार बार अपनी दादी माँ का पल्लू खींच कर कोई सवाल पूछना चाह रहा था। लेकिन दादी माँ चुप करवा देती। कमर्शियल ब्रेक में दादी माँ ने कबीर की और मुखातिब होते हुए पूछा ,"हाँ अब बता क्या पूछना है तुझे ?" कबीर बोला ,"दादी माँ , वो बन्दर कौन था जो अपनी पूँछ पर आग लगा कर सब कुछ जला रहा था ?" दादी माँ झल्ला कर बोली ,"बेटा ऐसा नहीं बोलते। ये वानर राज भगवान हनुमान हैं और बाकी सभी वानर हनुमान की सेना ! इन्होंने ही मैय्या सीता को बचाने में भगवान राम की सहायता की थी।"
 दादी ने आगे बताया के कल घर में हनुमान चालीसा का आयोजन किया जाएगा। अगले दिन घर में हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। सभी पूजा पाठ  में व्यस्त थे। अचानक बाहर शोर हुआ और सभी बाहर की ओर भागे। रसोई में बन रहे प्रसाद पर बंदरों के एक झुण्ड ने धावा बोल दिया था। कोई लाठी तो कोई बम बजा कर बंदरो को डराने लगा। सभी शोर मचाकर बंदरों को भगाने लगे।
कबीर दादी माँ के पल्लू को पकड़ कर ये सब नज़ारा देख रहा था। उसने दादी माँ का पल्लू खींचा । दादी ने कबीर की ओर देखा तो कबीर तुरंत बोला ," दादी माँ ,ये तो प्रभु राम भक्त हनुमान की सेना  है न ! फिर सभी इस को भगा क्यों रहे हैं ?"
दादी माँ के पास कबीर के प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। 

Sunday, 14 September 2014

PATENT

धर्म संसद में युद्ध छिड़ गया है.………… !
अपने -२ भगवान को बचाने का संकट आन पड़ा है। 
अब तो भगवान को पूजने के लिए भी मंज़ूरी लेनी पड़ सकती है। 
 अब समय आ गया है के अपने अपने भगवान का "पेटेंट " करवा लिया जाए ताकि भविष्य में किसी तरह की कोई दिक्कत न झेलनी पड़े

Friday, 12 September 2014

A LETTER...EK CHITHEE PART-19

दोस्तों नमस्कार।
मैं आप से खूब बातें करता रहता हूँ।  इस बार सोचा के क्यों न ये जाना जाए के आप के मन में क्या चल रहा है।
क्या आप ने कहीं पढ़ा या सुना है के स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में सार्वजानिक जगहों पर धुम्रपान करने पर लगाए जाने वाले जुर्माने को २०० से बढ़ा कर २०००० रूपए का प्रस्ताव दिया है। ये एक अच्छा निर्णय है या आप को प्रजातंत्र में तुग़लकी फरमान जैसा लगता है ? ये आप खुद तय करें !
 हरयाणा के विधान सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। हरयाणा हमेशा दल बदलूओं के लिए मशहूर रहा है। लोकसभा में भाजपा की सुनामी क्या चली दूसरे दलों के नेताओं को जैसे अपनी पार्टी से एलर्जी होने लगी। हरयाणा के नेताओं ने तो कमाल ही कर दिया है इधर से उधर पाला इस तरह बदल रहे हैं मानो उनके लिए राजनीति का मतलब केवल सत्ता हासिल करना हो। जनता की उन्हें कोई चिंता नहीं। ऐसे में इन जैसे लोगों को वोट देना चाहिए या नहीं ? ये आप खुद तय करें !
पांच वर्ष पूर्व  ( सी। बी। एस। ई। ) सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ़ स्कूल एजुकेशन द्वारा सी। सी। ई। प्रणाली को शुरू किया गया था। मकसद केवल एक था के बच्चों को बस पास होना चाहिए। बेशक़ वो जीवन की परीक्षा में फेल हो जाए। उस समय खूब हो हल्ला मचा के इस से शिक्षा का स्तर गिर जाएगा।  अब समाचार ये है के पहले की तरह दोबारा वार्षिक परीक्षा होंगी। अब पास वही होगा जो किताबों को पढ़ कर लिखने में सक्षम होगा। हमारी शिक्ष प्रणाली ठीक है या गलत ? ये आप खुद तय करें !
धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में तापी नदी ने जिस तरह से प्रकोप बरपाया है उससे तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति को अपने साथ अब और छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं है। ये तो हम सब जानते हैं के आपदा कभी दस्तक दे कर नहीं आती परन्तु देश के अलग अलग भागों में जिस तरह प्राकृतिक विसंगतियां होने लगी हैं ये  बिल्कुल दस्तक  देने जैसा ही है। इस सब के लिए दोषी कौन है ? ये आप खुद तय करें !
एक जर्मन कवि फ्रेडरिक होल्डरलिन ने लिखा है ," धरती इस लिए नरक बन रही है ,क्योंकि मनुष्य इसे अपना स्वर्ग बनाने  कोशीश कर रहा है।" हम इस धरती को स्वर्ग बना रहे हैं या नरक ? ये आप खुद तय करें !
अच्छा दोस्तों फिर मिलते हैं। कुछ तय कर लें तो मुझे ज़रूर बताइएगा !

Saturday, 6 September 2014

A LETTER .. EK CHITHEE PART-18

दोस्तों नमस्कार।
लिखने को तो "बहुत कुछ " है पर जीवन की भागमभाग में जैसे बहुत कुछ छूट सा जाता है।इसी वजह से ये चिठ्ठी लिखने में कुछ देरी भी हो गई। लेकिन ये चिठ्ठी लिखना एक ऐसा माध्यम बन गया है के इसके लिखने से मन की "भड़ास"तो निकल ही जाती है। 
इस बार कर्ण भूमि करनाल के लोग सावन में बरसात को तरसते रहे परन्तु भादों में बरखा ने गर्मी को कम कर दिया है। "लोगों के साथ -साथ मौसम भी बदल रहा है !"
" नाटक करना भी जैसे युद्ध जीतना है। पिछले वर्ष की तरह इस बार भी  कॉलेज में नाटक की तैयारी करवा रहा हूँ। प्रिंसिपल कहती हैं ,"नाटक विनिंग होना चाहिए !  नाटक में हार -जीत क्या होता है ,अभी तक समझ नहीं पाया हूँ !" 2000 की संख्या वाले कॉलेज में फ़क़त 8 लड़कियों को नाटक में PARTICIPATE करवाने के लिए पूरे कॉलेज की टीम मशक्क़त कर रही है। "नाटक को लेकर बच्चियां जो तर्क देती हैं उससे अब समझ आने लगा है ज़िन्दगी भी एक नाटक है  !
भाई मोहिन्दर से पिछले कईं दिनों से हर रोज़ बात हो जाती है। पिछले साल की तरह इस बार भी मोहिन्दर ही नाटक की स्क्रिप्ट लिख रहा है। पिछले साल "मोहिन्दर "द्वारा लिखित नाटक "पल पल जीती हर पल मरती" नाटक का मंचन किया था। मोहिन्दर ने बताया के फिल्म भुजंग का पोस्ट प्रोडक्शन लगभग पूरा होने वाला है। फिल्म का पहला पोस्टर रिलीज़ हो चुका है। पोस्टर मोहिन्दर की पत्नि ऋचा ने डिज़ाइन किया है। "ऋचा बधाई ,बहुत सुन्दर बना है पोस्टर ! " फिल्म का डायरेक्शन और लेखन मोहिन्दर ने खुद किया है।
अगस्त 2014 काफी व्यस्त रहा। पहले पांच दिन मोहिन्दर के साथ बीत गए। मोहिन्दर मुंबई से घर छुटियाँ मनाने आया था। जिस तरह से अगस्त महीने के पहले पांच दिन बीते " हमारी भी ईद हो गई ! "
अगले 10 -15  दिन स्कूल में आज़ादी ,तीज ,ईद , राखी ,मुंशी प्रेम चंद के जन्मोत्सव मनाने में बीत गए। हर वर्ष की भांति इस बार भी  स्कूल में "सद्भावना पखवाड़ा " मनाया गया। स्वतंत्रता समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत मेरे कॉलेज समय के केमिस्ट्री के प्रोफेसर डॉ अशोक महता ने की। डॉ अशोक महता की सादगी और नम्रता का मैं हमेशा कायल रहा हूँ। "कॉलेज के दिनों में बेशक केमिस्ट्री  में हाथ तंग रहा लेकिन ज़िन्दगी की केमिस्ट्री का अपना ही मज़ा है !"
1987 में दयाल  सिंह कॉलेज करनाल से ग्रेजुएशन पास किया था । 1984  में दयाल सिंह कॉलेज की और से भारत सरकार द्वारा सांस्कृतिक सद्भावना के उदेशय से आयोजित "अपना उत्सव "कार्यक्रम में मैंने हरयाणा को रिप्रेजेंट किया था । वहीं अंबाला से अपना उत्सव में भागेदारी कर रहे बबलू, हंस और मनबीर तथा यमुनानगर से अमित डांगे से मिलना हुआ। 27 साल बीत जाने के बाद आज भी उन से मुलाकात होती रहती है। बाद में बबलू ने भी इंडियन थिएटर से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आज कल बबलू अमेरिका में किसी "संधू "नाम की गारमेंट कंपनी में नौकरी करता है। इस से पहले उस के पास  दुबई का चार्ज था।अमेरिका जाते हुए करनाल कुछ देर रुक कर गया। उससे बातचीत और मुलाकात बढ़िया रही। "जीवन की किताब के पुराने पन्ने खुले तो बहुत सारी भूली बिसरी यादें ताज़ा हो गई !"
चिठ्ठी लिखते लिखते सावन के सूखे को भादों की बरखा ने हरा कर दिया है। सावन में यहाँ सूखा रहा लेकिन भादों में बरखा जम के बरस रही है। लोग खुश हैं के मौसम में ढंडक हो गई है लेकिन किसान इस बेमौसमी बरखा से निराश है।"जो किसान पानी के लिए आसमान की ओर देख रहा था आज वही अभी ना बरसने की गुहार लगा रहा है !"
अगली चिठ्ठी में कुछ और संस्मरणों के साथ फिर मुलाक़ात होती है। तब तक के अलविदा दोस्तों !
TO BE CONTINUED.......................

Sunday, 17 August 2014

SHOK SABHA

 एक शोक सभा में जाने का अवसर मिला। दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए पाठ  चल रहा था। जितने लोग हॉल में थे ,उतने ही बाहर खड़े थे। अलग -अलग झुंडों में अलग -अलग चर्चा चल रही थी। चुनाव नज़दीक होने के कारण अधिकतर लोग चुनावों पर बतिया रहे थे।मृतक का भाई भी बाहर खड़ा था। वो नज़दीकी सम्बन्धियों और मित्रों को मिलने में व्यस्त था।
बाहर खड़े लोगों में अधिकतर नेता और अफसर थे जो अपने -अपने चाटुकारों से घिरे हुए थे। आज कल शोक सभाएं भी शक्ति प्रदर्शन का अखाडा लगने लगी हैं। बाहर खड़ी लाल और नीली बत्ती वाली गाड़ियों से तो कुछ ऐसा ही लग रहा था।
शोक सभा समाप्त होने में अभी देरी थी , मैं भी समय बिताने के लिए एक झुण्ड के समीप हो लिया। इस झुण्ड में मृतक का भाई सुल्तान और कुछ सम्बन्धी आपस में बतिया रहे थे। इधर उधर की बात करने के बाद सुल्तान ताली पीटते हुए ज़ोर से बोला,"कोई ग़म नहीं है भाई के जाने का,मौज कर के गया है।अभी एक महीना पहले ही सिंगापुर,थाईलैंड और कईं देश घूम कर आया था। घोड़े जैसा था अब तक !" सुल्तान की बात सुन कर सब ने ज़ोर का ठहाका लगाया।
ठहाकों के बीच एक लाल बत्ती लगी गाड़ी की कूँ कूँ ने शोक स्थल के बाहर खड़े सभी लोगों का ध्यान अपनी और खींच लिया। गाड़ी को देखते ही सुल्तान गाड़ी की तरफ हो लिया। गाड़ी से उतरने वाले व्यक्ति से सभी का परिचय करवाते हुए सुल्तान बोला ,"अपने दामाद के बड़े भाई हैं ,"मलखान सिंह " कमिश्नर हैं आज कल। " पास खड़े लोगों में से कुछ अपनी मुंडी हिलाते हुए एक स्वर में बोले ,"जनाब को कौन नहीं जानता। " अपनी प्रशंसा सुनते ही मलखान सिंह का चेहरा लाल गुलाब की तरह खिल उठा।
मलखान ने सुल्तान को एक तरफ ले जा कर शोक प्रकट किया। लेकिन सुल्तान तो जैसे भाई के चरित्र का सर्टिफिकेट सब को दे देना चाहता था। उसने मलखान का हाथ दबाते हुए फिर दोहराया ,"मौज कर के गया है भाई। अभी एक महीना पहले ही सिंगापुर ,थाईलैंड और कईं देश घूम कर आया था। बिल्कुल घोड़े जैसा था अब तक !" मलखान सिंह के चेहरे पर भी एक कमीनी सी मुस्कान दिखाई देने लगी।बाकी सभी लोगों ने इस बार ठहाका तो नहीं लगाया लेकिन एक कटु मुस्कान सब के चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थी।
बातों बातों में मलखान का भाई जगतार भी मण्डली में शामिल हो गया और सुल्तान दूसरे रिश्तेदारों को मिलने लगा। उसने आते ही भाई को प्रणाम किया और भाभी व बच्चों के बारे में पूछने लगा। मलखान सिंह के चेहरे पर उदासी छा गई। इस से पहले के मलखान सिंह कुछ बोलता , झुण्ड में से ही एक परिचित ने उदासी भरे लहज़े से पूछा ," सब ठीक तो है कमिशनर साब  ?"
"हाँ , कल सुबह जब्बर भगवान को प्यारा हो गया ,घर में मातम छाया हुआ था !"भरे हुए गले से मलखान सिंह बोला।
मलखान की बात सुनते ही सारा वातावरण ग़मगीन हो गया। हालांकि बहुत सारे लोग जब्बर से परिचित नहीं थे। भाई को उदास देख जगतार बोला ,"आप ने बताया भी नहीं ,कैसे हुआ ये सब ?"
 "कईं दिनों से बीमार चल रहा था," मलखान ने जवाब दिया।
 इतने में सुल्तान फिर वहां पहुँच गया। माहौल को उदास देख उसने इशारों इशारों में उदासी का कारण जानने की कोशिश की।जगतार सस्पेंस से पर्दा उठाते हुए बोला , "भाई साब के कुत्ते की मौत हो गई आज सुबह , बहुत प्यारा और समझदार कुत्ता था।सुल्तान, जगतार की बात सुनते ही अफ़सोस करते हुए बोला ,"ओहो ! पिछली बार ही तो मिला था मैं , बहुत प्यार करते थे बच्चे उससे। घर में तो सभी बहुत उदास होंगे !"इतने में जगतार बोला ,"बिल्कुल घर के मेंबर की तरह था जब्बर। "
 इससे पहले के कमिशनर साब कुछ बोलते ,झुण्ड में खड़े सभी लोग शोक प्रकट करने लगे !

Thursday, 7 August 2014

A JOURNEY TO BAALA G DHAM PART-2

अब आगे………………
 सालासर जाते हुए रास्ते में अधिकतर खेत सूखे हुए थे। हालांकि पिछले दिनों हुई बरसात के कारण आसपास काफी हरयाली नज़र आ रही थी। लेकिन अधिकतर खेत रेत के टीलों की तरह ही लग रहे थे हमारे सारे रास्ते में बादल आसमान में मंडराते रहे हमारे साथ चलते रहे लेकिन कहाँ बरसे ये बाला जी  ही जानें। रास्ते में लक्ष्मणगढ़ का किला भी आया। सालासर जल्दी पहुँचने के चक्कर में उसे नज़दीक से नहीं देख सके। हालाँकि ज़्यादातर फोटो चलते -चलते ही खींची थी और लक्ष्मणगढ़ के किले को भी दूर से ही क्लिक कर सका।

शाम को सालासर  पहुँच कर गाड़ी को चमेली देवी धर्मशाला के सामने रोक दिया गया। ध्रर्मशाला का निर्माण बखूबी किया गया था।  कहीं से भी फाइव स्टार होटल से कम नज़र नहीं आ रही थी। अंदर जाने के बाद जब हमने अपने कमरे में प्रवेश किया तो मैं हैरान हो गया। कमरे में खूबसूरत नक्काशी वाले बेड ,मित्सुबिशी का ए सी ,तोशिबा का एल सी डी ,शानदार बाथरूम ,गर्म और ठंडे पानी की व्य्वस्था ,भोजन के लिए साफसुथरी मेस और कैंटीन। सच में सब कमाल था। सब कुछ मात्र 600 रुपये में लेकिन खाने का बिल अलग से।

शहर में जब घूमने गए तो पता चला के यहाँ धर्मशालाओं का जाल सा बिछा हुआ है।हिसार धर्मशाला। आदमपुर धर्मशाला। मायादेवी धर्मशाला। नरवाना वालों की धर्मशाला। बातों बातों में गाइड की भूमिका अदा कर रहे राकेश ने बताया के अधिकतर धर्मशालाएं देश के बड़े सेठों और हरयाणा के बड़े राजनितिक घरानों की हैं।ऐसा नहीं के सभी धर्मशालाएं महंगी थी। आपकी श्रद्धा और जेब के हिसाब से यहाँ सभी तरह की व्यवस्था है।
यहाँ अधिकतर  धर्मशालाओं के नाम बेशक हरयाणा के शहरों पर रखे गए थे लेकिन उन पर लगे पोस्टरों की और इशारा करते हुए राकेश ने बताया के ये धर्मशालाएं हरयाणा के पूर्व मुख्य मंत्रियों भजनलाल और ओम प्रकाश चौटाला की हैं।  "धर्म के नाम पर काले को सफ़ेद करने का ये नायाब तरीका है", राकेश ने इशारों -इशारों में मुझे समझाने  की कोशिश की।
 यही नहीं हरयाणा के मौजूदा मुख्य मंत्री की भी यहाँ एक धर्मशाला निर्माणाधीन है। वैसे तो पूरे भारत वर्ष से भगतजन बाला जी के दर्शन के लिए यहाँ आते हैं लेकिन अधिकतर लोग यहाँ हरयाणा , राजस्थान और पंजाब से आते हैं।
थोड़ी देर आराम करने के बाद हम तीनों ने मंदिर का रुख किया। आरती का समय शाम 7. 40 निर्धारित था। मंदिर द्वार पर पहुंचे तो वहां बहुत भीड़ थी।  
आरती का समय नज़दीक आता जा रहा था। अगर श्रद्धालूओं वाली लाइन में लगते तो आरती का समय निकल जाता। श्यामलाल ने जुगाड़ लगा कर वी आई पी द्वार से प्रवेश करवा दिया। मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही मन आनंदमयी हो गया। मंदिर की सरंचना बहुत भव्य थी।
लेकिन मंदिर के अंदर प्रवेश करने के बावजूद भी मन बाला जी से यही प्रश्न करता रहा और सोचता रहा के क्या भगवान भी जुगाड़ वालों को ही दर्शन देते हैं। कुछ समय बाद ही आरती आरम्भ हो गई।  जो कुछ भी हो लोगों की श्रद्धा और विश्वास देखते ही बनता था। देखते ही देखते पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

Tuesday, 5 August 2014

A JOURNEY TO BAALA G DHAM - PART 1




लम्बे अरसे से दोस्तों के साथ किसी दौरे पर नहीं गया था। चार -पांच साल पहले तक दोस्तों की चौंकड़ी जमते ही कहीं न कहीं निकल लेते थे। पिछले दो सालों से मित्रमंडली में से श्यामलाल गर्ग और राकेश हर महीने बाला जी धाम सालासर राजस्थान की यात्रा पर जाते हैं। उनके साथ समीर ,राहुल ,जगदीश पाण्डे ,राजीव चौधरी,वीर प्रकाश आदि लगभग सभी साथी वहां हो आए थे। मन तो मेरा भी था लेकिन संजोग नहीं बन रहा था।
 श्यामलाल गर्ग और राकेश का 26 जुलाई को सालासर जाने का प्रोग्राम बना। शनिवार का दिन था , मैं भी हो लिया उनके साथ। मुझे बताया गया के करनाल से सालासर 370 किलोमीटर है। सुबह 8. 30 पर सफर की शुरुआत हुई और पानीपत ,रोहतक ,भिवानी ,लोहारू ,झुंझनू ,लक्ष्मणगढ़ से होते हुए हम शाम 5 बजे सालासर पहुँच गए।
रास्ते में पानीपत पर पहला टोल प्लाजा आया और उसके बाद कुल 6 जगह सड़क पर चलने के लिए एक तरफ का कुल 350 रूपए टैक्स देना पड़ा। सरकार का कहना है के जगह जगह पर लिए जाने वाले टोल टैक्स सड़कों के रखरखाव के लिए हैं। कुछ इलाकों को छोड़ कर अधिकतर सड़कें खस्ताहाल थीं। न जाने लोग इन्हें बंद करवाने के लिए एकजुट क्यों नहीं होते।
लोहारू के बाद जैसे ही राजस्थान में प्रवेश किया तो कासनी गांव में राकेश ने कार को रोक लिया। मुझे बताया गया के ये गांव नीलम प्रदीप कासनी का ससुराल है। नीलम प्रदीप कासनी हरयाणा में आई ए एस काडर की अफसर हैं और कुछ समय के लिए करनाल की डी सी भी रहीं। उनके पति भी हरयाणा में आई ए एस अफसर हैं। आगे चल कर बख्तावर पुरा  गांव के बारे में बताते हुए राकेश ने बताया के ये एक मॉडल विलेज है। बख्तावर पूरा की खासीयत ये है के इस गांव में कोई नाली नहीं है

रास्ते में दो जगह रुक कर चाय पी और खाना खाया। रास्ते में गाड़ी को उन्हीं जगह पर रोक गया जहाँ वो हर बार रुकते थे। रास्ते में होटल न्यू सुख सागर में खाना खाया और कुछ देर आराम किया। इस जगह का ज़िक्र राकेश और श्याम लाल अक्सर किया करते थे। यहाँ की आवभगत और खासतौर पर हुक्के का ज़िक्र करते हुए दोनों थकते नहीं थे। वापसी पर भी यहाँ रुके लेकिन दोनों बार हुक्का नदारद था।

 पूरे सफर में राकेश एक गाइड की तरह मुझे हर उस चीज़ की जानकारी  देता रहा। रास्ते में मरुस्थल के जहाज़ के नाम से मशहूर ऊँट की सवारी आम थी। गधों को ईंट के भट्ठों पर ईंट की ढुलाई ,धोबियों के पास कपड़ों की ढुलाई और गावों में सामान इधर -उधर पहुंचाने के प्रयोग में आम  देखा था लेकिन गधों को ठेला खींचते हुए देखना अजब संजोग था। लोकल आने जाने के लिए लोग थ्री व्हीलर का प्रयोग करते हैं। यहाँ चलने वाले थ्री व्हीलर्स का डिज़ाइन भी कमाल का है।