Sunday, 21 February 2016

A LETTER- EK CHITHEE (PART-41)

जागो इंडिया जागो (Part -2 )
भाग -1 से आगे............  स्थिति चिंताजनक किन्तु नियंत्रण में है ! 
  . . . . . . . . .  पुलिस के चालान के जुर्माने को चुकाने और गाड़ी रिलीज़ करवाने के चक्कर में मेरे एक महीने की तनख्वाह मेरी जेब से खिसक गई । बेशक घर का सारा बजट बिगड़ गया लेकिन मुझे इस जुर्माने की चिंता की बजाये बच्चों की मानसिक अस्थिरता और असंतुलन की चिंता ज़्यादा थी। सच मानिए उनको इस मनोस्थिति से उबरने में कईं दिन लगे। वर्ना इन युवाओं को अपने रास्ते से भटकाने के लिए पुलिस ने अपने इस कुकृत्य ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी. . . . . . . 
आज कल बेटा गोवा में आयोजित I B W ( इंडियन Bike Week ) में भाग लेने के लिए गया हुआ है। एक तरफ  लगभग 2500 किलोमीटर का सफर बाइक पर तय करना था उसे। पिता होने के नाते  चिंता वाज़िब थी। ना जाने उसे विदा करते हुए ये ही शब्द क्यों निकले ,"बेटा ध्यान से जाना ! रास्ते में पुलिस से बचते बचाते जाना। आप की गाड़ी के कागज़ तो पुरे हैं न ? " न जाने क्योँ मेरे मन में पुलिस का ही डर क्यों था ! शुक्र है के रास्ते में किसी पुलिस वाले ने उनको कहीं नहीं रोका और कोई अप्रिय घटना नहीं घटी !
पुलिस का एक और किस्से का ज़िक्र भी मैं यहाँ करना चाहूँगा। कुछ दिन पहले ही मेरी बहन विदेश से अपने वतन वापिस आई। साथ में बेटा और इटली की एक मित्र भी साथ आईं थी । ये सभी पिछले 10 -12 वर्षों से कनाडा में settled हैं। उनसे मिला तो बहन ने बताया के उनकी दोस्त "कालरा " भारत दर्शन के लिए आईं हैं। मैंने मिलते ही कालरा से पूछा ,"How is इंडिया ?" कालरा बोली ,"we have just arrived . एक दो दिन में घूमेंगे तो देखते हैं ,कैसा है आप का इंडिया !"
अगले ही दिन बहन अपनी मित्र कालरा को अपना शहर घुमाने ले गईं। शाम को मैं जब दोबारा उनसे मिलने गया तो मैंने कालरा से अपना पहले वाला प्रश्न दोहराया। इस बार कालरा मुस्कुरा भर दी और बहन की ओर देखने लगी। मैं कुछ समझ नहीं पाया। मैंने अपनी बहन सिम्मी की और आश्चर्य से देखा। सिम्मी ने जो किस्सा सुनाया वो सच में दहला देने वाला था। सिम्मी ने कहानी सुनाते हुए कहा ,"बाज़ार में घूम रहे थे तो उन्हें अहसास हुआ के एक व्यक्ति  उनका पीछा कर रहा है। स्थिति को भांपते हुए वो एक दुकान में घुस गए और दुकानदार को इस के बारे में सूचित किया। भला हो उस दुकानदार का उसने मानवता दिखाते हुए उस व्यक्ति को धर दबोचा। बाद में उसने कबूला के वो लूटने के उदेश्य से उनका पीछा कर रहा था।
ये कहानी सुनते ही मैंने प्रश्न दागा ,"उसको पुलिस के हवाले कर दिया न ?" बहना मायूसी भरे लहज़े में बोली ,"नहीं भाई !" मैं इससे पहले कुछ बोलता वो फिर बोली ," actually दुकानदार ने ही हमें पुलिस स्टेशन जाने से मना कर दिया था। " आगे की स्टोरी बताते हुए वो बोली ,"दुकानदार कहने लगा के आप  विदेश से आई हैं ,क्यों इस लफ़ड़े में पड़ती हैं ,पुलिस में जाएंगी तो बार -बार पुलिस स्टेशन में चक्कर लगा कर तंग आ जाएंगी। इस का कुछ हो न हो लेकिन हमारी पुलिस आप को परेशान ज़रूर कर देगी। आप से पुलिस सौ तरह के सवाल पूछेगी और इस परेशानी से बचने के लिए आप को जेब ढीली करनी पड़ेगी वो अलग !" शायद दुकानदार का यह अनुभव बोल रहा था।
एक ही सांस में सारी कहानी सुनाते हुए वो बोली ,"मैंने भी सोचा के क्यों पचड़े में पड़ा जाए !"सारा किस्सा सुनाने के बाद वो एक ढंडी सांस लेते हुए बोली ,"मैं सोच रही हूँ के कालरा मेरे देश और यहाँ के system के बारे में क्या सोच रही होगी ! अपने वतन वापिस लौट कर मेरे देश की कैसी छवि रखेगी। पिछले कईं दिनों से जिस तरह से आंदोलनकारियों ने पूरा हरयाणा हाईजैक कर लिया है और पुलिस मूक दर्शक बन कर रह गई है।  कालरा को पिछले कईं दिनों से घर में नज़रबंदी झेलनी पड़ रही है ,ऐसे में वो अपने वतन लौट कर मेरे देश की क्या छवि रखेगी ये ख़ुदा ही जाने।" इस सारे घटना क्रम के बाद से मैं अभी तक उनसे मिलने का साहस नहीं जूता पा रहा हूँ।
ये चिठ्ठी लिखते लिखते समाचार ये है कि काश्मीर में उग्रवादियों ने एक बिल्डिंग पर कब्ज़ा कर लिया है।तीन जवान शहीद हो चुके हैं। पिछले 18 घंटों से आर्मी और उग्रवादियों के बीच मुठभेड़ जारी है। देश के अलग अलग कोनों में युवा ,वकील ,छात्र ,अध्यापक और मीडिया व् सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोग आज़ादी ,राष्ट्र द्रोह और तिरंगा झंडा फहराने के उदेश्य और समय को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। पूरा देश एक नई क्रांति के चक्रव्ह्यू में फंसा नज़र आ रहा है।
मन की बात कहूँ तो मुझे ऐसा लगता है के पूरा देश असहिषुणता के दौर से गुज़र रहा है। समय आ गया है के देश में गरीबी और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं का समाधान करने और गली सड़ी व अपंग हुई व्यवस्था को बदलने और उसमें विश्वास बहाल करने की ज़रुरत है। इस के साथ समस्यायों को  जड़ से खत्म करने के लिए मूलभूत कारणों को समझना होगा।
आप को नहीं लगता के असहिषुणता की पतंग देश द्रोह और देश भक्ति के पेंच में फंस गई है। तिरंगा फहराया जाए या नहीं हम इस बहस में उलझ गए हैं ! काम के बजाय हर वर्ग आरक्षण के मकड़जाल में फंसना चाहता है। आखिर कहाँ जा रहा  है मेरा "डिजटल इंडिया "और आखिर क्या होगा मेरे "मेक इन इंडिया" का !!
जागो इंडिया जागो .......!

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