Sunday, 21 February 2016

A LETTER-EK CHITHEE (PART-40)

                                 जागो इंडिया जागो .......! (Part -1 )
लिखते हुए बहुत दुःख हो रहा है के "देशां मै देश हरयाणा ,जित दूध दही का खाणा " कहे जाने वाला मेरा प्रान्त आज आरक्षण की चपेट में जल रहा है। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं और जाट एकता ज़िंदाबाद के नारे गूँज रहे हैं। इसे पुलिस की नाकामयाबी कहें या कुछ और समझ नहीं आ रहा। सड़कों पर पुलिस के आला अधिकारी सेना के साथ फ्लैग मार्च कर रहे हैं। लगभग 9 लोग मारे जा चुके हैं। चारों तरफ जलती हुई बसें ,गाड़ियां और बिल्डिंग जलती हुई नज़र आ रही हैं। रास्ते हैं लेकिन उन पर आरक्षण मांगने वालों का कब्ज़ा है। बड़े पुलिस अधिकारी अपने चिर परिचित अंदाज़ में आश्वासन दे रहे हैं , "स्थिति चिंता जनक किन्तु नियंत्रण में है। "
ये सही है के ऐसे मौकों पर प्रशासन का  कर्तव्य बनता है के वो लोगों में भय निकाल कर शांति का माहौल बना कर रखे। मेरी समझ से परे है की ऐसे हालातों में पुलिस भाईचारे की बात करती है लेकिन जब सब ठीक ठाक  होता है तो उस की छवि किसी वर्दी वाले गुंडे , उपद्रवी या फिर किसी रिश्वत खोर दानव की तरह क्यों बन जाती है।
आज आरक्षण समर्थक फ्रंट फुट पर तो पुलिस बैक फुट पर है। आज पुलिस अस्त्र शस्त्र से लैस होने के बावजूद भी किसी नपुंसक की तरह कुछ भी कर पाने में असमर्थ नज़र आ रही है। जब भी स्थिति विकट हो जाती है तो पुलिस असहाय क्यों हो जाती है। ऐसे में आर्मी को तलब किया जाता है।
आम दिनों में सुरक्षा के नाम पर सड़क के बीचों बीच नाके लगा कर आम आदमी के चालान करने व रिश्वत ऐंठने वाली दबंग पुलिस आज न जाने कहाँ गायब है। कल शाम को घर के नज़दीक मार्केट में रोज़ मर्रा की ज़रुरत का सामान लेने गया। जब मार्किट के पास पहुंचा तो वहां लगे एक पेड़ के नीचे करीब 15 -20 युवाओं का एक ग्रुप हाथों में डंडे लहराते हुए खड़ा था । उन्हें देख कर एक बारगी तो मैं दहल गया। मैंने तुरंत 100 नंबर पर डायल किया। लेकिन वहां से कोई response नहीं मिला। थोड़ी देर में बिना किसी अप्रिय घटना के वो वहां से गायब हो गए। थोड़ी देर में स्कूटर और मोटर बाइक पर झुण्ड में करीब 40 -50 युवक हुड़दंग मचाते हुए निकले। मैं उन्हें इधर उधर घूमते हुए देखता भर रहा।ऐसे मौके पर जब पुलिस को शहर में शांति बना कर रखने के लिए तैनात रहना चाहिए ,ऐसे में पुलिस नदारद नज़र आ रही है।
इस दृश्य के बाद मेरे मानस पटल पर कुछ पुरानी बातें और तस्वीरें तैरने लगीं। करीब दो माह पूर्व मेरा इंजीनियर बेटा अपने दो मित्रों के साथ किसी मोटर बाइक के एक इवेंट को देखने के लिए गया था। कार्यक्रम की शुरुआत से पहले ही पुलिस ने इस को रद्द कर दिया। इस से खफा वहां उपस्थित युवाओं ने हुड़दंग मचाना शुरू कर दिया। पुलिस ने सतर्कता बरतते हुए वहां पुलिस फ़ोर्स को भेजा। पुलिस को देखकर हुड़दंगी गायब हो गए। लेकिन पुलिस को अपनी कार्यवाही को अमली जमा तो पहनाना ही था। उपरोक्त कार्यवाही से बेखबर बेटा और उसके दोस्त इस पूरे ड्रामे को समझ पाते - पुलिस ने उनको पकड़ लिया। शहर के दरोगा ने बेटे को उसको कॉलर से पकड़ते हुए पुलिस की गाड़ी में धकेल दिया। बेटे ने जब अपना परिचय देना चाहा तो दरोगा ने उसके मुहं पर ज़ोर से तमाचे जड़ना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में "मेक इन इंडिया " का सपना लेने वाले तीन बेक़सूर  इंजीनियर किसी उपद्रवी और हुड़दंगी के tag के साथ पुलिस चौकी में थे। लगभग तीन घंटे तक पुलिस ने किसी मुज़रिम की तरह उन्हें पुलिस चौकी में बिठा कर रखा और उनकी एक न सुनी । यही नहीं उनके मोबाइल फ़ोन भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिए ताकि वो किसी से संपर्क न कर सकें।
शुक्र है के उन पर पुलिस ने राजद्रोह या असहिषुणता का कोई केस नहीं बनाया लेकिन उनकी मोटर साइकिल और कार के चालान काट दिए गए और दोनों इम्पाउंड कर लिए गए । पुलिस के चालान के जुर्माने को चुकाने और गाड़ी रिलीज़ करवाने के चक्कर में मेरे एक महीने की तनख्वाह मेरी जेब से खिसक गई ।  मुझे इस जुर्माने की चिंता की बजाये बच्चों की मानसिक अस्थिरता और असंतुलन की चिंता ज़्यादा थी। सच मानिए उनको इस मनोस्थिति से उबरने में कईं दिन लगे। वर्ना इन युवाओं को अपने रास्ते से भटकाने के लिए पुलिस के इस कुकृत्य ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी।
To be  continued ...........

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