"गिरगिट "
दिल तो बच्चा है जी !
आरक्षण की मांग करने वालों का दिल शायद बड़ा हो गया था। बच्चों में दिमाग नहीं होता न । बड़ा हो जाने पर आदमी दिमाग से काम करने लगता है। अभी अभी एक भाई की पोस्ट देख रहा था। शहर में मार्च निकाला गया था। प्रान्त में शांति बहाली और आंदोलनकारियों द्वारा पीड़ितों को मुआवज़ा देने की मांग की जा रही थी। शहर को बंद रखा गया। तस्वीरें देख कर हैरान हुआ के इस आंदोलन में ज़हर उगलने वाले इस मार्च की अगुवाई कर रहे थे। राजनीतिज्ञों को "गिरगिट "की तरह रंग बदलने से तो सब वाकिफ़ हैं लेकिन सामान्य जीवन में शांत ,होनहार और संस्कारी युवाओं को "गिरगिट "की तरह रंग बदलते देख मैं असमंजस में हूँ।एक दिन पहले ही आज से लगभग 15 वर्ष पूर्व निर्देशित नाटक "गिरगिट " की फोटू सोशल मीडिया पर शेयर की थी। पिछले 10 दिन के घटना क्रम ने मेरे द्वारा निर्देशित नाटक की कहानी को चरितार्थ कर दिया।
"झटपट रंग बदल ले भाई !
झटपट रंग बदल ले !
एक रंग से काम नहीं चलता !
झटपट रंग बदल ले भाई !"
थोड़ी देर पहले ही मुंबई में मेरे एक दोस्त से इस पूरे घटनाक्रम पर बात कर रहा था। सब कुछ सुनने के बाद एक स्टोरी राइटर की तरह एक लाइन में बोलते हुए वो बोला ," आंदोलन नहीं दंगा था ये तो ! बिल्कुल
1947 की तरह !" इसी के साथ उसने एक सवाल भी कर डाला ," हमारे देश का युवा कहीं आगे बढ़ने की बजाए रूढ़ीवादी तो नहीं होता जा रहा ? " उसके इस सवाल का जवाब मैं नहीं दे पाया।
मेरा मानना है के कृष्ण और कर्ण के नाम से विख्यात हरयाणा में" महाभारत " की तरह एक नए युद्ध की इबारत लिख दी गई है। " जीवन एक युद्ध है ! इसे लगातार लड़ते रहना होगा !" ये मेरा कहना नहीं है! ये तो हमारे पवित्र ग्रन्थ "गीता" में लिखा हुआ है ! अभी एक गीत के बोल कानों में सुनाई दे रहे हैं , " दइया रे दइया ! चढ़ गयो पापी बिछुआ !"
खैर अपना -अपना स्टाइल है !
ख़ुदा खैर करे !










