Tuesday, 23 February 2016

"गिरगिट "


                                                               "गिरगिट " 
 दिल तो बच्चा है जी !
आरक्षण की मांग करने वालों का दिल शायद बड़ा हो गया था। बच्चों में दिमाग नहीं होता न । बड़ा हो जाने पर आदमी दिमाग से काम करने लगता है। अभी अभी एक भाई की पोस्ट देख रहा था। शहर में मार्च निकाला गया था। प्रान्त में शांति बहाली और आंदोलनकारियों द्वारा पीड़ितों को मुआवज़ा देने की मांग की जा रही थी। शहर को बंद रखा गया। तस्वीरें देख कर हैरान हुआ के इस आंदोलन में ज़हर उगलने वाले इस मार्च की अगुवाई कर रहे थे। राजनीतिज्ञों को "गिरगिट "की तरह रंग बदलने से तो सब वाकिफ़ हैं लेकिन सामान्य जीवन में शांत ,होनहार और संस्कारी युवाओं को "गिरगिट "की तरह रंग बदलते देख मैं असमंजस में हूँ।एक दिन पहले ही आज से लगभग 15 वर्ष पूर्व निर्देशित नाटक "गिरगिट " की फोटू सोशल मीडिया पर शेयर की थी। पिछले 10 दिन के घटना क्रम ने मेरे द्वारा निर्देशित नाटक की कहानी को चरितार्थ कर दिया।
"झटपट रंग बदल ले भाई ! 
झटपट रंग बदल ले  !
एक रंग से काम नहीं चलता !
झटपट रंग बदल ले भाई !" 
 थोड़ी देर पहले ही मुंबई में मेरे एक दोस्त से इस पूरे घटनाक्रम पर बात कर रहा था। सब कुछ सुनने के बाद एक स्टोरी राइटर की तरह एक लाइन में बोलते हुए वो बोला ," आंदोलन नहीं दंगा था ये तो ! बिल्कुल 
1947 की तरह !" इसी के साथ उसने एक सवाल भी कर डाला ," हमारे देश का युवा कहीं आगे बढ़ने की बजाए रूढ़ीवादी तो नहीं होता जा रहा ? " उसके इस सवाल का जवाब मैं नहीं दे पाया।
मेरा मानना है के कृष्ण और कर्ण के नाम से विख्यात हरयाणा में" महाभारत " की तरह एक नए युद्ध की इबारत लिख दी गई है। " जीवन एक युद्ध है ! इसे लगातार लड़ते रहना होगा !" ये मेरा कहना नहीं है! ये तो हमारे पवित्र ग्रन्थ "गीता" में लिखा हुआ है ! अभी एक गीत के बोल कानों में सुनाई दे रहे हैं , " दइया रे दइया ! चढ़ गयो पापी बिछुआ !"
खैर अपना -अपना स्टाइल है !
ख़ुदा खैर करे !

Sunday, 21 February 2016

A LETTER- EK CHITHEE (PART-41)

जागो इंडिया जागो (Part -2 )
भाग -1 से आगे............  स्थिति चिंताजनक किन्तु नियंत्रण में है ! 
  . . . . . . . . .  पुलिस के चालान के जुर्माने को चुकाने और गाड़ी रिलीज़ करवाने के चक्कर में मेरे एक महीने की तनख्वाह मेरी जेब से खिसक गई । बेशक घर का सारा बजट बिगड़ गया लेकिन मुझे इस जुर्माने की चिंता की बजाये बच्चों की मानसिक अस्थिरता और असंतुलन की चिंता ज़्यादा थी। सच मानिए उनको इस मनोस्थिति से उबरने में कईं दिन लगे। वर्ना इन युवाओं को अपने रास्ते से भटकाने के लिए पुलिस ने अपने इस कुकृत्य ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी. . . . . . . 
आज कल बेटा गोवा में आयोजित I B W ( इंडियन Bike Week ) में भाग लेने के लिए गया हुआ है। एक तरफ  लगभग 2500 किलोमीटर का सफर बाइक पर तय करना था उसे। पिता होने के नाते  चिंता वाज़िब थी। ना जाने उसे विदा करते हुए ये ही शब्द क्यों निकले ,"बेटा ध्यान से जाना ! रास्ते में पुलिस से बचते बचाते जाना। आप की गाड़ी के कागज़ तो पुरे हैं न ? " न जाने क्योँ मेरे मन में पुलिस का ही डर क्यों था ! शुक्र है के रास्ते में किसी पुलिस वाले ने उनको कहीं नहीं रोका और कोई अप्रिय घटना नहीं घटी !
पुलिस का एक और किस्से का ज़िक्र भी मैं यहाँ करना चाहूँगा। कुछ दिन पहले ही मेरी बहन विदेश से अपने वतन वापिस आई। साथ में बेटा और इटली की एक मित्र भी साथ आईं थी । ये सभी पिछले 10 -12 वर्षों से कनाडा में settled हैं। उनसे मिला तो बहन ने बताया के उनकी दोस्त "कालरा " भारत दर्शन के लिए आईं हैं। मैंने मिलते ही कालरा से पूछा ,"How is इंडिया ?" कालरा बोली ,"we have just arrived . एक दो दिन में घूमेंगे तो देखते हैं ,कैसा है आप का इंडिया !"
अगले ही दिन बहन अपनी मित्र कालरा को अपना शहर घुमाने ले गईं। शाम को मैं जब दोबारा उनसे मिलने गया तो मैंने कालरा से अपना पहले वाला प्रश्न दोहराया। इस बार कालरा मुस्कुरा भर दी और बहन की ओर देखने लगी। मैं कुछ समझ नहीं पाया। मैंने अपनी बहन सिम्मी की और आश्चर्य से देखा। सिम्मी ने जो किस्सा सुनाया वो सच में दहला देने वाला था। सिम्मी ने कहानी सुनाते हुए कहा ,"बाज़ार में घूम रहे थे तो उन्हें अहसास हुआ के एक व्यक्ति  उनका पीछा कर रहा है। स्थिति को भांपते हुए वो एक दुकान में घुस गए और दुकानदार को इस के बारे में सूचित किया। भला हो उस दुकानदार का उसने मानवता दिखाते हुए उस व्यक्ति को धर दबोचा। बाद में उसने कबूला के वो लूटने के उदेश्य से उनका पीछा कर रहा था।
ये कहानी सुनते ही मैंने प्रश्न दागा ,"उसको पुलिस के हवाले कर दिया न ?" बहना मायूसी भरे लहज़े में बोली ,"नहीं भाई !" मैं इससे पहले कुछ बोलता वो फिर बोली ," actually दुकानदार ने ही हमें पुलिस स्टेशन जाने से मना कर दिया था। " आगे की स्टोरी बताते हुए वो बोली ,"दुकानदार कहने लगा के आप  विदेश से आई हैं ,क्यों इस लफ़ड़े में पड़ती हैं ,पुलिस में जाएंगी तो बार -बार पुलिस स्टेशन में चक्कर लगा कर तंग आ जाएंगी। इस का कुछ हो न हो लेकिन हमारी पुलिस आप को परेशान ज़रूर कर देगी। आप से पुलिस सौ तरह के सवाल पूछेगी और इस परेशानी से बचने के लिए आप को जेब ढीली करनी पड़ेगी वो अलग !" शायद दुकानदार का यह अनुभव बोल रहा था।
एक ही सांस में सारी कहानी सुनाते हुए वो बोली ,"मैंने भी सोचा के क्यों पचड़े में पड़ा जाए !"सारा किस्सा सुनाने के बाद वो एक ढंडी सांस लेते हुए बोली ,"मैं सोच रही हूँ के कालरा मेरे देश और यहाँ के system के बारे में क्या सोच रही होगी ! अपने वतन वापिस लौट कर मेरे देश की कैसी छवि रखेगी। पिछले कईं दिनों से जिस तरह से आंदोलनकारियों ने पूरा हरयाणा हाईजैक कर लिया है और पुलिस मूक दर्शक बन कर रह गई है।  कालरा को पिछले कईं दिनों से घर में नज़रबंदी झेलनी पड़ रही है ,ऐसे में वो अपने वतन लौट कर मेरे देश की क्या छवि रखेगी ये ख़ुदा ही जाने।" इस सारे घटना क्रम के बाद से मैं अभी तक उनसे मिलने का साहस नहीं जूता पा रहा हूँ।
ये चिठ्ठी लिखते लिखते समाचार ये है कि काश्मीर में उग्रवादियों ने एक बिल्डिंग पर कब्ज़ा कर लिया है।तीन जवान शहीद हो चुके हैं। पिछले 18 घंटों से आर्मी और उग्रवादियों के बीच मुठभेड़ जारी है। देश के अलग अलग कोनों में युवा ,वकील ,छात्र ,अध्यापक और मीडिया व् सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोग आज़ादी ,राष्ट्र द्रोह और तिरंगा झंडा फहराने के उदेश्य और समय को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। पूरा देश एक नई क्रांति के चक्रव्ह्यू में फंसा नज़र आ रहा है।
मन की बात कहूँ तो मुझे ऐसा लगता है के पूरा देश असहिषुणता के दौर से गुज़र रहा है। समय आ गया है के देश में गरीबी और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं का समाधान करने और गली सड़ी व अपंग हुई व्यवस्था को बदलने और उसमें विश्वास बहाल करने की ज़रुरत है। इस के साथ समस्यायों को  जड़ से खत्म करने के लिए मूलभूत कारणों को समझना होगा।
आप को नहीं लगता के असहिषुणता की पतंग देश द्रोह और देश भक्ति के पेंच में फंस गई है। तिरंगा फहराया जाए या नहीं हम इस बहस में उलझ गए हैं ! काम के बजाय हर वर्ग आरक्षण के मकड़जाल में फंसना चाहता है। आखिर कहाँ जा रहा  है मेरा "डिजटल इंडिया "और आखिर क्या होगा मेरे "मेक इन इंडिया" का !!
जागो इंडिया जागो .......!

A LETTER-EK CHITHEE (PART-40)

                                 जागो इंडिया जागो .......! (Part -1 )
लिखते हुए बहुत दुःख हो रहा है के "देशां मै देश हरयाणा ,जित दूध दही का खाणा " कहे जाने वाला मेरा प्रान्त आज आरक्षण की चपेट में जल रहा है। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं और जाट एकता ज़िंदाबाद के नारे गूँज रहे हैं। इसे पुलिस की नाकामयाबी कहें या कुछ और समझ नहीं आ रहा। सड़कों पर पुलिस के आला अधिकारी सेना के साथ फ्लैग मार्च कर रहे हैं। लगभग 9 लोग मारे जा चुके हैं। चारों तरफ जलती हुई बसें ,गाड़ियां और बिल्डिंग जलती हुई नज़र आ रही हैं। रास्ते हैं लेकिन उन पर आरक्षण मांगने वालों का कब्ज़ा है। बड़े पुलिस अधिकारी अपने चिर परिचित अंदाज़ में आश्वासन दे रहे हैं , "स्थिति चिंता जनक किन्तु नियंत्रण में है। "
ये सही है के ऐसे मौकों पर प्रशासन का  कर्तव्य बनता है के वो लोगों में भय निकाल कर शांति का माहौल बना कर रखे। मेरी समझ से परे है की ऐसे हालातों में पुलिस भाईचारे की बात करती है लेकिन जब सब ठीक ठाक  होता है तो उस की छवि किसी वर्दी वाले गुंडे , उपद्रवी या फिर किसी रिश्वत खोर दानव की तरह क्यों बन जाती है।
आज आरक्षण समर्थक फ्रंट फुट पर तो पुलिस बैक फुट पर है। आज पुलिस अस्त्र शस्त्र से लैस होने के बावजूद भी किसी नपुंसक की तरह कुछ भी कर पाने में असमर्थ नज़र आ रही है। जब भी स्थिति विकट हो जाती है तो पुलिस असहाय क्यों हो जाती है। ऐसे में आर्मी को तलब किया जाता है।
आम दिनों में सुरक्षा के नाम पर सड़क के बीचों बीच नाके लगा कर आम आदमी के चालान करने व रिश्वत ऐंठने वाली दबंग पुलिस आज न जाने कहाँ गायब है। कल शाम को घर के नज़दीक मार्केट में रोज़ मर्रा की ज़रुरत का सामान लेने गया। जब मार्किट के पास पहुंचा तो वहां लगे एक पेड़ के नीचे करीब 15 -20 युवाओं का एक ग्रुप हाथों में डंडे लहराते हुए खड़ा था । उन्हें देख कर एक बारगी तो मैं दहल गया। मैंने तुरंत 100 नंबर पर डायल किया। लेकिन वहां से कोई response नहीं मिला। थोड़ी देर में बिना किसी अप्रिय घटना के वो वहां से गायब हो गए। थोड़ी देर में स्कूटर और मोटर बाइक पर झुण्ड में करीब 40 -50 युवक हुड़दंग मचाते हुए निकले। मैं उन्हें इधर उधर घूमते हुए देखता भर रहा।ऐसे मौके पर जब पुलिस को शहर में शांति बना कर रखने के लिए तैनात रहना चाहिए ,ऐसे में पुलिस नदारद नज़र आ रही है।
इस दृश्य के बाद मेरे मानस पटल पर कुछ पुरानी बातें और तस्वीरें तैरने लगीं। करीब दो माह पूर्व मेरा इंजीनियर बेटा अपने दो मित्रों के साथ किसी मोटर बाइक के एक इवेंट को देखने के लिए गया था। कार्यक्रम की शुरुआत से पहले ही पुलिस ने इस को रद्द कर दिया। इस से खफा वहां उपस्थित युवाओं ने हुड़दंग मचाना शुरू कर दिया। पुलिस ने सतर्कता बरतते हुए वहां पुलिस फ़ोर्स को भेजा। पुलिस को देखकर हुड़दंगी गायब हो गए। लेकिन पुलिस को अपनी कार्यवाही को अमली जमा तो पहनाना ही था। उपरोक्त कार्यवाही से बेखबर बेटा और उसके दोस्त इस पूरे ड्रामे को समझ पाते - पुलिस ने उनको पकड़ लिया। शहर के दरोगा ने बेटे को उसको कॉलर से पकड़ते हुए पुलिस की गाड़ी में धकेल दिया। बेटे ने जब अपना परिचय देना चाहा तो दरोगा ने उसके मुहं पर ज़ोर से तमाचे जड़ना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में "मेक इन इंडिया " का सपना लेने वाले तीन बेक़सूर  इंजीनियर किसी उपद्रवी और हुड़दंगी के tag के साथ पुलिस चौकी में थे। लगभग तीन घंटे तक पुलिस ने किसी मुज़रिम की तरह उन्हें पुलिस चौकी में बिठा कर रखा और उनकी एक न सुनी । यही नहीं उनके मोबाइल फ़ोन भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिए ताकि वो किसी से संपर्क न कर सकें।
शुक्र है के उन पर पुलिस ने राजद्रोह या असहिषुणता का कोई केस नहीं बनाया लेकिन उनकी मोटर साइकिल और कार के चालान काट दिए गए और दोनों इम्पाउंड कर लिए गए । पुलिस के चालान के जुर्माने को चुकाने और गाड़ी रिलीज़ करवाने के चक्कर में मेरे एक महीने की तनख्वाह मेरी जेब से खिसक गई ।  मुझे इस जुर्माने की चिंता की बजाये बच्चों की मानसिक अस्थिरता और असंतुलन की चिंता ज़्यादा थी। सच मानिए उनको इस मनोस्थिति से उबरने में कईं दिन लगे। वर्ना इन युवाओं को अपने रास्ते से भटकाने के लिए पुलिस के इस कुकृत्य ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी।
To be  continued ...........

Saturday, 20 February 2016

राम झूठ न बुलवाये !(Part-6)

राम झूठ न बुलवाये !
हररोज़ की तरह आज घर से काम के लिए निकला तो ट्रैफिक कुछ कम था। ये तो आप जानते ही हैं कि हरियाणा आरक्षण की आग में जल रहा है। सभी रास्ते जाम हो चुके हैं। अधिकतर रेल गाड़ियां रद्द हो चुकी हैं। रोहतक और भिवानी में आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया है। रोहतक ,भिवानी,  झज्जर और जींद में कर्फ्यू लगा दिया गया है। हरियाणा अपने पड़ौसी राज्यों पंजाब ,राजस्थान ,दिल्ली और उतर प्रदेश से बिलकुल कट सा गया है। 
इस आंदोलन में अब तक पांच लोगों की मृत्यु का समाचार है। आगजनी जारी है और सरकारी व प्राइवेट गाड़ियों तथा सम्पति को आग के हवाले किया जा रहा है। अधिकतर मोर्चों की कमान उग्र युवाओं के हाथ में है। सेना बुलवा ली गई है। सेना Flag मार्च कर रही है। HTET और CTET की परीक्षाएं स्थगित कर दी गई हैं।
नेता अपने अपने ढंग से शांति बनाये रखने की अपील कर रहे हैं। राजनीती गर्म हो गई है। कुछ नेताओं द्वारा राजनीतिक रोटियां सेकने में कोई गुरेज़ नहीं किया जा रहा।
G . T . Road पर गाड़ियों का पहिया थम सा गया है। दोपहर वापिस घर लौटा तो कर्फ्यू जैसा माहौल लगा। हालांकि मेरे शहर करनाल में अभी शांति बनी हुई है। स्कूलों में आज छुट्टी की घोषणा कर दी गई। कुछ स्कूलों के अध्यापक करनाल में आयोजित सरस मेला घूम आये। अध्यापक आरक्षण से बेख़बर सेल्फ़ी खिंचवाने में मशगूल थे।
नुक्क्ड़ और चाय के खोखों पर लोग चाय की चुस्की लेते हुए इस पर अपने ढंग से तप्सरा कर रहे हैं। पानीपत टोल प्लाज़ा को आग के हवाले किए जाने की ख़बर से लोग खुश हैं। खुसफुस करते हुए कहने लगे कि कितना अच्छा हो अगर सभी टोल प्लाज़ा फूंक दिए जाएं। अधिकतर लोग इसे आरक्षण के ज़रिए जाट और एंटी जाट के शक्ति परीक्षण के रूप में परिभाषित कर रहे हैं।
राम झूठ न बुलवाये - आम आदमी स्तब्ध है ! आम आदमी को आरक्षण नाम की इस चिड़िया के मायने समझ नहीं आ रहे हैं !

Saturday, 13 February 2016

A LETTER- EK CHITHEE(Part-39)

                                                          जनवरी नामा ( भाग - 1 )

हमेशा की तरह नए साल की शुरुआत कर्म स्थली में पूजन से हुई। स्कूल में पूरे स्टाफ के साथ यह प्रण लिया गया के सब बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेगा।
असल में मैं और मेरे साथ विद्यालय में काम करने वाले सभी अध्यापक एक मिशन की तरह काम कर रहे हैं। यही कारण है के हम सभी अपने स्कूल को कर्म स्थली का नाम देते हैं। स्कूलों में सर्दियों की छुट्टियों का एलान हो चुका था।  पिछले तीन चार सालों से सर्दी देर से पड़ने के कारण इस बार छुट्टियां 1 जनवरी से करने का निर्णय लिया गया था ।
मेरे लिए नए साल की शुरुआत सफर से हुई। एक दिन पहले बच्चों के साथ गांव में चला गया था।
स्कूल में पहुंचना ज़रूरी था। इसलिए सुबह ही गाड़ी स्टार्ट की और करनाल के लिए रवानगी डाल दी। गाँव में कोहरे की चादर बिछी हुई थी। लेकिन जैसे ही जी टी रोड पर पहुंचा तो धुप खिली हुई थी।
स्कूल में पहुँचते ही ऐसा लगा मानो मंज़िल मिल गई हो। यहाँ भी धूप खिली थी लेकिन मौसम में ढंडक थी। इधर -उधर बैठे अध्यापक अपने काम में व्यस्त थे।
मेरे ऑफिस के साथ वाले पार्क में नन्हें -नन्हें बच्चे डांस प्रैक्टिस में व्यस्त थे। सरबजीत बच्चों को बहुत ही सरल तरीके से डांस की टिप्स दे रहा था।
इस बार स्कूल का वार्षिकोत्सव लेट हो गया था और इसीलिए उसकी तैयारियों के लिए स्कूल में पांच दिन की नृत्य कार्यशाला का आयोजन किया गया था।
इसी आँगन में मेरी सहयोगी नवज्योत कौर ,सुनीता भंडारी ,संगीता चावला ,पूनम ,दीपिका व अन्य अध्यापिकायें नए सैशन के लिए books फाइनल करने में व्यस्त थीं। सर्दियों की छुट्टियों में काम के प्रति इन की लग्न देखते ही बनती थी। नए साल के पांच दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला।
हर साल की तरह इस बार भी प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया और बाद में स्टाफ द्वारा आयोजित स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठाया।
आज बहुत अच्छा लगा क्योंकि सभी लोग एक "टीम "तरह काम कर रहे थे।
पिछले कई बरसों से टीचर्स का घूमने का प्रोग्राम बन रहा था। कभी स्वर्ण मंदिर तो कभी दिल्ली भ्रमण फाइनल होता लेकिन किसी न किसी वजह से सिरे न चढ़ता। इस बार दिल्ली का प्रोग्राम फाइनल हो गया। सभी ने मेरी हामी भी भरवा ली लेकिन न जाने कैसी खिचड़ी बनी कि इस बार प्रोग्राम फिर कैंसल हो गया। छुट्टियों के बाद पता चला के सभी दिल्ली घूम अाये थे।
जीवन की भागमभाग में अपने लिए समय निकालना शायद बहुत मुश्किल होता है। इसलिए दुनियादारी की चिंताओं से मुक्त होने के लिए ये ज़रूरी है के कहीं घूम लिया जाए।
नए साल की शुरूआत मैंने भी कुछ फोटो खींच कर और घूमने के साथ की। सुबह खेतों में छिन्दे के साथ घूमने गए तो आनंद आ गया।
न जाने जीवन की डोर कब कट जाए इसलिए ज़रूरी है के जीवन को भरपूर जी लिया जाना चाहिए। इस दुनिया और जीवन से कोई गिला शिकवा नहीं है। बीता हुआ कल अच्छा बीत गया ,आने वाले कल की चिंता किए बिना आज को जीने की कोशिश कर रहा हूँ।
आप सब के लिए भी नया साल खुशियों से भरा हो यही दुआ करता हूँ। जल्द मिलता हूँ अगले ख़त के साथ।
जय हो !
To be continued......

Saturday, 6 February 2016

A LETTER- EK CHITHEE(PART-38)

                                                         अलविदा -2016  !
मैंने अपनी आखिरी चिठ्ठी अक्टूबर -2015 में लिखी थी। नवंबर और दिसंबर '१५  में आप से कोई सम्पर्क नहीं कर पाया। जीवन की भागमभाग में समय कितनी तेज़ भागता है ये पता ही नहीं चलता। भला हो इस फेस बुक वालों का जो समय समय पर कुछ नया करते रहते हैं। आज कल फेस बुक वाले ये बता रहे हैं के पिछले बरस आज ही के दिन आप ने फेस बुक पर क्या शेयर किया था। इसी के ज़रिये आप से संपर्क बना रहता है।
कुछ दिन पहले जल्दी नींद से जाग गया। फेस बुक खोला तो पिछले बरस लिखी चिठ्ठी नंबर -२९ ( जनवरी नामा - 2015 ) सामने थी। चिठ्ठी को पढ़ा तो ऐसा महसूस हुआ जैसे सब कल ही की बातें हैं। लेकिन इस चिठ्ठी को लिखे एक बरस बीत चुका था।
लम्बे अरसे से कुछ लिखा नहीं था। सोचा पिछले साल की तर्ज पर चिठ्ठी ही लिख दी जाए ! लिखने बैठा हूँ तो ऐसा लगता है के समय बेशक भागता जाए परन्तु समय चक्र में किस्से ,कहानियां ,घटनाएं लगभग वही रहती हैं लेकिन किरदार बदल जाते हैं।
आज रविवार है जैसे सोने पे सुहागा। पिछले बरस को याद करता हूँ तो कुछ ख़ास बातें या लम्हें ही मानस पटल पर चित्रित होते हैं। बार बार मानस पटल  के बटन दबाने के बावजूद भी सब कुछ स्पष्ट नज़र नहीं आता। दिमाग पर ज़्यादा ज़ोर न डाला जाए इस लिए सिरहाने के नीचे एक डायरी और पेन रख लिया था ताकि कुछ छूट न जाए। लेकिन फिर भी सब कुछ याद रखना या लिखना असंभव लगता है। अपने लेखक मित्र डॉ अजय शर्मा से एक दिन बात कर रहा था। गुरु ग्रन्थ साहेब का ज़िक्र करते हुए कहने लगे ," हम जितना मर्ज़ी लिखते रहें लेकिन सृष्टि निर्माता के लिखे का मुकाबला नहीं कर सकते और न उस को समझ सकते।" डॉ शर्मा एक नॉवल लिख रहे हैं , जिस का नाम भी इन्हीं पंक्तियों पर आधारित है ,"कागद कलम न लिखण हार। "
पिछले बरस निफा के सहयोग से दो बढ़िया नाटक खेलने का मौका मिला। निफा " National Integrated Fouram of Artists & Activists " राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक और सांस्कृतिक उत्थान के लिए अग्रसर है। इस संस्था के नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में चार रिकॉर्ड दर्ज हैं। इस संस्था के चेयरमैन प्रितपाल सिंह पन्नू से मेरा विशेष लगाव है। इस लगाव का कारण यही है के सामजिक क्षेत्र में बदलाव का जो सपना मैंने संजोया था वो उसे पूरा करने में निस्वार्थ लगा हुआ है। वो जो काम कर रहा है सच में सराहनीय है।
पिछले बरस मेरी दो कहानियों "स्कूल फीस " और "Friend Request" पर पुनीत सहगल के निर्देशन में दूरदर्शन शिमला द्वारा दो फिल्म्स का निर्माण किया गया। मैं इस चिठ्ठी के ज़रिये पुनीत सहगल और दूरदर्शन का धन्यवाद करना चाहूँगा !
पिछले बरस ही भतीजे कन्नू की शादी तो बिन्नी की सगाई हो गई। बिन्नी की शादी का इस बरस सब को इंतज़ार है। भतीजी अमानकौर की शादी भी धूमधाम से हो गई। उसके माता पिता -शेरो व बघेल सिंह ने इटली से अपने वतन आकर शादी करना बेहतर समझा। उनका सारा परिवार इटली में सेटल्ड है।
नीशू की शादी भी पिछले बरस ही हुई। लेकिन शादी के दो महीने के भीतर ही उसकी पत्नी सौम्या को कैंसर की खबर ने पूरे परिवार को दहला कर रख दिया। नीशू ने अपने प्यार सौम्या के लिए कैंसर से जिस तरह लड़ाई लड़ी वो सच में काबिले तारीफ है। कुछ दिन पूर्व ही  Bone Marrow  Transplantation हुआ है। सामाजिक संस्थाओं ने निशु और सौम्या को जिस तरह से मानसिक और वितीय सहायता दी उससे ऐसा लगा के दुनिया में मानवता अभी ज़िंदा है। बेशक असहिषुणता के नाम पर पूरा देश मानवता को तार तार करता रहा हो। हम सब सौम्या के जल्द ठीक होने की दुआ करते हैं।
पिछले बरस करनाल में शिक्षा क्षेत्र के स्तम्भ G S Warraich का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। उनके पुत्र नवज्योत सिंह ने अपने पिता का पार्थिव शरीर PGI Chandigarh में दान करके एक मिसाल कायम की। पारिवारिक मित्र अमृत लाल मेहंदीरत्ता भी अपनी जीवन यात्रा पूरी करके ब्रह्मलीन हो गए। एक अच्छे व्यक्तित्व के धनी मेरे मित्र नरेंदर के पिता भी प्रभु चरणों में लींन हो गए।
मेरे मित्र डॉ अजय शर्मा की रीढ़ की हड्डी का सफल ऑपरेशन हो गया। इस तरह के ऑपरेशन का नाम सुनकर एक बारगी तो शरीर में कम्पन पैदा हो जाती है। भला हो नई टेक्नोलॉजी और सक्षम doctors का। डॉ अजय शर्मा का ऑपरेशन सफल रहा। डॉ अजय शर्मा लेखन और पत्रकारिता में एक स्थापित नाम हैं।
फिर मिलने की उम्मीद से बस इतना ही लिखूंगा के "कागद कलम न लिखण हार !" 
 अलविदा 2016 ........ !