Friday, 11 July 2014

A LETTER...... EK CHITHEE PART-15

दोस्तों ,
नमस्कार।
कईं दिनों से आप सब से मुखातिब होने की कोशिश करता रहा लेकिन संयोग ही नहीं बना। आज एहसास हुआ के ख़त लिखने के लिए भी माहौल की ज़रुरत होती है।महीने भर की छुटियाँ थी ,लेकिन पूरी छुटियों  में माहौल नहीं बना। खैर आज बमुश्किल अपने आप को तैयार किया के कुछ लिख ही डाला जाए।
आप सब जानते ही हैं के अधिकतर लोगों का जीवन उतार चढ़ाव भरा होता है।जीवन में हम जो चाहते हैं कईं बार उसे हासिल करने में उम्र बीत जाती है।लेकिन देर आये दुरुस्त आए जैसी कहावत भी तो सोच समझ कर लिखी गई होगी।
मेरे दोस्त दलजिंदर सिंह के बारे में मैंने आप सब को पहले भी ज़िक्र किया था। उसने पंजाबी फिल्म "पंजाब 1984 "में  रोल किया था। फिल्म हिट हो गई है। सभी कलकारों ने बहुत बढ़िया अभिनय किया है।दलजिंदर के रोल की भी प्रशंसा की जा रही है। मैं तो उसकी स्मरण शक्ति के साथ -साथ उसके अभिनय का हमेशा से कायल रहा हूँ।शुभकामनायें दलजिंदर।
स्कूलों की छुटियाँ खत्म हो चुकी हैं। लगभग डेढ़ महीने की छुटियों के बाद भी स्कूल में बच्चों की संख्या अभी तक पूरी नहीं हुई है।माँ -बाप और बच्चे शायद सीबीएसई की शिक्षा प्रणाली को समझने लगे हैं। इस लिए बेफिक्र हैं।
मौसम का मिज़ाज भी कमाल का है ,बिल्कुल शेयर बाजार की तरह। कभी ऊपर तो कभी नीचे। पारा तो कम है लेकिन मौसम में आद्रता अधिक होने के कारण लोग पसीने -पसीने हुए जा रहे हैं। रही सही कसर बिजली विभाग ने पूरी कर दी है। बिजली बाई कुछ इस तरह से आँख मिचोली खेल रही है मानो अपने आशिक़ों का इम्तिहान ले रही हो। लेकिन आशिक़ हैं के अपनी माशूका को भूल कर बुलेट ट्रैन की रफ़्तार की घोषणा से खुश हुए जा रहे हैं।
बरखा ऋतु ने जून के महीने में दस्तक दी थी ,चिलचिलाती गर्मी से कुछ राहत भी मिली थी ,पेड़ पौधों पर पड़ी धूल साफ़ हो गई थी और चारों तरफ हरियाली छाने लगी थी। परन्तु जुलाई महीने में बरखा जैसे रूठ सी गई है। टीवी पर बार बार दिखाया जा रहा है के उत्तर पश्चिम भारत में सुखा पड़ने के आसार हैं।
बातें तो खूब सारी हैं जिन्हें मैं आप सब के साथ शेयर करना चाहता हूँ। हाँ सच बता दूँ मेरा दोस्त समीर नाना हो गया है। बिटिया अमानत और गुड़िआ स्वस्थ हैं। मेरे साथ कर्ण पब्लिक स्कूल में कम्प्यूटर अध्यापिका रजनी महेंद्रू ने भी पुत्र को जन्म दिया है। दोनों तंदुरुस्त हैं।मेरी और से ढुल परिवार व रजनी परिवार के सभी सदस्यों को ढेरों बधाई व शुभकामनायें।
अच्छा दोस्तों विदा लेता हूँ ,जल्द ही आप सब से फिर मुलाकात होगी।
         

Monday, 7 July 2014

DUNIYADARI

                                                                    दुनियादारी 
 कबीर ने जैसे ही चंडीगढ़ में प्रवेश किया उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। उसको तो जैसे पंख लग गए थे। आज पहली बार वो अपने बाप के बिना लॉन्ग ड्राइव के लिए निकला था। असल में साथ वाली सीट पर बैठ कर उसका बाप ड्राइविंग टिप्स देता रहता था। जो उसे कतई अच्छा नहीं लगता था।कभी- कभी तो कबीर इतना चिढ़ जाता के बीच रास्ते में गाड़ी रोक कर अपने बाप को कहता ,"लो आप ही गाड़ी ड्राइव कर लो और गाड़ी की चाबी अपने बाप को थमा कर पीछे जा कर बैठ जाता। "
 "गाड़ी धीरे चलाओ" ,"अगली गाड़ी से डिस्टेंस बना कर रखो" ,"यहाँ आप को ब्रेक लगानी चाहिए थी", "ये क्या कर रहे हो" ,"इतने नज़दीक से ओवरटेक नहीं करते" और न जाने क्या -क्या सुनना पड़ता था कबीर  को।
ऐसा नहीं के वो अभी -अभी ड्राइविंग सीखा था। जब दसवीं पास की ,तभी से गाड़ी ड्राइव कर रहा था। अब तो वो इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुका था। वो अपनी इंजीनियरिंग भी मैकेनिकल में कर रहा था। पर बाप तो बाप होता है। इस लिए बार -बार इंस्ट्रक्शंस दे कर वो आत्म संतुष्ट हो जाता और साथ ही बाप होने का फ़र्ज़ भी अदा कर लेता।
हालाँकि अंदर से बाप अच्छी तरह से जानता था के कबीर ड्राइविंग में परफेक्ट हो चुका है ,फिर भी वो कबीर को  बार -बार समझाता ,"ड्राइविंग का एक नियम गांठ बांध लो ,इस में कभी कोई परफेक्ट नहीं होता। तभी तो रोड पर साइन बोर्ड लगे होते हैं - सावधानी हटी ,दुर्घटना घटी।" जब भी कोई साइन बोर्ड आता कबीर का बाप उसकी और इशारा कर के कबीर को कोई न कोई हिदायत दे डालता।
आज उस के साथ माँ व् बहन थी। असल में वो अपनी बहन को एक कॉम्पिटिशन का पेपर दिलवाने के लिए चंडीगढ़ आया था। चंडीगढ़ को "सिटी ब्यूटीफुल" के नाम से जाना जाता है। इस शहर की सरंचना बख़ूबी की गई है। इस शहर की सुंदरता की तारीफ किए बिना कोई नहीं रह सकता।
ट्रिब्यून चौंक ,लेबर चौंक,किसान भवन ,अरोमा होटल ,२२ -२३ चौंक, बस स्टैंड के सामने से निकलते हुए कबीर स्टेडियम चौंक की और से जैसे ही रोज़ गार्डन वाले रोड पर चढ़ा तो आगे रेड लाइट देख कर उसने अपनी कार को रोक लिया। कबीर अपनी माँ व बहन को चंडीगढ़ के बारे में जानकारी देने लगा।कबीर इस से पहले कईं बार चंडीगढ़ आ चुका था।
अभी कबीर चंडीगढ़ के बारे में बता ही रहा था के ट्रैफिक पुलिस के एक जवान ने ड्राइवर साइड में खिड़की पर दस्तक दी। जैसे ही कबीर ने शीशा नीचे उतारा पुलिस वाले ने गाड़ी साइड पर लगाने का निर्देश दिया। गाड़ी के कागजों की जांच पड़ताल के बाद पुलिस वाले ने कबीर के ड्राइविंग लाइसेंस को तीन -चार बार पलट कर कहा ,"तेरा तो लाइसेंस डुप्लीकेट है काका।"डुप्लीकेट !",जैसे ही कबीर ने रियेक्ट किया तो पुलिस वाला बोला ,"मतलब फोटो कॉपी है काका। " इससे पहले कि कबीर कुछ बोलता पुलिस वाले ने गाड़ी के पिछले शीशे की और इशारा करते हुए कहा ,"शीशे पर काली फिल्म लगी है ,इस फिल्म का भी 2000 रूपए जुर्माना लगेगा। " इस से पहले के कबीर पुलिस वाले को कहता,"सर फिल्म तो मैने उतरवा रखी है और मेरा ड्राइविंग लाइसेंस भी ओरिजिनल है "पुलिस वाला चालान बुक निकाल कर किसी लाला के मुनीम की तरह जुर्माने का जोड़ करते करते बोला ,"काका तेरी कार की तो नंबर प्लेट भी ठीक नहीं है ,तेरा कुल जुर्माना बनता है ------4000 रूपए। " 
कबीर को समझते देर न लगी के पुलिस वाला क्या चाहता है। उसको समझ आ गया के पुलिस वाला चालान काटने के बजाए हड्डी का स्वाद चखना चाहता है।कबीर असमंजस में पड़ गया के इस पुलिस वाले को कितनी घूस दे। इस समय ,कबीर को वो पुलिस वाला अपनी गली के उस कुत्ते की तरह लग रहा था जो बिना वजह वहां से निकलने वालों के पीछे दौड़ता और कभी -कभी किसी को काट भी लेता। क्योंकि कबीर जानता था के वो पुलिस वाला बिना वजह तंग कर रहा है। कबीर ने मन ही मन पुलिस वाले को मोटी  मोटी गालियां निकालते हुए साइड में आने का इशारा किया। अपनी जेब से 500 का नोट निकाल कर उसने पुलिस वाले की हथेली पर रख दिया।कार की सभी खामियाँ दूर हो चुकी थी।पुलिस वाले ने तुरंत चालान बुक बंद कर ली और आगे ध्यान से जाने की हिदायत देते हुए वहां से चले जाने का इशारा किया।
कबीर ने घर पहुँचते ही बाप को ये सारा किस्सा सुनाया।न जाने क्यों इस पूरे किस्से को सुनाते हुए कबीर अपने बाप से बिल्कुल ख़ौफ़ज़दा नहीं था। बाप ने कबीर को कुछ नहीं कहा और मंद -मंद मुस्कराने लगा।
बाप खुश था के कबीर ड्राइविंग के साथ साथ दुनियादारी भी सीख गया है।  
     

Tuesday, 10 June 2014

"SOCIAL MEDIA KA LIKE"

कल नरेश  के पिता की मृत्यु हो गई। उसने दोस्तों को इन्फॉर्म करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया। उसने अपने स्टेटस पर पोस्ट किया ,"पिता की मृत्यु हो गई है ,अंतिम संस्कार कल रविवार को सुबह 11 बजे होगा। अलग से कोई कार्ड नहीं भेजा जा रहा है। " जिस ने भी दोस्त के स्टेटस को देखा "लाइक " कर दिया।नरेश अपने स्टेटस को देख कर खुश था। शाम तक उसके स्टेटस में "550 लाइक" जुड़ चुके थे।   

Saturday, 7 June 2014

A LETTER...... EK CHITHEE PART-14

दोस्तों ,
नमस्कार।
लगभग एक महीना हो गया है आप से रूबरू हुए। पिछला ख़त 7 अप्रैल को लिखा था। लिखने की ज़रुरत नहीं के विश्व के सब से बड़े और महानतम लोकतंत्र हिंदुस्तान में सत्ता परिवर्तन हो चुका  है।नरेंदर दामोदर दास मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपना काम शुरू कर दिया है। अब तक की कार्यवाही से लग रहा है के जल्द ही देश में सार्थक परिवर्तन देखने को मिलेंगे। अपने मंत्री साथियों को पाँव छूने के बजाए काम करने पर बल देने की सलाह की सभी जगह प्रसंशा की जा रही है।

अप्रैल और मई का महीना कैसे बीता कुछ पता ही नहीं चला। याद करने की कोशिश करता हूँ तो लगता है के पिछले दो महीने जैसे बिना कोई सार्थक काम किए बीत गए। कर्ण पब्लिक स्कूल में काम करते करते और बच्चों के बीच रहते हुए समय कैसे उड़न छू हो जाता है ,सच में पता नहीं चलता। ये दो महीने पूरी तरह से स्कूल को समर्पित रहते हैं। एक तरफ बच्चों के एडमिशन का दबाव रहता है तो दूसरी और बच्चों को सही शिक्षा प्रदान करने के लिए सक्षम अध्यापकों के चयन के लिए भी खासी मशक्क़त करनी पड़ती है।शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। इंग्लिश मीडियम की अंधी दौड़ बच्चों के भविष्य के साथ क्या गुल खिलाएगी,भगवान ही जानें।

अमेरिका से आए पारिवारिक दोस्त मंजीत चीमा से मण्ढौर (अम्बाला )में मुलाक़ात हुई। उनकी पत्नि भी साथ थी। फॉर्मल बातचीत के बाद फ़ोटो सैशन हुआ और एक दूसरे से विदा ली। आजकल मोबाइल फ़ोन ही कैमरा बन गए हैं। झटपट फ़ोटो खींचो और डाल दो सोशल साइट पर।मंजीत भाई अमेरिका आने से पहले कभी कभी बात कर लिया करते थे लेकिन इस मुलाक़ात के बाद अभी तक उन से कोई बात नहीं हुई।

पिछले वर्ष शूट हुई फिल्म भुजंग के प्रदर्शन का सभी बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। ख़ासकर कर्ण पब्लिक स्कूल करनाल के बच्चे। यही नहीं चंडीगढ़ से सुरेन भी अक्सर मैसेज कर पूछ लेता है ,"सर जी कब आ रही है। "यही नहीं फिल्म में एक अहम रोल निभाने वाले कलाकार समीर ने तो प्रण कर लिया है के इस फिल्म के रिलीज़ होने के बाद ही वो कोई अगली फिल्म साइन करेगा। फिल्म के डायरेक्टर मोहिन्दर से इस सिलसिले में जब भी बात होती है तो उस का बस यही जवाब होता है ,"यार फिल्म सबमिट करवा दी है और पास भी हो गई है ,आगे पैसे रिलीज़ करें तो पोस्ट प्रोडक्शन का काम शुरू करें। "सरकारी तंत्र में स्टैम्प लगवाने और फाइलों को इधर उधर करवाने के चक्कर में लोगों के सपने कैसे दब कर रह जाते हैं। ये इस का अच्छा उदाहरण है। हालांकि मोहिन्दर पूर्ण रूप से आशान्वित है के फिल्म १००%रिलीज़ होगी। कल उस की डिपार्टमेंट के लोगों से मीटिंग भी है। "शुभकामनायें दोस्त। "

गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं। पारा 47*तक पहुँच चुका है। गर्म हवाओं और आग उगलती गर्मी के कारण दोपहरी को बाहर निकलना मुश्किल हो गया है।आज कल अलसुबह सैर पर निकल जाता हूँ। अपने मोबाइल से कुछ फोटो खींच कर फेस बुक पर अपलोड कर देता हूँ। आजकल तरबूज़ बेचने वाले जगह -जगह नज़र आ जाते हैं। अपनी सेहत को लेकर लोग जागरूक हो गए हैं। हर जगह योग शिविर चल रहे हैं। आप सब भी अपनी सेहत का ध्यान रखें। इस उम्मीद के साथ के फिर मिलेंगे ,अलविदा दोस्तों !



To be continued.............! 

Friday, 30 May 2014

chunav

दुम हिलाते
निकल पड़ा है
कुतों का झुण्ड
ये मत समझना
के
वफादार
हो गए हैं ,
ध्यान रखना
ये
कुते
काटने
वाले हैं ! 

Friday, 23 May 2014

AJAB GAJAB KI RAJNEETI

दोस्तों ! देश के अलग अलग हिस्सों में मतदान की प्रक्रिया और चुनावी वायरल का यौवन समाप्त हो चुका है। देश और देश के लोगों का भाग्य जिन ई वी एस मशीनों में बंद हुआ था वो जादुई पिटारा १६ मई को खुला चुका है और पता लग गया है के देश के लोग वास्तव में क्या चाहते हैं।चुनावी फ़िज़ा में बदलाव तो स्पष्ट नज़र आ रहा था। परन्तु असल में देश के लोगों के मन की बात १६ मई को ही पता चल पाई।बचपन में सुना करते थे के "इट इज़ ऑल फेयर इन लव एंड वॉर।" देश के अलग अलग हिस्सों में हुए चुनावी प्रचार -प्रसार को देखा तो  "इट इज़ ऑल फेयर इन पॉलिटिक्स " के मायने भी समझ आने लगे।

राजनीतिज्ञों के लिए सत्ता लोलुपता और राजनितिक महत्वकांक्षा इतनी महत्वपूर्ण हो गई है के इन लोगों ने सभी नियमों को ताक़ पर रख दिया। कुछ दिनों पहले की ही तो बात है मेरे एक मित्र ने मज़ाक -मज़ाक में कहा था," कितना अच्छा हो यदि सभी नियमों को तोड़ दिया जाए। "मैंने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा तो वो तुरंत बोला ,"कितना मज़ा हो अगर होली वाले दिन बॉम्ब पटाखे बजाए जायें और दीपावली वाले दिन लोग एक -दूसरे को रंग गुलाल लगाएं। "साथ ही उसने तर्क भी दिया ,"सब कुछ एक ही तरह से करते करते जीवन बेरंग और बेमज़ा हो गया है। "

बिल्कुल ऐसा ही हाल हमारे देश की राजनीति का भी रहा। राजनीतिज्ञों को भी ये समझ आ गया के अब के बार कुछ भी सीधा नहीं।लोगों में आपसी भाई चारे की बात करने वाले नेताओं ने झूठे वायदे और धार्मिक उन्माद फैलाने वाले भाषण दिए। नेताओं या पार्टी ने बेरोज़गारी ,गरीबी , महंगाई ,भ्रष्टाचार ,देश का भविष्य बच्चों और युवाओं के लिए शिक्षा व स्वास्थय सेवाओं, महिलाओं ,मज़दूरों या किसानों के बारे में बात तो की लेकिन संजीदगी से नहीं।  एक दूसरे पर औछी टिप्पणी का जैसे प्रचलन सा ही हो गया था। बातों -बातों और इशारों -इशारों में एक दूसरे को नंगा करने की कोशिश कुछ इस तरह से की गई मानो कहना चाह रहे हों के चुनाव भी हमाम की तरह है ,जहाँ सब को एक बार नंगा तो होना ही पड़ता है। इस बार तो ऐसा लगा मानो चुनाव नहीं बल्कि दंगल हो। दंगल में पहलवान अपने लंगोट कस कर मैदान में उतरते हैं परन्तु यहाँ तो सभी के लंगोट खिसकते नज़र आए।

 क्या यही राजनीति के असल मायने हैं ! कोई किसी की बीवी के बारे में सवाल पूछ रहा था तो कोई किसी के पति पर सवालिया निशान लगा रहा था। कोई माँ की ममता में अंधेपन का ज़िक्र कर के लोगों को अपनी आँखें खोलने की अपील कर रहा था तो कोई राजकुमार से शादी न करने का कारण पूछ रहा था। मौसमी पारे के बढ़ने के साथ -साथ चुनावी गर्मी भी बढ़ती गई। बाबा जी भी चुनावी दंगल में कूद गए। शायद भूल गए के दंगल में लंगोट कस कर रखना पड़ता है और सत्संग में बोल पर नियंतरण रखना ज़रूरी है।पर बाबा कहाँ रुकने वाले। ऐसे में सोशल मीडिया भी पीछे नहीं रहा। कहीं चाय वाले के कपड़ों का ज़िक्र हुआ तो कहीं बाबा को औरतों के कपड़ों में दिखा कर उन्हें भगोड़ा प्रमाणित करने का प्रयास किया गया। जाति के नाम को भुनाने का समय आया तो छाती ठोक कर अपना प्रमाण पत्र दिया। कुल मिला कर एक दूसरे की माँ बहन  करने में किसी ने कोई कोर कसर बाकी  नहीं छोड़ी।
शहजादे ,गुड़िआ ,मैडम ,टॉफ़ी ,गुब्बारे जैसे शब्दों का प्रयोग तो इस तरह किया गया मानो नेता लोग छोटे बच्चों की तरह गुड़िआ -गुड़िआ खेल रहे हों।
खैर इस बार अजब गजब तो हुआ ! सब कुछ पहले जैसा नहीं हुआ ! मतदान प्रतिशत भी बढ़ा। लोग भी जागरूक हुए ! लहर और सुनामी का असर भी देखने को मिला। परिवार वाद को अलविदा के साथ विश्व की सब से बड़ी और महानतम लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के ज़रिए सत्ता परिवर्तन की एक नई  दास्ताँ भी लिखी गई। 
२६ मई को देश का नया प्रधानमंत्री शपथ लेगा।  शेर की तरह चलने और दहाड़ने वाला नरेंदर मोदी देश के १२५ सौ करोड़ लोगों की उम्मीदों पर कैसे खरा उतरता है ,ये आने वाले समय में कबीले गौर करने वाला होगा।     









Wednesday, 21 May 2014

achhe din aane vaale hain.......!

अच्छे दिन आने वाले हैं................. !
लो जी विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र हिंदुस्तान की राजनीति में विश्व रिकॉर्ड बन गया है। स्वतन्त्र देश में जन्म लेने वाला पहला व्यक्ति २६ मई को विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहा है।पिछले करीब 65 साल से देश की सत्ता पर काबिज कांग्रेस की ये सब से बढ़ी हार हुई है। 
 नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा के सेंट्रल हॉल में दिए गए भाषण को सुन रहा था। वाह जी वाह मोदी जी !आप तो छा गए। कमाल  का भाषण दिया। तालियां बजीं ,आंसू बहे ,माँ को याद किया गया। अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म का डायलाग याद आ गया , "मेरे पास माँ है। " टीवी वाले अलग -अलग ढंग से आप के भाषण को बार -बार दिखा रहे हैं। दिखाएँ भी क्यों ना.……टी आर पी का चक्कर जो है।
यही नहीं संसद में प्रवेश से पहले जिस तरहां से नतमस्तक हो कर सलाम किया गया वो सच में काबीले तारीफ़ है।आडवाणी और वाजपायी को जिस तरह से सम्मान दिया गया उस से भारतीय संस्कृति को बखूबी प्रचारित और प्रसारित करने में आप कामयाब हुए हैं। 
ये बाल धुप में सफ़ेद नहीं किए हैँ ,इस लकोक्ति के मायने समझ आने लगे हैं। समझ में आने लगा है के किला फ़तेह करने के लिए कला और कौशल दोनों की ज़रुरत होती है।जोकि मोदी ने बखूबी किया है। पूरा देश मोदीमय हो गया है। मोदी के बोलने के स्टाइल की वाजपाई के साथ तुलना की जा रही है।
आशावाद ,देशभक्ति ,महिलाओं की सुरक्षा ,गरीबों के उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए जिस तरह मोदी ने संसद में बैठे जनप्रतिनिधिओं को सरकार के मायने बताए वो निःसंदेह सराहनीय है।सरकार का मतलब है लोगों की सरकार ,जो लोगों के बारे में सोचे और जो लोगों के सपने ले। वाह जी वाह मोदी जी। आपने संसद में अपने पहले भाषण से अपने साथिओं को जो संकेत दिए हैं ,मैं उस की मुक्त कंठ से  प्रसंशा करता हूँ। राह आसान नहीं है परन्तु यदि होंसले बुलंद हों और नियत में कोई खोट न हो तो मंज़िल नज़दीक नज़र आने लगती है।
मोदी को हिंदुस्तान की जनता ने जिस तरह से बहुमत दिया है उससे मोदी की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है। नुक्कड़ पर चाय की दुकान पर चाय पीता रिक्शा चालक या कॉलेज में पढ़ने वाला कोई बालक ,पान की दुकान पर धुंए के छलै बनाता कोई दिलजला आशिक या फिर कोई दार्शनिक ,बस में सफर करते दो अनजान यात्री हों या फिर किसी वातानुकूलित कमरे में बैठे दो घनिष्ठ मित्र ,दफ्तरों में काम करते बाबू या फिर एकांत में चिलम पीते साधू ,क्या दुकानदार ,हवालदार ,जैलदार या फिर कोई पहरेदार सभी के मुख पर बस एक ही बात है, "ये मोदी ज़रूर कुछ करेगा।"टीवी पर बेशक प्रचार प्रसार रुक गया हो लेकिन अब आम आदमी के ओंठों पर बस एक ही गीत है , "अच्छे दिन आने वाले हैं !"
शुभकामनायें !