Monday, 7 July 2014

DUNIYADARI

                                                                    दुनियादारी 
 कबीर ने जैसे ही चंडीगढ़ में प्रवेश किया उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। उसको तो जैसे पंख लग गए थे। आज पहली बार वो अपने बाप के बिना लॉन्ग ड्राइव के लिए निकला था। असल में साथ वाली सीट पर बैठ कर उसका बाप ड्राइविंग टिप्स देता रहता था। जो उसे कतई अच्छा नहीं लगता था।कभी- कभी तो कबीर इतना चिढ़ जाता के बीच रास्ते में गाड़ी रोक कर अपने बाप को कहता ,"लो आप ही गाड़ी ड्राइव कर लो और गाड़ी की चाबी अपने बाप को थमा कर पीछे जा कर बैठ जाता। "
 "गाड़ी धीरे चलाओ" ,"अगली गाड़ी से डिस्टेंस बना कर रखो" ,"यहाँ आप को ब्रेक लगानी चाहिए थी", "ये क्या कर रहे हो" ,"इतने नज़दीक से ओवरटेक नहीं करते" और न जाने क्या -क्या सुनना पड़ता था कबीर  को।
ऐसा नहीं के वो अभी -अभी ड्राइविंग सीखा था। जब दसवीं पास की ,तभी से गाड़ी ड्राइव कर रहा था। अब तो वो इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में प्रवेश कर चुका था। वो अपनी इंजीनियरिंग भी मैकेनिकल में कर रहा था। पर बाप तो बाप होता है। इस लिए बार -बार इंस्ट्रक्शंस दे कर वो आत्म संतुष्ट हो जाता और साथ ही बाप होने का फ़र्ज़ भी अदा कर लेता।
हालाँकि अंदर से बाप अच्छी तरह से जानता था के कबीर ड्राइविंग में परफेक्ट हो चुका है ,फिर भी वो कबीर को  बार -बार समझाता ,"ड्राइविंग का एक नियम गांठ बांध लो ,इस में कभी कोई परफेक्ट नहीं होता। तभी तो रोड पर साइन बोर्ड लगे होते हैं - सावधानी हटी ,दुर्घटना घटी।" जब भी कोई साइन बोर्ड आता कबीर का बाप उसकी और इशारा कर के कबीर को कोई न कोई हिदायत दे डालता।
आज उस के साथ माँ व् बहन थी। असल में वो अपनी बहन को एक कॉम्पिटिशन का पेपर दिलवाने के लिए चंडीगढ़ आया था। चंडीगढ़ को "सिटी ब्यूटीफुल" के नाम से जाना जाता है। इस शहर की सरंचना बख़ूबी की गई है। इस शहर की सुंदरता की तारीफ किए बिना कोई नहीं रह सकता।
ट्रिब्यून चौंक ,लेबर चौंक,किसान भवन ,अरोमा होटल ,२२ -२३ चौंक, बस स्टैंड के सामने से निकलते हुए कबीर स्टेडियम चौंक की और से जैसे ही रोज़ गार्डन वाले रोड पर चढ़ा तो आगे रेड लाइट देख कर उसने अपनी कार को रोक लिया। कबीर अपनी माँ व बहन को चंडीगढ़ के बारे में जानकारी देने लगा।कबीर इस से पहले कईं बार चंडीगढ़ आ चुका था।
अभी कबीर चंडीगढ़ के बारे में बता ही रहा था के ट्रैफिक पुलिस के एक जवान ने ड्राइवर साइड में खिड़की पर दस्तक दी। जैसे ही कबीर ने शीशा नीचे उतारा पुलिस वाले ने गाड़ी साइड पर लगाने का निर्देश दिया। गाड़ी के कागजों की जांच पड़ताल के बाद पुलिस वाले ने कबीर के ड्राइविंग लाइसेंस को तीन -चार बार पलट कर कहा ,"तेरा तो लाइसेंस डुप्लीकेट है काका।"डुप्लीकेट !",जैसे ही कबीर ने रियेक्ट किया तो पुलिस वाला बोला ,"मतलब फोटो कॉपी है काका। " इससे पहले कि कबीर कुछ बोलता पुलिस वाले ने गाड़ी के पिछले शीशे की और इशारा करते हुए कहा ,"शीशे पर काली फिल्म लगी है ,इस फिल्म का भी 2000 रूपए जुर्माना लगेगा। " इस से पहले के कबीर पुलिस वाले को कहता,"सर फिल्म तो मैने उतरवा रखी है और मेरा ड्राइविंग लाइसेंस भी ओरिजिनल है "पुलिस वाला चालान बुक निकाल कर किसी लाला के मुनीम की तरह जुर्माने का जोड़ करते करते बोला ,"काका तेरी कार की तो नंबर प्लेट भी ठीक नहीं है ,तेरा कुल जुर्माना बनता है ------4000 रूपए। " 
कबीर को समझते देर न लगी के पुलिस वाला क्या चाहता है। उसको समझ आ गया के पुलिस वाला चालान काटने के बजाए हड्डी का स्वाद चखना चाहता है।कबीर असमंजस में पड़ गया के इस पुलिस वाले को कितनी घूस दे। इस समय ,कबीर को वो पुलिस वाला अपनी गली के उस कुत्ते की तरह लग रहा था जो बिना वजह वहां से निकलने वालों के पीछे दौड़ता और कभी -कभी किसी को काट भी लेता। क्योंकि कबीर जानता था के वो पुलिस वाला बिना वजह तंग कर रहा है। कबीर ने मन ही मन पुलिस वाले को मोटी  मोटी गालियां निकालते हुए साइड में आने का इशारा किया। अपनी जेब से 500 का नोट निकाल कर उसने पुलिस वाले की हथेली पर रख दिया।कार की सभी खामियाँ दूर हो चुकी थी।पुलिस वाले ने तुरंत चालान बुक बंद कर ली और आगे ध्यान से जाने की हिदायत देते हुए वहां से चले जाने का इशारा किया।
कबीर ने घर पहुँचते ही बाप को ये सारा किस्सा सुनाया।न जाने क्यों इस पूरे किस्से को सुनाते हुए कबीर अपने बाप से बिल्कुल ख़ौफ़ज़दा नहीं था। बाप ने कबीर को कुछ नहीं कहा और मंद -मंद मुस्कराने लगा।
बाप खुश था के कबीर ड्राइविंग के साथ साथ दुनियादारी भी सीख गया है।  
     

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